पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[पद्मावत] ३३
तहँवां बहुत पंखे खरभरैं। आप आप महँ रोदन करैं॥
बिषे दाना कित होय अँगूरे। जहँ मामरन डहन धरचूरै॥
जो न होत चारा की आसा। कित चिड़हार ढकत लै लासा॥
ये बिर्ष चारा सबबिधि ठगी। औ भा काल हाथ ले लगी॥
यहिं झूठी माया मन भूला। चूरी पांख जैसो तन फूला॥
यहि मन कठिन मरै नहिं मारा। काल न देखि देखिपै चारा॥
दो० हम तो बुद्धि गँवाई, बिर्ष चारा अस खाय।
तू सोठां पण्डित हता, तू कित भा निठुरायँ ॥७
सुवै कहा हमहूं अस भूले। टूटिहिं डोल गर्व जेहि झूले॥
केला के बन लीन्ह बसेरा। पड़ा साथ तन बैरी केरा॥
सुखे करवार फेरो खाना। बिर्ष भा जेहि न्याँध तुलाना॥
काहेक भोगे वृक्ष अस फरा। अड़ा लाय पंखहिं कहँ हरा॥
सखीनिचिंतै जोखधन करना। यह निश्चिंत आगे है मरना॥
भूले हमहुँ गर्व तेहि माहां। सो बिगरा पांवा जहँ पाहां॥
होय निश्चिंत बैठि तेहि अड़ा। तब जाना खोंचा हियें गड़ा॥
दो० चरत न खुरकें कीन जब, तबरे चरा सुख सोय।
अब जो फांद परा गै, तब रोये का होय ॥८
सुनि के उतरें आंसु पुनि पोछे। कोन पंख बांधी बुध ओछे॥
पंखिन जो बुद्धि होय उजियारी। पढ़ा सुआँ कित धरै मंजारी॥
कित तीतर बन जीभ उघेला। शुकहिं हँकार फांद गये मेला॥
उड़नेवाले जानवर १-२६ ज़हर २-४-८-१४ बाजू ३ पर मड़ोरके ५ मौत ६
अक्ल ७-२५-२७ तोता ९-११-२८ बेदर्द १० ग़रूर १२-१६ खुशी १३ बहेलिया १५
पेड़ खाने का १६ ग़ाफ़िल १७-१८-२० दिल २१ अंदेशा फ़िक्र २२ गर्दन २३-
३० जवाब २४ बिल्ली २६॥