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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

मासकै$^१$ लाग चलत तेहिबाटाँ$^२$। उतरै जाय समुद्र की घाटा ॥
रतनसेन भा योगी यती । सुनि भेटे आवा गजपती$^३$ ॥
योगी आप कटक$^४$ सब चेला । कौनदीप कहँ जाहिखेलाँ ॥
भली आय सब मायाँ कीजै । पहुँनाई कहँ आयसु$^७$ दीजै ॥
सुनहु गजपती उतरं$^८$ हमारा । हम तुम एकै भाव निरारा ॥
सो तेहिकहँ जेहिमहँ यहभावा । जोनिरार्श$^१०$ तेहिलाड़नशावाँ$^११$॥
यही बहुत जो बोहित$^{१२}$ पाऊँ । तुमते सिंहलदीप सिधाऊँ ॥
दो० जहां मोहिं निजजाना, कटकैं हौं लिये बारैं$^{१५}$ ।
जो रेजियों तौ लै फिरौं, मरौं तो वहकी बारैं॥
गजंपती कही शीर्श$^{१८}$ वरमांगा । इतनी बोल न होइहै सांगा ॥
यहि सब देउँ आन पै गढ़ी । फूल सोई जो महेश्वर$^{१८}$ चढ़ी ॥
पै गुसाई सो एक नबांती$^{२१}$ । मारगैं$^२$ कठिनैं$^{२२}$ जाव केहिभांती$^{२३}$ ॥
सात समुद्र असूझ अपारा । मारहिं मगरमच्छ घड़ियारा ॥
उठै हिलोर न जाय सँभारी । भाँगैहि कोइनिबहै व्योपारी ॥
तुम सुखया अपने घर राजा । एते दुख जो सहो केहिकाजा ॥
सिंहलद्वीप जाये सो कोई । हाथ लेहें आपन जिव होई ॥
दो० खारि$^{२५}$ क्षीर$^{२६}$ दधि$^{२७}$ उदधि$^{२८}$ सुराँ, जलपुनिकिलें$^{२६}$ किला कूतें$^{२४}$।
कोचदि नांघ समुद्रये सातों, है काकर असपूत ॥
गजपति यहिमन सकती सेवा । पैजेहिप्रेम कहां तेहि जीवा ॥
जो पहिले शिरदेपगैं$^{३२}$ धरिये । मुये केरका मीचैं$^{३४}$ करीये ॥


शब्दार्थ / पाद-टिप्पणी:
एकमहीना १ राह २-२१ नाम राजा ३-६-१७ फ़ौज ४-१४ जाना ५ मेहर-
बानी ६ ज़्याफ़त ७ हुक्म ८ जवाब १० नाउम्मेद ११ नुक़सान १२ नाव १३
दरवाज़ा १५-१६ शिर १८ महादेवजी १६ अर्ज़ करना २० मुश्किल २२
किसतरह २३ क़िस्मत २४ खारी २५ दूध २६ दही २७ मीठापानी २८ शराब
२६ नाम समुद्र ३०-३१ सख़्ती ३२ क़दम ३३ मौत ३४ ॥