पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पद्मावत । २६
उनई घटा पराजग छाहां। शंशि की शरण लीन्ह जनु राहू॥
छिपगये दिनभानु कीदसा। तेहि निशि नखतचांद परगसा॥
भूल चकोर दृष्टि तेहि लावा। मेघघटा महँ चन्द दिखावा ॥
दशन दामिनी कोकिलभाखै। भौहैं धनुष गगन लैराखै ॥
नयन खंजन दुइ केल करेहीं। कुच नारंग मधुकैरै रसलेहीं ॥
दो० सरोवर रूप विमोहा, हिये हिलोर करै।
पाउँ छुवे मगैं पाउँ, तन मन लहरें दे ॥ (५१)
धरी तीर सब कंचुक सारी । सरवर महँ पैठीं सब वौरी ॥
पानी तीर जानि सब बेलैं। हुलसैंहिं करहिंकामकी केलैं॥
करलैं केश विषहरैं विषभरे। लहरें लेहिं कमल मुख धरे ॥
नवल वसन्त संवारे कैरी। होय प्रकट जानहु रस भरी ॥
उठी कोप जस दाँड़िम दाखौं। भई अनन्त प्रेमकी साखा ॥
सरवर नहिं समाय संसारा। चांद नहाय बैठिलिये तारा ॥
धनसों नीर शेशि तैंरई उई। अबकित दृष्टि कमलऔकोई॥
दो० चकई बिछुर पुकारी, कहां मिलहो नांह। (५२)
एकचन्दनिशि स्वर्ग महँ, दिनदूसरजलमांह ॥
लागीं केलकरैं मँझ नीराँ। हंस लजाय बैठिहै तीराँ ॥
पद्मावतिकौतुक कहँराखे। तुमहिंशशि होहितराये नहिंराखे ॥
बाद मेल के खेल पसारा। हार देव जो खेलत हारा ॥
दुनिया १ चांद २-३१-४१ सूर्य ३ रात्रि ४ खिलना ५ निगाह ६-३३ दाँत ७
बिजुली ८ कोकिला कीसी बोली ६ कमान १० आसमान ११-३६ आँख १२
छाती १३-१८ भँवर १४ तालाब १५-१६-२६ दिल १६ शायद १७ लड़की
२० खुशहोना २१ मुलायम २२ बाल २३ सांप २४ कली २५ ज़ाहिर २६ अनार
२७ अंगूर २८ पानी ३०-३८ नखत ३२ क़ोकाबेली ३४ राति ३५ बीच ३७
किनाग ३६ तमाशा ४० नखत ४२ ॥
३० पद्मावत ।
सँवरहिं सांवर गोरहिं गोरी । आपन आपन लीन्हसजोरी ॥
बूझौ खेल खेलौ एक साथा । हारि न होय पराये हाथा ॥
आजहिं खेल बहुरि कित होय । खेलगई कित खेलै कोय ॥
धनि सो खेल खेल रस प्रेमा । रेंवतई और कुशलै क्षेमा ॥
दाँव. दो० मुहम्मदबारजो प्रेमकी, ज्योंभावे त्यों खेल । ६३।
तेलहिं फूलहिंवासज्यों, होय फुलायल तेल ॥
सखी एक तैं खेल न जाना । भई अचेतै मनहारगँवाना ॥
कमल डारगहि भई बिकरारौ । कासों पुकारों आपन हारा ॥
कित खेले आयौं एक साथा । हार गँवाय चल्यौं ले हाथा ॥
घर पैठत पूँछब यह हारू । कौन उतरै पावव पैसारू ॥
नयन सीप आंसू तस भरे । जानहु मोति गिरहिं सबढरे ॥
सखिन कहा बौरी कोकिला। कौनपानी जेहिपबुनूँ नहिं हिला ॥
हार गँवाय सो ऐसे रोवा । हरे हराये लेव जो खोवा ॥
दो० लागीं सबमिलि हेरी, बूड बूड एक साथ ।
कोई उठी मोतीले, काहू घोंघा हाथ ॥
कहा मानसेरं चहा सुपाई । पारस रूप यहां लगि आई ॥
भा निरमलै तेहिपायन परशे । पावा रूप रूप के दरशे ॥
मली समीर बासु तनआई । भा शीतल तनतपनबुझाई ॥
नाजानौंकौनपवँनै लेआवा । पुण्यदशा भइ पाप गँवावा ॥
ततछन हार बेगि उतराना । पावा सखहिं चन्द विहसाना ॥
बिक्सौ कमलदेखिशशि रेखा। भइतेहि रूप जहां जो देखा ॥
ठकुराई १ खैरियत २ बेहोश ३ बेकरार ४ जवाव ५ आँख ६ हवा ७-१४
ढूंढना ८-६ नाम तालाब १० पाक ११ चन्दन १२ ठंडा १३ जल्द १४
फूलना १६ चांद १७ ॥
पद्मावत । ३१
पावा रूप रूप जस चहा । शशि$^{१}$ मुख सब दरपन है रहा ॥
दो० नयन$^{२}$ जो देखे कमल भये, निरमलै नीर$^{३}$ शरीरँ ।
हस्त$^{५}$ जो देखे हँस भये, दशनँ$^{६}$ जोति नग हीर ॥ खण्ड
पद्मावति तहँ खेल दुलारी । सुआँ मंदिर महँ देखि मँजारी ॥
कहिसि चलौं जौलहि तन पांखा । जिव लै उड़ा ताक बन ढांखा ॥
जाय परा वन खंडँ$^{९}$ जिव लीन्हा । मिले पंखे$^{१०}$ बहु आदर कीन्हा ॥
आन धरी आगे फरशाखा । भुक्ति$^{११}$ न मिटी जबलहि राखा ॥
पाय भुक्ति$^{१३}$ सुख मन में भयो । दुख जो अहा बिसर सब गयो ॥
ए गुसैयाँ तू ऐसो विधाता$^{१४}$ । जानवंत जिव सब का भुकेँ दाता ॥
पाथर महँ नहिं पतंग बिसारा । जहँ तहँ सँवर दीन्ह तुइँ चारा ॥
दो० तौलहि साग बिछोह कर, भोजन पड़ा न पेट ।
पुनि बिसरा भा सँवरना, जनु सपने भइ भेंट$^{१५}$ ॥
पद्मावति पहँ आय भँडौरी$^{१६}$ । कहिसि मंदिर महँ परी मँजारी ॥
