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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 470 में से

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पृष्ठ 272

आराधंत बर ग्यान, होइ संसार सुघात्यौ ।
दैवक्रत्त करि जोग, सोइ पाषान उघात्यौ ॥
रुधि रुंड छुट्ठि संमुह चलिय, चत्ति अद्भुत सु दिप्पियौ ।
परिगह पवास संची नृपति इन आहिज्ज सुलप्पियौ । कुं० ॥ २४ ॥ छ० ॥ २४ ॥
पाषाण का उखाड़ लेना सुन व्यास का दुखित हो
राजा के पास आना ॥
दूहा ॥ सुनि आयौ वर व्यास तँह, दुप पायौ मन मज्झ ।
का जंप्यौ मुप नृपति सैं, इह मति मूढ अभुज्झ ॥ कुं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २५ ॥
अनंगपाल का पश्चाताप करना और व्यास का आगम कहना ॥
कवित्त ॥ अनंगराय चक्कवै, बुद्धि जो इसी उकिल्लिय ।
भयौ तुम्हार मति हीन, करी किल्लिय तैं ढिल्लिय ॥
कहै व्यास जग जोति, अगम आगम हौं जानौं ।
तूंअर तैं चहुआन, अंत व्हैहै तुरकानों ॥
तूंअर सु अवहि संडव घरह, इक्क राइ वलि दिक्कवै ।
नव सत्त अंत मेवात पति, इक्क छत्र महि चक्कवै ॥ कुं० ॥ २६ ॥ छ० ॥ २६ ॥
व्यास का अनंगपाल को खेद न करने का उपदेश करना ॥
पद्धरी ॥ उच्चरयौ व्यास जग जोति वीर । मृत सुग्गं लोक पाताल नीर ।
चयकाच्च दरस दरसिय सु देव । व्यासहि समान जोतिगिय तेव ॥ कुं० ॥ २७
संसार सार अस्सार कीन । वर व्यास बुद्धि कोविद प्रवीन ॥
मंडयौ सु राज सैं क्रोध नूप । वरज्यौ सुकिष्ण व्यासह सरूप ॥ कुं० ॥ २८ ॥
२४ पाठान्तर-अनंगपाल । प्रथवी । अचरिज । वत । होइ । सोइ । जांन्यो । ग्यान ।
सोय । सोइ । चलोय । अद्भूत । दिपियै । परिग्रह । न्रपति । आदिज । लिपियै ॥
२५ पाठान्तर-तहां । तह । मंझ । न्रपति । सो । मूढ मति असमंझ ॥
२६ पाठान्तरः- अनंगपाल । यती । उफुल्लित । भय । तौंवर । तैं । ढिल्लीय । किल्ली । हूं
जांनां । तोअर । तैं । चहुवांन । ह्वैहैं । होइ है । तुरक । इक । राइ । बिकवै । अंति । मनि । इक ।
छत्र० । चक्रवै ॥
२७ पाठान्तर-उचयौ । मृत । स्वर्ग । समांन । जोत्तगी । असार । बुधि । सौ ॥
२८ जनमेज । मत । मांन । आंनी । ध्यांन ॥