पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
आराधंत बर ग्यान, होइ संसार सुघात्यौ ।
दैवक्रत्त करि जोग, सोइ पाषान उघात्यौ ॥
रुधि रुंड छुट्ठि संमुह चलिय, चत्ति अद्भुत सु दिप्पियौ ।
परिगह पवास संची नृपति इन आहिज्ज सुलप्पियौ । कुं० ॥ २४ ॥ छ० ॥ २४ ॥
पाषाण का उखाड़ लेना सुन व्यास का दुखित हो
राजा के पास आना ॥
दूहा ॥ सुनि आयौ वर व्यास तँह, दुप पायौ मन मज्झ ।
का जंप्यौ मुप नृपति सैं, इह मति मूढ अभुज्झ ॥ कुं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २५ ॥
अनंगपाल का पश्चाताप करना और व्यास का आगम कहना ॥
कवित्त ॥ अनंगराय चक्कवै, बुद्धि जो इसी उकिल्लिय ।
भयौ तुम्हार मति हीन, करी किल्लिय तैं ढिल्लिय ॥
कहै व्यास जग जोति, अगम आगम हौं जानौं ।
तूंअर तैं चहुआन, अंत व्हैहै तुरकानों ॥
तूंअर सु अवहि संडव घरह, इक्क राइ वलि दिक्कवै ।
नव सत्त अंत मेवात पति, इक्क छत्र महि चक्कवै ॥ कुं० ॥ २६ ॥ छ० ॥ २६ ॥
व्यास का अनंगपाल को खेद न करने का उपदेश करना ॥
पद्धरी ॥ उच्चरयौ व्यास जग जोति वीर । मृत सुग्गं लोक पाताल नीर ।
चयकाच्च दरस दरसिय सु देव । व्यासहि समान जोतिगिय तेव ॥ कुं० ॥ २७
संसार सार अस्सार कीन । वर व्यास बुद्धि कोविद प्रवीन ॥
मंडयौ सु राज सैं क्रोध नूप । वरज्यौ सुकिष्ण व्यासह सरूप ॥ कुं० ॥ २८ ॥
२४ पाठान्तर-अनंगपाल । प्रथवी । अचरिज । वत । होइ । सोइ । जांन्यो । ग्यान ।
सोय । सोइ । चलोय । अद्भूत । दिपियै । परिग्रह । न्रपति । आदिज । लिपियै ॥
२५ पाठान्तर-तहां । तह । मंझ । न्रपति । सो । मूढ मति असमंझ ॥
२६ पाठान्तरः- अनंगपाल । यती । उफुल्लित । भय । तौंवर । तैं । ढिल्लीय । किल्ली । हूं
जांनां । तोअर । तैं । चहुवांन । ह्वैहैं । होइ है । तुरक । इक । राइ । बिकवै । अंति । मनि । इक ।
छत्र० । चक्रवै ॥
२७ पाठान्तर-उचयौ । मृत । स्वर्ग । समांन । जोत्तगी । असार । बुधि । सौ ॥
२८ जनमेज । मत । मांन । आंनी । ध्यांन ॥
२६२ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय ८
जनमैज राज तस मत्त मान। आनो न चित्त तिन निमष ग्यान ॥
क्षिति राज सरिस रिष राइ बोलि। कीनीय बत्त तुम गत्त खोलि॥छं०॥२८
हूं गड्डि गयौ किल्ली सजीव। इछाय करी ढिल्ली सईव ॥
तुंअर अवहि संडव सुथान। भोगवै भूमि सुरतान पान ॥ छं० ॥ ३० ॥
सो मत्ति जानि तुंअर चिनेत्त । मति करै रोस राजन सुचेत ॥
जान्यौ सु कह्यौ बर व्यास रूप । झूटी सु बत्त बरजित्त भूप ॥ छं० ॥ ३१ ॥
हिन्दून् † जानि पंडव सु वंस । तिन भयौ अंस पारत्थ नंस ॥
तिहि वंस भीम अरु भ्रम्म सुत्त । तिहि वंस बली अनगेस तुत्त ॥ छं० ॥ ३२
मति करहु सोच सम संच मानि । हुअ राज काज वर चहुवान ॥
बर वंस सुमति अति मति प्रताप । दिन कितक तपै चहुवान आप ॥ छं० ॥ ३३ ॥
फिरि व्यास कहै सुनि अनग राइ । भवतव्य बात मेटी न जाय ॥
रघुनाथ हाथ त्रैलोक देव । ते कनक म्रग्ग आगे पछेव ॥ छं० ॥ ३४ ॥
- ये दोनो पाद सं० १५४७ की लिखित पुस्तक में नहीं है और उसके इधर की संवत् १८५६
की में हैं ॥ २८ ॥ हुं । क्रिलि । किली । गड़ि । हलाप । ढिली । इव । तुंअर । अवंटि । सुथांन ।
सुरतानं । पांन ॥ ३० ॥ मति । जांनि । तोंअर । जांन्यौ । झूठी । स । वरदत्ति ॥ ३१ ॥ जांनि ।
पारथ । धूम्म सुत । वमं । वली । तुत ॥
३२ पाठान्तर-मांनि । हुय । चाहुआनं । चाहुवांन ॥ ३३ ॥ राय । मृग । लगे ॥ ३४ ॥
† इस महाकाव्य में “हिन्दू” शब्द यहां पर आया है । उसकी व्युत्पत्ति वाचस्पत्य
बृहतसंस्कृताभिधानकर्त्ता और शब्दकल्पद्रुमवाले ने पुंल्लिङ्ग में यह की है-
“हीनं दूषयतीति । दुष+डुः पृषोदरादित्वात् साधुः । जातिभेदे । जातिविशेषः ॥”
और उसका प्रयोग मेरुतंत्र में यह दिखाया है-
पश्चिमाम्नायमंत्रास्तु प्रोक्ताःपारस्यभाषया । अष्टोत्तरशताशीतिर्येषां संसाधनात् कलौ ॥
पंच खानाः सप्तमीरा नव शाहा महाबलाः । हिन्दुधर्म्मप्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्त्तिनः ॥
हीनं च दूषयत्येन हिन्दुरित्युच्यते प्रिये ! मेरुतन्द्रे २३ प्र० ॥
और भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व्व के तृतीय खंड के दूसरे अध्याय में लिखा है कि विक्र-
मादित्य के पौत्र शालिवाहन ने पितृराज्य पाने पर शकादि को जीत कर आर्य्यदेश और म्लेच्छ-
देश की सीमा इस प्रकार से स्थापित कीं-
एतस्मिन्नन्तरे तत्र शालिवाहन भूपतिः ॥ १७ ॥
विक्रमादित्यपौत्रश्च पिताराज्यं गृहीतवान् ॥
जित्वा शकांन्दूराधर्षींश्चीनतैत्तिरिदेशजान् ॥ १८ ॥
बाल्हीकान्कामरूपांश्च रोमजान्खुरजांछठान् ॥
तेषां कोषां गृहीत्वा च दंडयोग्यानकारयत् ॥ १६ ॥
स्थापिता तेन मर्यांदा म्लेच्छार्य्याणां पृथक् पृथक् ॥
तीसरा समय ६] पृथ्थीराजरासो । २६३
मारीच अप्य आवै छरन्न । दुइ दोन चार सीता हरन्न ॥
पंडवन जाग आरंभ कीन । वरज्यो सु व्यास पंडित प्रवीन ॥ छं० ॥ ३५ ॥
दुरवास दारिका दिषन आइ । जदवन बान्न संह्यौ उपाइ ॥
करि पुरुष नारि रचि गर्भ घास । कछ देव याचि उपजै सु आस ॥
धिजि कछी विप्र तस उदर जोइ । जदवन वंस नष्यै सु षोइ ॥
वरजे सुअम्भ सुत रमन जूप । देषंत अंध ते परे कूप ॥ ३७ ॥
केतेक कद्यौ सुनि अनंग राइ । जानति जान कीनौ उपाय ॥
भवतव्य बात उतपात मोटि । मिटै न बुद्धि कोइ करौ कोटि.॥ ३८ ॥
जिन करौ भेद उपदेस मोहि । धौं जानि ग्यान इछ कद्यौ तोहि ॥
करि घरा भ्रम्म उद्धारि देह । संसार अनित्त छंडौ सनेह ॥ ३९ ॥
द्वैलोक जीत्ति जिन जेरं कीन । ते गये अंत हुइ आपु छीन ॥
फूक गल्ह अमर संसार सार । रप्पै न पहुमि ते बड़ गमार ॥
छं० ॥ ४० ॥ रू० ॥ २७ ॥
सिंधुस्थानमितिज्ञेयं राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम् ॥ २० ॥
म्लेच्छस्थानं परंसिंधोः कृतं तेन महात्मना ॥ २१ ॥
यदि यह माननीय है तो स्पष्ट है कि "हिंदु" शब्द तो "सिंधु" का और "हिन्दुस्थान"
शब्द "सिंधुस्थान" का अपभ्रष्ट है अर्थात् वह यावनी नहीं है। यदि उनको यावनी भी मानें तो
भी तो आजकल हमारे देश में बड़ी ही प्रबलता से यह माना जाता है कि संसार भर की सब
भाषा हमारी संस्कृत से ही निकली हैं। अत एव फिर हम को बतलाना पड़ेगा कि यावनी "हिंदु"
शब्द किस संस्कृत शब्द का अपभ्रष्ट है? और जब वह संस्कृत का अपभ्रष्ट है तो फिर उससे
घृणा क्यों करनी चाहिये ?