सुआँ जो उत्तरँ$^{१७}$ देत अहा पूंछा । उड़गा पिंजर न बोलै छूछा ॥
रानी सुना जो सुख सब गयो । जनु निशि$^{२०}$ परी अस्त दिन भयो ॥
गहने गही चन्द की किरा । आंसु गगनँ$^{२२}$ जस नखतहिं भरा ॥
टूटिवार सरवरँ$^{२३}$ बह लागे । कमल बूडि मधुकरैँ$^{२४}$ उड़ भागे ॥
यहिविधि आंसु नखत हो चुये$^{२७}$ । गगनँ छांड सरवरँ महँ उये ॥
भरहिं चुवहिं मोतिन की माला । अव संकेत बाँधा चहुपालाँ ॥
दो० उड़गा सो ठाँ कहँ बसा, खोज सखी सो तास ॥
पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes):
चांद १ आंख २ पांक ३ पानी ४ बदन ५ हाथ ६ दांत ७ तोता ८-१६-२६
चिड़ी ९-१८ जंगल १० उड़ने वाले जानवर हमजिन्स ११ खुराक जंगली १२-१३
ईश्वर १४ रोजी देने वाला सबका १५ मुलाक़ात १६ रसोईवरदार १७ जवाब
२० राति २१ आसमान २२-२५ तालाव २३-२६ भँवर २४ रंज २७ चारों
तरफ २८ ॥
वहहै धर्ती¹ की स्वर्ग² का, पवन³ न पावै वास ॥
चहूँ पास समझावहिं सखी । कहांसु अव पावेगा पखी ॥
जवलहि पिंजर अहा परेवों । अहा बांध कीन्हेसि नितसेवा ॥
तेहि बन घन जो छूटेपावा । पुनिफिरवां दै होय कितआवा ॥
वै उड़ाम फुरहरी खाई । जो भा पंख पांख तनलाई ॥
पिंजर जेहक सौंप तेहिगयो । जो ज़ाकर सो ताकर भयो ॥
दशबाटें⁵ जेहि पिंजरमाहां । कैसे बांच मँजारी⁶ पाहां ॥
ये धर्ती अस कंतन लीले । अश्वपति⁸ गजपतिबहुवरकीले ॥
दो० जहँ न राति नहिंदिवर्स है, तहां न पान न खांन ।
तेहि बन सोतों है बसा, फेरि मिलावै आन ॥
सुवै¹¹ तहां दिनदश कैलकाटी । आयो व्याधै ढुका लै ठाटी ॥
पैगें पैग भुइँ चापत आवा । पंखहि¹⁴ देखि सबै डरखावा ॥
देखो कुछ अचरज अनभलौं । तरवरै एक आवत होचला ॥
यह बन रहंत गये हम आऊँ । तरवरै चलत न देखा काऊ ॥
आजजोतरवरे चलभलनाहीं । आवहु यह बनछांड़ पराँहीं ॥
वैतो उड़ै और बन ताका । पण्डितसुओं भूल मन थाका ॥
शाखा देखि राज जनु पावा । बैठिनिचिंते चूल्हा वह आवा ॥
दो० पांचे बाणकर खोंचा, लासा भरे सो पांच ।
पांखभरा तन उरझा, कित पारधिन बांच ॥
बन्दभौं सुओ करतसुखकेली । चूरै पंखमेलेसि घरठेली²७ ॥
ज़मीन १ आसमान २ हवा ३ उड़नेवाला जानवर ४-१४ ताबेदार वा
क़ैदी ५ दशराह तथा इन्द्री बदनके सुराख ६ बिल्ली ७ घोड़े का सवार ८ दिन
६ तोता १०-११-२१-२५ बहेलिया १२ क़दम बाक़दम १३ बुरा १५ पेड़ १६-
१८-१६ उमर १७ भागना २० ग़फ़िल २२ कंपा २३ क़ैद २४ बाजू को
तोड़के २६ मोरी २७ ॥
[पद्मावत] ३३
तहँवां बहुत पंखे खरभरैं। आप आप महँ रोदन करैं॥
बिषे दाना कित होय अँगूरे। जहँ मामरन डहन धरचूरै॥
जो न होत चारा की आसा। कित चिड़हार ढकत लै लासा॥
ये बिर्ष चारा सबबिधि ठगी। औ भा काल हाथ ले लगी॥
यहिं झूठी माया मन भूला। चूरी पांख जैसो तन फूला॥
यहि मन कठिन मरै नहिं मारा। काल न देखि देखिपै चारा॥
दो० हम तो बुद्धि गँवाई, बिर्ष चारा अस खाय।
तू सोठां पण्डित हता, तू कित भा निठुरायँ ॥७
सुवै कहा हमहूं अस भूले। टूटिहिं डोल गर्व जेहि झूले॥
केला के बन लीन्ह बसेरा। पड़ा साथ तन बैरी केरा॥
सुखे करवार फेरो खाना। बिर्ष भा जेहि न्याँध तुलाना॥
काहेक भोगे वृक्ष अस फरा। अड़ा लाय पंखहिं कहँ हरा॥
सखीनिचिंतै जोखधन करना। यह निश्चिंत आगे है मरना॥
भूले हमहुँ गर्व तेहि माहां। सो बिगरा पांवा जहँ पाहां॥
होय निश्चिंत बैठि तेहि अड़ा। तब जाना खोंचा हियें गड़ा॥
दो० चरत न खुरकें कीन जब, तबरे चरा सुख सोय।
अब जो फांद परा गै, तब रोये का होय ॥८
सुनि के उतरें आंसु पुनि पोछे। कोन पंख बांधी बुध ओछे॥
पंखिन जो बुद्धि होय उजियारी। पढ़ा सुआँ कित धरै मंजारी॥
कित तीतर बन जीभ उघेला। शुकहिं हँकार फांद गये मेला॥
उड़नेवाले जानवर १-२६ ज़हर २-४-८-१४ बाजू ३ पर मड़ोरके ५ मौत ६
अक्ल ७-२५-२७ तोता ९-११-२८ बेदर्द १० ग़रूर १२-१६ खुशी १३ बहेलिया १५
पेड़ खाने का १६ ग़ाफ़िल १७-१८-२० दिल २१ अंदेशा फ़िक्र २२ गर्दन २३-
३० जवाब २४ बिल्ली २६॥
३४ पद्मावत ।
तादिन ब्याधैं भयो जिवलेवा। उठी पांख भा नाउँ परेवाँ ॥
