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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

३२२ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २४
अरिल्ल ॥ कहै कन्ह हम मानी सब्बह । भुल्यौ भह मग्गा वन तब्बद्द ॥
उसन केलि डर जोरिय बत्तं । इह अचिञ्ज मन्नै न बिसत्तं ॥
छं० ॥ १४५ ॥ रु० ॥ ६२ ॥
पृथ्वीराज के मन में सन्देह हो जाना ॥
दूहा ॥ किचि मंनी अमनी सुकिचि, चिविधि जानि संसार ॥
सुनत राज विभ्रम भयौ, पच्यौ सुचित्त बिचार ॥
छं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ६३ ॥
इतने में चन्द का आकर आसीस देना ॥
इहि विचार करवह मनंह, आयौ चंद सुतन्त्र ।
दिय असीस कर उंच करि, वेद नीत वर कब्ब ॥
छं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ६४ ॥
पृथ्वीराज का चन्द को पास बुलाकर वीरों की बात छेड़ना ।
राजद्द सूर हकार जिय, दिय सादर सनमान ।
वीर बिरद बरदाय प्रति, लग्गे बत्त पुछान ॥
छं० ॥ १४७ ॥ रु० ॥ ६५ ॥
पृथ्वीराज का चन्द की बड़ाई करके कहना कि हम लोगों की
बड़ी अभिलाषा है सो आज वीरों का दर्शन करवाओ ॥
कवित्त ॥ कहै चंद कविराज । बत्त पूरब जो बित्तिय ॥
कथिय कुँअर प्रथिराज । चंद चरची सो सत्तिय ॥
हमहि बहुत अभिलाष । देव वीरनि दरस कज ॥
पावहिं तो परसाद । सूर सामंत मंत अज ॥
६२ पाठान्तर-कहँ । मांनी । भुल्यौ । मग । तबह । जोरीय । सुभ हित डबर गाम सपत्तं । अचिर्जं ॥
६३ पाठान्तर-किहिं । स । किहिं । चिधा । जांनि । चित ॥
६४ पाठांतर-इह । घिवारि । तंब । दीय ।
६५ पाठान्तर-राज । हक्कार । सनमांन । वरद । वरदार । लगे । पूछानं ॥