प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
(5)
शताब्दी माना है । भास के काल-निर्णय के सम्बन्ध में निम्नांकित बिन्दु अत्यन्त
महत्वपूर्ण हैं—
(1) प्रतिज्ञायौगन्धरायण, अविमारक एवं स्वप्नवासवदत्त में जिन
प्राचीन राज्यों का उल्लेख किया है, उनका अस्तित्व मौर्य युग के पूर्व महापद्म
नन्द के समय अर्थात् ई. पू 384 में वर्तमान था । चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में
छोटे-छोटे गणतन्त्र विलीन होकर बृहत्तर भारत में मिल गए थे । फलतः भास
द्वारा उल्लिखित राज्यों के आधार पर उनका समय ई. पू. चौथी सदी माना
जा सकता है ।
(2) भास ने दर्शक के समय में मगध की राजधानी राजगृह को बताया
है । अजातशत्रु के समय में मगध की राजधानी राजगृह से हटकर पाटलिपुत्र
में स्थापित हो गई थी । अतः भास का काल मौर्यकाल से पूर्व है ।
(3) भास की रचनाओं में भरत के नाट्यशास्त्र के नियमों का विरोध
पाया जाता है, जैसे—
(अ) भरत ने प्रस्तावना में नान्दी पाठ के अनन्तर काव्य के नाम-
निर्देश का निरूपण किया है किन्तु भास की रचनाओं में यह नहीं मिलता ।
(ब) नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रतिज्ञायौगन्धरायण चार अंकों का होने
से तथा दिव्यस्त्री कारणोपगत युद्ध होने से ईहामृग होना चाहिए, पर नाटक-
कार ने स्वयं ही इस नाटक के प्रारम्भ में इसे प्रकरण कहा है ।
(स) भरत ने मंच पर युद्ध, वध, आक्रमण एवं रुदन का निषेध किया
है । जबकि बालचरित में दामोदर द्वारा अरिष्टर्षभ्, मुष्टिका वध, ऊरुभंग में
दुर्योधन भीम युद्ध तथा अभिषेक में राम-रावण युद्ध वर्णित है । प्रतिमा में
दशरथ की मृत्यु, अभिषेक में वाली की मृत्यु तथा विभिन्न स्थानों पर शयन
आदि का वर्णन आया है । इससे स्पष्ट है कि भास ने नाट्यशास्त्र के नियमों
का अनुसरण नहीं किया है । अतएव भास को भरत से पूर्ववर्ती स्वीकार करना
तर्कसंगत है ।
(4) भास वात्स्यायन एवं उसके कामसूत्र से अपरिचित है । इसके
नाटकों में आए प्रेमसन्दर्भों में बाभ्रव्य का ही अनुकरण किया गया है । बाभ्रव्य
ने मन्दिर गमन, भ्रमण, उद्यान विहार, जलक्रीड़ा, विवाह, उत्सव, पर्व दुर्घटना,
अग्निकांड, चोरी, दृश्यदर्शन हेतु गमन आदि द्वारा प्रेमोद्भव का कथन किया
( 6 )
हैं। ये चारुदत्त, अविमारक, प्रतिज्ञा, स्वप्नवासवदत्त आदि मे मिलते हैं। इधर
वात्स्यायन के वर्णन पर अविमारक कथा के अध्ययन की छाया स्पष्ट है।
वात्स्यायन का समय चोल चित्रासेना, कुन्तल शातकर्णि, शातवाहन, मलयवती
एवं नरदेव चित्रलेखा के आख्यानो के प्राप्त होने के कारण ईस्वी सन् 140-
200 के लगभग है। भास इनसे पूर्ववर्ती हैं ।
(5) भास की रचनाओं की भाषा मे पाणिनी से यत्र-तत्र भिन्नता
उपलब्ध है। यथा सन्धि के नियमो का अतिक्रमण, आत्मनेपद के स्थान पर
परस्मैपद का प्रयोग, अकर्मक धातुओं का सकर्मक के समान प्रयोग, अनियमित
समास तथा प्रत्यय आदि। अतएव भास का समय पाणिनि से पूर्व या उनके
समकालीन होना चाहिए।
(6) शूद्रक के मृच्छकटिक पर भास के चारुदत्त का स्पष्ट प्रभाव है,
कुछ तो मृच्छकटिक को चारुदत्त का ही विकसित रूप मानते हैं। स्मिथ महोदय
ने शूद्रक का शासन काल ई. पू 220-197 माना है। अतः भास का काल
इससे पूर्व ही होना चाहिए ।
(7) भास ने नागवन, वेणुवन, राजगृह एव पाटलिपुत्र का उल्लेख
किया है। ये सभी स्थान बुद्ध के समय मे प्रसिद्ध हो चुके थे। अतः भास का
समय बुद्ध के पश्चात् मानना युक्तिसंगत है।
(8) भास ने मानवीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर, योगशास्त्र, बार्हस्पत्य अर्थ-
शास्त्र, प्राचेतस श्राद्धकल्प, मेधातिथि न्यायशास्त्र आदि का उल्लेख किया है।
इनमें से कोई भी ई. पू. चतुर्थ पंचम शताब्दी के बाद का नहीं है।
(9) डॉ० पुशालकर ने भास का समय महापद्म नन्द का राज्यकाल
बतलाया है। यह पहला शासक है, जिसने समस्त उत्तर भारत को अपने
अधीन किया था। भास के भरत वाक्य में जिस राज्य सीमा का निर्देश आया
है, वह राज्यसीमा महापद्म नन्द की है।
(10) अय्यर महोदय का अनुमान है कि भास कौटिल्य के समकालीन
है। कौटिल्य ने नन्दो के विनाश मे योगदान दिया था और चन्द्रगुप्त मौर्य को
भारत के चक्रवर्ती पद पर प्रतिष्ठित किया था। चाणक्य या कौटिल्य ने अपने
अर्थशास्त्र मे प्रतिज्ञा यौगन्धरायण का "नवं शरावं" (4·2) वाला पद्य उद्धृत
( 7 )
