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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

पद्मावत । ५३
आय दोहों नारंग बिच भये । देखि मयूर ठमक रहिगये ॥
आय जुरी भँवरन की पांती । चन्दन गाभ वास की माती ॥
गइ कालिन्दी बिरह सताई । चलपराग अरबैल बिचआई ॥
नाभी कुंड सो वानारसी । साँहें को होय मीचें तेहिलिखी ॥
दो० शिरकरवँततनकाशी लैले, बहुतसीफ तेहिआश ।
(१५४) बहुत धूम घूँट मैं देखी, उत्तर न देइ निराश ॥
चोंटी पीट लन्हि वै पाछें । जनु पहिर चली अप्सरा काँछें ॥
मलैयागिरि की पीठि सँवारे । बेनी नाग चढ़ा जनु कारे ॥
लहरैं देत पीठ जनु चढ़ा । चीर उढ़ावा केंचुल मढ़ा ॥
वेहिकाकहँ अस बेनी कीन्ही । चन्दनवास भुअंगहि लीन्ही ॥
कृष्णकरा चढ़ा वह माथे । तब सो लूटि अब छूटन नाथे ॥
कारे कमल गहे मुख देखा । शशि पीछे जनु राहुबिशेखा ॥
को देखै पावै वह नागु । सो देखै माथे मन भागू ॥
दो० पन्नग जो पंकज मुखगहे, खंजन तेहिशिर बैठ ।
(१५५) छत्र सिंहासन राजधन, ताकहँ होइ जो दीठ ॥
लंक खीन असआहिनकाहू । केहरि कहूँन वह सरताहू ॥
बसा लंक पखनीगजभीनी । तेहितेँ अधिक लंक वहखीनी ॥
परहँस पिवर भये तहँ बसौ । लिये डंख मानुष कहँ डसां ॥
मानहुँ नलिन खंड दुइ भये । दुहँबिच लंक तार रहिगये ॥
हिये सोमूड़परचलीवहनागा। पैगदेत कितसहसैकै लागा ॥
यमुना १ नाममुक़ाम २ बराबर ३ मौत ४ धुआं ५ जवाब ६ ना-
उम्मेद ७ इन्द्रपरी ८ धोती ६ चन्दन १० चोटी ११-१२ काला नाग १३-
१४ पकड़ना १५-१६ चांद १६ सांप १७ कमल १८ ममोला २० कमर २१-
२५-२८-३३ पतली २२ चीता २३ भंवरा २४-३१ बहुत पतली २६
बहुत २७ बारीक २६ डाह ३० कोकावेली ३२ छाती ३४ डर ३५ ॥

छुद्रघंट मोहहिं नरराजा । इन्द्र अखाड़ आये जनु बाजा ॥
नाम बीन गैहे कामिनी । लाकहिं सबै राग रागिनी ॥
दो० सिंहैं नजीता लंकैं शर, हार लीन्ह बनवास ।
तेहि रिस रक्तपिये मानुष, खाय मारके मांस ॥११५॥
नाभी कुण्डसो मलयसमीरू । समुद्र भँवर जस भवै गंभीरू ॥
बहुते भँवर बौंडर भये । पहुँच न सके स्वर्ग कहँ गये ॥
चन्दनमांझ कुरंगिन खोजू । वेहिंको पाव को राजा भोजू ॥
को वह लागहि वंचल सींझा । काकहिं लिखी ऐसको रीझा ॥
सोहै कमल सुगन्ध शरीरू । समुद्र लहर सोहै तन चीरू ॥
झूलहि रतन पाटके झोपां । साज मदन वहिकाकहँ कोपा ॥
अबहिं सो अहै कमलकी करी । नजनों कौन भँवर कहँ धरी ॥
दो० बेधरही जग बासना, निरमलै मेदै सुगन्ध ।११६।
तेहि अरघान भँवर सब लुब्धे, तजेंहिं न दियेबन्ध ॥
बैरणों तम्बै लंकै की शोभा । औ गर्जे गवनदेख सबलोभा॥
जुरे जंघ शोभा अति पाये । केला खंभ फेर जनु लाये ॥
कमल चरण अतिरौंत विशेखी । रहै पांट पर भूमि नदेखी ॥
देवता हाथ हाथ पगलेहीं । जहँ पगपरै शीशँ तहँ देहीं ॥
माथे भागन कोउ अस पावा । चरणकमल लै शीशँ चढ़ावा॥
चौरा चांद सूर्य उजियारा । पायल बीच करहिं झनकारा॥
अनवट बिछिया नखत तँराई । पहुँच सकै को पांइन ताई ॥

करधनी १ नामबाजा २ पकड़ेहुये ३ चीता ४ कमर ५ चन्दनकी हवा ६
गंहिरा ७ आसमान ८ हरिनके पांवका निशान ९ लहँगा १० कामदेव ११
पांकसांझ १२ केसर १३ छोड़ना १४ तारीफ़ करना १५ चूतड़ १६ कमर
१७ हाथी १८ बहुत लाल १६ तख़्त २० ज़मीन २१ क़दम २२ शिर २३-२४
छोटे नखत २५ ॥

पद्मावत । ५५
दो० वरन शिंगार न जान्यो, नखशिख जैस अभोग ।
तस जग में कछू न पायों, उपमां देव वह योग ॥
मुनिके राजा गयो मुरझाय । जानो लहर सूर्य के पाय ॥
प्रेम घाव दुख जानि न कोई । जेहि लागै जानै पै सोई ॥
परा सुप्रेम समुद्र अपारा । लहरहिं लहर होय बिसआराँ ॥
विरह भँवर होय भांवर देय । खनखन जीव हिलोरहिं लेय ॥
कितहिं निसाँसँ बूड़िजिवजाइ । कितहिं उठै निसाँसै बौराइ ॥
कितहिं पतिं खन हो मुखसेताँ । कितहिंचेते खनहोयअचेताँ ॥
कठिन मरन ते प्रेम व्यवस्था । नान जिये न जाय अवस्थाँ ॥
दो० जनु लै हारहिंलीन्ह जिव, हरहिं त्राँसेहि ताहि ।
इतना बोल न आव मुख, करें त्राहि त्राहि ॥
जहँलग कुटुंब लोग औ नेगी । राजारायआय सब बेगी ॥
ज्ञानवन्त गुणी कारणी आये । ओझा वैद्य सयान बुलाये ॥
चरचहिं चेतै परखहिं नारी । नेरें नाहिं औषध तहिं बारी ॥
है राजा लक्ष्मण के कराँ । शक्ती बान मोह है पराँ ॥
तहँ सो राम हनुमन्त बलदौरी । को लै आव सजीवनमूरी ॥
बिनय करहिं जेतो गढ़पती । का जीव कीन्ह कौन मतमती ॥
कहोसो पियर काहि पुनि खांगा । समुद्रसुमेरु औरतुमहिंमांगा ॥
दो० धावने तहां पठावैं, देहिं लाख दशरोकें ।
होयसो बेल जेहिबारी, आनहिं सबै बरोकैं ॥
जो भा चेत उठा बैरागा । बावर जनो सोय उठि जागा ॥
दुनियाँ १ मिसाल २ बेकरार ३ वेदम ४-५ पीला ६ सफ़ेद ७ होश ८
बेहोश ६ हाल १० दुखदेना ११ जल्द १२-१६ चेहरेकी हालत १३ नजदीक
१४ मानिन्द १५ राजा १६ दूत १७ नक़द १८ ॥

