सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 333

छठां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो : ३२३
तो सम न और तिहु लोक में । नह सह नाटिकक नर ॥
संसार पार वोद्दिय समर । तोहि सात देवी सुबर ॥
छंदं ॥ १४८ ॥ रू० ॥ ६६ ॥
कवि चन्द का मंत्र जपना और होम करना ॥
दूहा ॥ सुनि आनंद्यौ चंद चित । कीन संत्त आरंभ ॥
जप्प जाप छवि होम सब । लग्ग्यौ कज्ज असंम ॥
छंदं ॥ १४९ ॥ रू० ॥ ६७ ॥
वीरों का प्रगट होना ॥
गाथा ॥ किय जप जाप सुछोमं । आए वीर धीर आतुरयं ॥
गज्जै गयन गभीरं । भय भै भीत सोर आघातं ॥
छंदं ॥ १५० ॥ रू० ॥ ६८ ॥
छंद भुजंगी ॥ धसंकी धरा धंम धंम्मै धरक्की । कठं पिठ कंमठ्ठ कठ्ठे करक्की ॥
डिग्गै अड्डिगं सो दिगंपाल दस्सं । तरक्कै चकै मुनि जंनं तपस्सं ॥१५१॥
अरक्कै सुवाजं सु वाजं विछुट्ठै । तरक्कैक एकं उलट्टै सुलट्टै ॥
इसो आगमं भै सुबावन्न वीरं । कंपे काइरं धीर रयौ सुधीरं ॥
छंदं ॥ १५२ ॥ रू० ॥ ६६ ॥
वीरों के शब्द से सामंतों का डरकर सोचना कि बिना काम इन को बुलाना ठीक नहीं हुआ ।
दूहा ॥ सुनिअ घात डर वीर कौ, चमकै चित सामन्त
इन आकर्षै कज्ज बिन, किनौं अप्प अमन्त ॥ छंदं ॥ १५३ ॥ रू० ॥ ७० ॥
६६ पाठान्तर-कहै । कुंवर । प्रथीराज । चरचा । चरचि । सतिय । दमहिं । घोरनि ।
धोरानं । कजि । पाबहि । सामंत । तिहुं । मैं । नट । भट । नाटिक्र ॥
६७ पाठान्तर-आनंद्यो । मंत्र । जप । सम । लगे । कज ॥
६८ पाठान्तर-गाहा । स । गजे ॥
६६ पाठान्तर-धम्मकी । धम । धम्मै । धम्मे । धम्मैं । धरकी । कमठ । कठे । फरकी ।
डिगै । डिगे । अडिगं । द्विगंपालं । दसं । तरके । तरकैं । चक्रे । मुनि । मुनि । जनं । तपसं ॥
१५१ ॥ भरके । बिखुटे । तरंकैक । उलटे । सुलटे । इसो । धीरं । कंपे । कंपैं । कायरं स ॥ १५२ ॥
७० पाठान्तर-सु आघात । चमके । कज । किनौं ॥