भईव्याधै तृष्णाँ सुखखाधू। सूझी भुक्ति न सूझै ब्याधू ॥
हमहिं लोभ वह मेला जारा। हमहिं गर्व वह चाहै मारा ॥
हम निश्चिंतै वह आवछिप्राना। कौन व्यार्थ है दोपै अयानो ॥
दो० सो अवगुणेँ कित कीजिये, जिवदीजे जेहिकाज।
अब कहना कुछ नाहीं, मुँह भले पक्षिराजें ॥
चित्रसेन चित्तौरगढ़ राजा। कइगढ़कोतिचित्रैं समै साजा ॥
तेहिकुलं रतनसेन उजियारा। धनि जननी जन्मी असवारों ॥
पण्डित गुण सामुद्रिक देखहिं। देखिरूप औ लगन विशेखहिं॥
रतनसेन यहि कुल निरमरौं। रतनज्योति मन माथे परा॥
पदके पदारथ लिखीसोजोरी। चांद सूर्य जस होय अँजोरी ॥
जसमालतीकहँ भँवरवियोगी। तस वह लाग होय यह योगी ॥
सिंहलद्वीप जाय वह पावा। सिद्ध होय चित्तौर लै आवा॥
दो० भोग भोजैं जस मानी, विक्रमैं शाका कीन्ह।
परख रतन जो पारखी, सबै लिखन लिख दीन्ह ॥
चित्तौर गढ़ कर एक बँजारा। सिंहलद्वीप चला व्योपारा ॥
ब्राह्मणहुत एकनिपैटैं भिखारी। सो पुनि चला चलत व्योपारी ॥
ऋणैं काहूकर लीन्हेंसि काढ़े। मँग तेहिगये होय कछु बाढ़े ॥
मारगें कठिनैं बहुत दुख भये। नांघ समुद्र द्वीप वह गये ॥
देखि हाँट कुछ सूझे न ओरा। सबै बहुत कुछ देखि न थोरा ॥
चिड़ीमार १-३ उड़नेवाले जानवर २ दुनियाकी हवा हवस ४ रोज़ी ५ बहे-
लिया ६-६ गरूर ७ ग़ाफ़िल ८ क़सूर १० नादानी ११ बुरा काम १२ चुप १३ उड़ने
वाले जानवरों के राजा १४ तसवीर १५ बराबर १६ लड़का १७ पाक १८ लाल
जवाहर १६ रोशनी २० दुःखी २१ नामराजा २२ राजा विक्रमादित्य २३ बहुत
ग़रीब २४ क़र्ज़ २५ शायद वा कदाचित् २६ राह २७ मुश्किल २८ बाज़ार २६॥
पै सुठ ऊँच नीच तेहिकेरा । धनी पाव निरधनी मुख हेरौ ॥
लाख करोरहि वस्तु बिकाई । सहसनै केर न कोउ ओनाई ॥
दो० सबहिं लीन्ह बिसहना, औ घर कीन्ह बहोरै । (७४)
ब्राह्मण तहाँ ले का, गांठ सांठ सुठथोर ॥
झुरी ठाढ़ हौं काहेक आवा । बनजँ न मिला रहा पछतावा ॥
लाभै जानि आयौं यह हाटँ । मूर गँवाय चल्यों यह बाटँ ॥
का मैं मरन सिखावन सिखी । आयौं मरै मीचै हत लिखी ॥
आपनचलत सो कीन्हा झौंनी । लाभै न देखि मूरभइ हॉनी ॥
का मैं बोआ जन्म औ भूंजी । खोय चल्यों घरहुँ की पूँजी ॥
जेहि व्योहरिया कर व्योहारू । कालै देब जो छेंकैहि बारू ॥
घर कैसे पैठव मैं छूछे । कौन उतरै देहौं तेहि पूँछे ॥
दो० साथचला संतें बिछला, भये बिच समुद्रपहार । (७५)
आशनिराशाही फिरौं, तूविधि देहि उधार ॥
तबहीं व्याधै सुआँ लैआवा । कंचनबरनै अनूपै सुहावा ॥
बेचै लाग हाँटै लै ओही । मोल रतनमाणिकै जेहिहोही ॥
सुहिं कोपूँखपतंग मँडारें । चलन देख आछे मन मारें ॥
ब्राह्मण आय सुआँ सो पूछा । वह गुणवन्तकिनिरगुणछूंछा ॥
कहु पंखी जो गुणतोहिपाहां । गुणन छिपाये हृदये माहां ॥
हम तुम जात ब्राह्मण दोऊ । जात जात पूँछै सब कोऊ ॥
पण्डित हौ तो सुनावहु वेदू । बिन पूँछे पाई नहिं भेदू ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes):
दौलतवाला १ बेदौलत २ देखना ३ हज़ार ४ लौटना ५ बेपूंजी ६ माल ७
फ़ायदा ८-१३ बाज़ार ६-२३ राह १० मौत ११ होशियारी १२ नुक़सान १४
रोकना दरवाज़ा का १५ जवाब १६ ईमान १७ ब्रह्मा १८ बहेलिया १६ तोता
२०-२५-२७-२८ सोने का रंग २१ बेमिसाल २२ जवाहऱात २४ उड़नेवाले
जानवर २६ दिल २६॥
३६ पद्मावत।
दो० हाँ ब्राह्मण औ पण्डित, कहि आपन गुण सोय।
पढ़ेके आगे जो पढ़े, दून लाभै तेहि होय॥
तब गुण मोहिं अहा हो देवा। जब पिंजर हुत छूट परेवां॥
अवगुणकौनजोबँदै यजमाना। घाल मँजूसाँ बेंचै आना॥
पण्डित होय सो हाटैं नहिं चढ़ा। चहौं बिकाय भूलगा पढ़ा॥
दुइ मारग देखौं यह हाटाँ। दई चलावै वेहि केहि वाटाँ॥
रोवत रक्त भयो मुख रातों। तनभा पियर कहों का बाता॥
राती श्याम कण्ठ दुइग्रीवा। तेहि दुइ फन्द डरों शठजीवां॥
अबहूं कण्ठ फन्दकें चीन्हा। दुहूँके फन्द चाहै का कीन्हा॥
दो० पढ़ि गुण देखा बहुत मैं, है आगे डर सोय।
धुन्धजगतैं सबजानकै, भूलरहा बुद्धि खोय॥