तथा हमारे दिये इस प्रमाण से पुरातत्ववेत्ता विद्वानों के विचारार्थ एक यह प्रश्न भी
उपस्थित होता रहे कि इससे तो शालिवाहन का विक्रम का पोता होना विदित होता है और
अन्य शोधों के अनुसार प्रचलित शालवाहन शककर्त्ता कनिष्क नामक सिदियन राजा माना
जाता है। हमारी देशीसाक्षी से विक्रम और उसके पोते शालवाहन का १३५ वर्ष का अंतर
असंभव होना प्रतीत नहीं होता है। इस के अतिरिक्त शालवाहन का बौद्ध हो जाना भी कहा
जाता है और शक भी बौद्ध धर्म्मावलंबी माने जाते हैं। क्या आश्चर्य है कि यह शालवाहन ही
शक धर्मावलंबी हो कर कनिष्क नामक राजा हो गया हो और हमारे यहां उसके पहिले नाम
से ही शक प्रख्यात चला आया हो ?
पाठान्तर-अप । होइ । होय होनहार । जाय ॥ ३५ ॥ द्विषिन । आय । जदखन । उपाय ।
कद्यौ ॥ ३६ ॥ जदखन । नंषिय । अंत ॥ ३७ ॥ कह्यों । अनंगराइ । जानंत । जांनि । जान । कीनसु ।
मौट । मिटै । बुधि । को । कोट ॥ ३८ ॥ उपदेश । हूं । झांनि । धर्म्म । उद्धारि । छंदो ॥ ३९ ॥
जोर । तेउ । गए । होइ । रखै । पहमि । गवार ॥ ४० ॥
२
२६४ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय १०
अनंगपाल के पीछे जो जो दिल्ली के राजा होंगे उनके
विषय में व्यास का भविष्य कथन करना ॥
तुँअरों का नाश और चौहानों का राज्य होगा ॥
कवित्त ॥ सुनि अनगेस नरेस, सोचि इह आगम बुझै ।
अंत राज चहुबान, सोचि इह बेगो सुझै ॥
सब तूंअर पग मग्ग, भिरिंग मंडव आहुहै ।
सार धार धर भूमि, सुगति पय बंधन कुहै ॥
इह दोस राज दिज्जै नहीं, मैं बहु बार बरज्जियौ ।
भवतव्य बात मिहैं न को, होइ सु ब्रह्म सिरज्जियौ ॥ छं० ॥ ४१ ॥ रु० ॥ २८ ॥
चौहानों के पीछे मुसलमान और उनके पीछे फिर
हिन्दुओं का राज्य होगा ॥
कवित्त ॥ ता पच्छै सुनि राज, राज सज्जै चहुआनिय ।
बहुत काल अन्तरै, तपै पुहमी तुरकानिय ॥
मेच्छ अवनि तप छुटि, प्रलै हुइ है तिन बंसह ।
बहुरि जोर हिन्दून्, राज छुइ है इक अंसह ॥
संघारि सकल दानव कुलह, धर्म्म राज सह विस्तरै ।
जितै जगत तप प्रबल करि, आनि दिसा बिदिसा फिरै ॥
छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ २९ ॥
फिर मेवालपति सं० १६७१ में दिल्ली जीत लेंगे* ॥
कवित्त ॥ नव सत्तै वर अंत, बहुरि ढिल्ली पति होई ।
पग्ग पोद घुरसान, पहुमि चक्कवै सु जोई ॥
२८ पाठान्तर—चहुआंन । बेघो । सूझै । तोअंर मग । मैं । वरजयौ । मेटै । होय । सिरजया ॥
२९ पाठान्तर—पछै । चहुआंनिय । चहुआंनीय । तुरकानीय । मेछ । मेछि । हूै हैं । हिन्दून् । हूँ । दानव । आनं । दिशा । फिर ॥
- यह ३० और ३१ दोनों रूपक पुरानी पुस्तक सं० १६४७ की लिखी में वास्तव में तो
नहीं हैं । परंतु उसके पत्रे के किनारे पर किसी अन्य ने पीछे से इन दोनों को लिख दिया है ।
और उस के पीछे की नवीन पुस्तकों में इन दोनों के पाठ हैं । संवत् १८३८ की में तो “मेवातपति”
तीसरा समय ११] पृथ्वोराजरासो । २६५
मदि मेवात महीप, दीप दीपनि दल मंडै ।
क्किक्क रहें पय आप, इक्क पल पिंड निपंडै ॥
मंडै सु पहुमि प्रथिराज जिम, सत्त वात जोनिक जपिय ।
मानी सु सत्ति करि सबनि हूर, व्यास वचन व्यासच्च थपिय ॥
छं० ॥ ४३ ॥ रू० ॥ ३० ॥
दूहा ॥ सोरै सै सत्थोत्तरै, विक्रम साक बदंति ।
ढिल्ली धर मेवातपति, लैंहि पग्ग बल जीत ॥ छं० ॥ ४४ ॥ रू० ॥ ३१ ॥
व्यास का कहा हुआ भविष्य नहीं टरेगा ॥
कवित्त ॥ तिद्धि जथ वत्त प्रमान, सुनहि दिढ तुच्छ सुचंतं ।
वर म्लेच्छनि सत घटइ, धर्म्म पारस रस रतंतं ॥
हुइ नव सत्त प्रमान, ध्रुअ टरइ रवि टरइ ।
टरै न व्यास बचन्न, मान जस तें अजु टरई ॥
ए सब अजान सुता जु धी; परी इक्क मक्की मुची ।
परि पै प्रसन्न परतीत करि, तब काढत ग्राबह जुची ॥ छं०॥४५॥रु०॥३२॥
माता का दान और होम करना ॥
भुजिङ्गि ॥ सुनि श्रोतान भए चहुआनं, कही मान मति तत्त सुजानं ।
बहुरि पुच्छि दुजराजन आनं, कियौ होम दै दान प्रमानं ॥ छं० ४६॥ रु०३३॥
पाठ है और सं० १६४७ की प्रति में "मेवारपति" पाठ है । वैसे ही पहिली में १५७७ और दूसरी
के में १०७७ पाठ हैं । निदान ये दोनों तो स्पष्टरूप से क्षेपक हैं । तथा हमारे पाठकों के ध्यान
में रहे कि उदयपुर वाले स्वर्गवासी कविराज श्यामलदासजी ने जो इस महाकाव्य का आद्योपान्त
जाली बनना संवत् १६४० से लेकर १६७० तक के भीतर माना है उसका आधार इन क्षेपक
रूपकों में से रूपक ३१ पर रक्खा है । उसके जाली बनने के समय के विषय में हमने आदि पर्व की
"उपसंहारणी टिप्पणी" पृ० १७५-१७८ तक वाक्य ३ और "पृथ्वीराजरासो की प्रथम संरक्षा" के
पृष्ठ ३४ से ३७ तक वाक्य १७ में सविस्तर कथन किया है अतएव यहां अधिक नहीं कहते हैं ॥
३० पाठात्तर-सत्तै । ढिली । पग । पोढि । चकवि । मेबाद । ढिक आहू रहि पाइ ।
सति । जपिय । थपीय ॥
३१ पाठान्तर-सोरैं । सतरिसे । सित्योतरि । विक्रम। शाक । ढिल्ली । मेवारपति । लइ । पग ॥
३२ पाठान्तर-अथ । बत । प्रमांन । तुक्क । म्लेकनि । होय । सत । प्रमान । मांन अजांन
हक । मकी । घरी इक मकी मही । पस्र्यै । प्रसन ॥
३३ पाठात्तर-छंद वाघा । चहुआनं । सुजानं । पुंछि । दुजराजनि ॥
२६६ पृथ्वीराजरासो । [ तीसरा समय १२
मातुल का अपने मन में मोह करना ॥
