पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 284, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा समय १८ ] पृथ्वीराजरासो । २७३
१० एक दिन राजा अनंगपाल का हस्तिनापुर में आखेट के लिये वन में जाना मूल पद्य
में बिल्कुल नहीं है। किंतु रूपक १० में कलहन राजा का वन क्रीड़ा करना कहा हुआ है ॥
११ आखेट का सविस्तर वृत्तान्त, जैसा कि वर्णन किया गया है, मूल में नहीं है ॥
१२ राजा अनंगपाल का एक वट वृक्ष की सघन साया में बैठना भी मूल में नहीं है ॥
१३ राजा अनंगपाल का एक श्वान का एक भेड़िये के साथ युद्ध करना देखना लिखा है
उसके स्थान में मूल पद्य के रूपक १७ में कलहन राजा के प्रसंग में "सुसा और स्वान" शब्दों
का प्रयोग हुआ है ॥
१४ इस कौतुक की भूमि पर राजा अनंगपाल का चिन्ह कर देना कि भूल न जावे मूल
में नहीं है ॥
१५ दूसरे दिन राजा अनंगपाल का गुरु व्यासदेव के आश्रम पर जाना आदि भी मूल में
नहीं कहा है ॥
दिल्ली में कुतुबमीनार के पास जो एक लोहे की बड़ी कीली अब तक विद्यमान है उसके
विषय में पुरातत्ववेत्ता विद्वानों में मत भेद है। तंवरों की ख्यातियों में कलहन, केलिहन, फल्हन
और किल्हन का चंद भी नामान्तर मिलता है । तथा कलहनादि नामान्तरों की चंद्रवाचक
व्युत्पत्ति हो सकती है । अत एव अनुमान होता है कि कीली पर जो नीचे लिखे श्लोक खुदे हुए
हैं और उनमें जिस राजा चंद्र का नाम है वह यही राजा कलहन उपनाम चंद्र होगा-
यस्योद्वर्त्तयतः प्रतीपमुरधैः शत्रून् समेत्यागतान् ।
वह्नेष्वाहववर्त्तिनोविलिखिता खङ्गेन कीर्त्तिर्भुजे ॥
तीर्त्वा सप्तमुखानि येन समरे सिन्धोर्निता वाह्लिकाः ।
यस्याद्याप्यधिवास्यते जलनिधि र्वीर्य्यानिलैर्दक्षिणः ॥ १ ॥
खिद्यस्येव विसृज्य गां नरपतेर्गामाश्रितस्येतराम् ।
मूर्त्या कर्म्मजितावनिं गतवतः कीर्त्या स्थितस्य क्षितौ ॥
शान्तस्येव महावने हुतभुजो यस्य प्रतापो महान् ।
नाद्याप्युत्सृजति प्रणाशितरिपोर्यत्नस्य लेशः क्षितौ ॥ ३ ॥
प्राप्तेन स्वभुजार्जितञ्च सुचिरं चैकाधिराज्यं क्षितौ ।
चंद्रोहेन समग्रचंद्रसदृशीं वक्त्रश्रियं बिभ्रता ।
तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना भावेन विष्णौ मतिम् ।
प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वजस्थापितः ॥
इस कीली के परिमाण के विषय में इलाहाबाद लिटरेरी इन्स्टीट्यूट की बनाई हुई
हिन्दी रीडर नम्बर ५ अर्थात् हिन्दी शिक्षावली भाग पंचम में जो सन् १८६९ ई० में पांचवी बार
छपी है, यह लिखा हैः-
"इसी लाट के पास एक बड़ी लोहे की कीली लग भग १६ इञ्च मोटी धरती में गड़ी हुई
है । धरती से ऊपर इस कीली की ऊंचाई २२ फुट है और कनिंगहम साहब लिखते हैं कि यह
निश्चय नहीं हुआ कि यह कीली पृथिवी के नीचे कितनी दूर तक गई है । एक बार २६ फुट तक
"धरती खोदी गई थी परन्तु कीली की जड़ का पता न लगा" ।