५६ पद्मावत ।
आय जगत बालक जस रोवा। उठा रोय हा ज्ञान सो खोवा॥
हौं तो अहा अमर पुर जहां। यहां मरन पुर आयों कहां॥
कै उपकारै मरन पर कीन्हा। सुँकि जगाय जीव हर लीन्हा॥
सोवत रहा जहां सुख साखा। कसन तहां सोवत विधि राखा॥
अब जिव वहां यहां तन सूना। कवलग रह यहि भान वहूना॥
जो जिव घटै कालके हाथा। कठिन नेकपै जीवन साथा॥
दो० उठहिं हाथ तन सरवरैं, हियाँ कमल तेहि माहिं।
नयनन्हिं जानहु नेरे, फेर पहुँचत अवगौहिं॥
सबहिं कहा मन समझो राजा। कालें से ते कुछ जूझे न छाजा॥
तासों जूझें जात जो जीता। जातन कृष्ण तजेंहिं गोपिता॥
उनहिं नेहूँ काहू से कीजे। नाउँ मेटि काहे जिव दीजे॥
पहिलहिं सुख नेहूँ जब जोरा। पुनि हो कठिन निबाहत ओरा॥
रहत हाथ तन जैसे शरीरू। पहुँच न जाय परातस फेरू॥
गगनं दृष्टि सो जाई पहुँचा। प्रेम अहँ दृष्टि गगनै ते ऊँचा॥
ध्रुवै ते ऊँच प्रेम धुवै उँचा। शिर दै पाऊँ दिये सो लुआ॥
दो० तुम राजा औ सुखिया, करो राजसुख भोग।
यहरे पंथ सो पहुँचे, सहै जो दुःख वियोग॥
सुवै कहा मन समझो राजा। करत प्रीति कठिन है काजा॥
तुमहि अबहिं जेई घर पोई। कमल न भेटहिं भेटहिं कोई॥
जानहि भँवर जो तेहि पँथै लूटे। जीव देहि औ दिये न छूटे॥
दुनियाँ १ बैकुंठ २ अहसान ३ चुपचाप ४ ईश्वर ५ अलग ६ तालाव ७
दिल ८ आंख ६ हाथ १० गहरा ११ मौत १२ लड़ाई १३-१४ छोड़ना १५
मुहब्बत १६-१७ मुश्किल १८-२८ कदम १६ आसमान २०-२३
निगाह २१ अंग्रेज २२ नाम रुखत २४-२५ राह २६-३१ विरह २७ मुला-
क़ात २६ कोकावेली ३०॥

पद्मावत। ५७
कठिनै आह सिंहलकर साजू । पाई नाहिं जो झांकै साजू ॥
वह पंथै जाय जो होय उदासी। योगी यैती औ तपी संन्यासी॥
भोग किये पायत वह भोगू । तर्ज सो भोग कोइ करतन योगू ॥
तुम राजा चाहो सुख पावा। योगहि भोग करत नहिं आवा ॥
दो० साधेन सिद्धन पाई, जोलौ साधि न तप्प ।
सोपै जानहिं बापुरो, शीशें जो करतहिं कल्प ॥
का भाखे कहानी कथा। निकसै घीव न बिन दधि मथा ॥
जो लह आप हेराय न कोई। तौलहि हेरत पाव न सोई ॥
प्रेम पहाड़ कठिनै बिधि १२ गढ़ा। सोपै जाय शीशें सों चढ़ा ॥
पंथै सूरि नगर उठा अँगूरू। चोर चढ़ार्क चढ़ि मंसूरू ॥
तुइँ राजा का पहिरेसि कंथा। तोरे घरहिमांझ दश पंथा ॥
कामक्रोधे तृष्णां मनमाया। पांचौ चोर न छांड़हिं कायों ॥
नव सेंध २१ गढ़े २२ के मंझियारों । घर मूसहिं निशि २३ के उजियारा॥
दो० अबहूँ जागि अयानी, होत आवनि शि२७ ओर।
पुनि कुछ हाथ न लागै, मूसजायँ जब घोर ॥
सुनि सो बात राजा मन जागा। पलकन मारि टकटकालागा॥
नयनन्हिं ढरहिं मोति औ मूंगा। जस गुड़ खाय रहा है गूँगा ॥
हियें की ज्योति दीपवह सूझा । यह जो दीप अँधेरा बूझा ॥
उलटि दृष्टि ३० माया सो रूठी। पलक न फिरी जान कै झूठी॥
जो पै नाहीं इस्थिर दसा । जंग उजारि का कीजे वसा ॥
: मुश्किल १-११ लड़ाई २ राह ३ किस्मफ़क़ीर ४-५-६-७ छोड़ना ८
फ़क़ीर ६-१५ शिर १०-१३ ईश्वर १२ राहसूरीकी १४ गुदड़ी १६ बीच १७
राह तथा नाक कान आँख मुहँ गुदा लिंग १८ गुस्सा १६ हवस २० बदन
२१ सूराख २२ क़िला २३ दरमियान २४ रात २५-२७ नादान २६ आंख
२८ दिल २६ नज़र ३० ॥