दूहा ॥ सुनत सुपन सोमेस सुअ, बज्जाए बर बाज ।
गिन्यौ सु मातुल सोच मन, औ अवनिंय काज ॥ छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥३४ ॥
पृथ्वीराज का स्वप्नफल सुन आनन्द में फूला न समाना ॥
पद्धरी ॥ सुनि सुंपन मात फल कहै राइ । दरिया तरंग मनं मोज पाइ ॥
ज्यों सोए सेह आगम अनंद । राका चकोर ज्यों मुझ चंद ॥ ४८ ॥
चंदनह बन्न ज्यौं पाय चिन्ह । तिह नाह पिष्ष ज्यौ सुभग सिंघ ॥
संग्राम भूमि ज्यौं सुभट पिष्ष । गुरु विह्यावंत ज्यौं पाय सिष्प ॥ ४९ ॥
घत्तार घत्त ज्यौं दृष्ष चोट । दातार पाइ जाचिक्क टोट ॥
पंडिप्त पाइ ज्यौं गुनियगाह । व्यांपार पाइ ज्यौं साह चाह ॥ ५० ॥
परि वित्त पेपि ज्यौं खेल ज्वारि । कुछ कैल पाइ लंपह नारि ॥
ध्यानंद सु यौं प्रथिराज पाइ । फुल्ल्यौ सु अंग अंगह न साइ ॥ ५१ ॥
बज्जे अनंत वज्जांच्च अनंद । दिय दान विदुष दुज भह वृंद ॥
दिन दिन नरिंदं तन दसा बढ्ढि । चढढंत दीह जो दसा चढ़ि ॥ ५२रु०३५
स्वप्नफल सुन कर पृथ्वीराज की सर्वस्व वृद्धि कैसे होने लगी ॥
कवित्त ॥ चढत नही जिम सेह, नेह नवला जुबनागम ।
सिद्धदाह दिन चढत, सु गुरु सिष्यक विद्या क्रम ॥
सस्त्र ओप ज्यौं अरनि, लच्छि व्यापारह बढ़त ।
बढ़त भह गज बंस, बेलि द्रुम सीसच चढ्ढत ॥
जिम सरह रयनि सुद पष तिथि, बढ़त कला ससि तम गमत ।
चहुआन सूर सोमेस सुअ, रूम सुदसा दिन दिन जमत ॥ छं० ॥५३॥ रु०॥३६॥
कवित्त ॥ बढ़त पटन उमराव, बढ़त साधन तुरियन दल ।
बढ़त भंडारन दाम, बढ़त कोठार अन्नबल ॥
३४ पाठान्तर-अधनिय ॥
३५ पाठान्तर-राय । दरीयाव । पाय । मुख । पाइ । चिन्ह । पखि । सील । पिखि । विद्या-
बंत । सिखि । दृष्टि । जाचिग । पंडित । गुनयग्राह । लंपट । पाय । माय। दानं । चढंत । दशा । चढ़ि ॥
३६ पाठान्तर-लक्ष । वढत । चहुआन ॥
तीसरा समय १३] पृथ्वीराजरासो । =६७
जमद्दर पानान यस्त, वढत दानन दिन ही दिनं ।
छह संस तरवारि, वढत सस्त्रन्न पिन छि पिन ॥
वढंत कित्ति दिन दिन अमन्द, प्रथीराज सोमेस सुत्र ।
दस दिसा जोति दिन दिन वढत, महा निसा पछ जानि धुअ ॥
छं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३७ ॥
पृथ्वीराज का अजित अवतार होना ॥
कवित्त ॥ सहरि गईमछ सूर, नूर नवलून नवछा मुप ।
चार वरन चिर आव, गेह विलसंत महा सुप ॥
पदत मैवासन घाउ, दाध दिज्जन दुज्जन घर ।
अडटनि उटत सुटंड, थप्पि थिर करत अप्प घर ॥
चिंधु चक्क छक्क घर थर धरत, पिसुन पिंजि किज्जय नरम ।
अवतार अजित दानव मनुष, उपजि सूर सोमच करम ॥
छं० ॥ ५५ ॥ रू० ॥ ३८ ॥
लोहाना का गैरव में से कूदना और अजानवाह
नाम और जागीर पाना ॥
कवित्त ॥ षोडस गज उरह, राज जमै गवप्प तस ।
संझ समय चीतार, पच कीनो पेसकस ॥
देषत संभीरनाथ, हथ्थ कूटन हथ सारदा ।
तीर कि गोरि बिछुदि, तुहि असमान की तारदा ॥
अधवीच नीच परतें पछिल, लोहाने लीनो झरपि ।
नट कळा खेलि जनु फेरि उठि, आनि हथ्थ पिथ्थउ अरपि ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ *
३७ पाठान्तर-भंडारन १ दांम । तरवार । वढंत ॥
३८ पाठान्तर-सहरि । च्यारि । दुजन । अरटन । दटत । थपि । अप । चिंडु । चक ।
हक । किजय ॥
३८ पाठान्तर-गंवध । चित्रकार । हथ । आसमान । आनि ॥
- ये ३९ । ४० दो रूपक सं० १६४७ की पुरानी पुस्तक में नहीं हैं और इधर की सं० १८५९
में हैं ॥
२६८ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय १४
गाथा ॥ हरषि राज प्रथिराजं, कीरति कीन सूर सामंतं ।
बगसि ग्राम गजबाजं, अजानंबाह दीनयं नामं ॥ छं० ॥ ५७॥ रु० ॥ ४० ॥ *
दिल्ली किल्ली कथा का उपसंहार ॥
दूहा ॥ सुपन सुफल दिल्ही कथा, कही चंदवरदाय ।
अब अग्गे करि उच्चरौं, पिथ्य अकूँर गुन चाय ॥ छं० ॥ ५८ ॥ रू० ॥ ४१ ॥
इति श्रीकविचंदविरचिते पृथ्वीराजरासके
दिल्ली किल्ली कथा वर्णन नाम तृतीय
प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ : :
*४० पाठान्तर-ग्रांम । बाज । अजांनं ॥
४१ पाठान्तर-दिल्लोय । वरदाय । अगैं । उचरौं । पिथ । कूँअर । गुनचार ॥
[तीसरा समय १५] पृथ्वीराजरासो । २६६
उपसंहारणी टिप्पण ।
जो कुछ हमने प्रथम और द्वितीय समय की टिप्पणी और उपसंहारणी टिप्पण में कहा है
वह हमारे पाठकों के ध्यान में होगा और जो अब निवेदन किया जाता है वह भी उसी के साथ
सदैव स्मरण में रहेगा। क्योंकि वह सब इस महाकाव्य के विषयक अनेक वाद विवादों के
विचार और निर्णय करने के समय बहुत ही उपयोगी होगा॥
अब इस तीसरे समय-दिल्ली किल्ली कथा-का मूल लेख हमारे पाठकों की सेवा में
उपस्थित है। और जो कुछ उन्होंने अब तक इस महाकाव्य के नाम से अनेक दंत कथा और
वृत्तान्त पुस्तकादि में पढ़े और सुने हैं वे भी उन्हें ज्ञात हैं। अत एव अब यह एक बहुत ही अच्छा
अवसर है कि हम उन दोनों का मिलान कर के देखें कि क्या आज कल के ग्रन्थकर्त्ताओं ने भी
अपने लिखे वृत्तान्त ठीक ठीक इस महाकाव्य के वृत्तान्त के अनुकूल ही लिखे हैं, अथवा उनको
बदल कर उनमें कुछ और अपनी मनमानी घडन्त भी करी है? यदि उनमें परिवर्तन किया गया
है तो क्या उनका ऐसा करना ठीक है? मूल में मिला हुआ अगला क्षेपकांश तो अब निश्चित
होना कैसा कठिन हो रहा है, तिस पर भी क्या आधुनिक ग्रन्थकर्त्ताओं का भूल से विरुद्ध