किया है। इससे स्पष्ट है कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समय तक भास की
रचनाएं विख्यात हो चुकी थी।
(11) भास के कई नाटकों के भरत वाक्य में "राजसिंह" शब्द आया
है। मौर्य राजा स्वयं राजसिंह कहलाते थे। अय्यर महोदय का अनुमान है कि
चन्द्रगुप्त को ही राजसिंह कहा गया है। वही हिमालय से लेकर विंध्यपर्वत-
पर्यन्त समुद्र पृथ्वी का एकच्छत्र भोग करने वाला चन्द्रगुप्त मौर्य ही था। यही
प्रथम सम्राट् माना जाता है, जिसने प्रथम बार समस्त उत्तर भारत को संगठित
कर अपने शासन के अधीन किया था।
(12) भास के रूपकों में जैन और बौद्ध धर्म के प्रति किसी भी प्रकार
की सद्भावना नही दिखलाई पड़ती। अपितु जो भी धार्मिक आदर्श प्रस्तुत
किए गए है, वे वैदिक धर्म के है। भास ने अपनी कृतियों में सर्वत्र प्राचीन
वैदिक आदर्शों का ही चित्रण किया है। यह यथार्थ है कि क्रान्तिकारी जैन
और बौद्ध धर्म से भास परिचित थे तथा उन्होंने जैन और बौद्ध श्रमणों का
उपहास भी किया है। अतएव इनका समय ई. पू. चतुर्थ शती होना चाहिए।
(13) कालिदास ने मालविकाग्निमित्र नाटक की प्रस्तावना मे भास
को याद किया है। इस उल्लेख से स्पष्ट है कि भास कालिदास के पूर्ववर्ती हैं।
जो विद्वान् कालिदास का समय ई० पू० प्रथम सदी मानते है, उनके
मत से भास का समय ई. पू. चौथी शती मानने में कोई विरोध नहीं है।
अतः भास का समय ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी मानना अधिक
उचित है।
भास की रचनाएं
बहुत समय तक भास की रचनाएं अज्ञात रही और कालिदास, बाण,
राजशेखर आदि कवियों द्वारा की गई भास की प्रशंसा ही उपलब्ध थी। सन्
1912 ई. मे गणपति ने त्रिवेन्द्रम से भास के 13 नाटको का एक संग्रह
प्रकाशित किया। इनके नाम इस प्रकार हैं--
(1) प्रतिमा नाटक
(2) अभिषेक
(3) पंचरात्र
(4) मध्यम व्यायोग
( 8 )
(5) कर्णभार
(6) दूतवाक्य
(7) दूतघटोत्कच
(8) ऊरुभंग
(9) बालचरित
(10) प्रतिज्ञायौगन्धरायण
(11) स्वप्नवासवदत्त
(12) चारुदत्त
(13) अविमारक
कथावस्तु की दृष्टि से इन नाटकों के 5 वर्ग बनाए गए हैं—
(1) रामकथा वाले (प्रथम दो नाटक)
(2) महाभारत की कथा वाले (तीसरे से आठवें तक)
(3) कृष्ण कथा वाला (नवी संख्या का नाटक) .
(4) उदयन कथा के (दसवा व ग्यारहवा नाटक)
(5) लोककथा वाले (अन्तिम दो नाटक) !
भास की कृतियों की प्रामाणिकता
इस संबंध में तीन मत हैं—
प्रथम मत—कतिपय आलोचकों ने नाटकचक्र के रूपकों को केरलीय
रंगमंच के अभिनेता चाक्यारों की रचना माना है। उनका मत है कि यदि यह
नाटकचक्र भास द्वारा प्रणीत होता तो प्रस्तावना या स्थापना में भास का नाम
अवश्य आता। इनकी पाण्डुलिपियां केरल के अतिरिक्त अन्य प्रान्तों में भी
अवश्य प्राप्त होतीं। रीति ग्रन्थों में जो स्वप्नवागवदत्तम् के उदाहरण आये
हैं, उनका भी वर्तमान नाटक में अभाव है। प्रतिज्ञा व स्वप्न नाटकों में
विवाह के लिए "सम्बन्ध" शब्द का प्रयोग हुआ है, जो आज भी चाक्यारों
में इसी अर्थ में प्रयुक्त है।
द्वितीय मत—कुछ विद्वानों ने इन तेरह नाटकों को दो भागों में
विभक्त किया है और विभिन्न काल की रचनाएं स्वीकार किया है। ये स्वप्न
और प्रतिज्ञा आदि नाटकों को तो भास की कृति मानते हैं तथा अन्य रूपकों
को नहीं। इनके अनुसार भास के नाटकों में परिवर्द्धन तथा संशोधन कर किसी
केरल कवि ने इन्हें रंगमंच के योग्य बनाया है। नाटकचक्र पर हुए समीक्षण
( ९ )
और परीक्षणों से यह स्पष्ट है कि इन नाटकों का समस्त अंश भास की
रचना नही है।
तृतीय मत—इस वर्ग के विचारक इन तेरह रूपकों को भास कृत
मानते हैं, क्योकि—
(1) इन सभी रूपको मे आकृति की समता पाई जाती है। अतः
इनका रचयिता एक ही व्यक्ति है।
(2) प्राचीन उदाहरणो मे स्वप्नवासवदत्तम् भास की कृति सिद्ध है
तथा ये सभी रूपक उसके ही समान है।
(3) सस्कृत रूपकों की परम्परा के अनुसार नान्दी पाठ के बाद
सूत्रधार रगमच पर प्रवेश करता है, किन्तु इन 13 रूपकों मे नान्दी पाठ की
योजना प्रस्तावना मे सम्मिलित नही है।
(4) लगभग सभी रूपको के अन्त में भरत वाक्य का अन्तिम चरण
"राजसिंहः प्रशास्तु न." लिखा है।
(5) इनमे प्ररोचना का अभाव है तथा अनेक रूपको मे पताका
स्थान एव गण्ड का प्रयोग है।
(6) इन सभी नाटकों मे अपाणिनीय प्रयोग भी समान रूप से
मिलते है।
(7) भरत नाट्यशास्त्र के नियमो का उल्लघन समान रूप से ही इन
नाटको मे पाया जाता है।