५८ पद्मावत।
गुरु बिरह चिनगी पै मेला। जो सुलगाय लिये सो चेला॥
अबकी पतङ्गे भृङ्ग की करौं। भँवर होऊँ जेहि कारन जरा॥
दो० फूल फूल फिर पूँछौं, जो पूँछौं वह केतें।
तन न्यौछावर कै मिलौं, ज्यों मधुकैरै जिउदेत॥
हिन्दूमीतैं बहुत समझाया। मान न राजा गवन भुलावा॥
उपजै प्रेमपीर जेहि आये। परबुधि होत अधिकै सोआये॥
अमृत वात कहत बिष जाना। प्रेमको वचन मीठ कै माना॥
जो वह बिषे मारिकै खाय। पूँछौ ताही प्रेम मिठाय॥
पूँछौ बात भरथंरहि जाय। अमृतराज तँजो विषखाय॥
औ महेशैं बड़ सिद्ध कहावा। उनहूँ विषे कण्ठ पै लावा॥
होतउयो रबि किरण निकासा। हनुमन्तहोय को देइसुआसा॥
दो० तुमसब सिद्धि मनावहु, होय गणेश सिधिलेहु।
चेला कीन चलावै, तुलै गुरू जेहि भेहु॥
तजौं राज राजा भा योगी। केरै किंकरी तन कियो वियोगी॥
तन बिसभेरैं मनबावरलटा। उरझा प्रेम परी शिर जटा॥
चन्द्रबदनै औ चन्दनदेहा। भस्म चढ़ाय कीन्ह तनखेहौँ॥
मेखलँ सिंहे चक्र ढिंढारे। लीन्ह हाथ तिरशूल सँभारे॥
कंथों पहिर दण्ड केरै गहौँ। सिद्धिँ होयकहँ गोरखेँ कहा॥
मुद्रौं श्रवणैं करँठे जपमाला। केरैउहियां कांध सिंहंछाला॥
पांवरेँ पायलीन्ह शिर छाता। खप्पर लीन्ह भेषै कै रातौँ॥
┈┈ परवाना १ नामकीड़ा २ मानिन्द ३ केतकी ४ भँवरा ५ दोस्त ६ नसी-
हत ७ बहुत ८ वांत ६ राजाभरथरी १० छोड़ना ११-१४ महादेवजी १२ सूर्य
१३ हाथ १५-२२ दुःखी १६ बेकरार १७ मुँह १८ राख १६ मस्तहाथी २०
गुदड़ी २१ पकड़ना २३ पूराहोना २४ नामफ़क़ीरकामिल २५ वाला २६ कान
२७ गरदन २८ सुमरिनी २६ चीतेकीखाल ३० खड़ाऊँ ३१ सूरत ३२ लाल ३३॥

पद्मावत । ५६
दो० चला भीखि मांगने कहँ, साजकिया तप योग ।
सिद्धिहोय पद्मावत पाये, हृदयँ जबकि बियोग ॥
गणकैकहहिं करगवन न आजू । दिन लै चलहिं होयसिधकाजू ॥
प्रेमलुब्ध दिन घड़ी न देखा । तब देखी जब होय सरेखा ॥
जेहितन प्रेम कहां तेहि मासू । काया रक्त न नयनहि आंसू ॥
पण्डित भुलान न जानहिचालू । जीवलेत दिन पूँछ न कालू ॥
सती कि बौरी पूँछै पांडे । औ घर बैठि नसैं तैं भांडे ॥
मरिजो चलै गङ्गा गति लेइ । तेहि दिन कहां घड़ी को देइ ॥
मैं घर वार कहां कर पावा । घरकार्यों पुनि अन्ते परावा ॥
दो० होरे पखेरू पंखी, जेहि वन मोर निवाहि ।
खेलचला तेहि वन कहँ, तुम अपने घरजाहि ॥
चहुँदिशे आनसो डौंड़ी फेरी । भइ कट्केई राजा केरी ॥
जानवन्त अहहि सकलें दरकानौ । सांभरलेहु दूरहै जाना ॥
सिंहलद्वीप जायसब चाहा । मोल न पावब जहां बिसाहा ॥
सबनिवहै पुनि आपन सांठी । सांठी बिनसोरहँ सुखमाठी ॥
राजा चला साज कै योगू । साजो बेगेँ चलें सबलोगू ॥
गैर्बजो चढ़ीतुरौ केपीठी । अबमुइँच लहुस्वर्ग सोडीठी ॥
मंत्रों लीन्ह होहु सँग लागू । गुदरजाय सबहो यह आगू ॥
दो० का निश्चिन्तै रे मनै, अपनी चिन्ता आछ ।
लेह सजगेँ आ आगमनैं, पुनि पछतास न पाछ ॥
कामिल १-२ दिल ३ दुःख ४ नजूमी ५ पूरा ६ दीवाना ७ होशियार ८
बदन ९-१० आखिर ११ चारोंतरफ़ १२ फ़ौज १३ सब १४ अरकानदौलत
१५ पूँजी १६-१७ जल्द १८ गरूर १६ घोड़ा २० आसमान २१ निगाह २२
सलाह २३ ग़ाफ़िल २४ फ़िकिर २५ होशियार २६ पहिले २७ ॥

६० पद्मावत।
बिनवै रतनसेन की मायाँ । माथेछात पाटें नितैं पाया ॥
बर्षहिनवनिधि⁴ लक्षापियारी । राजछांड़ि जन होहिं भिखारी ॥
नितैं चन्दन लागै जेहि देहा । सो तन देखि भश्वअवखेहां ॥
सब दिन रहे करत तुम भोगू । सो कैसे साधव तप योगू ॥
कैसे धूप सहब बिन छाहां । कैसे नींद पड़ै भुइँ माहां ॥
कैसे ओढ़ब काँथर कंथाँ । कैसे पांय चलब भुइँ पंथाँ ॥
कैसे सहब खनहिं खन भूखा । कैसे खाव करकटा सूखा ॥
दो० राज पौंटं देरै पुरुष सब, तुमहीं सों उजियार ।
बैठि भोग रस माहिंके, नचल तेहि अँधियार ॥
मोहिं यह लोभ सुनाव न माया । काकर सुख काकर यह काया॥
योनियानं तन होइ यहछारों । मोटी पोष मरै को भारा ॥
का भूलौं यहि चन्दन चोवा । वैरी जहां अंग के रोवा ॥
हाथ पांय श्रवणैं औ आंखी । ये सब भरहिं आय पुनि साँखी ॥
सूति १६ सूतितन बोलहिं दोखाँ । कहो कहँहो यह गति मोखाँ ॥
जो भलहोत राज औ भोगू । गोपिचन्दै नहिं साधत योगू ॥
उन्हें सृष्टि २० जो देख परेवा । तजौं राज कजरी वनसेवा ॥
दो० देखि अन्तैं अस होयहि, गुरू दीन्ह उपदेश ।
सिंहलद्वीप जाबमैं माता, तुमसों मोर अंदेशै ॥
रोवहिं नागमती रनवासू । कै तुम कन्तै दीन्ह वनवासू ॥
अबको हमहिं कोहि भोगिनी । हमहूँ साथ होयहहिं योगिनी॥
की हम लावहु आपन साथा । की अब मार चलहु सेंहाथा ॥
अरज़करना १ तख़्त २-१० हमेशा ३-५ सब दुनियांकी दौलत ४ राज ६-
१३ गुदड़ी ७ राह ८ टुकड़ा रोटी ६ फ़ौज ११ आख़िर १२-२२ कान
१४ गवाही १५ सूराख़ १६-पाप १७ नजात १८ नामराजा १६ संसार २०
छोड़ना २१ सलाम २३ ख़ाविन्द २४ ॥