कथन करना मानो नवीन क्षेपक मिलाना नहीं हो सकता है? आश्चर्य यह है कि आज कल के
ग्रन्थकर्त्ता प्रतिज्ञा तो पृथ्वीराजरासो वा कवि चंद के कथनानुसार अपने कथन करने की करते हैं
और जब उनकी ऐसे मूल से मिलान कर के परीक्षा की जाती है तब उनके वृत्तों में रात्रि दिन
का सा अन्तर दीख पड़ता है! इसके केवल दो तीन ही उदाहरण हम यहां पर दिखाते हैं, अन्यो
का विचार हमारे पाठक स्वयं कर लेंगे-
(क) हिन्दी रीडर नंबर ५ अर्थात् हिन्दी शिक्षावली भाग पंचम नामक पुस्तक जो पाठ-
शालाओं में पढ़ाई जाती है और जिससे बालपन से ही हमारे बालकों के हृदय पर संस्कार
होता है उसमें कवि चंद के नाम से यह कहा हुआ है-
“चंद कवि लिखता है कि तोमर वंश के १६ वें राजा अनंगपाल ने पृथिवीराज के जन्म
के उत्सव के लिये व्यास नामक एक ब्राह्मण से मुहूर्त्त पूछा। ब्राह्मण ने कुछ सोच कर उत्तर
दिया कि यही शुभ समय है, इस कीली को गाड़िये और यह शेषनाग के सिर में जा लगेगी और
फिर तुम्हारा राज्य अचल हो जायगा। यह कह कीली को धरती में गाड़दी। परंतु राजा को
विश्वास न हुआ। निदान उसने उस कीली को निकलवा डाला जो निकालने पर लोहू से
भरी मिली। तब ब्राह्मण ने राजा से कहा कि तुम्हारा राज्य कीली के समान अस्थिर हो
जायगा और तोमर वंश के बाद चौहान वंश के राजा राज्य करेंगे और उनके बाद मुसलमानों
का राज्य होगा। राजा ने क्रुद्ध होकर उस ब्राह्मण को देश से निकाल दिया परंतु वह अजमेर
में चला गया जहां कि उसका मान अधिक हुआ॥”
(देखो हिन्दी शिक्षावली पंचम भाग पृष्ठ ४१)॥
(ख) तथा उसी पुस्तक में शाहजहां के समय में हुए भट्टराव कवि के लिखे इस वृत्तान्त
को भी पढ़िये-
२४० पृथ्थीराजरासो । [ तीसरा समय १६
"व्यास ब्राह्मण ने तोमर वंश के प्रमर राजा अनंगपाल को एक पच्चीस अंगुल लंबी कीली
दी और उसने कहा कि इसको धरती में गाड़िये। शुभ संवत् ७९२ अथवा दूसवी सन् ७३५
में बैशाख बदी त्रयोदशी को राजा ने इस कीली को पृथिवी में गाड़ दिया। तब व्यास ने राजा
से कहा कि अब तुम्हारा राज्य अचल हो गया क्योंकि यह कीली शेषनाग के माथे में गड़ी है।
जब ब्राह्मण चला गया तब राजा ने उस की बात का विश्वास न कर कीली को उखाड़ देखा
तो उस को लोहू से भरी पाया। राजा ने भय भीत हो उस ब्राह्मण को फिर बुलवाया और कीली
को फिर गाड़ने की आज्ञा दी। परंतु कीली उन्नीस ही अंगुल पृथिवी में धसी और ढीली रही।
तब ब्राह्मण ने कहा कि तुम्हारा राज्य इस कीली के सदृश अस्थिर रहेगा। और उन्नीसवीं पीढ़ी
के बाद चौहानों के हाथ जायगा। और उनके बाद मुसलमान राज्य करेंगे"॥
(देखो हिन्दी शिक्षावली पंचम भाग पृष्ठ ४१)॥
तदनन्तर "पृथ्वीराज चरित्र" नामक पुस्तक को पढ़िये। उस के कर्ता ने भूमिका में हम को
यह कह कर उस के लेख की परम प्रामाणिकता का विश्वास कराया है-
"प्रगट है कि पृथ्वीराज रासा नाम का पुस्तक भारतवर्ष के इस प्रान्त (राजपूताना) में
अति ही प्रसिद्ध है और प्रत्येक चत्री व चारण भाट इस के लिये निर्विवाद ऐसा मानते चले
आये हैं कि दिल्ली के अंतिम महाराजाधिराज पृथ्वीराज चौहान के प्रधान कवि व मित्र चन्द
बरदाई ने इस पुस्तक को बनाया है।"
"मैंने चाहा कि इस प्रसिद्ध पुस्तक का, जो छन्दबद्ध है, सरल साधुभाषा में कथारूप से
सारांश लिख कर इसके सत्यासत्य विषय में जो कुछ प्रमाण मिल सकें वे भूमिका में लिख दूं"॥
"तथापि ऐतिहासिक विषय में मूल पुस्तक के विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखा गया है।"
मैंने जो यह आशय गद्य में किया वह उदयपुर राज्य के विक्टोरिया हाल के पुस्तकालय
में रासे की एक लिखित पुस्तक से लिया है।"
और अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार उसने इस महाकाव्य के मूल पद्य का यह गद्य किया है:-
"यमुना तट पर हस्तिनापुर नाम्री नथ प्राचीन काल से विख्यात है जहां पांडववंशी राजा
अनंगपाल तंवर राज्य करता था। राजा की सुनीति और धर्माचरण से सर्व प्रजा सुखी और
राज्यकार्य आनन्द पूर्वक चलता था। इस राजा ने अपने भुज बल से कई भूपालों का गर्व
गंजन कर अपनी प्रभुता के सूर्य का प्रकाश दूर दूर तक फैला दिया था सहस्रों सामन्त देश
देशान्तर से आकर इस की सेवा करते थे। राजा के दो कन्या थीं बड़ी का नाम सुरसुन्दरी और
छोटी का नाम कमला। सुरसुन्दरी का विवाह कनौज के राठौड़ राजा बिजयपाल से
हुआ था और कमला जो रूप में रति को भी लज्जित करती थी अपनी बालक्रीड़ा से माता
पिता के हृदय को हुलसाती हुई शुक्लपक्ष की चंद्रकला के तुल्य सुन्दरता सुघड़ाई और यौवन
में वृद्धि को प्राप्त होती थी॥
एक दिन राजा अनंगपाल अपने सुभट सामन्तों सहित हस्तिनापुर से कुछ दूर आखेट
के वास्ते वन में गया। अपनी हिनहिनाहट से वज्र के तुल्य हृदय को भी कपाने और टापों
के प्रताप से शेष के सीस तक धरा को धुजाने का अभिमान रखने वाले चंचल तुरंगों पर कई
बांके छत्री शिकारी पोशाक पहने नेजे हाथ में लिये चलते थे, काली रात्रि के तुल्य कई मदो-
न्मत्त हस्तियों के झुंड साथ थे जिन के गंडस्थल में से झरने वाले सुगन्धित मद के पान करने
। तीसरा समय १०] पृथ्वीराजरासो । २७१
