पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० पद्मावत।
बिनवै रतनसेन की मायाँ । माथेछात पाटें नितैं पाया ॥
बर्षहिनवनिधि⁴ लक्षापियारी । राजछांड़ि जन होहिं भिखारी ॥
नितैं चन्दन लागै जेहि देहा । सो तन देखि भश्वअवखेहां ॥
सब दिन रहे करत तुम भोगू । सो कैसे साधव तप योगू ॥
कैसे धूप सहब बिन छाहां । कैसे नींद पड़ै भुइँ माहां ॥
कैसे ओढ़ब काँथर कंथाँ । कैसे पांय चलब भुइँ पंथाँ ॥
कैसे सहब खनहिं खन भूखा । कैसे खाव करकटा सूखा ॥
दो० राज पौंटं देरै पुरुष सब, तुमहीं सों उजियार ।
बैठि भोग रस माहिंके, नचल तेहि अँधियार ॥
मोहिं यह लोभ सुनाव न माया । काकर सुख काकर यह काया॥
योनियानं तन होइ यहछारों । मोटी पोष मरै को भारा ॥
का भूलौं यहि चन्दन चोवा । वैरी जहां अंग के रोवा ॥
हाथ पांय श्रवणैं औ आंखी । ये सब भरहिं आय पुनि साँखी ॥
सूति १६ सूतितन बोलहिं दोखाँ । कहो कहँहो यह गति मोखाँ ॥
जो भलहोत राज औ भोगू । गोपिचन्दै नहिं साधत योगू ॥
उन्हें सृष्टि २० जो देख परेवा । तजौं राज कजरी वनसेवा ॥
दो० देखि अन्तैं अस होयहि, गुरू दीन्ह उपदेश ।
सिंहलद्वीप जाबमैं माता, तुमसों मोर अंदेशै ॥
रोवहिं नागमती रनवासू । कै तुम कन्तै दीन्ह वनवासू ॥
अबको हमहिं कोहि भोगिनी । हमहूँ साथ होयहहिं योगिनी॥
की हम लावहु आपन साथा । की अब मार चलहु सेंहाथा ॥
अरज़करना १ तख़्त २-१० हमेशा ३-५ सब दुनियांकी दौलत ४ राज ६-
१३ गुदड़ी ७ राह ८ टुकड़ा रोटी ६ फ़ौज ११ आख़िर १२-२२ कान
१४ गवाही १५ सूराख़ १६-पाप १७ नजात १८ नामराजा १६ संसार २०
छोड़ना २१ सलाम २३ ख़ाविन्द २४ ॥