पद्मावत । ६१
तुम अस बिछुड़े पीव पिरीता । जहँवां राम तहां सँगसीता ॥
जबलहिजिवसँग छांड़िनकायाँ । करिहौं सेव प्रखारहूँ पाया ॥
भली पद्मिनी रूप अनूपौँ । हमसे कोइ न आगोरि रूपा ॥
भौहें भली पुरुपनेँ की दीठी⁶ । जहँ जाना तहँ दीन्ह न पीठौ ॥
दो० दीन्ह अशीश सबै मिलि, तुम माथे नितँछात ।
राजकरो चित्तौरगढ़, राखो पिय अहिवात ॥
तुम तिरियाँ मतिहीन तुम्हारी । मूरुख सोइ मता घर नारी ॥
राघव जो सीता सँग लाई । रावणहरी कौन सिधि⁸ पाई ॥
यह संसार स्वप्न जस हेराँ । अन्तै न आपनको कहिकेरा ॥
राजाभरथरिहिं नहिंसुनी अयौनी । जेहिके घर सोरहसै रानी ॥
कुँचै लीन्हे तरवा सहराई । भा योगी कोउ संग न लाई ॥
योगी काहि भोग से काजू । चही न मेहरी चहै न राजू ॥
जूड़ि करकटौ पै भीखहिचाहा । योगी ताँतै भात सों काहा ॥
दो० कहा न मानी राजा, तेंजी सवाँई भीर ।
चला छांड़िकै रोवत, फिरिके दीन्हन धीरे ॥
रोवत माता फिरै न बाँराँ । रतनचला जगँ भा अँधियारा ॥
बांरे मोर जियावैर रता । सो लैचला सुत्रों परवता ॥
रोवहिं रानी तँजेहिं पराना । फोरहिंवरी²³ करहिं खरिहाना ॥
चूरहिंगें अभरने उरेँ हारू । अव काकहँ हम करव शिंगारू ॥
जाकहँ कही रहसिके पीव । सोई चला काकर यह जीव ॥
बदन १ धोना २ बेमिसाल ३ खूबसूरत ४ मर्द ५ देखना ६-१० हमेशा
७ औरत ८ कामिल ९ आखिर ११ नादान १२ छातीकीडंडी १३ ठंडीरोटीका
टुकड़ा १४ गर्व १५ छोड़ना १६-२४ सब १७ धीरज १८ लड़का १६-२१
डुलियां २० ज़िन्दगी का सबब २२ तोता २३ चूड़ी २५ गरदन के ज़ेवर २६
छाती २७ ॥

६२ पद्मावत ।
मरीचहहिं पै मरै न पावहिं । उठै आग सबलोग बुझावहिं ॥
घड़ी एक सुट भयो अँडूरो । पुनि पाछे बीता होय रुरो ॥
दो० टूटि मने नवं मोती, फूट मने दसें कांच ।
लीन्ह समेट सबै आभरनं, होयगा दुखकर नांच ॥
निकसा राजा सुनके पूरे । छांड़ि नगर मेला होय दुरे ॥
राये रांग सब भये बियोगी । सोरह सहसं कुँवर भये योगी ॥
माया मोह हरी सैंहाथा । देखि न बूझ नियानं न साथा ॥
छांड़हिं लोग कुटुम्ब सबकोऊ । भयेनिराश दुखसुखतर्जदोऊ ॥
सँवरहिं राजा सोइ अकेलौं । जेहिरे पन्थे खेलेहोय चेला ॥
नगरनगर औ गांवहिं गांवां । छांड़ चला सब ठांवहिं ठांवां ॥
काकर गढ़ काकर मठ माया । ताकर सब जाकर जिवकायां ॥
दो० चलाकटकै योगिनके, करके गेरुवा भेस ।
कोसबीस चारैहुँ दिश, जानहुँ फूला टेसूँ ॥
आगे सगुन सगुनैं यहितका । दहीमांझ रूपे कर टका ॥
भरे कलश तरुनी चलिआई । दही लिये ग्वालन गुहराई ॥
मालिन आय मौर ले गाथे । खंजनं बैठ नागके माथे ॥
दाहिन मिरगेँ आयगाधायें । प्रतीहारैं बोला घर बायें ॥
बिरखैं सवारिया दाहिनबोला । बायें दिशैं गीदरैं नहिं डोला ॥
बायें अकोशी धूरे आये । लोवाँ दरश आय देखराये ॥
बायें कुरेरी दाहिन कोचौं । पहुँची भुक्ति जैस मनरोचौ ॥
शोर १-२ ज़ेवर ३-शेर ४ राजा के भाई ५ दुःखी ६ हज़ार ७ आख़िर ८
छोड़ना ६ परमेश्वर १० राह ११ जगह १२ बदन १३ फ़ौज १४ चारों तरफ़
१५ टेसू १६ नजूमी १७ रुपया दही में रखके १८ जवान औरत १६ ममोला
२० हिरन २१ तीतर २२ सांड़ २३ तरफ़ २४ सियार २५ चील्ह २६ लोँवड़ी
२७ कौवा २८ उल्लू २६ रोज़ी ३० चाहना ३१ ॥

