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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

२६६ पद्मावत।
घाल कचवेची टीका सजा। तिलकजोदेखठाउँ जिउतजा॥
मणिकुण्डलडोलैदुइश्रवनाँ।शीशँधुनहिसुनिसुनिपियगवनाँ॥
नागिनअलकैँ झलकउरेहारू। भयो श्रृंगार कंत बिन भारू ॥
दो० गवन जो आयो पॅवरँ महँ, पिय गवने परदेश ।
सखीबुझावहिंकिमैअनंल, हुसैसेोकेहिउपदेश॥
मान गवन जस घूँघट काढ़ी। बिनवै आय वारेँ भइ ठाढ़ी ॥
तीपी हेरे' चीर गँहि ओढ़ा। कंतनहेरे' कीन्ह जियपोढ़ा ॥
तबधनेँ कीन्ह बेहँसे चंपै दीठी। बादलैंतवहिँ दीन्ह फिरपीठी ॥
मुख फिराय मन अपने रीसा । चलतनतिरियाकरमुखदीसाँ ॥
भामिने भेष नारिकेँ लेखे। कसपिउ पीठ दीन्ह मुँहदेखे ॥
मँकु पिय दृष्टि समानो चालू। हुलैसे पीठ गढ़ाऊँ सालू ॥
कुचें ताँबी अब पीठ गड़ोऊँ। गहेसि जोहूककाढ़रिसधोऊँ॥
दो० रँहुलजाय तोपिय चलै, कहौंतो कहिमुहिँ दीठँ।
ठाढ़ तेवानी काकरों, भारी दोउबसीठँ ॥
लाजकियेजो पियनहिंपाऊं। तजों लाज करें जोर मनाऊं ॥
कर हठ कंत जाय जेहिलाजा। घूँघट लाज आवकेहिकाजा ॥
तब धन बेहँसे कहा गहिफेटा। नारिजो बिनवै कंत न मेटा ॥
आज गवन हूँ आई नाँहां। तुम न कंते गवनो रनमाहां॥
गवनआवधनमिलनकिताई। कौन गवन जो बिछुड़े सांईं॥
नाम नखत १ फान २ शिर ३ बाल ४ छाती ५-२३ दरवाज़ा ६ जाना
सिधारना ७ किसतरह ८ आग ६ ड्योढ़ी १० कटीली निगाहसे देखा ११
खींचना १२ देखना १३-१८ औरत बादल की १४ हँसना १५ आँख १६
नाममंत्री १७ औरतका शकुन बदसमागया १६ शायद २० निगाह २१
पीठ देख तसकीनकी २२ खींचाकि दिलका दुख निकल जावे २४ शोख २५
दोनों छाती २६ हाथ २७ हँसना २८ अर्ज़ २६ खाविन्द ३०-३१

