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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

पद्मावत । ७१
उलटहिं माणिक मोती हीरा । दर्ब देखि मन होय न धीरा ॥
मनो अनचाह दर्ब औ भोगू । पंथ भुलाय बिनाशै योगू ॥
योगी मनहिं उही रिस मारहिं । दर्ब हाथकै समुद्र पयारहिं ॥
दर्ब लेइ जो इस्तिरे राजा । जो योगी तेहिके केहि काजा ॥
पंथी पंथै दर्ब रिपु होई । ठग बटपारं चोर सँग सोई ॥
पंथी सोई दर्ब सो रूसे । दर्ब समेट बहुत अस मूसे ॥
दो० क्षीरसमुद्र सब नांघा, आये समुद्रदधि माहिं ।
जोहै पंथ के बावरे, नांतेहिं धूप न छांहिं ॥
दधि समुद्र देखत तसदहों। प्रेमके लुब्धै दग्धै पैसा ॥
प्रेम जो डांढौ धन वह जीव । दधि जमाय मथिकाढ़ै घीव ॥
दधि इकबूंदजामिसवक्षीरूँ । कांजी बूंदविनशियोयनीरूँ ॥
स्वांस डांढे मनमथनी गाढ़ी । हिये ज्योति बिनफूटिनसोंढी ॥
जेहिजियप्रेम चंदन तेहिआगे । प्रेमभवैनै फिर डर नहिंभागे ॥
प्रेमकी आग जरै जो कोय । ताकर दुख नहिं मिथ्यों होय ॥
जो जानहि सत आपहिंजारा । नास्तै हिये संत करेन पारा ॥
दो० दधि समुद्र पुनि पारभे, प्रेमहि कहां सँभार ।
भावै पानी शिरपरै, भावै परहि अँगार ॥
आय उदधिजलै समुद्रअपारा । धर्ती स्वर्ग जरै तेहिं झारा ॥
आग जो उपँजी ओही समुन्दा । लंका जरी वही एकबुन्दा ॥
विरह जो उपजी ओही काढ़ा । खन न बुझाय जाय तन बाढ़ा॥
राह १-५-१० तैरना २ क़ायम ३ मुसाफ़िर ४ राह लूटनेवाले ६ राह
चलनेवाले ७ अर्थात् माल वा दौलत पास अपने न राखे ८ दही ९-१६-
१७-२८ दीवाने ११ जलताहुआ १२ आशक १३ आंच १४ औटाहुआ १५
दूध १८ खटाई १६ पानी २० रस्सी २१ दिल २२-२७ चालाई २३ मकान २४
ख़राब २५ कमहिम्मत २६ नामसमुद्र २९ ज़मीन ३० आसमान ३१ पैदा
होना ३२-३३ ॥