पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३३३
दूहा ॥ भयौ प्रात जगात द्वितिय, वंचि सुकग्गह पानि ।
आबू रा सळषान लिखि, बर गिर नारी बानि ॥
छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १७ ॥
उक्त पत्र में बीर रूप देवस्थान हिंगुलाज के प्रभाव से
पृथ्वीराज के बलवान होने और नाहरराय के बल
प्रताप का वर्णन ॥
कवित्त ॥ पूना कर पर वत्तह । कोरि दृह नीज सवायौ ॥
बीर रूप इक रुद्र । थांन हिंगुलाज बनायौ ॥
देवल एक अचम्भ । हेम जुत्तत्ति इक मंडी ॥
धूप दीप साषा* सूरङ्ग । धजा पत्ताकह ठण्डी ॥
दिषन सुथांन आचम्म वर । ज्यौ कवि मंची होइ कज ॥
कवि कहै चन्द वरदाइ बर । जौ चहुआन सुहोइ बज ॥
छं० ॥ २० ॥ रु० ॥ १८ ॥
कवित्त ॥ बर गिरनारि नरेस । सिंधु वही सुर तानं ॥
तेज तुज्झ तप तेज । बैर भंजै अरि पानं ॥
वर गुज्जर बैसाचि । जगत अड्डौ सुस्त्र बज ॥
तिन मुक्कत्ति दिय दूत । राज सम्भरिय षित्ति षल ॥
परिहार नाथ नाहर नृपति । दुह बळ्यो इक इक अग ॥
जानें कि जरा जुब्बन दुवन । सामन्तां संतोष भग ॥
छं० ॥ २१ ॥ रु० ॥ १८ ॥
कवित्त ॥ दूत सामन्तन नाथ । बाथ बडवानल घल्लै ॥
सण्डल घल्लै नाथ । सार अग्गी षल जल्लै ॥
अकह कहांनी करन । सरन रषन असरन बज ॥
सुथिर अस्थिर करि थपन । अंग जग जन दारुन दज ॥
१७ पाठान्तर—पांनि । पांन । बांनि ॥
१८ पाठान्तर—परवत्तह । प्रबतह । घांन । घांनि । हिंगुंलाज । फुत्तरि । पुतलि । * अधिक
पाठ है । सुरङ्गु । पताकह । दिपिन । सु यांन । ज्यो । कहैं । जो । चहुवांन । चहुआंन ॥
१८ पाठान्तर—बटी । पांनं । गुजर । अडौ । मुकलि । पित्त । पल । जाने । जुबन । सांमन्तां ॥