पद्मावत । ६३
दो० जाकहँ सगुनहोहिं अस, औगवनै जेहिआस ।
अष्टोमहासिद्धि पंथैहि, जस कबि कहा ब्यास ॥
भयो पयानै चला तब राजा । शंखनादै योगिनकर बाजा ॥
कहिन आज कुछथोर पयानां । काल्ह पयानैं दूर है जाना ॥
वह मिलानै जो पहुँचे कोई । तब हम कहब पुरुष भल सोई ॥
है आगे परवतकी बाँटैं । विषमै पहाड़ अगमै सठघाटैं ॥
विचविच कोह नदी औ नारा । ठाँवहिं ठांव बैठि बटपारौं ॥
हनुमंतै केर सुनत पुनि हांका । वहिको पार होयको थाका ॥
असमन जानि सँभारहु आगू । अगर्वा केर होहु पछलागू ॥
दो० करहिं पयानैं भोरउठि, नितहिं कोसदश जाहिं ।
पंथी पंथों जो चलहिं, ते कित रहैं औठाहिं ॥
करहु दृष्टि थिरै होय बटाऊँ । आगू देखि धरहु भुइँ पांऊ ॥
योगिओवैंट भुइँ परी भुलाय । कीमरि पंथै चले न जाय ॥
पांयन पहिरलेहु सब पाँवरी । कांटे न चुभै न गड़ै अँकरोरी ॥
परी आय अववनखंडै माहां । डंडौ कारन बीच निबाहां ॥
सघनै ढांखवन चहुँदिशँ फूला । बहुतुखमिलै वहांकर भूला ॥
झाँखरजहांसु छांड़हु पन्थौ । हिलगम कोयनफारहु कन्थौ ॥
दहिने विदैरै चंदेरीं । वायैं । वहिकहँ होब बाँटै दुइठाँयें ॥
दो० एक वाँट गई सिंहलैं, दूसर लंक समीपैं ।
जाना १ कामिल २ राह ३-१०-२०-२५-३१-३५-३७ कूच ४ शंखकी
आवाज़ ५ कूच तथा मौतका दिन ६ कूच दूर तथा क़यामतका दिन ७
मिलना ८ जवाँमर्द ९ टेढ़ा ११ जहां कोई न पहुँचसके १२ जगह १३-३६
राहलूटनेवाले १४ वन्दर १५ गुरू १६ कूच १७ हररोज़ १८ राहचलनेवाले १६
निगाह २१ कायम २२ मुसाफ़िर २३ राह बतलानेवाला २४ खड़ाऊँ २६ जंगल
२७ नाम जगह २८ गुंजान २६ चारोंतरफ़ ३० गुदड़ी ३२ नाम मुल्क ३३-३४
जगह ३६ नाममुल्क तथा स्वर्ग ३८ नाम मुल्क तथा नरक ३६ बराबर ४० ॥

६४ पद्मावत ।
: है आगे पंथ दो बनहिं, गवनबै केहिदीप ।
ततखन बोला सुआ सरेखौ । अगवों सोई पंथ जेहिं देखा ॥
सो का उड़ै न जेहि तन पांखू । लैसोपलाशँहि बोलै शाखू ॥
जस अंधा आँधीकर संगी । पंथ न पाव होय सहलँगी ॥
सुनिमति काजचहसि जो साजा । बीर्जा नगर विजौगिरराजा ॥
पूंछा जहां कुण्ड औ गोलां । तजि वायें अंध्यारे खटोला ॥
दखिन दाहिने रहै तिलंगौ । उत्तरमांझ होय कहँोकंटंगा ॥
मांझ रतननपुर सौंह दुआरा । झारखण्ड वे वांयें पहारा ॥
दो० आगे बाउँ उड़ीसों, वायें देहिसु वौंट ।
दहिनाव्रत लायके, उतर समुद्रकी घाट ॥
होत पयान जाय दिनकेरों । मिरगार्ने मंहिं कीन्ह बसेरा ॥
कुश सांठर भइ सूरि सपेती । करवंटे आय वनी सुँइसेती ॥
क्यामिली जसभूमि गलीजा । चलिदसकोस ओसतनभीजा ॥
ठांव ठांव सब सोवहिं चेला । राजों जागै आप अकेला ॥
जेहिके हिये प्रेम रंग जामा । का तेहि नींद भूखविशरामाँ ॥
बन अँध्यार र्यानि अँधियारी । भादों बरन भयो अतिभारी ॥
किंगरी गहे हाथ बैरागी । पंचतन्त धुनिओही लागी ॥
दो० नयनं लाग तेहि मारेंगे, पद्मावत जेहि दीप ।
जैसे स्वाति बूँदकह, बन चातकै जलसीप ॥
राह १-६-१६-३१ जाना २ तोता होशियार ३ राहबतानेवाला ४ नाम
दरख्त ५ भोलामारहुआ ७ सलाह ८ नाम मुल्क ६ छोड़ना १० नाम मुक़ाम
तथा योग की क्रिया ११-१२-१३ नाम मुल्क तथा मुक़ाम मतलब १४ नाम
मुल्क १५ कूच १७ शामकेवक्त १८ जंगल तथा कबरिस्तान १६ तोशक
और लिहाफ़ २० तकिया २१ ज़मीन २२ जगह २३ रतनसेन सुरांद परसे-
श्वर २४ दिल २५ आराम २६ रात २७ नाम बाजा २८ पाँचतार २६ आँख ३०
पपीहा ३२ ॥

मासकै$^१$ लाग चलत तेहिबाटाँ$^२$। उतरै जाय समुद्र की घाटा ॥
रतनसेन भा योगी यती । सुनि भेटे आवा गजपती$^३$ ॥
योगी आप कटक$^४$ सब चेला । कौनदीप कहँ जाहिखेलाँ ॥
भली आय सब मायाँ कीजै । पहुँनाई कहँ आयसु$^७$ दीजै ॥
सुनहु गजपती उतरं$^८$ हमारा । हम तुम एकै भाव निरारा ॥
सो तेहिकहँ जेहिमहँ यहभावा । जोनिरार्श$^१०$ तेहिलाड़नशावाँ$^११$॥
यही बहुत जो बोहित$^{१२}$ पाऊँ । तुमते सिंहलदीप सिधाऊँ ॥
दो० जहां मोहिं निजजाना, कटकैं हौं लिये बारैं$^{१५}$ ।
जो रेजियों तौ लै फिरौं, मरौं तो वहकी बारैं॥
गजंपती कही शीर्श$^{१८}$ वरमांगा । इतनी बोल न होइहै सांगा ॥
यहि सब देउँ आन पै गढ़ी । फूल सोई जो महेश्वर$^{१८}$ चढ़ी ॥
पै गुसाई सो एक नबांती$^{२१}$ । मारगैं$^२$ कठिनैं$^{२२}$ जाव केहिभांती$^{२३}$ ॥
सात समुद्र असूझ अपारा । मारहिं मगरमच्छ घड़ियारा ॥
उठै हिलोर न जाय सँभारी । भाँगैहि कोइनिबहै व्योपारी ॥
तुम सुखया अपने घर राजा । एते दुख जो सहो केहिकाजा ॥
सिंहलद्वीप जाये सो कोई । हाथ लेहें आपन जिव होई ॥
दो० खारि$^{२५}$ क्षीर$^{२६}$ दधि$^{२७}$ उदधि$^{२८}$ सुराँ, जलपुनिकिलें$^{२६}$ किला कूतें$^{२४}$।
कोचदि नांघ समुद्रये सातों, है काकर असपूत ॥
गजपति यहिमन सकती सेवा । पैजेहिप्रेम कहां तेहि जीवा ॥
जो पहिले शिरदेपगैं$^{३२}$ धरिये । मुये केरका मीचैं$^{३४}$ करीये ॥