(8) युद्ध की सूचना और युद्ध का वर्णन भटो द्वारा किया गया है।
(9) मुद्रा अलकार का प्रयोग चारुदत्त और अविमारक को छोड़ कर
शेष सभी नाटको में पाया जाता है। इसमे नाटक के प्रमुख पात्रो के नाम
तथा अभीष्ट देवता की स्तुति की गई है।
(10) कंचुकी और प्रतिहारी के नामों की कई नाटको में पुनरावृत्ति
हुई है। ये नाम क्रमशः बादरायण और विजया है।
(11) प्रायः सभी नाटकों में प्रस्तावना के स्थान पर "स्थापना" का
प्रयोग हुआ है। इन रूपको में अन्य किसी भी ग्रन्थकार का नाम नही
मिलता। छन्दो के प्रयोग भी प्रायः समान है।
(12) इन सभी नाटको मे साम्य भी उपलब्ध है, जैसे—
( 10 )
(अ) बलशाली की उपमा सिंह से तथा दुर्बल की मृग से दी है ।
(ब) वीर व्यक्ति का सबसे अच्छा अस्त्र उसका हाथ बताया गया है ।
(स) नारद को "कलह प्रिय" कहा है ।
(द) शाप तथा शपथ का वर्णन इन सभी नाटको मे समान रूप से
पाया जाता है ।
(क) भास ने अपने रूपको मे जीवन की विविधता और वैषम्य का
चित्रण किया है, जिससे अश्रुसिक्त अवस्था का वर्णन भी अनेक स्थलो पर
आया है ।
(ख) समान भावों का प्रयोग—जैसे दयनीय दृश्यो का वर्णन समान
रूप से उपलब्ध है । ब्रह्मचारी पात्र के प्रवेश से नाटकीय कौतूहल को सजग
बनाने का प्रयास प्रायः कई नाटको में पाया जाता है । परिव्राजक या तापस
इसी का परिवर्तित रूप है ।
(ग) पिता को कन्या के विवाह की चिन्ता, अमात्य का दायित्व,
अपराध निरीक्षण एव कला संबधी प्रेम ऐसे भाव है, जिनकी आवृत्ति विभिन्न
प्रसंगों मे प्रायः कई नाटकों में पाई जाती है ।
(घ)
( 11 )
भास की उपमाओं, भावों व शब्दो आदि से प्रभावित हैं। वल्कल धारण से
सौन्दर्य की वृद्धि, तपोवन का वर्णन, शाप की कल्पना, वृक्ष व लताओं के प्रति
स्नेह, भाग्यदशा का चित्रण आदि के भाव कालिदास ने भास से ग्रहण किए हैं।
भास के चारुदत्त का परिवृंहण कर शूद्रक ने मृच्छकटिक की रचना
की है। इन दोनो रूपको की कथावस्तु समान है तथा भावों का अंकन भी
उसी प्रकार पाया जाता है। इसे हम भास का प्रभाव ही नहीं कह सकते,
अपितु पूर्णतया अनुकरण मान सकते है। विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में भी
भास के भावों, विचारों और शब्दो के प्रयोग में पर्याप्त समता है। मनोवैज्ञानिक
दृष्टिकोण तथा परिस्थिति विशेष में विभिन्न मानसिक स्थितियों का चित्रण
विशाखदत्त मे भास के समान पाया जाता है। नाटककार हर्ष भी भास से
पर्याप्त प्रभावित है। रत्नावली नाटिका की कथावस्तु का आधार वृहत्कथा
चाहे न भी हो पर स्वप्नवासदत्तम् अवश्य है। स्वप्न नाटक में वर्णित उदयन
और वासवदत्ता की कथा रत्नावली में यत्किंचित् परिवर्तन के साथ गृहीत है।
भवभूति की तीनों रचनाओ पर भास का पर्याप्त प्रभाव है। इनके उत्तर राम-
चरित की चित्रवीथि कल्पना पर भास का प्रभाव पाया जाता है तथा और
भी कई भाव साम्य हैं।
भट्टनारायण ने वीर रस प्रधान वेणीसंहार नामक नाटक की रचना
की है, जो महाभारत के आख्यान पर आधृत है। इस नाटक की कथावस्तु के
गठन मे भट्टनारायण ने वीर रस प्रधान एकांकी उरुभंग तथा दूतवाक्य का
अध्ययन अवश्य किया है। मुरारि कवि ने अपने अनर्घराघव नाटक में भास
अभिषेक और प्रतिमा नाटक से उपमाएँ एव कल्पनाएँ ग्रहण की हैं। राज-
शेखर के नाटकों पर भी भास की कृतियों का ऋण है। जयदेव कवि के प्रसन्न-
राघव पर भी भास का प्रभाव परिलक्षित होता है। इस प्रकार सस्कृत के
सभी नाटककारो ने भास से कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य ग्रहण किया है।
भास की भाषा शैली
भास के नाटको में कल्पना, भावना और कवित्व का प्राचुर्य है, जिसके
कारण उनकी भाषा में काव्यात्मकता की प्रधानता है। इनकी भाषा शैली
पात्रो के भावो और विचारों के अनुरूप है। शैली की विशेषता के ॰ ॰
इनके संवादों में प्रभावात्मकता आ गई है : सूक्ति वाक्यों के प्रयोगों ने इनकी
भाषा शैली को सशक्त बनाया है ।
प्रभावपूर्ण भाषा—भास की भाषा प्रभावोत्पादक तथा मुहावरेदार है ।
इसमें सर्वत्र स्वभावोक्ति का पुट मिलता है । लम्बे-लम्बे समासान्त पदों का
प्रयोग भास को पसन्द नहीं है । नाट्यकला के लिए भाषा की सरलता, सरसता,
स्फुटता, प्रसन्नता, गम्भीरता, मधुरता, मनोरंजकता अपेक्षित है । कथोप-
कथन एवं कवित्व की दृष्टि से भी इनके रूपक संस्कृत साहित्य के किसी
भी सम्मानित कवि या नाटककार से कम नहीं है । निःसन्देह भास की कृतियों