पद्मावत । २६७
धन न नयन भर देखा पीऊ । पिया न मिलंधनसोभरजीऊ ॥
तेहिसव आस भरा है केवों । भँवरन तेजै वास रस लेवा ॥
दो० पावनधरा ललाटै धन, विनय सुनहु हो राय ।
अलकें परा फँदवार है, कैसेहिं तजै न पाय ॥
बांड़ फेटैं धन बादल कहा । पुरुषगवन धन फेट न गहों ॥
जो तुइँगवन आयगजगामी । गवन मोर जहँवाॅमोरस्वामी ॥
जब लग राजा लूट न आवा । भावै वीर शृंगार न भावा ॥
तिरिया भूमि खड्ग की चेरी । जीत जो खड्ग होय तेहिकेरी ॥
जेहिं घर खड्ग मूठ तहँ गाढ़ी । तहां न अंडन मूछ न दाढ़ी ॥
तब मुँह मूछ जीव पर खेलौं । स्वामिकाज इन्द्रासन पेलौं ॥
पुरुप कें २ बोल टरै नहिं पाछू । दर्शनै गयन्द ग्रीवै नहिंकाछू ॥
दो० तुइँ अवलों धन कुबुधैँ बुध, जानैकहाजुभाँरें ।
जेहि पुरुर्षहि हियें १७ बीररस, भावैतेहिन शृँगार ॥
जो तुमचहो जूझ पिय वाजा । कीन्ह शृंगार जूझ मैं साजा ॥
यौवन आय सौंहें है रोपा । पिघला विरहकामदल कोपा ॥
भयो वीररस सेंदुर मांगा । रातो रुधिर खड्गजस नांगा ॥
भौंहैं धनुप नयन शरैं सांधे । बरनैं बीज काजर बिषबांधे ॥
दय कटाक्ष २३ सों सान सँवारी । औ मुखसेलभाल अनयौरी ॥
अलकें फासग्रिवैं मेलअस्रूझा । अधरैं अधरसों चाहहिंजूझा ॥
कुंभस्थलें कुचैं दोउ मैमन्ता । पेलों सौंहें सँभारहु कन्ता ॥
कमल १ छोड़ना २ माथा ३ बाल ४ कंमर ५ औरत ६ पकड़ना ७
हाथीकी चाल ८ लड़ना ६ ज़मीन १० तलवार ११ मर्द १२-१८ दांतहाथी
के १३ गरदन कछुवाकी १४ नादान १५ कमअक़्ल १६ लड़ाई १७ दिल १८
सामने २० लालखून २१ तीर २२ पलक बिजुली की तरह २३ तिरछी नि-
गाह २४ नोकीले २५ बाल २६ गर्दन २७ होंठ २८ हाथी मस्त २६ छाती ३०
मुक़ाबिल ३१ ॥

२६८ पद्मावत ।
दो० कोप श्रृंगार विरह दल, टूटहोय दुइ आध ।
पहिले मोहिं संग्रामकै, करहुजूझकी साधै॥
कैसहूँ कंत फिरै ना फेरी । आग परी चितौर धन केरी ॥
उठी सो घूमें नयन गरवानी । लागे परे आंशु भंहरानी ॥
भीजेहार चीरें हियें चोली । रही अलूत कंत नहिं खोली॥
भीजेलाग चुवें कर्टमुण्डन । भीजै भँवरकमलशिरफुन्दन ॥
चुइ चुइ काजर अँचरा भीजा । तवहूँ न पियके रोवैं पसीजा॥
छांड़चला हिरदयँ दयदाहूँ । निठुरनाहँ आपननहिंकाहू ॥
सबै श्रृंगार भीज सुँई बुवा । छोरंमिलायकन्ते नहिं छुवा ॥
दो० रोये कन्त न बहुरे, तेहि रोये का कांज ।
कन्तधरामनजूझरन, धने साजीसबसाज ॥
खण्ड तैंतालीसवां गोरावादलवर्णन ॥
मँते बैठ बादल औ गोरा । सोमत कीजे परनहिं भोरों ॥
पुरुष न करै नारिमत कांची । जसनौशावाँ कीन्ह न बांची॥
चढ़ा हाथ इसकन्देर वैरी । सकतें छांड़ के भई बँदेरी ॥
सजंगं जोनाहँमारवल कांधा । बुधै कहिये हँस्ती काबांधा ॥
देवतनचलें आय अस आंटी । सुरजनै कञ्चनै दुर्जनै माटी॥
कञ्चन जुरै भये दश खांड़ा । फूटन मिलै और कर भांड़ा॥
जस तुरकहिं राजा छलसाजा । तस हमसाज छुड़ावहिंराजा ॥
दो० पुरुष तहांही छल करै, जहँवल कैसोन आंटँ ।
लड़ाई १ इरादा २ धुवां ३ सारी ४ छाती ५-७ कुरती ६ जलन ८ ता-
विन्द ९-११ धूर १० औरत १२ सलाह १३ नाममंत्री १४ हँसी १५ मर्द १६
नामशाहज़ादी १७ नाम बादशाह १८ उसको छोड़ दिया १६ होशियार २०
अक़लमन्द २१ हाथी २२ दोस्त २३ सोना २४ दुश्मन २५ माटी २६
पहुँचना २७ ॥