शब्दार्थ / पाद-टिप्पणी:
एकमहीना १ राह २-२१ नाम राजा ३-६-१७ फ़ौज ४-१४ जाना ५ मेहर-
बानी ६ ज़्याफ़त ७ हुक्म ८ जवाब १० नाउम्मेद ११ नुक़सान १२ नाव १३
दरवाज़ा १५-१६ शिर १८ महादेवजी १६ अर्ज़ करना २० मुश्किल २२
किसतरह २३ क़िस्मत २४ खारी २५ दूध २६ दही २७ मीठापानी २८ शराब
२६ नाम समुद्र ३०-३१ सख़्ती ३२ क़दम ३३ मौत ३४ ॥

६६ पद्मावत।
सुख संकल्प दुख सांभरै लीन्हा। तौ पयान सिंहल कहँ कीन्हा॥
भँवर जानि पै कमल पिरीती। जेहि महँ बिथा प्रेम की बीती॥
औ जें समुद्र प्रेम कर देखा। तें यहिं समुद्र बूँद वर लेखा॥
सातौँ समुद्र सत लीन्ह सँभारू। जों धरती का गरु पहारू॥
जो पै जीव बांध सत बेरा। परजिव जाय फिरै नहिं फेरा॥
दो० रंगनाथ हौं जाकर, हाथ वही के नाथ।
गहै नाथ सो खींचै, फिरै न फेरे माथ॥
प्रेम समुद्र जो अति अवगाहूँ। जहां न वार न पार न थाहा॥
जो वह समुद्र गाह यहिं परे। जो अवगाहँ हंस होइ तरे॥
हौं पद्मावत कर भिखमङ्गा। दृष्टि न आव समुद्र औ गङ्गा॥
जेहि कारणै मैं काँथर कंथौ। जहां सो मिलै जाउँ तेहि पंथौ॥
अब यह समुद्र परो होय मरा। प्रेम मोर पानी के करों॥
मरभा कोई कतहूँ लै जाऊँ। वहकी पंथै कोऊ घर खाऊँ॥
असमन जान समुद्र महँ पयौँ। जो कोई खाय वेगेँ निसतेरयौँ॥
दो० स्वर्ग शीश धर धरती, हियों सों प्रेम समुन्द।
नयनै कौड़यौ होयरही, लै लै उठ तेहि हुन्द॥
कठिन बियोगै योग दुखदाहूँ। जन्म जरतहौं और न पाहू॥
डर लज्जा तहँ दोउ गँवानी। देखै कछू न आग न पानी॥
आग देखि वह आगें धावा। पानि देखि वह सौंहिं धसावा॥
जस बावर न बुझाये बूझा। कौन भांति जाय का सूझा॥
तोशा १ कूच २ बराबर ३ खारी, मीठा, पानी, दही, दूध, शराब, किल-
किलाकृत ये सात समुद्र हैं ४ ज़मीन ५ पकड़ना ६ गहिरा ७-८ निगाह ६
वास्ते १० गरदन ११ गुदड़ी और कंठ्ठा १२ राह १३-१५ मानिंद १४ जल्द
१६ छूटजाना १७ आसमान १८ शिर १६ ज़मीन २० दिल २१ आँख २२ नाम
जानवर २३ मुश्किल २४ जुदाई २५ जलना २६ सामने २७ किस तरह २८ ॥

पद्मावत । ६७
मगर मच्छ डर मने न लेखा । आपहिं चहौं पारभा देखा ॥
औ नहिं साय वह सिंहंसिंदूरी । काठै जाहि अधिकै यह झूरी ॥
कायाँ सायों सङ्गन साथी । जेहि जिव सौंपा सोई साथी ॥
दो० जो कुछ दैर्व अहा सङ्ग, दान दीन्ह संसार ।
काजानी केहिकी संतः दई उतारै पार ॥
धन जीवनैं औ ताकर जिया । ऊँच जगतैं महिजाकर दिया ॥
दिया सो सर्व जपतप उपर्राहीं । दिया बराबर कुछ जगं नाहीं ॥
एक दियातें दशगुन लाहा । दिया देखि सबको मुख जाहा ॥
दिया करै आगे उजियारा । जहां न दिया तहां अँधियारा ॥
दिया मंदिरे निशि करै उजोरा । दिया नाहिं घर मूसहिं चोरा ॥
हौतिम करनैं दिया जो सिखा । दिया रहा धर्मन महँ लिखा ॥
दिया सो काज दोहूँ जग आवा । यहां जो दिया वहां सब पावा ॥
दो० निरमलैं पंथै कीन्ह तेहि, जेहिरे दिया कुछ हाथ ।
कुछ नहिं कोई लैजायही, दिया जाय पै साथ ॥
खण्ड ग्यारहवां बोहितखण्ड ॥
संत नडोल देखा गजपंती । राजादत्त संत दोनों सती ॥
आपन नाहिं कर्यो पी कंथा । जीवदीन्ह अगमन तेहि पंथाँ ॥
निश्चै चला भर्म डर खोय । साहंसैं जहां सिद्ध तहँ होय ॥
निश्चै चला छांड़िकै राजू । बोहितैं दीन्ह दीन्ह सब साँजू ॥
चढ़ा वेगै औ बोहितैं पेली । धन वह पुरुष प्रेमपंथै खेली ॥
शेरलाल १ ज़्यादा २ बदन ३-२१ दुनियां दौलत ४ रुपया ५ ईश्वर ६
ज़िन्दगानी ७ दुनियां ८-१० ऊपर ६ मकान ११ रात १२ नाम सखी १३-१४
पाक्साफ़ १५ राह १६-२३-३१ ईमान १७ नाम राजा १८ सखावत १६
सच्चाई २० पहिले २२ बहादुर २४ कामिल २५ नाव २६ सामान २७ जल्द २८
जहाज़ २६ मर्द ३० ॥