में ओज, प्रसाद और माधुर्य इन तीनों गुणों का यथोचित रूप में समावेश
हुआ है ।
सरल भाषा—अपनी कृतियों में भास ने अलंकार विहीन सरल भाषा
का प्रयोग किया है । उनकी प्रवाहयुक्त सरल भाषा भावों की अभिव्यक्ति में
पूर्ण समर्थ है । इनके संवादों में शैली की स्वच्छता स्पष्टतः दिखाई पड़ती
है । पात्र कथोपकथनों में अत्यन्त विदग्ध है । उक्ति प्रत्युक्ति की मनोरमता
अवगत करने के लिए प्रतिज्ञा नाटक में यौगन्धरायण तथा भरत रोहक के
संवादों का अवलोकन किया जा सकता है । उदयन पर भरत रोहक द्वारा
लगाए गए आक्षेपों का उत्तर यौगन्धरायण जिस चतुराई से देता है, उसमें
भास की नाट्यशैली की विशेषता झलकती है । नाटक में तर्क-वितर्क का
महत्त्वपूर्ण स्थान है । क्योंकि इन्हीं के द्वारा घटना चक्र और कथानक आगे
बढ़ता है । भास के नाटकों में उक्ति प्रत्युक्तियों का संतुलित प्रयोग आया है ।
ये सीधी, स्वाभाविक और प्रभावोत्पादक हैं ।
छन्दों का सफल प्रयोग—नाटककार भास की उक्ति-प्रत्युक्तियों में
छन्दों का प्रयोग भी सफलतापूर्वक हुआ है । यही कारण है कि कई स्थानों पर
एक ही छन्द दो भागों में विभक्त हो गया है । पूर्वार्द्ध का प्रयोग एक पात्र
करता है तथा उत्तरार्द्ध का अन्य पात्र । इस प्रक्रिया द्वारा पात्रों में प्रत्युत्पन्न-
मतित्व समाविष्ट हो गया है ।
पात्रों के अनुकूल भाषा—भास के रूपकों की सफलता का श्रेय जहां
एक ओर उनके चरित्र चित्रणों में निपुण होने को है, वही उन पात्रों के
नुकूल भाषा का प्रयोग भी हैं । पात्रों और दर्शकों को एक सूत्र में बांधने
वाला उनका प्रसाद गुण अत्यधिक सहायक हुआ है। रूपको का प्राण प्रसाद-
गुण है, यह स्वीकार करने मे कोई अतिशयोक्ति नहीं है, क्योकि रूपक गति-
शील होता है। जिस गति से वह चलता है, उसी गति से यदि भाषा सामा-
जिको की समझ मे नही आती तो रूपक का समस्त आनन्द ही समाप्त हो
जाता है। अतः रूपक को गतिशील बनाए रखने के लिए उसमे प्रसाद गुण की
सर्वाधिक आवश्यकता है।
बोलचाल की भाषा—भास ने बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया
है। यही कारण है कि इनकी भाषा मे अनेक अपाणिनीय प्रयोग भी सम्मि-
लित है। ये आत्मनेपद के स्थान पर परस्मैपद का अथवा इसका विपरीत
प्रयोग करते है। इसी प्रकार इन्होने अकर्मक क्रियाओ का सकर्मक प्रयोग भी
किया है। यही नही, भास ने समास की प्रक्रिया मे भी कुछ नवीन प्रयोग
किए है, जो पाणिनि से मेल नही खाते। इन्होने कई नए तथा क्लिष्ट शब्दो
का प्रयोग भी किया है।
शैली मे तीनों गुणो का समावेश—शास्त्रीय दृष्टि से भासकी शैली में
ओज, प्रसाद व माधुर्य इन तीनो गुणो का समावेश पाया जाता है। ये मधुर
तथा मनोरम शैली का प्रयोग वही करते है, जहा किसी व्यक्ति की कोमल
भावनाओ की अभिव्यक्ति करनी होती है अथवा रम्य प्रकृति का वर्णन करना
अभीष्ट होता है। यह सत्य है कि जब कल्पना की दुरूहता और अलकारो के
बोझ से भाषा की सहज माधुरी दब जाती है, तब रसोद्रेक मे क्षीणता उत्पन्न
होती है। भास ने बलपूर्वक अलकारो का उपयोग नही किया है।
सशक्त शैली का प्रयोग—भास की वर्णन कला प्रौढ एव अपने ढंग
की अनोखी है। शैली को सशक्त बनाने के लिए इन्होने आम, वाढम् यदि,
चेत् तथा कुशल प्रश्न के लिए 'सुखमार्यस्य'' का प्रयोग किया है। इससे
ज्ञात होता है कि नाटककार दृश्यो के चित्रण मे अत्यन्त पटु है। इस प्रकार
के वर्णनो के आधार पर चित्राकन किया जा सकता है। शैली की सक्षिप्तता के
कारण छोटे-छोटे वाक्यो मे गभीर तथा रसपेशल भावो की व्यजना प्रस्तुत
की गई है।
वाग्विस्तार का परिहार—भास के पात्रो ने शैली की विशेषता के
कारण कम से कम शब्दो मे अधिक से अधिक भावो की अभिव्यजना की है।
( 14 )
इनमें व्यर्थ का विसंवाद कहीं भी प्राप्त नहीं होता है। संक्षिप्त शब्दों में
मनोगत भावों को प्रकट करना भास की विशेषता है। कौन पात्र किस परि-
स्थिति में किस प्रकार की भावदशा के अधीन रहेगा, इसका चित्रण भास ने
कुशलतापूर्वक किया है। वाग्विस्तार का परिहार इनकी प्रमुख विशेषता है।
वार्तालापों के आश्रय से ही सारे दृश्य उपस्थित हो गए हैं। पृथक्-पृथक् अवस्था
में विभिन्न भावों और विषयों के सूक्ष्म वर्णन में भास सिद्धहस्त हैं।
वर्णन का सूक्ष्म व स्पष्ट होना—वर्णन की सूक्ष्मता भी भास का शैलीगत
वैशिष्ट्य है। विषय या दृश्य का वर्णन करते समय उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंश
को भी वे उपस्थित कर देते हैं। दरिद्र चारुदत्त में दरिद्रता का वर्णन स्वाभा-
विक होने के साथ सूक्ष्म भी है। भास की शैली में संक्षिप्तता के साथ स्पष्टता
गुण भी निहित है। वे दृश्य वर्णन प्रसंग में इतने स्पष्ट रहते हैं, जिससे पाठक
या दर्शक बिम्ब ग्रहण करने में समर्थ होता है। यही कारण है कि भास को
संध्यावर्णन, मध्यरात्रि वर्णन, वनवर्णन, मध्याह्न वर्णन, तारुण्य वर्णन आदि
( 15 )
शब्द और श्रथ का सामंजस्य सुन्दर रूप मे घटित हुआ है । नाटकीयता का
सन्निवेश सुरुचिपूर्ण ढंग से किया गया है । भास का काव्यत्व नाटकत्व का
पूरक है । इनके पात्रो के सवाद संक्षिप्त, उचित, श्रवसरानुकूल तथा कथावस्तु
के परिवृहरण में सहायक है । नाटकीय कुतूहल सर्वत्र पाया जाता है । भाषा
मे श्रपूर्व प्रवाह श्रौर सरलता विद्यमान है । गागर मे सागर भरने वाली उक्ति
इनकी रचनाश्रो मे चरितार्थ है । इनका कथन क्षण भर में गुह्यतम गुत्थियों
का समाधान, मानसिक भावनाश्रो की सुख मे परिणति तथा विचारो को
सक्षिप्त रूप मे रखते हुए भाव की स्पष्टता को करने वाला है ।
श्रनुकरणीय शैली—भास की शैली मे भावाभिव्यक्ति की पूर्ण क्षमता
है । श्रत आद्य नाटककार होने पर भी भास की शैली पूर्ण गंभीर और प्रौढ़
है । इसका अनुकरण कालिदास, हर्ष, भवभूति आदि नाटककारो ने भी किया
है ।
निष्कर्ष—हम सक्षेप मे भास की शैली की विशेषताश्रो को इस प्रकार
बद्ध कर सकते है—
(1) स्वच्छता श्रौर सक्षिप्तता
(2) प्रभावोत्पादकता व व्यजकता का मणिकांचन योग
(3) श्रल्पसमास या समासहीन वाक्य संघटना
(4) सरलता श्रौर सहज बाधगम्यता
(5) श्रौचित्य एवं पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग
(6) लोकोक्तियो एवं सूक्तियो का प्रचुर प्रयोग
(7) घटनाश्रो का श्राकस्मिक वितरण
(8) स्वल्प शब्दो द्वारा श्रधिक भाव व्यजना
(9) श्रकृत्रिमता श्रौर स्वाभाविकता का समावेश
प्रतिमा-नाटकम्
नाटक का नामकरण
प्रतिमा नाटक भास का एक महत्वपूर्ण नाटक है । रामायण की
कथावस्तु वाले इस रूपक मे प्रतिमा गृह अथवा मूर्ति गृह की घटना का
महत्व ही इस नाटक की इतिवृत्त रचना की प्रमुख विशेषता है । इस प्रकार
इसका नाम तीसरे अंक के 'प्रतिमा गृह' की घटना के आधार पर रखा
गया है । प्राचीन काल मे राजाओ के देवकुल होते थे, जिनमे मृत्यु के बाद
राजाओ की पत्थर की मूर्तिया स्थापित की जाती थी । इक्ष्वाकु वंश का
भी ऐसा ही देवकुल था, जिसमे मृत नरेशो की मूर्तिया स्थापित की गई थी ।
ननिहाल से लौटने समय देवकुल मे स्थापित दशरथ की प्रतिमा को देख कर
ही भरत ने उनकी मृत्यु का अनुमान अपने आप कर लिया था । इसी कारण
से इसका नाम "प्रतिमा नाटक" पड़ा । प्रो० ध्रुव के अनुसार इस नाटक
का पूरा नाम 'प्रतिमा दशरथ' रहा होगा, जिसे संक्षिप्त रूप मे 'प्रतिमा'
कर दिया गया । भास के एक अन्य नाटक 'प्रतिज्ञा यौगन्धरायण' को संक्षेप
मे 'प्रतिज्ञा नाटक' तथा 'स्वप्नवासवदत्तम्' को 'स्वप्न नाटक' भी कहा जाता
[
( 17 )
नाओं को इस तरह सजाया गया है कि नाटक के अन्त तक पहुंचते-पहुंचते
क्षको की प्रायः सम्पूर्ण जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है। नाटक के कथानक के
भिन्न अंगों का विकास सहज रूप में हुआ है। इसकी सारी घटनाएं एक-
सरे का सहज विकास है। इसके कथानक में श्रोता या दर्शक के मन में
तूहल उत्पन्न करने की पूर्ण क्षमता है। इसकी घटनाएं अचानक मोड़
लेकर लोगो को सहसा चौंका देती हैं। इसमें कार्य-कारण की पूर्वापरता इस
तरह व्यवस्थित की गई है कि स्थान-स्थान पर दर्शक विमुग्ध होता जाता
है।
कथावस्तु
प्रतिमा नाटक में कुल सात अंक है।
पहला अंक—अयोध्या में राम के अभिषेक की तैयारियां हो रही
हैं। राजा दशरथ के आदेश से सब कुछ व्यवस्थित होता है। अचानक मंगल
वाद्य बजते हुए रुक जाते हैं। इधर सीता भी परिहास में एक वल्कल वस्त्र
पहनती हैं। राम उसके पास आते हैं और कहते हैं कि अचानक मेरा राजा
बनना रुक गया। वहीं लक्ष्मण का भी आगमन होता है, जो आवेश में कहते
हैं कि मैं संसार से सभी युवतियों को समाप्त कर दूंगा, क्योंकि एक युवती
कैकेयी के ही कारण यह सब हुआ है। यहीं ये बताते हैं कि राम को 14
वर्ष के लिए वन में भी रहना पड़ेगा। सीता तथा लक्ष्मण दोनों भी राम से
वन चलने की अनुमति प्राप्त कर लेते हैं।
दूसरा अंक—राम के वन चले जाने के कारण राजा दशरथ अत्यन्त