को आये हुए भ्रमरों का गुंजार शब्द ऐसा प्रतीत होता था कि मानो कई बन्दीजन मधुर वाणी
में महाराज का यश गाते हों। रेशमी डोरियों से बन्धे हुए कई कुत्ते अपने रक्तकों को ताने लिये
जाते थे मानो सूअर साभर कुरंग आदि पशुओं का गंध पाकर उनके रुधिर से अपनी पिपासा
बुझाने को आतुर हो रहे हों। पायदलों के ठट्ठ ने चारों ओर घिरर कर वन को घेर लिया और
भेरी नफीरी आदि कई वाजिन्न बजा कर पशुओं को डराने और उनका स्थान छुड़ाने लगे। राजा
और उनके साथी सामंतों ने सेल संभाले सूअरों के पीछे घोड़े छोड़े और बात की बात में कई
बड़े बड़े वराहों को भूमि पर गिरा दिया। वन में चारों ओर धूम मच रही थी बिचारे पशु
प्राण भय से इधर उधर भागते फिरते थे कि कंज कली को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य्यदेव ने
सिर पर आकर मानो इस हिंसा से शिकारियों को निवारण करने के लिये क्रोध दृष्टि धारण
की हो, प्रचंड ताप से पृथ्वी को तपा दिया सूर सामन्त व सिपाहियों ने जहां तहां वृक्षों की
छाया देख कमर खोली और जलपानादि करके श्रम दूर करने को लेटे, राजा भी एक घट वृक्ष
की सघन छाया में बैठा हुआ था कि अचानक उसकी दृष्टि वन में एक स्थान पर पड़ी तो
क्या देखता है कि झाड़ी की ओट में एक अजा अपने दो बच्चों को लिये बैठी है उधर से एक
भेड़िया आकर बच्चों पर लपका चाहता था कि दोनों को उठा कर ले जावे इतने में माता ने
सचेत हो भेड़िये से युद्ध करना आरंभ किया और भेड़िये को भगा कर बच्चों को बचा लिया।
यह कौतुक देख राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस स्थान पर कुछ चिन्ह कर दिया कि भूल न जावे
जब अपनी राजधानी को लौटा तो दिन भर के परिश्रम से थका हुआ भोजनान्तर वह शयन
गृह में आकर निद्रा निमग्न हुआ। प्रभात् होते ही गुरु व्यास देव के आश्रम पर जा हाथ जोड़
कर ऋषि से वह वन का चरित्र वर्णन किया। व्यास देव कुछ काल तक समाधिस्थ हो बोले कि
राजन्! वह भूमि महा पवित्र और वीर है यदि वहां गढ़ बनाया जावे तो उस गढ़ का स्वामी सर्व
भूमंडल के अधिपतियों का सर्दार होवे। राजा ने निवेदन किया कि महाराज मैं वहां एक नग्र
बसा कर गढ़ बनाऊंगा व्यास देव बोले कि आज तिथि, नक्षत्र वार योगादि सर्व शुभ हैं अत एव
एक लोहे की कीली मंगवाओ कि वहां गाड़ दी जावे आज्ञानुसार कीली मंगवाई गई व्यास राजा
सहित उसी स्थान पर गये और मंत्र पढ़ कर कीली वहां गाड़ दी जहां बकरी ने वृक को
भगाया था। फिर राजा से कहा कि यहाँ गढ़ की नींव दिलवाना इस कीली को निकालने का
साहम मत करना यह कीली शेषनाग के सिर में जाकर बैठ गई है सो जब तक यह अचल है
तुम्हारा राज्य भी अचल रहेगा व्यास के मुख यह सुन कर कि "यह किल्ली शेष के सिर में जा
बैठी है" राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और कहने लगा कि महाराज! इतनी सी किल्ली शेष
के सिर तक कैसे पहुंच सक्ती है? एक दिन कुतूहल बस राजा ने अपनी शंका निवारण करने
को बिना बिचारे उस कीली को निकलवा ली कील के निकलते ही भीतर से रुधिर की धारा
छूटी और कील का मुख भी रुधिर से भींगा हुआ देखा। राजा को बड़ा पश्चाताप हुआ कि
मैंने केवल अपने संशय युक्त चित्त का संताप करने के निमित्त उस महर्षि की आज्ञा उल्लंघन
की और अपने को महा हानि पहुंचाई फिर उस स्थान पर एक नग्र बसाया क्योंकि उस किल्ली को
राजा ने ढीली कर दी थी अत एव उस नग्र का नाम भी 'ढिल्ली ही रहा जो वर्त्तमान काल में
दिल्ली करके प्रसिद्ध है राजा की आज्ञां से वहां बड़े २ महल चौहट्टे और विशाल भवन बनाये
गये और फिर वहीं राजधानी स्थापन हुई" ॥
३
२७२ पृथ्वीराजरासो। [ तीसरा समय १८
(पृथ्वीराज चरित्र पृष्ठ ३२-३५)
निदान इन तीनों वृत्तान्तों को जिस चंद कवि के नाम के ओट से ग्रन्थकर्त्ताओं ने लिखा
है उनको उसी कवि के मूल पद्य से मिलाने पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि उन्होंने (ग्रन्थकर्त्ता)
इस दिल्ली किल्ली कथा के मूल पद्य को भले प्रकार पढ़े और समझें बिना जैसा जिसके ध्यान
में केवल दंत कथाओं पर से आशय आया वह अपने अपने ग्रन्थों में लिख लिया है। इन को मूल
पद्य से मिलाने पर वृत्तौँ में यह बड़े बड़े अंतर स्पष्ट देख पड़ते हैं-
हिन्दी शिक्षावली के कथन में ॥
१ चंद का मूल पद्य चाहे शुद्ध वा अशुद्ध वा जाली कैसा ही क्यों न हो परंतु उसके
अनुसार वृत्तान्त लिखने की प्रतिज्ञा करने वाले को उसके विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखना चाहिये
उपन्यास और नाटकादि लिखने के भी नियम हैं। ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि जहां से
मूल कथा ग्रहण करी हो उस लेख के वृत्तौँ को ऐसे बदल देना कि उनमें रात्रि दिन का सा
अंतर पड़ जाय। देखो चंद ने अपने मूल पद्य में दो दिल्ली किल्ली कथा वर्णन करी हैं। एक तो
कलहन वा कल्हन वा किल्हन राजा के समय की और दूसरी राजा अनंगपाल के समय की।
परंतु इन ग्रंथकर्त्ताओं ने दोनों के वृत्तों को घेल मेल करके एक ही कथा कर दी है। क्या मूल
पद्य को पढ़ और समझ कर लिखने वाला ऐसी भूल कर सकता है?
