पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा समय १३] पृथ्वीराजरासो । =६७
जमद्दर पानान यस्त, वढत दानन दिन ही दिनं ।
छह संस तरवारि, वढत सस्त्रन्न पिन छि पिन ॥
वढंत कित्ति दिन दिन अमन्द, प्रथीराज सोमेस सुत्र ।
दस दिसा जोति दिन दिन वढत, महा निसा पछ जानि धुअ ॥
छं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३७ ॥
पृथ्वीराज का अजित अवतार होना ॥
कवित्त ॥ सहरि गईमछ सूर, नूर नवलून नवछा मुप ।
चार वरन चिर आव, गेह विलसंत महा सुप ॥
पदत मैवासन घाउ, दाध दिज्जन दुज्जन घर ।
अडटनि उटत सुटंड, थप्पि थिर करत अप्प घर ॥
चिंधु चक्क छक्क घर थर धरत, पिसुन पिंजि किज्जय नरम ।
अवतार अजित दानव मनुष, उपजि सूर सोमच करम ॥
छं० ॥ ५५ ॥ रू० ॥ ३८ ॥
लोहाना का गैरव में से कूदना और अजानवाह
नाम और जागीर पाना ॥
कवित्त ॥ षोडस गज उरह, राज जमै गवप्प तस ।
संझ समय चीतार, पच कीनो पेसकस ॥
देषत संभीरनाथ, हथ्थ कूटन हथ सारदा ।
तीर कि गोरि बिछुदि, तुहि असमान की तारदा ॥
अधवीच नीच परतें पछिल, लोहाने लीनो झरपि ।
नट कळा खेलि जनु फेरि उठि, आनि हथ्थ पिथ्थउ अरपि ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ *
३७ पाठान्तर-भंडारन १ दांम । तरवार । वढंत ॥
३८ पाठान्तर-सहरि । च्यारि । दुजन । अरटन । दटत । थपि । अप । चिंडु । चक ।
हक । किजय ॥
३८ पाठान्तर-गंवध । चित्रकार । हथ । आसमान । आनि ॥
- ये ३९ । ४० दो रूपक सं० १६४७ की पुरानी पुस्तक में नहीं हैं और इधर की सं० १८५९
में हैं ॥