पद्मावत । २६६
जहां फूल तहँ फूल है, जहां कांटे तहँ कांटे ॥
सोरह सै चयडोल सवारी । कुँवर सजायेले तहँ बैठारी ॥
पद्मावत कर साज बेवानू । बैठ लुहार न जानै आनू ॥
रच बेवान सौ साज सँवारा । चहुँदिशिँ चमरकरहिंसबदाराँ ॥
साज सबै चयडोल चलाई । सुरँग उहार मोति बहु लाई ॥
भय सँग गोरो बादल बली । कहत चले पद्मावत चली ॥
हीरा रतन पदार्थ झूलहिं । देख बिमानँ देवता भूलहिं ॥
सोरह सै सँग चलीं सहेली । कमल न रहा और को बेली ॥
दो० राज छुड़ावन रानिचलि, आपहोय तहँ ओल ।
तीससहर्स तुरि खींचसँग, सोरहसै चयडोल ॥
राजा बँद जेहिके सौंपना । गागोराँ तापहँ अगमनाँ ॥
टका लाख दशदीन्ह अकोरों । बिनती कीन्हपांयगहिगोराँ ॥
बिनवौं बादशाह सो जाई । अब रानी पद्मावत आई ॥
बिनँती करै आयहूँ देहिली । चित्तौरकी मोसों है कीली ॥
बिनँती करै जहां है पूँजी । सब भँडारूँ की मोसों कूँजी ॥
एक घड़ी जो अज्ञा पाऊँ । राजा सौंप मंदिर महँ आऊँ ॥
तब रखवारँ गये सुलतानी । देख अकोरेँ भये जसपानी ॥
दो० लीन्ह अँकोर हाथ जो, जीउ दीन्ह तेहि हाथ ।
जो वह कहै करैसो, कहीं छांड़ नहिं माथ ॥
लोभ पाप की नदी अकोराँ । संतै न रहै हाथ जो बोरा ॥
जहँ अकोर तहँ नेकैं न राजू । ठाकुरकेर बिनाशहिं काजू ॥
बहादुर १ सूर्य २ चारोंतरफ ३ औरत ४ राजमंत्री ५-१० जवाहिरोत ६
चयडोल ७ तीसहज़ार ८ घोड़ा ६ पहिले ११ रिशवंत-नज़राना १२-२१-
२२-२३ अर्ज़ १३-१४-१५-१७ कुंजी १६ खज़ाना १८ हुक्म १६ दारोगा २०
ईमान २४ राजअच्छा नहीं २५ ख़राब २६ ॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (ट्रांसक्रिप्शन) दिया गया है:

३०० पद्मावत।
भा जिव घिव रखवारी केरा। द्रव्य लोभ चौंडोल न हेरा ॥
जाय शाह आगे शिर नांवा। ऐजग सूरं चांदचलिआवा ॥
जानवन्त सब नखतैं तराई। सौरहसै चण्डोल जो आई ॥
चित्तौर जेत राज की पुञ्जी। लैसो आय पद्मावत कुञ्जी ॥
बिनती करै जोर करै खड़ी। लै सौंपों राजा इक घड़ी ॥
दो० यहां वहां के स्वामी, दोहूँ जगत मोहिं आशँ।
पहिले दरश देखाव नृपै, तब आऊँ कैलाश ॥
अर्जा भई जाय इक घरी। ढूँढ जो घरी फेर विधि भरी ॥
चलिविमानैं राजापहँ आवा। सँग चौंडोल जगत सबछावा ॥
पद्मावत के वेषै² लोहारू। निकसकाटिबंदै³ कीन्हजोहारूँ ॥
उठा कोप जस छूटा राजा। चढ़ा तुरंगैं सिंहैं असगाजा ॥
गोरा बादलँ खांड़े¹⁷ काढ़े। निकस कुँवरचढ़चढ़ भे ठाढ़े ॥
तीर्थे तुरङ्गगगनें शिरलांगा। कौन जुगत कर टेकै वागा ॥
जो जिय ऊपर खड्ग सँभारा। मरणहार सो सहँसहिं मारा ॥
दो० भइ पुकार शाहसों, शशि²¹ औ नखत सो नाहिं।
छलकैन ग्रहन गिरासा, ग्रहन गिरासी छांहिं ॥
लै राजा चितौर कहँ चले। छूटो मिरँगै सिंहैं करवले ॥
चढ़ा शाह चढ़े लांग गुहारी। कटकैं असूझपरी जगकारी ॥
फिर गोरा बादेल सो कहा। ग्रहनँ लूट पुनि²⁷ चाहै गहा ॥
चहुँदिशि²⁸ आवा लोपत भानूँ। अब यह गोय यही मैदानू ॥

पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes):
'तलाशलेिना १ सूर्ये २ सखी-सहेली ३ अर्ज ४ हाथ ५ मालिक ६ उम्मेद
७ राजा ८ हुक्म ६ ईश्वर १० चण्डोल ११ सूरत १२ वेड़ी १३ सलाम १४
घोड़ा १५-१६ शेर १६-२४ नाममंत्री १७ तलवार १८ आसमान २० हज़ार
२१ चांद तथा पद्मावत २२ हरिण २३ फ़ौज २५ राजा २६ फेर २७ चारोतरफ़
२८ सूर्य २६ ॥

पद्मावत । ३०१
तुइँ अब राजा लैचल गोरा। हौं अब उलटजेरों झाजोरा ॥
वहँ चौगान तुर्क कस खेला। है खिलार रणजरोँ अकेला ॥
तब पाउँ बादल अस नाउँ । जब मैदान गोय लै जाउँ ॥
दो० आजखड्ग चौगान गँहि, करोंशीश रण गोय।
खेलौं सौंहे शाहंसो, हाल जगत महँ होय ॥
तब अगमने है गोराँ मिला। तुइँ राजा लै चल बादलाँ ॥
पिताँ मरे जो सारी साथे । मीच न देय पूतके माथे ॥
मैं अब आंयु भरी और मूँजी। का पछताव आय जो पूँजी ॥
बहुतहिं मार मरों जो जूझी। ताकहँ जन राखहु मनबूझी ॥
कुँवरसहसे सँगगोराँ लीन्हीं। और वीरबादलै सँग कीन्हीं ॥
गोरहिं १४ समुद्र मेघअसगाजा। चला लीन्ह आगेकर राजा ॥
गोराँ उलट खेतभा ठाढ़ा। पूरूँर्ष देख चाउँ मनबाढ़ा ॥
दो० आवकटंक सुलतानी, गगनँ छिपामँसि मांझ।
परत आव जग कारी, होत आव दिन सांझ ॥
द्वै मैदान परी अंब गोय। खेलहार वहँ काकर होय ॥
यौवन तुरी चढ़ी जो रानी। चलीजीत अति खेलसयानी ॥
कटि २१ चौगानगोय कुंचै साजी। हियँ मैदान चली लै बाजी ॥
हालै सो करै गोयलै बाढ़ा। गोली दुहुँ पैचकै काढ़ा ॥
भइ पहार वै दोनों गोरी २६। दृष्टि २७ नेर पहुँचत सुठ दूरी ॥
ठाढ़े वाण चलहिं अस दोऊ। शार्लेहिं हिये २६ न काढ़ै कोऊ॥
मुकाबिल १ पकड़ना २ शिर ३ सामने ४ आगे ५ नाममंत्री ६-७ बापकी
जगह राजा साथहै ८ मरना बेटेका न देखेगा ६ उमर १० हज़ार ११ नाम
मंत्री १२-१३-१४-१५ मर्द १६ चाह १७ फ़ौज १८ आसमान १६ सियाही २०
घोड़ा २१ कमर २२ छाती २३ सीना २४ हलचल २५ तथा छाती २६ निगाह
२७ सुराख २८ दिल २६ ॥