२ चंद ने मूल पद्य में कहीं नहीं कहा है कि राजा अनंगपाल तोमर वंश में १६ सोलहवां
राजा हुआ था ॥
३ और उसने यह भी नहीं कहा है कि अनंगपाल ने पृथ्वीराज के जन्म उत्सव के लिये
व्यास नामक ब्राह्मण से किल्ली गाड़ने का मुहूर्त्त पूछा था ॥
४ और न यह कहीं मूल में कहा है कि भविष्य कहने पर राजा ने अप्रसन्न हो कर व्यास
को निकाल दिया और वह अजमेर चला गया जहां कि उसका अधिक मान हुआ ॥
खड्गराय के कथन में ॥
५ व्यास का राजा को पच्चीस अंगुल कीली देना मूल पद्य में वर्णन नहीं किया हुआ
है। किन्तु जो किल्ली कलहन के समय में गड़ी उसका कुछ परिमाण नहीं लिखा है और जो
अनंगपाल के समय में गड़ी थी उसका रूपक १२ में-साठि सु अंगुर लोहय किल्लिय-साठ ६०
अंगुल का परिमाण लिखा है ॥
६ कीली गाड़ने का संवत् ७९२ वैशाख बदी १३ मूल पद्य में कहीं नहीं कहा है ॥
७ कीली को उखाड़ने पीछे फिर उसका गाड़ना और केवल उन्नीस ही अंगुल पृथ्वी में
धसना कहीं भी मूल पद्य में नहीं कहा हुआ है ॥
८ व्यास का अनंगपाल को कहना कि तुम्हारी उन्नीस पीढ़ी पीछे राज्य चौहानों के हाथ
में जायगा मूल पद्य में कहीं नहीं वर्णन किया हुआ है ॥
पृथ्वीराज चरित्र के कथन में ॥
९ हस्तिनापुर का नाम तक मूल पद्य में नहीं है और न उसका और अनंगपाल, के.
राज्यशासन की अत्यन्त प्रशंसा उस में चंद ने कथन की है ॥
तीसरा समय १८ ] पृथ्वीराजरासो । २७३
१० एक दिन राजा अनंगपाल का हस्तिनापुर में आखेट के लिये वन में जाना मूल पद्य
में बिल्कुल नहीं है। किंतु रूपक १० में कलहन राजा का वन क्रीड़ा करना कहा हुआ है ॥
११ आखेट का सविस्तर वृत्तान्त, जैसा कि वर्णन किया गया है, मूल में नहीं है ॥
१२ राजा अनंगपाल का एक वट वृक्ष की सघन साया में बैठना भी मूल में नहीं है ॥
१३ राजा अनंगपाल का एक श्वान का एक भेड़िये के साथ युद्ध करना देखना लिखा है
उसके स्थान में मूल पद्य के रूपक १७ में कलहन राजा के प्रसंग में "सुसा और स्वान" शब्दों
का प्रयोग हुआ है ॥
१४ इस कौतुक की भूमि पर राजा अनंगपाल का चिन्ह कर देना कि भूल न जावे मूल
में नहीं है ॥
१५ दूसरे दिन राजा अनंगपाल का गुरु व्यासदेव के आश्रम पर जाना आदि भी मूल में
नहीं कहा है ॥
दिल्ली में कुतुबमीनार के पास जो एक लोहे की बड़ी कीली अब तक विद्यमान है उसके
विषय में पुरातत्ववेत्ता विद्वानों में मत भेद है। तंवरों की ख्यातियों में कलहन, केलिहन, फल्हन
और किल्हन का चंद भी नामान्तर मिलता है । तथा कलहनादि नामान्तरों की चंद्रवाचक
व्युत्पत्ति हो सकती है । अत एव अनुमान होता है कि कीली पर जो नीचे लिखे श्लोक खुदे हुए
हैं और उनमें जिस राजा चंद्र का नाम है वह यही राजा कलहन उपनाम चंद्र होगा-
यस्योद्वर्त्तयतः प्रतीपमुरधैः शत्रून् समेत्यागतान् ।
वह्नेष्वाहववर्त्तिनोविलिखिता खङ्गेन कीर्त्तिर्भुजे ॥
तीर्त्वा सप्तमुखानि येन समरे सिन्धोर्निता वाह्लिकाः ।
यस्याद्याप्यधिवास्यते जलनिधि र्वीर्य्यानिलैर्दक्षिणः ॥ १ ॥
खिद्यस्येव विसृज्य गां नरपतेर्गामाश्रितस्येतराम् ।
मूर्त्या कर्म्मजितावनिं गतवतः कीर्त्या स्थितस्य क्षितौ ॥
शान्तस्येव महावने हुतभुजो यस्य प्रतापो महान् ।
नाद्याप्युत्सृजति प्रणाशितरिपोर्यत्नस्य लेशः क्षितौ ॥ ३ ॥
प्राप्तेन स्वभुजार्जितञ्च सुचिरं चैकाधिराज्यं क्षितौ ।
चंद्रोहेन समग्रचंद्रसदृशीं वक्त्रश्रियं बिभ्रता ।
तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना भावेन विष्णौ मतिम् ।
प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वजस्थापितः ॥
इस कीली के परिमाण के विषय में इलाहाबाद लिटरेरी इन्स्टीट्यूट की बनाई हुई
हिन्दी रीडर नम्बर ५ अर्थात् हिन्दी शिक्षावली भाग पंचम में जो सन् १८६९ ई० में पांचवी बार
छपी है, यह लिखा हैः-
"इसी लाट के पास एक बड़ी लोहे की कीली लग भग १६ इञ्च मोटी धरती में गड़ी हुई
है । धरती से ऊपर इस कीली की ऊंचाई २२ फुट है और कनिंगहम साहब लिखते हैं कि यह
निश्चय नहीं हुआ कि यह कीली पृथिवी के नीचे कितनी दूर तक गई है । एक बार २६ फुट तक
"धरती खोदी गई थी परन्तु कीली की जड़ का पता न लगा" ।
२७४ पृथ्वीराजरासो । [ तीसरा समय २०
सो अशुद्ध है। मालूम होता है कि ग्रन्थकर्त्ता ने जनरैल कनिंगघाम साहब की सन् १८७१
की रिपोर्ट पुस्तक १ पृष्ठ १६९ ही पढ़ कर यह वृत्तान्त लिख दिया कि जिस को अब तक अनेक
बालक पढ़ कर मिथ्याज्ञान उपार्जन करते चले आते हैं। यह तहकीकात पीछे के अन्वेषण से रद्द
हो गई है कि जिसका वृत्तान्त उक्त जनरैल साहब की रिपोर्ट पुस्तक ४ पृष्ठ २८ में लिखा है।
पिछली तहकीकात के अनुसार इस कीली की ऊंचाई धरती से ऊपर २२ फुट और धरती के नीचे
केवल बीस इंच और कुल लंबाई २३ फुट ८ इंच निश्चित हुई है। उक्त सभा जो अपनी पुस्तक