सुनि ब्राह्मण बिनवौ चिरहारूँ। करि पंखहिं कहँ मयाँ न मारू॥
कतर्ये निठुर जिवबधेसि परावा। हत्याकेर न तोहिं डेरावा॥
कहेसि पंखैं का दोषैं जनाँवा। निठुर सोई सो परमसैं खावा॥
उनहिं रोय जानिके रोना। तहूँ न तजहिं भोगसुखसोना॥
औ जानहिं तन होय यह नासू। पोषै मांस पराये मांसू॥
जो न होहिं अस परमसैं खाधू। कितपंखन कहँ धरै बियाधू॥
जोरी व्याधै पंखनि नितधरे। सो निश्चिन्तै मन लोभै न करे॥
दो० ब्राह्मण सुआँ बेसाहा, सुनि मत वेदगरंथै।
मिलाआय सोसाथिनकहँ, भा चितोरकी पँथै॥
फ़ायदा १ जानवरपरिन्द २ क़ैद ३ संदूक़ ४ बाज़ार ५-७ राह ६-८ खून
६ लाल १०-११ काला १२ गला १३ दुनियां १४ अक़्ल १५ ख़ुशामद १६
चिड़ीमार १७ उड़नेवाले जानवर १८-२२-२८-३१ मेहरबानी १९ बे दर्द
२०-२४ मारडालना २१ पाप २३ पराया मांस खानेवाले २५-२७ छोड़ना २६
बहेलिया २६-३० ग़ाफ़िल ३२ लालच ३३ तोता ३४ पोथी ३५ राह ३६॥
पद्मावत। ३७
तबलौंग चित्रसेन शिवसाजो। रतनसेन चित्तौर भा राजा ॥
आय बात तेहि आगे चली। राज बणिज आये सिंहली ॥
हैं गज मोति भरी सब सीपी। और वस्तु बहु सिंहलदीपी ॥
ब्राह्मण एक सुआ लै आवा। कंचनबरण अनूप सुहावा ॥
राती श्याम कंठ दुइ कांठा। राती डहन लिखा सब पाठा ॥
औ दुइ नयन सुहावन रांता। राँती ठोर अँगूरसबता ॥
मस्तक टीका कांध जनेऊ। कबि ब्यास पण्डित सहदेऊ ॥
दो० बोल अर्थ सों बोली, सुनत शीश सब डोल।
राजमन्दिरमहँ चाही, अस वह सुआ अमोल ॥
भयो रजायसु जन दौड़ाए। ब्राह्मण सुआ बेगि लै आये ॥
विप्र अशीश बिनत औधारा। सुआजीवनहिं करों निरारों॥
पै यह पेट महाबिस्वांसी। जैसबनावा तँपी संन्यासी ॥
दौरे सेज जहां कुछ नाहीं। सुइँ पर रही लाय गै बाहीं ॥
अन्धहिरही जो देखननयनौं। गूंगरही मुख और न बयनौं ॥
बहिररही जो श्रवण नहिं सुना। पै यह पेटन रहे निरगुनों ॥
कई कईफेरा नित्तै यह दोषे। बारहिं बार फिरै सन्तोषै ॥
दो० सो मोहि लिये मँगावै, लावै भूख पियास।
जो न होत अशनै बैरी, केहि काहूकी आस॥
सुऐं अशीश दीन्ह बड़साजू। बड़ परताप अखण्डितैराजू ॥
भागवन्तविधि बुद्धि अवताराँ। जहांभागतहँरूपजोहारौं ॥
१ मरना २ सौदागर ३ हाथी ४ सोना ५ लाल वा काला ५ आंख ६-१६
लाल ७ लालचोंच ८ अमृत ९ शिर १० हुक्म ११ नौकरलोग १२ जल्द १३
ब्राह्मण १४ अलग १५ ज़बरदस्त १६ तपकरनेवाले १७ औरत १८ आवाज़
२० कान २१ नादान २२ हमेशा २३ दरवाज़ा २४ पेट २५ हमेशा राज क़ायम
२६ ब्रह्मा २७ अक्ल २८ पैदा करना २६ देखना ३० ॥
३८ पद्मावत ।
कोइ केहिपास आसके गवनाँ । जोनिराशदृढ़ आसनमवनाँ ॥
कोइ बिन पूँछे बोल जो बोला । होय बोल माटी के मोला ॥
पढ़िगुणिजितने पण्डितमतिभेऊ । पूँछे बात कहै सहदेऊँ ॥
गुणी न कोई आप सराहाँ । जो सो बिकाय ज्ञानसो जाहा ॥
जबलग गुण प्रगट नहिं होय । तबलग मर्म न जानै कोय ॥
दो० चतुरवेद हों पण्डित, हीरामन मोहिं नाउँ ।
पद्मावति सों मेरदों, सेवकहों तेहि ठाँउँ ॥
रतनसेन हीरामन लीना । एकलाख ब्राह्मण कहँ दीन्हा ॥
बिप्रै अशीशजोकीन्हपयानाँ। सुआ जो राजमँदिरमहँआना ॥
बैरणो काहि सुआ की भाखा । दीन्ह सुनाउँ हीरामन राखा ॥
जो बोलै राजा मुखजोवौ । जानौ मोतिन हार पिरोवा ॥
जो बोलै सब माणिक मूंगा । नाहित मवनै बांध है गूंगा ॥
जनुहि मारमुख अमृत मेला । गुरुहै आप कीन्ह जगैचेला ॥
सूर्य चांद की कथा कहा । प्रेमकी कहनलाय चितगहा ॥
दो० जो जो सुनै धुनै शिर राजा, प्रीति होय अगाह ।
असगुणवन्त नाहिं भल, सोतों बावर कीजे काह ॥
दिन दशपांच तहां जो भये । राजा कतहूँ अहेरे गये ॥
नागवती रूपवन्ती रानी । सब रनिवास पाटपरधोनी ॥
कियश्रृंगार करें दरपनलीन्हा । दरपन देखिगँर्ब जेहि कीन्हा ॥
बोलहु सुआ पियारे नाहो । मोरे रूप कोउ जगै माहा ॥
जाना १ मज़बूत २ चुप ३-१५ राजायुधिष्ठिर के भाई ४ तारीफ़ ५
ज़ाहिर ६ भेद ७ चारोंवेद ८ मुलाक़ात ६ जगह १० ब्राह्मण ११ कूच १२
तारीफ़ १३ देखना १४ दुनियाँ १६ तोता १७-२३ शिकार १८ महारानी १६
हाथ २० गरूर २१ खोविन्द २२ संसार २३ ॥
पद्मावत । ३६
