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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 470 में से

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पृष्ठ 335

छठां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो ३२५
सरदारों का बहुत उपाय करना पर हाथियों
का वश में न आना ॥
दूहा ॥ दौरि सकल सामन्त मिलि, करे अनन्त उपाहू ॥
रोस लगे छुटै नहीं, भई सुहायो चाहू ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७५ ॥
चिहूं ओर हरषी छुटै, परै अगड सुमार ॥
गोना लगे गिलोल्ल गुरु, छुटै न तो इसरार ॥
छं० ॥ १६० ॥ रु० ॥ ७६ ॥
गाथा ॥ वर वावंन सु वीरं । कौतिग लषन्त सूर सामन्तं ॥
करे अनन्त कळापं । नह छुटन्त गज गरुं च्यारू ॥
छं० ॥ १६१ ॥ रु० ॥ ७७ ॥
चन्द का बावन बीरों से प्रार्थना करना कि आप लोग इन
हाथियों को छुड़ाकर बाँध दीजिए ॥
दूहा ॥ तब कर जोरिय चन्द कवि, अग्गे वांवन वीर ॥
तुम सु छुडावहु मन्त कछु, बहुरि जरहु जञ्जीर ॥
छं० ॥ १६२ ॥ रु० ॥ ७८ ॥
भैरव की आज्ञा से बीरों का हाथियों को ज़ंजीर से बाँध देना ॥
अरिल्ल ॥ तब भैरव भूवाल वीर वर । कीन हुकम कालीय ऊंच कर ॥
छोरावहु गजराज पांनि गछि । बहुरि जरौ जञ्जोर थान कहि ॥
छं० ॥ १६३ ॥ रु० ॥ ७९ ॥
दूहा ॥ तब काली दोखौ तलपि । गज्ज कुराइ समत्थ ॥
उभै पांनि सौं रद उभै । गहै उभै वरहत्थ ॥
छं० ॥ १६४ ॥ रु० ॥ ८० ॥
७५ पाठान्तर-दोरि । सामंत । करै । उपाय । लगैं । छुटै । नही । स ॥
७६ पाठान्तर-चिहुं । उर । परे सुगड पर मार । लगें । गुरु । छुटै । तो । अस ॥
७७ पाठान्तर-बांधन । । सामंतं । करै । गुरुयादं । गरुआई ॥
७८ पाठान्तर-बावन । बांबंन । स ॥
७९ पाठान्तर-भुवाल । किंन । उंच । छोरावौ । पांनि । जरौ । यांनि । कहिं ।
८० पाठान्तर-गज । छोराय । समय । पांनि । सो । सं । हथ ॥