में इस भूल को सुधार दे तो अत्युत्तम है ॥
इति ।
५. राजा जयचन्द से संघर्ष एवं संयोगिता हरण
अथ लोहाना आजान बाहु समय लिख्यते।
(चौथा समय)
पृथ्वीराज का अपने सामन्तों को बत्तीस हाथ
ऊंची गोष से कूदने की उत्तेजना देना ॥
कवित्त ॥ इक्क समय प्रिथिराज । राज ठट्ठा सामंतह ।
हथ बतीस इक गौष । चित्रसारो कहवत्तह ॥
घटिय शेष दिन रह्यौ । सब्रै अर और गह्मसह ।
नग्रनाथ नागौर । पहराजंत इन्द्र पह ॥
उच्चरिय बत्त इमि मत्ति करि । खोइ जोधा पब्बद्द जिसै ।
भै भित्त चित्त मैं भित भिरै । इह सुथान कुद्है इसै ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
लोहाना का कूदना ॥
कवित्त ॥ दुचित्त चित्त सामंत । चाचि लग्गिय टगटग्गिय ।
चित्र जानि पुत्तरिय । नयन जुव्वैं पग मग्गिय ॥
रज्जि मत्ति नादान । कंद उच्चरिय बत्त इह ।
चामुंडा जैतंसि । रोस आक्रस्सं कियौ वह ॥
ठट्ठौ सु इक्क लोहान भर । कहर कवूत्तर कुह्यौ ।
जो नेक चूकिएक्खो गियौ। साष अंब हू छह्यौ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
─────────────────────────────────────────────
यह समय हमारे पास की संवत् १६४७ की लिखित पुस्तक में नहीं है किन्तु उसके
इधर की लिखी सब पुस्तकों में मिलता है। तथा इस कथा का संदर्भ तीसरे समय के रूपक २६
"षोडश गज कूपटु"- से लगाकर अभिप्राय समझने से ध्यान में आवेगा कि एक दिन राजा
पृथ्वीराज सायंकाल के समय सोलह गज वा बत्तीस हाथ ऊंची चित्रसाली की गोख में सामन्तों
सहित खड़े थे और एक चित्रकार ने एक पत्र अर्थात् चित्र पेश किया उसको संभरी नाथ देख रहे
थे कि देखते देखते वह हाथ में से छूट पड़ा। उसको लोहाना आजान बाहु ने कूद कर अधबीच
में ही झड़प लिया इत्यादि ।
१ पाठान्तर-अजान बाहं । पृथीराज । ठट्ठा । ठट्ठा । वट्टा । सामतह । बत्तीस । कहैं ।
वर गहंम्मह । वत । मति । ज्जोधा । न्जिसो । भित । चित । कुहैं ॥
२ पाठान्तर-मति । षत । चामडां । नैतंसी । आक्रस । चट्ठौ । नेकि । चेक । असौ ॥
२७६ | पृथ्वीराजरासो । | [ चौथा समय २
लोहाने के कूदने की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ इक्क कहै धर जीव । काज पंषिनी रूपप्पिय ।
इक्क कहै सो ब्रज्र । इन्द्र को पुरषेव नंषिय ॥
इक्क कहै आकास । तास है उडियन तुहै ।
इक्क कहै सुरलोक । तास कोई नर जुहै ॥
कविचंद कित्ति उप्यम कहै । लोहाना तोवर सुभर ।
जाजुल्लि राइ सुत किह चित । नत्थि हुवै दुज्जै सुभर ॥
॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
पृथ्वीराज का दौड़ कर लोहाना के पास आना
और उसे हिये लगाना ॥
अरिल्ल ॥ दौरि राज पृथ्वीराज सु आयो । षमाषमा अषै उचायो ।
और सूर सामंतह अग्गी । चियरा सन्निऋए परि लग्गी ॥
छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥
उसे आप उठाकर अपने घर ले जाना और इलाज करना ॥
अरिल्ल ॥ अप्प उचाइ अप्प गृह आने । सब तबीब बहुत सनमाने ।
मौज मना मंझ होइ सुमंगौ । च्यारि पचर दिवसह मन्झि चंगौ ॥
छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥
हकीमों का लोहाना को दवा के लिये ले जाना और नवें
दिन उसका अच्छा हो कर पृथ्वीराज के पास आना ॥
दूहा ॥ तब तबीब तसलीम करि, लै घरि आइ लुहान ।
नव दीचे सिर झझयो, ढंढोलन गय ठान ॥ छं० ॥ ६ ॥ छं० ॥ ६ ॥
३ पाठान्तर-कहँ । कां । कहै । इंडियन । कोइ । कहँ । तांवर । किट्ट । दुजै ॥
४ पाठान्तर-राजा । प्रथीराज । उचायौ । मन्निए ॥
५ पाठान्तर- आनैं । बहुसत । सनै मानै । सुमग्गा ॥
६ पाठान्तर-झलयो ॥
[ चोथा समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । २०७
चंद् पंचमी अति सुअल्ल, दिय विप्र बहु दानं ।
तिथि तेरस रविवार दिन, पथ लग्गो चौहान ॥ छं० ॥ ७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
पृथ्वीराज का प्रसन्न हो कर लोहाना को ग्वालियर, रणथम्भौर,
उड़छा आदि पांच हज़ार गांव देना ॥
कवित्त ॥ पय लग्गत चहुवान । मौज ग्वालेर सुदिन्नौ ।
रिनथंभह जड़द्दो । कछर सूरब्बर किन्नौ ॥
लोहाना आजान (वाह) * नाम थप्यै बहु छप्पै ।
सहस पंच दिय ग्राम । जैत कविचंद सुजप्पै ॥
तिधि धरिय मल्हित्त यह अप्पियै । लै पहा सीसह धरिय ।
रक्खी सुवत्त दिन तीन संच । पग्ग मग्ग अप्पी परिय ॥
छं० ॥ ८ ॥ रू० ॥ ८ ॥
आजानुबाहु का आना और पृथीराज का हाथी घोड़े आदि देना ॥
दूहा ॥ पूनम तिथि मंगल दिनह, गृह तेरिय आजान ।
आसन खंडि सु अप्प दिय, बहु आदर सनमान ॥
॥ छं० ॥ ९ ॥ रू० ९ ॥
छंद पड़ड़ी ॥ नव दून अप्पि मदझर गयंद । कज्जल सकोट उज्ज्वल अनंद ॥
सै पंच दिन्न वानी पवंग । गो अप्प सैक (वान) * ग्रहता कुरंग ॥
॥ छं० ॥ १० ॥
सै पंच दिन्न अति उंट अच्छ । कत्तार भार फज्कार कच्छ ॥
दोइ सै दिन्न दासी सुचंग । झलझंत तास द्रप्पन सुअंग ॥ छं ॥ ११ ॥