विकल हो जाते हैं। सभी प्राणियों को लगता है कि उनके बिना अयोध्या
सूनी हो गई। कौसल्या और सुमित्रा महाराज को धैर्य बंधाती हैं। सुमन्त्र इन
तीनों को रथ में बैठा कर वन में छोड़ने जाते हैं। अब भी राजा
दशरथ को आशा है कि राम वापस अयोध्या लौट आयेंगे। किन्तु जब सुमन्त्र
खाली रथ को लेकर आते हैं, तो दशरथ का हृदय टूट जाता है। उनके
और सुमन्त्र के मध्य होने वाले वार्तालाप से अत्यन्त करुणा झलकती है। वे
राम, लक्ष्मण और सीता के समाचार पूछते हुए बार-बार संज्ञाहीन हो जाते
हैं। अन्त में उन्हें लगता है, मानो उन्हें ले जाने हेतु उनके पितर आ गए हैं
और उनकी मृत्यु हो जाती है।
( 18 )
तीसरा अंक—भरत ननिहाल से लौटते हैं । अयोध्या के बाहर
प्रतिमा गृह मे मृत महाराज दशरथ की प्रतिमा स्थापित की जाती है । यह
इक्ष्वाकु वंश के अन्य राजाओ की मूर्तियां भी हैं । भरत जब यहां आते हैं, तो
उन्हें अयोध्या के बाहर कुछ समय रुक कर ही शुभ मुहूर्त मे अन्दर आने को
कहा जाता है । वे इस प्रतिमा गृह को कोई मन्दिर समझ कर देव दर्शनार्थ
अन्दर जाते हैं और पुजारी से उन मूर्तियों के बारे में पूछते हैं । उनको
दिलीप, रघु और अज की मूर्तियों का परिचय दिया जाता है । इनसे यह भी
कहा जाता है कि यह इक्ष्वाकु वंश के राजाओं का स्मारक गृह है । दशरथ
की प्रतिमा को देख कर वे बेहोश हो जाते हैं । स्वस्थ होने पर देवकुलिक
(उन्हें) पूरी बात बताता है । उसी बीच रानियां भी वहां आती हैं । भरत
कैकेयी को बुरा-भला कहते हैं एवं सुमन्त्र को साथ लेकर राम को वन से
लौटाने हेतु प्रस्थान करते हैं ।
चौथा अंक दण्डकारण्य मे भरत पहुंचते हैं और राम, लक्ष्मण
व सीता—तीनों का अभिवादन करते हैं । भरत कैकेयी की निन्दा करते हुए
राम से आग्रह करते हैं कि वे अयोध्या चलें और राज्य ग्रहण करें । राम
कहते हैं कि मै पिताजी के कहे हुए वचनो को पूरा करके उन्हें 'सत्य प्रतिज्ञ'
बनाऊँगा । जब भरत भी वन मे राम के ही साथ रहने का निश्चय प्रकट करते
हैं, तो राम उनको शपथ देकर अयोध्या लौटाते हैं । भरत दो शर्तों के साथ
वापस लौटते हैं—(1) 14 वर्ष की अवधि के समाप्त होने के बाद राम अयोध्या
के राज्य को पुनः ग्रहण करेंगे, तथा (2) तब तक के लिए वे राम की चरण
पादुकाएं लेकर अयोध्या जायेंगे व उन्हें सिंहासन पर रख कर प्रजा पालन
करेंगे ।
पाँचवाँ अंक—राम अपने पिता दशरथ का वार्षिक श्राद्ध करने को
चिन्तातुर हैं । इसी बीच बाहर से किसी अतिथि की ध्वनि आती है । वहाँ
सन्यासी के कपट वेश मे रावण उपस्थित था, जो अपने भाई खर और
दूषण की मृत्यु का बदला लेने राम के पास आया है । राम इस परिव्राजक
(सन्यासी) का सम्मान करते हैं । बातों ही बातों में रावण बताता है कि
राम को सुवर्ण मृग से पिण्डदान करना चाहिए । अचानक वही एक ऐसा
हिरण दीखता है, जिसे लाने राम चले जाते हैं । लक्ष्मण उस समय अनुप-
( 19 )
स्थित थे। रावण अकेली सीता का अपहरण कर लेता है। सीता की करुण
पुकार सुन कर गिद्धराज जटायु वहां उपस्थित होता है।
छठा अंक-रावण और जटायु के मध्य भयंकर युद्ध होता है। अन्त
मे जटायु को समाप्त कर रावण सीता को लंका ले जाने मे सफल होता है।
जनस्थान के दो तपस्वी इसकी सूचना राम को देते हैं। राम से मिलने सुमन्त्र
वहा आते है, किन्तु उन्हे वहा न पाकर भरत को सीताहरण के विषय मे
बताते है और कहते है कि वे आजकल किष्किन्धा में सुग्रीव के समीप है।
भरत जब कैकेयी को क्रुद्ध होकर यह समाचार देता है, तो कैकेयी राजा
दशरथ को अन्ध मुनि पुत्र को मारने से दिए गए शाप के बारे मे परिचित
कराती है। इसे सुनकर भरत अपनी जननी कैकेयी को निर्दोष मानता है
और अपनी सेना लेकर लंका के राजा रावण के विरुद्ध अभियान की घोषणा
करता है।
सातवां अंक--रावण को मार कर राम आदि जनस्थान पहुंचते
है। यहा राम और सीता इस स्थान की अपनी पूर्व की अनुभूतियों को कहते
है। इसी बीच वहा भरत अपने समुदाय के साथ आ जाते हैं और राम को
अयोध्या का राज्य संभला दिया जाता है। कैकेयी भी इस अवसर पर अत्यन्त
प्रसन्न है, जो यह कामना करती है कि ऐसा ही अभिषेक अयोध्या मे भी
सम्पन्न होना चाहिए। राम इसकी अनुमति प्रदान करते है। विभीषण, सुग्रीव,
हनुमान आदि भी राम को बधाई देते है। अन्त मे ये सभी लोग पुष्पक
विमान मे बैठ कर अयोध्या प्रस्थान करते है। इस प्रकार इस आनन्दपूर्ण
समारोह के बीच नाटक की समाप्ति होती है।