६८ पद्मावत ।
प्रेम पंथं जो पहुँचै पारा । बहुरै न आय मिलै यहि छारौँ ॥
तेहि पावा उत्तमै कैलासू । जहां न मीचै सदा सुख वासू ॥
दो० यहि जीवनकी आशका, जैसे स्वप्न तिल आध ।
मुहम्मद जीतहि जो मुये, ते पूरुष सिध साध ॥
जस दिनरयँनि चलै गजं भांती । बोहितं चली समुद्रकी पांती ॥
धावहिं बोहितं मन उपराहीं । सहसैं कोस एक पलमहँ जाहीं ॥
समुद्र अपार स्वँग जनु लागा । स्वँगै नखाँलैं गिनै बैरागा ॥
ततखनै एक चालैँ दिखराये । जनु धौलाँगिरि पर्वत आये ॥
उठे हिलोर जो चालैँ निरोजे । लहर अकाशलानि भुँई बाजे ॥
राजा सितैं कुँवर सब कहैं । अस अस मच्छ समुद्रमहँ अहँ ॥
तेहिरे पंथं हम चाहत गवनौं । होहु सचेतै बहुरै न हिं अवनौ ॥
दो० गुरु हमार तुम राजा, हम चेला तुम नाथ ।
जहां पाउँ गुरु राखै, चेला राखै माथ ॥
केवटैँ हँसे सुनत को बंजौं । समुद्र न जानि कुवांकर मंजौं ॥
यहि तो चालैँ न लागै कोहू । का कहियो जब देखब रोहू ॥
सो अबहीं तुम देखे नाहीं । जेहि मुख ऐसे सहसँ समाहीं ॥
राजपंखैँ तेहिपर मँडराहीं । सहसँ कोस तिनकी परछाहीं ॥
तेवै मच्छ ठौर भैंहि लेहीं । शावकैं मुख चारा ले देहीं ॥
गरजे गगनैँ पंख जो खोलहिं । डोले समुद्र डहन जो डोलहिं ॥
तँहाँ न सूर्य न चांद असूझा । चढ़ै सोई जेहि अगम नैनैं बूझा ॥
राह १-२०-३४ लौटना २-२३ मिट्टी ३ वैकुण्ठ ४ मौत ५ मर्द ६ रात ७
हाथी ८ नाव ६-१० हज़ार ११-२८-३० आसमान १२-३३ ऊँचा १३ नीचा
१४ यकायक १५ नाम जानवर १६-१८-२७ नाम पहाड़ १७ हिलना १६
जाना २१ होशियार २२ मल्लाह २४ बातचीत २५ मेढक २६ सीमुर्ग २६ पक-
ड़ना ३१ बच्चा ३२ तथा परमेश्वरकी दूरन्देशी ३५ ॥

पद्मावत । ६६
दो० दशमहँ एक जायकोइ, कर्म धर्म संत नेम ।
वोहिते पार होइ जो, तौहो कुशल औ खेम ॥ (१५८)
बात कहत भइ देश गुहारी। केवटँहि चालैँ समुद्रमहँ मारी ॥
हस्ती लाय सिष्टं सब ढीला । दौड़आय इक चालैंहि लीला ॥
केवर्ट लागिलागि सब बली। फिरैन चालैँ जाय बहिचली ॥
वोहितँ सहसैं जाहिं चहुँओरा । होयकलोलैं जाहिं तरि बोरा॥
सुनिके आप चढ़ौँसें राजा । औ सबलोग देशमिलबाजाँ ॥
भालवांस खांड़े बहु परहीं। जान पखालै बाजके चढ़हीं ॥
चारालोल जो माछर बाभी । कहां जाय जो जाकर खंभी ॥
दो० माछरकर भूखहि हृदयँ, तेहि साधै विषं वान ।
सबहिँ पहुँचकै मारा, चालैहि तजौ परान ॥ (१५९)
जस धौलागिरि २४ परवत होई । तेही भांति उतरान्यो सोई ॥
सबै देश मिलि तैरहिं आना। लिये कुल्हाड़ी लोग जहाना ॥
जनु परवत कहँ लागहि चांटी २५। लेगये मांस रही सब कांटी ॥
मांजर परी कोसदस वँड़ी । मांजरिकस जस श्वेतँ बरेंड़ी ॥
नयनँ सोजानिकोटकी पँवरे २८ । कितअसगहे २६ फिरेतेहिभँवरे॥
रतनसेन से संघी कहें । अस अस मच्छ समुद्र महँ अहँ ॥
राजा तुमचाहो तहिँगवनौँ । होइकेसजगै बहुरि नहिँअवना ॥
दो० तुम राजा औ गुरू, हम सेवक औ चेरै ।
कीन्ह चहैं सब आयसैं, अबगवैनी तहिफेर ॥ (१५०)
नाव १-११ खैरियत २ नाखुदा अर्थात् मल्लाह ३-८ नाम जानवर
४-७-१०-२२ हाथी ५ ज़ंजीर ६ ज़बरदस्त ६ हज़ार १२ तैर १३ पानी के
नीचे १४ फ़ौज १५ पहुँचना १६ तलवार १७ नासजानना १८ खुराक १६
पेट २० ज़हर २१ छोड़ना २३ नाम पहाड़ २४ चूंटी २५ सफ़ेद २६ आंख २७
क़िलेका दरवाज़ा २८ पकड़ना २६ जाना ३०-३५ होशियार ३१ लौटना ३२
गुलाम ३३ हुक्म ३४ ॥

७० पद्मावत ।
राजैं कहा कीन्ह मो प्रेमा । जहां प्रेम तहँ कुशल १ क्षेमा ॥
तुम खेवो जो खेवहि पारहिं । जैसे आप तरहिं मोहिं तारहिं ॥
मोहिंकुशल २ कर सोच न ओता । कुशल ३ होत जो जन्म न होता ॥
धर्ती ४ स्वर्ग ५ जाँट पर दोऊ । जो यहिविच जिव राखनकोऊ ॥
हौं अब कुशल एक पै माँगौं । प्रेमपंथ सतबांधि न खाँगौं ॥
जो सतहिये ६ तो पंथहि १० दिया । समुद्रन डरे देखि मरजिया ॥
तहँलग हेरौं ११ समुद्र ढिंढोरौं । जहँलग रतन १२ पदारथ जोरौं ॥
दो० सप्तपातालै १३ खोजके, काढौं वेद गैरंथ ।
सातसमुद्र चढ़ि धावौं, पद्मावत जेहि पंथै १५ ॥
खण्ड बारहवां सात समुद्र खण्ड ॥
सायर १६ तरे हिये १७ सतपूरा । जो जीसंतें १८ कायर १९ पुनि सूरा ॥
तहँ सब बोहितं २० पूर चलाई । जहँ सतपवनै २१ पंख जनुलाई ॥
सतसाँथी सतगुरु हम वारू । सत गहीले लावे पारू ॥
सती नाक सबे आगू पाछू । जहँ जहँ मगर मच्छ औ काछू ॥
उठे लहर जनु उठे पहारा । चढ़े स्वर्ग औ परै पतारा ॥
डोलहिं बोहितं २२ लहरें खाई । सहँसै कोस इक पलमहँ जाई ॥
राजैं सो सत हिरदयँ बांधा । जेहि सत टेके करगुर कांधा ॥
दो० खारिसमुद्र सब नांघा, आये समुद्र जहँ खीर २७ ।
मिले समुद्र वै सातों, बेहरेँ बेहर नीरेँ ॥
क्षीरसमुद्र का बरैणों नीरू । श्वेतैं स्वरूप पियत जस क्षीरू ॥
खैरिचत १-२-३ ज़मीन ४ आसमान ५-२३ चक्की का पिल ६ राह ७-१०-
१५ कमी ८ दिल ९-१७-२६ देखना ११ लाल जवाहर तथा पद्मावत १२
सात पाताल १३ पोथी १४ बहादुर १६ सच्चाई १८ नामर्द १६ नाव २०
हवा २१ मददगार २२ जहाज़ २४ हज़ार २५ दूध २७-३२ अलग २८ पानी
२६ तारीफ़ ३० सफ़ेद ३१ ॥

