पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 281, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० पृथ्थीराजरासो । [ तीसरा समय १६
"व्यास ब्राह्मण ने तोमर वंश के प्रमर राजा अनंगपाल को एक पच्चीस अंगुल लंबी कीली
दी और उसने कहा कि इसको धरती में गाड़िये। शुभ संवत् ७९२ अथवा दूसवी सन् ७३५
में बैशाख बदी त्रयोदशी को राजा ने इस कीली को पृथिवी में गाड़ दिया। तब व्यास ने राजा
से कहा कि अब तुम्हारा राज्य अचल हो गया क्योंकि यह कीली शेषनाग के माथे में गड़ी है।
जब ब्राह्मण चला गया तब राजा ने उस की बात का विश्वास न कर कीली को उखाड़ देखा
तो उस को लोहू से भरी पाया। राजा ने भय भीत हो उस ब्राह्मण को फिर बुलवाया और कीली
को फिर गाड़ने की आज्ञा दी। परंतु कीली उन्नीस ही अंगुल पृथिवी में धसी और ढीली रही।
तब ब्राह्मण ने कहा कि तुम्हारा राज्य इस कीली के सदृश अस्थिर रहेगा। और उन्नीसवीं पीढ़ी
के बाद चौहानों के हाथ जायगा। और उनके बाद मुसलमान राज्य करेंगे"॥
(देखो हिन्दी शिक्षावली पंचम भाग पृष्ठ ४१)॥
तदनन्तर "पृथ्वीराज चरित्र" नामक पुस्तक को पढ़िये। उस के कर्ता ने भूमिका में हम को
यह कह कर उस के लेख की परम प्रामाणिकता का विश्वास कराया है-
"प्रगट है कि पृथ्वीराज रासा नाम का पुस्तक भारतवर्ष के इस प्रान्त (राजपूताना) में
अति ही प्रसिद्ध है और प्रत्येक चत्री व चारण भाट इस के लिये निर्विवाद ऐसा मानते चले
आये हैं कि दिल्ली के अंतिम महाराजाधिराज पृथ्वीराज चौहान के प्रधान कवि व मित्र चन्द
बरदाई ने इस पुस्तक को बनाया है।"
"मैंने चाहा कि इस प्रसिद्ध पुस्तक का, जो छन्दबद्ध है, सरल साधुभाषा में कथारूप से
सारांश लिख कर इसके सत्यासत्य विषय में जो कुछ प्रमाण मिल सकें वे भूमिका में लिख दूं"॥
"तथापि ऐतिहासिक विषय में मूल पुस्तक के विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखा गया है।"
मैंने जो यह आशय गद्य में किया वह उदयपुर राज्य के विक्टोरिया हाल के पुस्तकालय
में रासे की एक लिखित पुस्तक से लिया है।"
और अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार उसने इस महाकाव्य के मूल पद्य का यह गद्य किया है:-
"यमुना तट पर हस्तिनापुर नाम्री नथ प्राचीन काल से विख्यात है जहां पांडववंशी राजा
अनंगपाल तंवर राज्य करता था। राजा की सुनीति और धर्माचरण से सर्व प्रजा सुखी और
राज्यकार्य आनन्द पूर्वक चलता था। इस राजा ने अपने भुज बल से कई भूपालों का गर्व
गंजन कर अपनी प्रभुता के सूर्य का प्रकाश दूर दूर तक फैला दिया था सहस्रों सामन्त देश
देशान्तर से आकर इस की सेवा करते थे। राजा के दो कन्या थीं बड़ी का नाम सुरसुन्दरी और
छोटी का नाम कमला। सुरसुन्दरी का विवाह कनौज के राठौड़ राजा बिजयपाल से
हुआ था और कमला जो रूप में रति को भी लज्जित करती थी अपनी बालक्रीड़ा से माता
पिता के हृदय को हुलसाती हुई शुक्लपक्ष की चंद्रकला के तुल्य सुन्दरता सुघड़ाई और यौवन
में वृद्धि को प्राप्त होती थी॥
एक दिन राजा अनंगपाल अपने सुभट सामन्तों सहित हस्तिनापुर से कुछ दूर आखेट
के वास्ते वन में गया। अपनी हिनहिनाहट से वज्र के तुल्य हृदय को भी कपाने और टापों
के प्रताप से शेष के सीस तक धरा को धुजाने का अभिमान रखने वाले चंचल तुरंगों पर कई
बांके छत्री शिकारी पोशाक पहने नेजे हाथ में लिये चलते थे, काली रात्रि के तुल्य कई मदो-
न्मत्त हस्तियों के झुंड साथ थे जिन के गंडस्थल में से झरने वाले सुगन्धित मद के पान करने