३०२ पद्मावत ।
शालहिं तेहिं जानेसि है ठाढ़ी । शालहिं तासु चहै उठ काढ़ी ॥
दो० मुहमंद खेल प्रेमका, गहिर कठिन चौगान ।
शीशं नदीजे गोय जिमि², हलनहोय मैदान ॥
फिर आगे गोरैं तब हाँकाँ । खेलों करों आज रणशाकों ॥
हों खेलौं धौलांगिरि ५ गोरा । टरों न टारे अङ्ग न मोरा ॥
सोहौं जैस गगन उपराहीं । मेघ घटा मोहिं देख बिलाहीं ॥
सहसँ शीशशङ्करसँ लेखों । सहसहिंनयन अन्धिमां देखों ॥
चारहुँभुजा चतुर्भुज आजू । कंसं न रहा और को साजू ॥
हों है भीमें आज रण गांजा । पांछे घाल डँकोई १२ राजा ॥
होय हनुमंते यमकातें धाऊं । आजस्वामि शंकरैनियाऊं ॥
दो० है नलेँ नीलैं आजहों, देउं समुद्रमहिं मेंड़ ।
कटकें शाहकर टेंकों, है सुमेरुँ रण बेंड़ ॥
उनई घटा चहूं २० दिशि आई । छूटहिं वाणैं मेघ झरलाई ॥
डोलै आहिं देवजस आंदी । पहुँची तुर्क चाँदै कहँ वादी ॥
हाथन गहे खडै हरवानी । चमकहिंसेल बीजैंके बानी ॥
साज बाण जनु आवै गांजों । वाँकि डरैशैशैं जनुवाजा ॥
नेजा उठे डरै मन इन्दूँ । आवहिं पाछजान कबहिन्दू ॥
गौरैसाथ लीन्ह सब साथी । जस मैमन्त सूंड विन हाथी ॥
सबमिल पहिलउठौनीलीन्हीं । आवतआय हांक सबकीन्हीं ॥
.. शिर १ बराबर २ ललकारना ३ बहादुरी ४ नामपहाड़ ५ नामनखत ६
हज़ार ७ बराबर ८ चारहाथ ६ नाम राजादैत्य १० नाम महाशूरवीर ११
मंदंद १२ महावीरजी १३ नामकोल्हू १४ मालिकको वचाऊं ५ नामबन्दर
जिन्होंने पुल समुद्र में बांधाथा १६-१७ फ़ौज १८ नाम पहाड़ १६ चारों-
तरफ़ २० तीर २१ पैदाइशी २२ बराबर २३ तलवार २४ बिजुली २५-२६
नाम राजा सांप २७ शिर २८ इन्द्र २६ ॥

पद्मावत । ३०३
दो० रुण्ड मुण्ड अति टूटहिं, सहिबखतर औ कुंड ।
तुरी होहिं बिनकांधे, हस्तिं होहिं बिनसुंड ॥
उनवतआय सेनेँ सुलतानी । जानहु परलै आवतुलानी ॥
लोहे सेनेँ सूझ सब कारे । तिल इक कहूं न सूझउघारे ॥
खङ्ग फोलाद तुर्क सब काढ़े । हरीवीजँ असचमकहिं ठाढ़े ॥
पीलवान गर्जे पेलसों बांके । जानहु कालकरहिं जियँमाके॥
जनु यमकार्त करहिं सबभवां । जियपैचीन्हस्वॅर्ग अपसवां ॥
सेल सांप जनु चाहे डसा । लीन्हकाढ़ जियमुखविषबसा ॥
तिन्ह सामहिं गोरोँ रणकोपा । अंगदै सरिस पाउँभुइँरोपा ॥
दो० सपुरुषै भाग न जाने, भुइँ जो फिरफिरलेइ ।
शूरै कहैं दो करेँ, स्वामि काज जिउ देइ ॥
भइ पगमेल सेल घनघोरा । औगर्जे पेल अकेलसोगोरा ॥
सहसैं कुँवर सहसहुँसत बांधा । भारपहाड़ जूझकहँ वांधा ॥
लाग मरें गोराके आगे । वांग न मोर घावमुख लागे ॥
जैस पतंग आग धँस लीन्हीं । एकमुवै दूसर जिय दीन्हीं ॥
टूटहिं शीर्श उघर धेरै मारी । टूटहिं कंधहि कंध निरारीँ ॥
कोई परहिं रुधिरँ है रोँती । कोई घायल घूमहिंमदमाती ॥
कोइ घरखेंहूँ कीन्ह है भोगी । भस्म चढ़ायबैठ जस योगी ॥
दो० घड़ी एक भारतेँ भई, भइ असवाराहिं मेल ।
जूझिकुँवर सब बैठे, गोरा रहा अकेल ॥
गोरे देख साथ सब जूझा । आपन काँलँ नेरे भा बूझा ॥
घोड़ा १ हाथी २ फ़ौज ३-५ पहुँची ४ बिजुली ६ हाथीयस्त ७ लेनेवाले ८
यमदूत ६ आसमान पर लेजाना १० नाम मंत्री ११ नाम बन्दर १२ बहादुर
१३-१४ हाथ १५ हाथी १६ हज़ार १७ शिर १८ धड़फेकना १६ अलग २०
खून २१ लाल २२ राख २३ लड़ाई २४ मौत २५ ॥