हँसत सुआ पुनि आय सुनारी । दीन्ह कसौटी औ पनवारी ॥
सुआ बॉनि तोरी कस सोना । सिंहलद्वीप तोर कस लोना ॥
कौन दृष्टि तोरे रूपमनी । वहिं हौं लोने कि वै पद्मिनी ॥
दो० जोन कहेसि सँत सोठाँ, तोहि राजाकी आने ।
है कोई यह जग महँ, मोरे रूप समाने ॥
सँवरिरूप पद्मावति केरा । हँसा सुआ रानी मुख हेरौं ॥
जेहिसरवरें महँ हंस न आवा । बगुला तहँ जल हंस कहावा ॥
दई कीन्ह अस जगतैं अनूपा । एक एकते आगर रूपा ॥
कै मन गर्व न छाजा काहू । चांद घटा और लाग्यो राहू ॥
लोनेँ बिलोने तहां को कहै । लोनी सोइ कंत जेहि चहै ॥
काहि पूँछ सिंहलकी नारी । दिनहिंनपूजैनिशि अँधियारी ॥
कनकें सुगन्ध सु तेहिंकी कायां । जहां माथ का बरणों पाया ॥
दो० गढ़ी सुसोने सोंधी, भरे सो रूपे भाग ।
सुनत रोष भइ रानी, हिये लोन असलाग ॥
जो यह सुआ मंदिरमहँ अहै । कोन होय राजा सों कहै ॥
सुनि राजा पुनि होय बियोगी । छांड़े राज चलै होय योगी ॥
विषराखे नहिं होत अँगूरू । शब्दे न दे बहुर हम चूरू ॥
धाँयै दामिनी बेगि हँकारी । वहसौंपाहिये रिसनसँभारी ॥
देखोयहसो ठाँ है मुंडचाली । भयो न ताकर जाकर पाला ॥
मुखकी आनि पेटबसआना । तेहि अवगुण दसहाटबिकाना ॥
चुनौती १ आवाज २ खूबसूरत ३-५-१६ निगाह ४ सच ६ तोता ७ क़सम ८
बराबर ६ देखना १० तालाव ११ दुनियाँ १२ वेमिसाल १३ गरूर १४ खूबसूरत
या बदसूरत १५ खाविन्द १७ राति १८-२१ सोना १६ बदन २० गुस्सा २१
दिल २२-२६ दुखी २३ आवाज़ २४ लौंडी २५ विजुली २६ जल्द २७ बोलाया
२८ तोता ३० बदराह ३१ ॥
४० पद्मावत ।
पंख न राखी होय कुभाखी । लेतहँ मारि जहां नहिं साखी ॥
दो० जेहि दिनका मैं डरतहौं, रयनि छिपानो सूर ।
सो लैदे कमले कहँ, मोकहँ होय मयूर ॥
धाय सुआ ले मारे गई । समुझि ज्ञान हिरदै मत भई ॥
सुआ सुराजा करि बिशरामे । मारन जाय चहै जेहि स्वामे ॥
यह पण्डित खण्डित बैरागु । दोपं ताहि जेहि मूझि न आगू ॥
जो तिरियों के काज न जाना । परै धोख पाछे पछताना ॥
नागमती नागिन बुंधे ताऊ । सुआ मयूर होय नहिं काऊ ॥
जोनहिंकंत की आयसु माहां । कौन भरोस नारिकी बाहां ॥
मगैं यहि खोजहोय तसआय । तुरी रोग हरि माथेजाय ॥
दो० दुइसो छिपाये ना छिपे, इकहत्या अरु पाप ।
अन्तहि करहिं बिनाश यह, मैं साखी दै आप ॥
राखामुझा धांये मति साजा । भयोखोज तस आयोराजा ॥
रानी उतर माने सों दीन्हा । पण्डित सुआ मॅजारी लीन्हा ॥
मैं पूंछ्यो सिंहल पद्मिनी । उतरे दीन्ह तुम्हको नागिनी ॥
का तोर पुरुष रयनि करराऊ । उल्लुनजानिदिवैसे करभाऊ ॥
वैजसदिन तूनिशि अँधियारी । जहांबसन्त करीलकोवांरी ॥
का वह पंख कूट मुहँ कूटे । अस बड़बोल जीभ मुख छोटे ॥
जहर चुवै जो जो कहि बाता । अस हत्यार लिये मुखराताँ ॥
दो० माथे नहिं बैसारी, जो शठ सुआ सलोने ।
१ गवाह २ राति २-२४-२६ सूर्य ३ पद्मावति ४ मोर ५-१३ लौंडी ६-
२० दिल ७ आराम ८ मालिक ६ पाप १० औरत ११-१६ अक्ल १२ खाविन्द
१४ हुक्म १५ शायद १७ घोड़ा १८ बन्दर १६ जवाब गरूर से २१ बिल्ली २२
जवाब २३ दिन २५ बागीचा २७ उड़ने वाले जानवर २८ ज़हर २६ लाल ३०
बैठालना ३१ खूबसूरत ३२ ॥
सत कहि सती सँवारै सरा । आगलाय चहुँदिशि¹ सतजरा ॥
दुइजग² तरा सत्य जें राखा । और पियार दीन्ह सतभाखाँ ॥
सो सतछांड़ि जो धर्म बिनाशाँ। कामतिकीन्ह हिये⁴ सतनाशा ॥
दो० तँम सयान औ पण्डित, असतं न भाषौं काउ ।
सत्य कहो मोसों वह, काकर अपनाउँ ॥
सत्य कहत राजा जिव जाउ । पै मुखअसतं न भाषौं काउ ॥
हौं लिय सत्य निसस्यौ यहिँते । सिंहलदीप राजघर जेहिँते ॥
पद्मावत राजा की बारी । पद्मगन्धे शेशि दईसँवारी ॥
शेशि मुख अंगैं मलयँगिरिरानी। कनैंक सुगन्धहि द्वादशँ बानी ॥
है पद्मिन जो सिंहलमाहां । सुगंध स्वरूपसो वहकी छाहां ॥
हीरामन हौं तिहके परेवाँ । कंठि फूटि करत तेहि सेवा ॥
औ पायौं मानुष की भाखाँ । नाहीं तो पंखै मूठभरं पांखा ॥
दो० जबलहिं जियों रातदिन सँवरों, मरों वही लै नाउँ ।
मुखराताँ तनहरिहर कीन्हा, दुहूं जगंते लैजाउँ ॥