भास का कथावस्तु में परिवर्तन
नाटककार भास ने रामायण से ली गई इस कथावस्तु को नाटकीय
बनाने के लिए अपने प्रतिमा नाटक मे पर्याप्त परिवर्तन किया है, जो इस
प्रकार है-
(1) इस नाटक के प्रथम अंक मे प्राप्त होने वाली "वल्कल घटना"
का रामायण मे कही संकेत नहीं है। भास ने इससे राम और सीता के
मधुर पारिवारिक जीवन का एक दृश्य उपस्थित किया है।
( 20 )
(2) रामायण के अनुसार जब राजा दशरथ ने राम का राज्याभिषेक
करना चाहा, उस समय भरत और शत्रुघ्न दोनो अयोध्या से अनुपस्थित
थे। किन्तु भास के प्रतिमा नाटक के अनुसार उस समय शत्रुघ्न अयोध्या मे
ही थे। ननिहाल में केवल भरत को ही बताया गया है।
(3) दूसरे अंक में मृत्यु शय्या पर पड़े राजा दशरथ के सामने उनके
स्वर्ग से आए पूर्वजो का जो दृश्य बताया गया है, वह भी भास की अपनी
मौलिक कल्पना है। रामायण मे ऐसा वर्णन नही मिलता है।
(4) तीसरे अंक की "प्रतिमा गृह" की कल्पना का भी रामायण में
अभाव है। भास की इसी नाटकीय कल्पना के आधार पर 'प्रतिमा' नाटक
का नामकरण किया गया है। इसमे नाटककार ने कुशलतापूर्वक भरत को
उसकी अनुपस्थिति मे होने वाली घटनाओं से अवगत कराया है।
(5) सीताहरण की घटना भी अत्यन्त कौतूहल पूर्ण है। दशरथ के
श्राद्ध के लिए राम का चिन्तित होना, रावण का परिव्राजक के रूप मे राम
के सामने उपस्थित होना तथा काञ्चनपार्श्व मृग आदि की कल्पनाएँ भास
की निजी है।
(6) इस अवसर पर लक्ष्मण का किसी कुलपति के स्वागत के लिए
बाहर जाने का जो उल्लेख प्राप्त होता है, वह भी रामायण में नहीं है।
(7) छठे अंक में सुमन्त्र का राम के दर्शन हेतु जनस्थान मे जाना
और उनके माध्यम से भरत को सीताहरण की सूचना मिलना भी भास की
सृष्टि है। रामायण मे ऐसा नही मिलता।
(8) कैकेयी की निर्दोषिता प्रकट करने के लिए श्रवण वध एवं उसके
पिता द्वारा दिए गए शाप का उपयोग जिस रूप मे किया गया है, वह भास
की अपनी विशेषता है।
(9) रामायण मे इस बात का संकेत नही है कि कैकेयी राम को
केवल 14 दिन के लिए ही वन मे भेजना चाहती थी और घबराहट के
कारण उसके मुख से "चौदह वर्ष" का कथन निकल गया।
(10) छठे अंक के अन्त में रावण विजय के लिए भरत द्वारा
अपनी सेना को तैयार करने का जो वर्णन किया गया है, यह भी भास की
अपनी ही कल्पना है।
( 21 )
12- विवाह शुल्क - भरत लक्ष्मण से बड़े छोटे दिखायें
(11) सातवें अंक में जनस्थान में ही राम के राज्याभिषेक का जो
अंकन किया गया है, उसका रामायण में सर्वथा अभाव है। इस प्रकार
भास ने अपने प्रतिमा नाटक में ऐसे कई विवरण प्रस्तुत किए हैं, जो
वाल्मीकि रामायण में नहीं हैं।
चरित्र-चित्रण
(I) राम निष्काम
(1) भास विरचित प्रतिमा नाटक के राम धीरोदात्त नायक हैं। वे
अनासक्त होकर अपने कर्त्तव्य का पालन करने वाले हैं। अपने जीवन के
कठोर कर्मक्षेत्र में वे निष्काम भाव से अवतरित होते हैं। यहाँ तक कि वे
अपने अतुलनीय पराक्रम से प्राप्त लंका के साम्राज्य को भी विभीषण को
दे देते हैं।
(2) राम के चरित्र में प्रारम्भ से ही निर्लोभिता की भावना दृष्टि-
गत होती है। कैकेयी से उन्हें वनवास मिला, पर फिर भी उनके हृदय में
उसके प्रति आक्रोश की भावना नहीं है। अपना अभिषेक छोड़ कर वन
जाते समय वे तनिक भी विचलित नहीं होते। लोग उनके इस धैर्य पर
आश्चर्य प्रकट करते हैं, किन्तु वे इसे सामान्य बात समझते हैं।
(3) राम का हृदय सहिष्णु तथा सुकुमार भावों से ओतप्रोत है।
अपने वनवास के समाचारों से वे दुःखी होने के स्थान पर प्रसन्न ही होते हैं
और इस कार्य के लाभ गिनाते हुए कहते हैं कि "राजा दशरथ का वन जाना
रुका, मुझ पर पिता का वैसा ही वात्सल्य बना रहा, प्रजा को भी नये
राजा के अच्छे-बुरे झंझट से मुक्ति मिली एवं मेरे अन्य भाई भी ऐश्वर्य
भोग से वंचित न रहे।"
(4) प्रतिमा के राम का विनत भाव भी दर्शनीय है। वे अपनी
सौतेली जननी की आज्ञा को सहज रूप से शिरोधार्य कर लेते हैं। उन्हें
कैकेयी के प्रति थोड़ी सी भी अनास्था नहीं है। यदि कोई कैकेयी के विरुद्ध
कुछ भी कहता है, तो राम उस का विरोध तथा कैकेयी के पक्ष का समर्थन
करते हैं।
(5) सीताहरण के अवसर पर रामायण के राम सीता की स्पृहा-
विनोदन के लिए माया मृग मारीच के पीछे जाते हैं। परन्तु प्रतिमा के राम
श्राद्ध
( 22 )
पितृभक्त पुत्र के रूप में दशरथ के श्राद्ध हेतु कांचनपाश्र्वं मृग को लाने के
लिए प्रस्थान करते हैं ?
