पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २
अन्न अमार अपार उठि, जिन्हि लीनौ दिय ताहि ॥
करस भोग भोजन भले, रची न मनसा काहि ॥
छं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥
उभय ईस अग सोम पुनि, अस्तुति मंडिड समुष्ष ॥
तब चिनेन तन ताप हर, संचन सेवक सुष्ष ॥
छं० ॥ ७ ॥ रु० ॥ ७ ॥
शिव जी की स्तुति करना ॥
कवित्त ॥ विदित सरन अति चपल । विमल मति कञ्ज निचक्खिनि ॥
गीत राग रस रटित । सती लंपट विस भच्छिन ॥
भुगति दैन जन विभव । भूर भूक्षित तन सोभित ॥
त्रिपुर दहन कविचन्द । केन कारन कृत लोक्कित ॥
श्रीविश्वनाथ संमित गवन । गरल त्रिलोचन रस कुसल ॥
मुष अमल कमल परिमल बहुत । भुगति चारु चर्मेन असन ॥
छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥
छन्द पद्धरी ॥ जत गरल कंठ दीसद्दति वोय । जिम चित प्रगट संसार नीय ॥
सारङ्ग उल्ह तृन पान पानि । दिव तुङ्ग जाल जब जवनि मानि ॥ ९ ॥*
जट मुकुट गंग दीसद्दि उतङ्ग । सोभन्त चन्द लिल्लाट रङ्ग ॥
सारङ्ग सूल सादूल चर्म । सेवक सहाय अघ हरत कर्म ॥ १० ॥
कटि विकट निकट नटवत चिभङ्ग । गनभूत लेय विभूत अङ्ग ॥
बुन्द जा काम जा आप झूल । जैजै सुईस माया अभूल ॥
छं० ॥ ११ ॥ रु० ॥ ९ ॥
साटक ॥ कल्याणी कपञ्चाल बाहु गह्यौ, गिरज्जाइ सारङ्गनौ ॥
बीभच्छौ रस तव्य नित्य रतयौ, मुब्वौ सदा तुङ्गयौ ॥
६ पाठान्तर-अमरअच । उठि । जिहिं । नहीं ॥
७ पाठान्तर-मंडिय मुष । म stir समुष्ष ॥
८ पाठान्तर-विन्नछन । विन्नच्छिनि । वियमक्षिन । विभौ । कृत । गवन । कुषल । चांद । चर्म्मन । भसल ॥
९ पाठान्तर-जुत । दीसहिति । जम । पांनि पांनि । * "दिव तुंग जाल दिव दिव न मांन" संवत १६४७ की पुस्तक में पाठ है ॥ ९ ॥ लिलाट । सादूल । चर्म । कर्म । विभूत । अभूल ॥