हीरामन जो कमल बखानौँ । सुनि राजा होय भँवरभुलाना ॥
आगे आव पंखैँ उजियारे । कहै सुदीप पतंग किय मारे ॥
रहा जो कनकें सुबासके ठाउँ । कस न होय हीरामन नाउँ ॥
को राजा कस दीप अतंगू । जेहिरे सुनत मन भयो पतंगू ॥
सुनिसुसमुद्रचरैं भये कलकलाँ । कमलवाहिभँवरहोय मिला ॥
कहौसुगंधधनि²⁸ कसनिरमॅली। भाअलि²⁹ संगकिअबहींकली ॥
फुटनोट्स:
चारौतरफ़ १ दोनों जहान २ बोली ३ नाश ४ दिल ५ झूठ ६-८ क़सूर ७
लड़की ६ कमलकी खुशबू १० चांद ११-१२ बदन १३ चन्दन १४ सोना १५-
२४ ख़ालिस १६ उड़ने वाले जानवर १७-१६-२३ आवाज़ १८ बाल २०
दुनियां २१ वयान करना २२ जगह २५ आंख २६ नाग जानवर २७ पद्मावत
२८ पाकसाफ़ २६ भँवर ३० ॥
४४ | पद्मावत ।
औ बहुत तहां जो पद्मिनी लोनी १। घर घर सबके होहिं जस होनी ॥
दो० सबै बखानें तहां कर, कहंत सो मोसों आव ।
चहौं दीप वह देखा, सुनत उठा तस चाव ॥
का राजा हौं बरैनौं तासू । सिंघलदीप अह्रै कैलासू ॥
जो गा तहां भुलाना सोय । गये युग बीत न बहुरा कोय ॥
घर घर पद्मिनि छत्तीस जाती । सदा बसंत दिवसै अरु राती ॥
जेहिं जेहिं बरनैं फूल फुलवारी । तेहिं तेहिं वरनं सुगन्ध सुनारी ॥
गन्ध्रपसेन तहां बड़ राजा । अप्सरैंहिं माहिं इन्द्रासन साजा ॥
सो पद्मावत ताकी बाँरी । औ सब दीप माहिं उजियारी ॥
चहूँखण्ड के वर जो आहीं । गर्वहिं १० राजा बोलहिं नाहीं ॥
दो० उदित सूरै जस देखी, चांद छिपै जेहि धूप ।
ऐसे सबै जाहिं छिप, पद्मावत की रूप ॥
सुनि रबि १२ नाँउ रतनैं भारती १३। पण्डित वही फेर कहु बाता ॥
तुइ सुरङ्ग मूरति वह कहीं । चितमहँ लाग चित्रैं हैरही ॥
जनु होय सूर्य आय मनबसे । सब घटपूर हिये १६ परगँसे ॥
अबहूँ सूर्य चांद वह छाया । जल बिन मीनें रक्त बिन काया ॥
करनें करान आ प्रेम अँगूरू । जो शेशि स्वर्ग चढ़ौं होय सूरू ॥
सहसें किरन रूपमन भूला । जहँ जहँ दृष्टि २५ कमल जनु फूला ॥
तहां भँवर जहँ कमला गन्धी । भइ शाशी २६ राहुकेर ऋण बन्धी ॥
दो० तीन लोक खण्ड चौदह, सबै परै मोहिं सूझ ।
खूबसूरत १ तारीफ़ २-३ दिन ४ रंग ५-६ इंद्रलोककी परी ७ लड़की ८
चारों तरफ़ ६ ग़रूर १० सूर्य ११-१२-२३ राजारतनसेन १३ दीवाना १४
तसवीर १५ दिल १६ खिलना १७ मछली १८ वदन १९ नसनस में २०
चांद २१-२६ आसमान २२ हज़ार ज्योति तथा पद्मावत २४ निगाह २५ ॥
पद्मावत । ४१
कान टूटि जेहि आभरणें, का लै करब सुसोन ॥
राजा सुनि बियोगं तसमाना । जैसेहियँ बिक्रमे पछिताना ॥
वह हीरामन पण्डित सुवा । जो बोलै मुख अमृत चुवा ॥
पण्डित दुखखण्डित निरदोषा । पण्डित हियेँ परै नहिं धोखा ॥
पण्डित केर जीभ मुख शोधे । पण्डित बात न कहैं विरोधै ॥
पण्डित सुमति दै पन्थँहि लावा । जोकुपंथ तेहिपण्डितनआवा॥
पण्डित राती बदन सरेखा । जो हत्यार रुहिरै पै देखा ॥
की प्रान घट आनहि मेती । की जलिहोहिं सुआ संग सती ॥
दो० जन जानहुकि ये अवगुण, मंदिर होय सुखराज ।
आयसु मेट कन्तै कै, काकर भय न अकाज ॥
चांद जैस धनि उजेर अहे । भा पिउरोष गहन अस गहे ॥
परमसुहाग निवाहन पारी । भावै धाग सेवा जब हारी ॥
इतनक दोषैं वीरज पिउ रूठा । जो पिउ आपन कहै सुझूठा॥
ऐसे गर्व नहिं भूलै कोई । जेहि डर बहुत पियारो सोई ॥
रानी आय धौय के पासा । सुआ भवा सेमर की आसा ॥
पराप्रीति कंचन महँ सीसा । बिथरन मिले श्याँम पै दीसा ॥
कहां सुनार पास जेहि जाऊँ । दे सुहाग करै इक ठाँऊँ ॥
दो० मैं पिय प्रीति अरोसे, गर्व कीन्ह जिव माहँ ।
तेहिरिस हों परहेली, नगररोप की नाँहँ ॥
उत्तर धाय तब दीन्ह रिसाई । रिसआपहिंबुधि अवरहिंखाई ॥
ज़ेवर १ दुख २ दिल ३-५ राजा विक्रमादित्य ४ बेहूदा ६ राह ७ बद
राह ८ लालमुँह ६ खून १० नागमती रानी ११ हुक्म १२ खाविन्द १३-
२०-२४ रानी १४ छोड़ना १५ क़सूर १६ गरूर १७ लौंडी १८-२६ सोना १६
जगह २१ अहंकार २२ दूर २३ जवाब २५ अक़्ल २७ ॥
४२ पद्मावत।
मैं जो कहा रिस करहुन बाला। कोन गयो यहि रिस कर घालाँ ॥
बिरस बिरोध रसहि पै होई। रिस मारै तेहि मार न कोई ॥