(2) सीता
(1) प्रतिमा की सीता का चरित्र भी अत्यन्त सुकुमार एवं उदात्त
है। प्रथम अंक में जब वह अवदातिका और चेटी के साथ वार्तालाप करती
हुई दिखाई देती है, तो वल्कल वस्त्र को देखकर सीता के हृदय मे स्वाभा-
विक रूप मे उसे पहनने की उत्कण्ठा जागृत होती है। यहाँ उसका भोलापन
अत्यन्त सहज तथा आकर्षक है ।
(2) (सीता भी राम के समान ही उदार चरित्र वाली हैं)। न तो
उसे उस समय अत्यधिक प्रसन्नता होती है, जब उसे राम के अभिषेक की
सूचना मिलती है, और न उसे अत्यन्त दुःख होता है, जब उसे राम के
वनवास का पता चलता है। राजकुल के इस उतार-चढाव से उसे कोई
लेना-देना नही है- "बहुवृत्तान्तानि राजकुलानि नाम ।'
(3) कैकेयी के आदेश को वह भी धीरता से सुनती है। जब
लक्ष्मण आवेश में आकर स्वयं युद्ध करने हेतु धनुष धारण करने की बात
कहता है, तो सीता राम से कहती है कि "देखो, लक्ष्मण ने रोने के अवसर
पर धनुष उठाया है।" इससे पता चलता है कि सीता के हृदय में दशरथ
के प्रति भी अपार सम्मान था ।
(4) (सीता का भरत के प्रति भी अपार वात्सल्य है)। जब भरत
ननिहाल से लौटकर वन में गए राम को वापस अयोध्या लाने जाता है और
राम से अनुनय-विनय करता है, तो सीता के इस वाक्य मे, "आर्यपुत्र,
प्रतिकरुण मन्त्रयते भरतः" सब कुछ प्रकट हो जाता है। उसकी ममता
भरत को कुछ समय और अपने पास रखने को प्रेरित करती है ।
(5) वनवास के जीवन में भी सीता अपने सहज कार्यों को सम्पन्न
करती है। तपोवन के पादपो को पुत्रवत् अपना स्नेह प्रदान कर पालती है।
राम का संकेत पाकर परिव्राजक के रूप में आए रावण अतिथि का सत्कार
करती है तथा उसके द्वारा अपहरण करने पर राम और लक्ष्मण को अपनी
रक्षा हेतु पुकारती है ।
( २३ )
(३) भरत [हस्तलिखित: निर्लोभी]
(१) महाकवि भास ने भरत का एक आकर्षक चरित्र उपस्थित
किया है, जो पश्चात्ताप के दुःख की आँच से निखरा है। उसका व्यक्तित्व
एक प्रबल सङ्कल्प शक्ति पर आधारित है। परिस्थितियों के कारण भरत के
जीवन मे इतने उतार-चढ़ाव आते है कि वह बहता जाता है।
(२) अपने मन मे मधुर कल्पनाएँ संजोए हुए भरत ननिहाल से
लौटता है, किन्तु अयोध्या के निकट प्रतिमा गृह मे विद्यमान दशरथ की
मूर्ति को देखकर उसे नियति का क्रूर अट्टहास सुनाई देता है। वह कैकयी को
बुरा-भला कह कर राम को लाने जनस्थान दौड़ता है, पर असफल रहता है।
(३) भरत का त्याग वास्तव मे स्तुत्य है, जो परिवार के विघटन को
आगे नहीं बढ़ने देता। वस्तुतः विश्व के इतिहास में ऐसा चरित्र दुर्लभ है, जो
अपने को प्राप्त वैभव को इस प्रकार ठुकरा दे। व्यवहार मे तो हम दूसरी ही
प्रकार की बातो को पाते है, जो भरत के आचरण से विलोम हैं।
(४) कैकयी के हृदय में अपने पुत्र भरत को राज्य दिलाने की विशे-
षाधिकार की भावना थी। किन्तु भरत ने उसे अपने भ्रातृत्व की वेदी पर
चढ़ा दिया। भरत का यह विचार अपने क्षणिक भावावेश पर नही, अपितु
अन्तर्व्यथा से उत्पन्न श्रद्धा व निष्ठा की ज्वाला मे तपा हुआ था। तभी तो
राम कहते हैं कि "जो यश मैंने दीर्घ काल मे पाया, भरत ने वह अति शीघ्र
संचित कर लिया।” (4.26)
(५) राम के प्रति भरत की निरतिशय भावुकता श्रद्धामूलक थी।
भरत के समर्पण, चिन्तन, साधन एवं जीवन मे भी राम ही थे। लक्ष्मण ने
इस तथ्य को अच्छी तरह समझ कर प्रकट किया है—
"अयं ते दयितो भ्राता भरतो भ्रातृवत्सलः।
संक्रान्तं यत्र ते रूपमादर्श इव तिष्ठति॥" (4.11)
(४) लक्ष्मण
(१) रामकथा के अन्तर्गत लक्ष्मण का चरित्र कठोरता एवं क्रोध से
परिपूर्ण उपलब्ध होता है। किन्तु उसे कोमल, स्वाभाविक और सरल रीति
से अभिव्यक्त कर नाटककार ने सांस्कृतिक चेतना का विकास किया है।
(२) लक्ष्मण के चरित्र में त्याग, भ्रातृप्रेम, आत्मविश्वास, वीरता
एवं उत्साह का एक समन्वित परिपाक है। उसका जीवन उच्छृंखल न।
हुए भी अत्यन्त उग्र है। उसका आचरण शिष्ट संकल्प, समुचित दृढ़ता ।
भक्तिपूर्ण शक्ति का प्रदर्शन है। फिर भी कभी-कभी वह उद्धत बन जाता
(3) जब लक्ष्मण को पता चलता है कि राम के अभिषेक में कैक
ने टाँग अड़ाई है, तो वे रमार से समो युवतियो को समाप्त कर देने :
घोषणा करता है। इस प्रकार उसमे वीरता है, किन्तु अमर्यादित । लक्ष्म
की वीरता में सन्तुलन का अभाव है। उसको इस प्रकार उद्धत बनने
लिए उसका भ्रातृप्रेम ही बाध्य करता है।
(4) लक्ष्मण का धैर्य भयकर से भयंकर विपत्ति मे भी वहिर्नि
वस्तुओं की अपेक्षा आन्तरिक निगूढ़ताओं से अधिक मिला हुआ है। तभी त
राम के समझाने पर वह कहता है कि आपने मेरा आशय नही समझा
आपको राज्य से च्युत किया गया, इस कारण मुझे दुःख नहीं है, किन्तु मे
क्रोध का कारण यह है कि आपको 14 वर्ष तक वन मे रहना पडेगा।
(5) इस प्रकार समग्र हृदय, आशा और आश्वासन, शक्ति औ
सकल्प, प्रेम और प्रार्थना से जीवन और यौवन को कर्त्तव्य की बलि वेदी
पर चढाने वाले लक्ष्मण अपने अग्रज राम का परम भक्त है।
(5) दशरथ
(1) राजा दशरथ एक स्नेही पिता है । सन्तान का स्नेह उनके
जीवन का सम्बल है । वृद्धावस्था मे उत्पन्न अपने चारो पुत्रो मे से राम उनको
प्राणों से भी अधिक प्रिय है। तभी तो राम के वन चले जाने पर दशरथ
पुत्र वियोग में व्याकुल होकर गिरते हैं, उठते है और हाय-हाय की रट लगाते
हैं ।
(2) यही पुत्र वियोग उनके सामने साक्षात् मृत्यु बन कर खडा हो
जाता है। राम के अभाव मे उनके प्राण जलहीन मछली की तरह छटपटाते
है। इसके सामने दशरथ का सासारिक स्नेह टूटता जाता है। वे अपने कष्ट से
घबरा कर कहीं भाग नहीं पाते और दुःख का यह अस्तित्व उनमें एक विचित्र
परिवर्तन ला देता है ।
(3) दशरथ की यह पीड़ा और भी अधिक घनी हो जाती है। वे
अपनी प्राणाधिक प्रिय पत्नी कैकेयी के लिए भी सोचते हैं कि यदि वह वन मे