पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । ३२१
दूहा ॥ तब कहैं कुँअर सामन्त सब, काल्हि आखेटक रंग ।
भयौ सुर सुभैं एक भय, आलस ही सें गंग ॥
छं० ॥ १४१ ॥ रु० ॥ ५८ ॥
कवित्त ॥ अपरंजे आखेट । चन्द भुल्यौ सुवह वन ॥
जंगम इक तापस । मिल्यौ वरदाइ सुद्ध मन ॥
प्रसन भयौ कविचन्द । वीर मन्त्रह दीनौ वर ॥
अजमायौ कविचन्द । वीर बावन दरस चिर ॥
तिन देखि अमित चरितह सुनत । बरनै कवि बरदाइ अति ॥
अनेक रूप अनेक गुन । अनँत गति अनतह सुमति ॥
छं० ॥ १४२ ॥ रु० ६० ॥
सरदारों का उपहास करके कहना कि भाट, नट, चारन, ये सब
आरत हैं इन की बात सत्य नहीं माननी चाहिए ॥
अरिल्ल ॥ प्रसन सूर सामन्त सकल वर । हासे अप्प परस्पर सुब्भर ॥
भट नट चारन जू आरत्तह । इनकी गति न मनियै सत्तह ॥
छं० ॥ १४३ ॥ रु० ॥ ६० ॥
कैमास ने कहा कि चन्द को देवी ने वरदान दिया है वह
सचमुच कोई अवतार है ॥
गाथा ॥ कथिय वर कैमासं । देवी वरदाय चन्द भटायं ॥
अस तिन चवै असेसं । सत्यं रूप सत्य अवतारं ॥
छं० ॥ १४४ ॥ रु० ॥ ६१ ॥
कन्ह ने कहा कि चन्द छूट गया था यह बात सच है, इसी पर
उसने यह बात प्रसन्न करने के लिये गढ़ी है ।
५८ पाठान्तर-कुमर । कुंअर । काल्हि ॥
६० पाठान्तर-अपरजेन भयौ । कविचंद । भूल्यो । बट । तापस । मिल्यौ । चंद ।
बरने । बरदाय । अनेक । अनत ॥
६० पाठान्तर-प्रसंन । सुभर । भट्ट । नट्ट । चारंन । जु । आरतह । मनिये ॥
६१ पाठान्तर-कथिय । भटायं ॥