तुइ रिस भरी न देखेसि आगू। रिसमहँ काकहँ भयो सुहागू ॥
जेहि रिस तेहि रस जोग न जाई। बेरस हरैदि होय पीराई ॥
जेहिके रिस मिलाय रस दीजै। सो रस तज रिस कोह न कीजै ॥
कंतै सुहाग की पाई साधा। पावै सो जो वही चित बांधा ॥
दो० रहै जो पियकी आयसु, और बरती होय हीन।
निरमर्ल देखै चांद जस, जन्म न होय मलीनँ ॥
जुवाहार मन समुझी रानी। सुआ दीन्ह राजाकहँ आनी ॥
नागमती हौं गर्व न लीन्हा। कंत तुम्हार भर्म पिय लीन्हा॥
सेवा करै जो बारहमासा। अतनकि अवगुण करै नियासों ॥
जो तुम देइ नाय के ग्रीवों। छांड़हि नहिं बिन मारे जीवा॥
मिलतहि महँ जन अहो निरौरे। तुमसो अहो अदेशों पियारे ॥
मैं जाना तुम मोहे माहां। देखों ताक तो हौ सबमाहां ॥
का रानी का चेरी कोई। जेहिकहँ मयौ करै भल सोई ॥
दो० तुम सों कोई न जीता, हारा बिक्रर्म भोजँ।
पहिले आपहिं खोयकर, करै तुम्हारा खोज ॥
राजै कहा सत्य कहु सुआ। बिनसत कस जस सेंमर भुआ ॥
हो सुख रौती कहो सत बाता। जहाँ सत्य तहँ धर्म संघाता ॥
बांधी सृष्टि १८ अहै सतकेरी। लक्ष्मी अहै सत्य की चेरी ॥
सत्य जहाँ साहस सिधि २० पावा। औ सतबौंदी पुरुष कहावा ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes):
औरत १ खराब २-११ हल्दी ३ खाविन्द ४-६ हुक्म ५ पाकसाफ़ ६
मैला ७ गरूर ८ भेद १० गरदन १२ अलग १३ सारा जहान १४ मुहब्बत १५
राजा बिक्रमाजीत १६ नामराजा १७ लाल १८ दुनियां १६ कामिल २०
सच बोलनेवाला २१ मर्द २२॥
१. सूआ मिलन व रत्नसेन की विरह यात्रा
कहौं लिलाट दुइजकी जोती । दुइजहिज्योतिकहां जगँओती॥
सहसँ किरणिजोसूर्य्यदिपाये । देखि लिलाट सोउ छिपजाये ॥
का शिर बरणौं दिपै मयंकू । चांद कलंकी वह निकलंकू ॥
आवचांद पुनि राहु गरासा । वह बिन राहु सदा परकासा ॥
तेहिलिलाट पर तिलक जो बैठा । दुइजपास जानहुध्रुवै दीठा ॥
कनक पाट जनु बैठो राजा । सबै सिंगार अस्त्रं लै साजा ॥
वह आगे थिरै रहैन कोऊ । वहका कहिं अस जुरा सँजोऊँ॥
दो० खड्ग धनुष औ चक्रवान, दुइजग मारन नाउँ ।
सुनिके परा मुरछकै राजा, मोकहँ भये यकठाउँ ॥
भौंहें श्यामैं धनुर्प जनुताना । जासों हेरै मारि बिख बाना ॥
ओहि धनुष वह भौंह चढ़ा । कै हत्यार काल अस गढ़ा ॥
ओहि धनुष कृष्ण पै अहा । ओही धनुष राघव केर गहा ॥
ओहि धनुष रावण संहारों । ओहि धनुष कंसासुर मारा ॥
ओहि धनुष बेधा हत राहू । मारा वही सहस्राबाँहू ॥
ओहि धनुपमें उपनहि चीन्हा । धानिकै आप्पन वै जग कीन्हा
वहिभौंहहिशरैं कोइ न जीता । अप्सरैंहिं छिपी छिपी गोपितों ॥
दो० भौंहँधनुष धनधान कै, दूसर सैर न कराय ।
गगन धनुष उगवै, लांजहि सो छिपजाय ॥
नयने वान सैर पूचन कोऊ । जनुसमुद्र अस उलटहिं दोऊ ॥
रौती कमल करहिं अलभैंवाँ । गुंजहिं मातनकरहिं अपसवां ॥
शिर १-४-६ दुनियाँ २-२४ हज़ार ३ तारीफ़ ५ चांद ६ ऐब ७ रोशन ८
नाम नखत १० सोना ११ हथियार १२ क़ायम १३ मिलना १४ सियाह १५
कमान १६ देखना १७ मौत १८ हाथ १६ मारडालना २० नामराजा २१ तीर
अंदाज़ २२ निशाना २३ वान २५ इन्द्रलोककी परी २६ गोपी २७ पंचायत
तीर अंदाज़ २८ बराबर २६-३२ आसमान ३० आंख ३१ लाल ३३ भँवर ३४ ॥
४८ पद्मावत ।
उठहिं तुरंग लेहिं नहिं बागा । जानौँ उलट गगन कहँ लागा ॥
पवन झकोरें देहिं हिलोरा । स्वर्ग लाय भुइँ लाइ बहोरा ॥
जंग डोलै डोलत नयनोंहाँ । उलट औझर चहै पलमाहां ॥
जबहिं फिराये कङ्कन चूरा । असवै भौंह भँवरकी जोरा ॥
समुद्र हिलोर करहिं जनु झूले । खंजन लरहिं मिरगँ वन भूले ॥
दो० भरे समुद्र अस नयन दुइ, माणिक भरे तरंग ।
आवहिं तीर जाहिं फिर, काल भँवर तेहि सग ॥ ४७ ॥
बरुनी का बरनौं इमै वनी । साधे बान जानु वहि अनी ॥
जुरी राम रावणकी सैना । बीच समुद्र भयें वह नयना ॥
वारहि पार न्यावर सांधे । जासों हेरें लाग विये वांधे ॥
उन्ह बानहिं अस कौन न मारा । वैध रहा सगरा संसारा ॥
गगन नखत जस जाहिं न गिने । वै सब बान वही के हने ॥
धरती बान बेध सब राखे । शाखा ठाढ़ वही सब शाखे ॥