पद्मावत । ७१
उलटहिं माणिक मोती हीरा । दर्ब देखि मन होय न धीरा ॥
मनो अनचाह दर्ब औ भोगू । पंथ भुलाय बिनाशै योगू ॥
योगी मनहिं उही रिस मारहिं । दर्ब हाथकै समुद्र पयारहिं ॥
दर्ब लेइ जो इस्तिरे राजा । जो योगी तेहिके केहि काजा ॥
पंथी पंथै दर्ब रिपु होई । ठग बटपारं चोर सँग सोई ॥
पंथी सोई दर्ब सो रूसे । दर्ब समेट बहुत अस मूसे ॥
दो० क्षीरसमुद्र सब नांघा, आये समुद्रदधि माहिं ।
जोहै पंथ के बावरे, नांतेहिं धूप न छांहिं ॥
दधि समुद्र देखत तसदहों। प्रेमके लुब्धै दग्धै पैसा ॥
प्रेम जो डांढौ धन वह जीव । दधि जमाय मथिकाढ़ै घीव ॥
दधि इकबूंदजामिसवक्षीरूँ । कांजी बूंदविनशियोयनीरूँ ॥
स्वांस डांढे मनमथनी गाढ़ी । हिये ज्योति बिनफूटिनसोंढी ॥
जेहिजियप्रेम चंदन तेहिआगे । प्रेमभवैनै फिर डर नहिंभागे ॥
प्रेमकी आग जरै जो कोय । ताकर दुख नहिं मिथ्यों होय ॥
जो जानहि सत आपहिंजारा । नास्तै हिये संत करेन पारा ॥
दो० दधि समुद्र पुनि पारभे, प्रेमहि कहां सँभार ।
भावै पानी शिरपरै, भावै परहि अँगार ॥
आय उदधिजलै समुद्रअपारा । धर्ती स्वर्ग जरै तेहिं झारा ॥
आग जो उपँजी ओही समुन्दा । लंका जरी वही एकबुन्दा ॥
विरह जो उपजी ओही काढ़ा । खन न बुझाय जाय तन बाढ़ा॥
राह १-५-१० तैरना २ क़ायम ३ मुसाफ़िर ४ राह लूटनेवाले ६ राह
चलनेवाले ७ अर्थात् माल वा दौलत पास अपने न राखे ८ दही ९-१६-
१७-२८ दीवाने ११ जलताहुआ १२ आशक १३ आंच १४ औटाहुआ १५
दूध १८ खटाई १६ पानी २० रस्सी २१ दिल २२-२७ चालाई २३ मकान २४
ख़राब २५ कमहिम्मत २६ नामसमुद्र २९ ज़मीन ३० आसमान ३१ पैदा
होना ३२-३३ ॥

७२ पद्मावत ।
जेहिसोबिरहतेहिआगनदीठी १ । सौहिं २ जरैफिरदेहि न पीठी ॥
जगँमहँ कठिनें खड्ग की धारा । तेहिते अधिकँ बिरहकी झारा ॥
अगमें पंथ जो ऐस न होई । साधु कहै पावै सब कोई ॥
तेहि समुद्र महँ राजा परा । जरा चहै पै रोवैं न जरा ॥
दो० तलफैतेल कराह जिमि ८; इमि ९ तलफै सबनीरे १० ।
वहि जो मलयगिरि ११ प्रेमका, सुबुन्दसमुद्र शरीर ॥
सुरौ समुद्र पुनि राजा आवा । महुवामँधु छाती देखरावा ॥
जो तेहि पिये सो भांवर लेय । शीशैं फिरै पंथ पैगैं न देय ॥
प्रेमसुरौ जेहिके जिय माहां । कितै बैठे महुवा की छाहां ॥
गुड़ की पास दाखें रस रसा । बेरी २० वेर मार मन गसाँ ॥
बिरहिन दग्धैकीन्ह तन भौंठे । हाड़ जराय दीन्ह जस काठे ॥
नयनैं नीर २६ सों पोतै क्यौँ । तस मँधु चुवै बरै जस दिया ॥
बिरह सुरँगें भूँजै माँसू । गिर गिर पड़ैं रँक्त के आँसू ॥
दो० मुहम्मद जो प्रेमका, हिये ३१ दीप तेहि याख ।
शीशैं न देइपतंग ज्यों, तबलंग चाखन वाख ॥
पुनिकिलकिला समुद्रमहँ आई । गा धीरज देखत डर खाई ॥
भा किलकिल अस उठै हिलोरा । जनुअकाश टूटै चहुँ ओरा ॥
उठै लहर परबत की नाई । फिर आवै योजन लखताई ॥
धर्तीलेत स्वर्ग लहि बाढ़ा । सकलै समुद्र जानो भाठाढ़ा ॥
नीरे ३७ होय तरि ऊपर सोई । मँह अरम्भ समुद्रमहँ होई ॥
१ देखना १ सामने २ दुनियां ३ मुश्किल ४ तलवार ५ ज्यादा ६ जहां कोई
न पहुँचसकै ७ राह ८-१६ जिसतरह ९ इसतरह १० पानी ११ चन्दन १२
शराब १३-१४-१८-२८ शिर १५ क़दम १७ क्योंकर १६ अंगूर २० बेर
नाम मेवा फ़सली २१ लेना २२ गर्म २३ भट्टी २४ आंख २५ आंसू २६ बदन
२७ सीख २६ खून ३० दिल ३१-३२ पांखी ३३ नामसमुद्र ३४ आसमान ३५
सूर्य ३६ पानी ३७ शेर ३८ ॥