पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय ८
जनमैज राज तस मत्त मान। आनो न चित्त तिन निमष ग्यान ॥
क्षिति राज सरिस रिष राइ बोलि। कीनीय बत्त तुम गत्त खोलि॥छं०॥२८
हूं गड्डि गयौ किल्ली सजीव। इछाय करी ढिल्ली सईव ॥
तुंअर अवहि संडव सुथान। भोगवै भूमि सुरतान पान ॥ छं० ॥ ३० ॥
सो मत्ति जानि तुंअर चिनेत्त । मति करै रोस राजन सुचेत ॥
जान्यौ सु कह्यौ बर व्यास रूप । झूटी सु बत्त बरजित्त भूप ॥ छं० ॥ ३१ ॥
हिन्दून् † जानि पंडव सु वंस । तिन भयौ अंस पारत्थ नंस ॥
तिहि वंस भीम अरु भ्रम्म सुत्त । तिहि वंस बली अनगेस तुत्त ॥ छं० ॥ ३२
मति करहु सोच सम संच मानि । हुअ राज काज वर चहुवान ॥
बर वंस सुमति अति मति प्रताप । दिन कितक तपै चहुवान आप ॥ छं० ॥ ३३ ॥
फिरि व्यास कहै सुनि अनग राइ । भवतव्य बात मेटी न जाय ॥
रघुनाथ हाथ त्रैलोक देव । ते कनक म्रग्ग आगे पछेव ॥ छं० ॥ ३४ ॥
- ये दोनो पाद सं० १५४७ की लिखित पुस्तक में नहीं है और उसके इधर की संवत् १८५६
की में हैं ॥ २८ ॥ हुं । क्रिलि । किली । गड़ि । हलाप । ढिली । इव । तुंअर । अवंटि । सुथांन ।
सुरतानं । पांन ॥ ३० ॥ मति । जांनि । तोंअर । जांन्यौ । झूठी । स । वरदत्ति ॥ ३१ ॥ जांनि ।
पारथ । धूम्म सुत । वमं । वली । तुत ॥
३२ पाठान्तर-मांनि । हुय । चाहुआनं । चाहुवांन ॥ ३३ ॥ राय । मृग । लगे ॥ ३४ ॥
† इस महाकाव्य में “हिन्दू” शब्द यहां पर आया है । उसकी व्युत्पत्ति वाचस्पत्य
बृहतसंस्कृताभिधानकर्त्ता और शब्दकल्पद्रुमवाले ने पुंल्लिङ्ग में यह की है-
“हीनं दूषयतीति । दुष+डुः पृषोदरादित्वात् साधुः । जातिभेदे । जातिविशेषः ॥”
और उसका प्रयोग मेरुतंत्र में यह दिखाया है-
पश्चिमाम्नायमंत्रास्तु प्रोक्ताःपारस्यभाषया । अष्टोत्तरशताशीतिर्येषां संसाधनात् कलौ ॥
पंच खानाः सप्तमीरा नव शाहा महाबलाः । हिन्दुधर्म्मप्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्त्तिनः ॥
हीनं च दूषयत्येन हिन्दुरित्युच्यते प्रिये ! मेरुतन्द्रे २३ प्र० ॥
और भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व्व के तृतीय खंड के दूसरे अध्याय में लिखा है कि विक्र-
मादित्य के पौत्र शालिवाहन ने पितृराज्य पाने पर शकादि को जीत कर आर्य्यदेश और म्लेच्छ-
देश की सीमा इस प्रकार से स्थापित कीं-
एतस्मिन्नन्तरे तत्र शालिवाहन भूपतिः ॥ १७ ॥
विक्रमादित्यपौत्रश्च पिताराज्यं गृहीतवान् ॥
जित्वा शकांन्दूराधर्षींश्चीनतैत्तिरिदेशजान् ॥ १८ ॥
बाल्हीकान्कामरूपांश्च रोमजान्खुरजांछठान् ॥
तेषां कोषां गृहीत्वा च दंडयोग्यानकारयत् ॥ १६ ॥
स्थापिता तेन मर्यांदा म्लेच्छार्य्याणां पृथक् पृथक् ॥