रोवँ रोवँ मानुष तन ठाढ़े । सूतहिं सूत बेध अस गाढ़े ॥
दो० वरुनि बान जस उपनहिं, वेधी रन वन ढंख ।
सो जेहि तन सब रोवां, पंखहि तन सब पंख ॥
नासकेँ खंग देवों केहि योगू । खंग खीन वह बदन सँयोगू ॥
नासकेँ देखिल जान्यो सुआ । शुक आय बेसर होय उआ ॥
सुआ जो पियर हीरामन लाजा । और भाव का वरनौं राजा ॥
सुआ सुनाक कठौर नवौरी । वह कोमलैं तिलपुहुँपै सँवारी ॥
घोड़ा १ आसमान २-३-१८ दुनियां ४ आँख ५-८ ममोली ६ हिरन ७
जवाहर ६ लहरि १० किनारा ११ पलक १२-२० तारीफ़ १३ इसतरह १४
फ़ौज १५-१६ देखना १७ सूराख १६ जानवर परिन्द २१ नाक २२-२७
तलवार २३-२५ बराबरी २४ पतली २६ नाम नखत २८ वयान करना २६
सख्त ३० टेढ़ी ३१ मुलायम ३२ फूल ३३ ॥
4 पद्मावत । ४५
प्रेम छोड़ि कुछ और नहिं, सुना जो देखौं मनबूझ ॥
प्रेम सुनत मनभूल न राजा। कठिनप्रेम शिरदियेतेहिछाजा॥
प्रेम फन्द जो पड़ा न छूटा। जीव दीन्ह पै फांद न छूटा॥
गिरगिटै छन्दधरै दुखतीताँ। खनहो पीतं रोंति खन सीतोँ॥
जानिपुछारै जो भयबनबासी। रोवँरोवँपरी फांदनकोआसी॥
पांख फरेरा सोई फांदू। उड़ न सकहिं उरझे भये बाँदू॥
मेउमेउँ निशि दिन चिल्लाय। वही रोष नागिन धरखाय॥
पांडुकै सुआकण्ठ वह चीन्हा। ज्यहिँगै परा चाहि जिवदीन्हा॥
दो० तीतर गयैं ११ जो फांद है, नितहिं १२ पुकारै दोष।
मुकि १३ हँकारै फांदगैं १४, मेले कित मारे पुनमोषै॥
राजा लीन्ह ऊबके श्वासा। ऐसे बोल नहिं बोल निरासाँ॥
पहिल प्रेमहै कठिन दुहेलोँ। दोजगँ तरा प्रेम जेहि खेला॥
दुख भीतर प्रेम मधुँ राखा। किंचन मरन चहै सो चाखा॥
जेहिनाहिंशीशँ प्रेमपंथ लावा। सो पृथ्वी मँहँ काहेक आवा॥
अब मैं पीय प्रेमपंथ मेला। पायन ठेल राख कै चेला॥
प्रेमवारसो २६ कहै जो देखा। जें न देखि का जानि विशेखा॥
तबलंग दुख प्रीतम नहिं भेंटाँ। मिलातोजा जरमकैं दुखमेटा॥
दो० जस अनूप तुइ बरैणी, नखँशिख बरौँ शिंगार।
है मोहिं आश मिलन की, जो पुखै करतारै॥
१ रंग १ गर्म २ पीला ३ लाल ४ सफ़ेद ५ मोर ६ प्रेमका फन्दा ७ रात ८
गुस्सा ६ कुमरी १० गरदन ११-१५ हमेशा १२ चुप १३ बोलाना १४ नजात
१६ नाउम्मेद १७ मुश्किल १८ भारी १६ दोनों जहान २० शराब २१ शिर
२२-३५ राह २३-२५ ज़मीन २४ दरवाज़ा २६ मुलाक़ात २७ बहुत दिन २८
बयान करना २६ नाखून से शिरकी चोटी तक ३० तारीफ़ ३१ ईश्वर ३२॥
४६ पद्मावत ।
खण्ड सातवां श्रृंगारखण्ड पद्मावत ॥
का शिंगार वह बरर्णौं राजा । वहक शिंगार वही पै छाजा ॥
प्रथमे शीशँ कस्तूरी केशौँ । बलि बासुकिको और नरेशाँ ॥
भँवरकेश वह मालति रानी । विषहरँ लरहँ लेहिँअर्घौनी ॥
बेनी छोरि भार जो बारा । स्वर्ग पताल होय अँधियारा ॥
कोमलँ कुटिलँ केशँ नगकौरे । लहरे भरी भुअँगँ बैसारे ॥
बेधीजानि मलैयंगिरि वासा । शीशँ चढ़ी लोटहिँ चहुँपासा ॥
घुंघुरवार अलकें विषै भरे । संकरें प्रेम ज्यों गैयें परे ॥
दो० असफँदवार केशँ वै राजा, पराशीशँ मैं फांद ।
अष्टोकुलीनार्ग सब डरके, भये केशँ के बांदें ॥
बरैनौँ मांग शीशँ उपराहीं । सेंदुर असै चढ़ा जेहि नाहीं ॥
बिन सेंदुर अस जानहिं दिया। उजेरपंथे रैयैनि महँ किया ॥
कंचन रेख कसौटी कसी । जनु घनमहेँ दामिनि परगँसी ॥
सूर्य्यकिरणजनुगगनैँ बिशेखी। यमुना मांझ सरस्वती देखी ॥
खांड़े धार रुधिरँ जनु भरा । कर्रवँट ले बेनी पर धरा ॥
तेहि पर पूर धरे जो मोती । यमुना मांझ गङ्गाकी सोती ॥
कर्रवँट तपौँ लीन्ह होय चूरू । मगैँ सुरुधिरै लेदेइ सेंदूरू ॥
दो० कनकँ द्वादशँ बानि होय, चही सुहाग वह मांग ।
सेवा करहिं नखत शेशि तरैई, उवै गगनँ तस मांग ॥
तारीफ़ १ पहिले २ शिर ३-२०-२६-३२ मुश्क ४ बाल ५-६-१६-२६-
२५-२६ न्योछावर ६ नामसांप ७ आदमी = सांप १०-१७-१८ खुशबू ११
चोटी १२-४१ आसमान १३-३८-५० मुलायम १४ पेचदार १५ चन्दन १६
ज़हर २२ जंजीर २३ गरदन २४-२७ नाम सांप २८ गुलाम ३० तारीफ़ ३१
राह ३३ रात ३४ सोना ३५-४६ बिजुली ३६ चमक ३७ ख़ून ३६-४५
लोटके ४० नाम जगह जहाँ शिर कटाते हैं ४२ फ़क़ीर ४३ शायद ४४
ख़ालिस ४७ चांद ४८ नखत ४६ ॥