७ पाठान्तर-पंचमौ । दिये । तेरसि । लगै । चहुवान ॥
८ पाठान्तर-लगात । चहुवान । दिनौ । रिनथिंभह । उंडछा । सूरबर । किंनो । * अधिक
पाठ है । थपे । अप्पे । जंपै । लैं । रखी सरवत दिन तीन पर ॥
९ पाठान्तर-पूनिम ॥
१० पाठान्तर-अनंद्ध । सैं । * अधिक पाठ है । द्विन । अच्छ । कछ । सै नये ।
सरस । गर्नै । अस । मुपि । चालंडराय । सुक्कि । सब्ब । सुंभीर । नौंहर । सुरत्त । शहि । डोरे ॥
- पाठ उपस्थित पुस्तको में नहीं है ॥
सिरपाउ भाउ नषे सरस । को गनै द्रव्य भंडार अस ॥
सामंत सूर मुख नूर नत्थ । * * * कं० ॥ १२ ॥
अब्बूसराइ जामानि जह । चामंडराइ मन मुक्ति मह ॥
गोयंद राइ पीची प्रसंग । उर लग्गि अग्गिनह सुप्प अंग ॥ कं० ॥ १३॥
अप्पंत सूर सामंत और । खरगोस लहै पै कीस दौर ॥
ऐ सरस सब्ब सामंत सूर । तिन चढै नाम आजान नूर ॥ कं० ॥ १४ ॥
जुग्गिन पुरेस कजि अप्पि जीव । एती सबत्त छथ्यं सुदीव ॥
सिर पटा छाप लोहान होइ । लग्गे सुसरह सब पाइ लोइ ॥ कं० ॥ १५ ॥
कप्पूर चीर सागर सुनीर । सह धन्न धान जौहर सुचीर ॥
फुलेल अरगजा बहु सुगंध । कोठार आर उग्गह सुवंध ॥ कं० ॥ १६॥
कामंसु अप्पि ऐले सुक्रित्त । परधान मान करि मानमत्त ॥
रत्तौ सुस्वामि अम्मह सुसब्ब । गछि चलै स्वामि डारैं सुतब्ब ॥
कं० ॥ १७ ॥ १० ॥
लोहाना के वीरत्व का वर्णन ॥
गाथा ॥ लोहाना आजानं । वानं पर्थ भीम जुद्धानं ॥
आ अरूप सरूपं । बंकं अरं पहरं करनं ॥ कं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ ११ ॥
दूहा ॥ लोहाना तैंवर अभंग, मुहर सब्ब सामंत ।
सांई काज सुधारना, ढंढोलन गय दंत ॥ कं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ १२ ॥
लोहाना का पांच हज़ार सेना लेकर ओड़का के राजा
जसवान्त पर चढ़ाई करना ॥
कबित्त ॥ उंडच्छा अरि थान, कच्छ ईहां घर रत्तौ ।
नाम तास जसवंत, भग्ग राजन घर धुत्तौ ॥
लोहाना अनबोह, लीय बारत्त समर्थै ।
सज्जि सेन सामंत, कत्तह रषन जस कथ्यै ॥
११ पाठान्तर-पथु । बंकं ॥
१२ पाठान्तर-सब । ठंठोल गनय दंत ॥
चौथा समय ४ ] पृथ्वीराजरासो। २७६
हजार पंच सेना सन्नथ, करि जुहार अर चह्वयो।
लबहल्हि गसंत सायरत दिन, ढाक सेर गिर छह्वयो ॥
छं० ॥ २० ॥. छ० ॥ १३ ॥
ओड़छा पर चढ़ाई की शोभा का वर्णन ॥
छंद गीता मालती ॥ सजि चल्यो तामं जुद्ध धालं केन कामं पूरयं ।
घन घोर घटा समुद फहा दूम उलहा सूरयं ॥ २१ ॥
धुंधरिग सानं फुरेसानं देस जानं चल्लयं ।
दानवज्ज थानं परि भगानं सूरतानं सल्लयं ॥ २२ ॥
आजानुबाहं पहे थाहं गज्ज गाहं घुम्मरे ।
चह चहे महं गज्ज सहं घटा भहं उप्परे ॥ २३ ॥
नारद वदक्कं सूर ढक्कं लेयन्न श्छंकं जुद्धरे ।
जड़क्का उप्परि कंठला करि शराभष्फुरि अष्फुरे ॥
छं० ॥ २४ ॥ छ० ॥ १४ ॥
ओड़छा के राजा जसंवन्त का सामना करने
के लिये प्रस्तुत होना ॥
दूहा ॥ सुनी धाइ जसंवंत नृप, आयो सेन सुसज्जि ।
ढलकि ढाल बहल मिलिय, पुब्ब झाडाउ अवज्जि ॥
छं० ॥ २५ ॥ रू० ॥ १५ ॥
लड़ाई होना और लोहाना का जीतना ॥
छंद विराज ॥ बजे सिंधु नहं । करी सुन्कि महं ॥
हकं सूर बज्जे । मनो मेघ गज्जे ॥ २६ ॥
फुटे अग्ग बाजी । असे सार आजी ॥
मचे गोम थोमं । मनो राहु सोमं ॥ २७ ॥
भिड़े चत्थ बत्थं । मनो जुद्ध पत्थं ॥
घरे धीर धारी । बकै मार मारी ॥ २८ ॥
१३ पाठान्तर-उंडछा । थांन । कछ । इहां पंगा । सजि गसत ॥
१४ पाठान्तर-पुरेलानं । सलयं पुम्मरे । छू । लेयन । उंडंछा । कंवला ॥
१५ पाठान्तर-नृप । पुब' । झझाउ ॥
२८० पृथ्वीराजरासो । [ चौथा समय ४
ग्रहे सीस ईसं । करा रंत दीसं ॥
जुत्तं मरहं । मचे एम कहं ॥ २९ ॥
खरै यों लुहानं । अभंगं जुवानं ॥
जसक्वंत जोरं । चहक्कंकेति घोरं ॥ ३० ॥
गसेते गसानं । गए अग्ग थानं ॥ छं० ॥ ३१ रू० ॥ १६ ॥
दूहा ॥ खेचर भूचर जलचरह, सूर गए सुर थान ।
जुद्ध जुरे जसवंतसी, रन जित्यो लोहान ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ १७ ॥
लोहाना का गढ़ पर अधिकार कर लेना ॥
कवित्त ॥ सहस उभय लोहान, सुभट परि खेतह मज्जे ।
खार धार परछार, उभय गजराज विभज्जे ॥*
सय सत्तह हय खेत, नेत बद्धे रिन जित्यौ ।
षट सहस (अर)† पवंग, कवी चंदह कवि कित्यौ ॥
परि लुब्ध कोस सुर दून प्रति, धर लिन्मी गढ़ संजियौ ।
करि जेव बयठो गढ़ परि, इक्क यानि मन रंजियौ ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ १८ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते प्रथ्रिराजरासके लोहाना आज्ञा-
नबाहु समय नाम चतुर्थ प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ४ ॥
· १६ पाठान्तर-भनां । अगि । मनां । हयं । मनो । राम । मचैं । लरैं । यौं ॥
१७ पाठान्तर-थलचरह । सुर । जसवंतसा ॥
१८ पाठान्तर-लुहान मजे । * यह पाद संवत् १८४९ की लिखित पुस्तक में नहीं है ॥
† यह अधिक पाठ है । कित्तौ । लिंची । भंजियो । बयठो । रंजियो । लोहान ॥