पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां समय = ६] पृथ्वीराजरासौ । ३२७
वीरों का प्रसन्न होकर पृथ्वीराज से कहना कि वर माँगों सो
हम दें और अब हमको विदा करो ॥
दूहा ॥ भये त्रिपत वीराधिवर, पूरन डक्क डकार ॥
अनि आनन्दत उल्हसंत, बोले वयन वकार ॥
छं० ॥ १७० ॥ रु० ॥ ८४ ॥
मङ्गि मङ्गि महिपत्ति तुअ । सोइ समर्प्पै आज ॥
दै सुविहा न विलम्ब करि । जु बाकु चित्त तुअ काज ॥
छं० ॥ १७१ ॥ रु० ॥ ८५ ॥
पृथ्वीराज की ओर से चन्द का कहना कि लड़ाई के समय
हमारी सहायता कीजिएगा ॥
गाथा ! जंपे वर बरदाई । तुम वरं वीरं देव देवाधिं ॥
औ प्रथिराज सहाई । जुद्धं जय राज जुहाईं ॥
छं० ॥ १७२ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
भैरव का चन्द को बुलाकर कहना कि जब तुम्हें टेढ़ा
समय आवै तब हम को याद करना ॥
गाथा ॥ तब वर भैरव वीरं । उच्चारीगं संसुप्पं चन्दं ॥
जं तुंम वंकट ठारं । तं सँभारं विचित्त अम्हाएं ॥
छं० ॥ १७३ ॥ रु० ॥ ८७ ॥
गाथा ॥ परतिषि अम्ह सुपुह्वं । करयं जुद्धं तव्व साहस्सं ॥
जथ्यं चडिउन चन्दं । तथ्यं करै न हम आगमं ॥
छं० ॥ १७४ ॥ रु० ॥ ८८ ॥
८४ पाठान्तर-नृपति । डंक । डक । आनन्द तन । बैन ॥
८५ पाठान्तर-महिपति । समर्प्यै । दैह । तूं कछु चिंतत काज ॥
८६ पाठान्तर-जंपै । वर । बीर । देवधि । वीर देवाधि । जुटाई ॥
८७ पाठान्तर-उच्चारिग चंद संमुषं । तुंम । वंकठ । ठौरैं । संभारै । संभारे । विचित्र ।
अम्हाई ॥
८८ पाठान्तर-अंम्ह । जुहु । तब । साहसं । जयं । तथं । हंम्म । आगमं ॥
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