३०४ पद्मावत ।
कोप सिंहे सामहिं रण मेला । लाखन सों ना मरै अकेला ॥
लियो हांक हस्तिनें की ठट्टा । जैसे सिंहे विदारै घटा ॥
जेहि शिर देइ कोप तरवारू । सें घोड़े टूटहिं असवारू ॥
टूटकुंध शिर परैं निरौरी । माठ मँजीठ जानुरण डारी ॥
खेल फाग सेंदुर छिरकावे । चाचर खेल आग रणलावे ॥
हस्ती घोड़ धाय जो धूका । औतेहि दीन्हसोरुधिर भभूका ॥
दो० भइ आज्ञा सुलतानी, बेगें करहु यह हाथ ।
रतन जात है आगे, लिये पदारथे साथ ॥
सबै कटकैं मिल गोरौँ छेंका । गूँजतसिंहेँ जायनहिं टेका ॥
जेहिदिशि¹५ उठै सोइ जनुखावा । पलटिसिंहँतेहिठाउँनआवा॥
तुर्क बोलावहिं बोलै नाहां । गोरें मीचें धरी जियमाहां ॥
मुवे पुनि¹⁶ जूझजाज जगदेऊ । जियत न रहा जगतमहँकेऊ॥
जन जानहु गोरा सो अकेला । सिंहेंकी मूछ हाथको मेला॥
सिंह जियतनहिं आप धरावा । मुवे पीछ कोऊ घिसयावा ॥
करै सिंह मुँह सौहैं जो दीठी । जवलग जिये देयनहिंपीठी ॥
दो० रतनसेन जो बांधा, मसिं²° गोराके गाँतै²¹ ।
जब लग रुधिरैं²² न धोऊँ, तवलग होयनराँतै²³ ॥
सुरजौँ वीर सिंह चढ़ गाजा । आय सौहैं गोरा सों बाजा ॥
पहलवान सो बखाने वली । मदद मीरहमजाँ औ अली ॥
मददअयूर्ब²५ शीश²६ चढ़ कोपी । महाभारत²७ नाउँ अलंपी³० ॥
शेर १-३ हाथी २-७ फाड़ना ४ अलग ५ लाख ६ लोहू = हुक्म. ६ जल्द
१० तथा पद्मावत ११ फ़ौज १२ नाममंत्री १३ शेर १४-१६-१६ तरफ १५
मौत १७ ऐबादशाह चमेरे हाथ न आऊँगा १८ सामने निगाह २० सियाही
२१ बदन २२ खून २३ लाल २४ नाम पहलवान २५-२७-२८ सामने २६ शिर
२६ बड़े बहादुरों का नाम मिटानेवाले ३० ॥

पद्मावत। ३०५
औ तासों सालार सो आये। जेहिं कबरो पांडवेँ बँद पाये ॥
लंधौरै देव धरा जेहि आवे। औ कोमालै वाद कहँ पावे ॥
पहुँचा आय सिंह असवारू। जहां सिंह गोरा बरयारू ॥
मारेसि सांग पेटमहँ धसी। काढ़ेसि हुमुकआंतभुइँ खसी ॥
दो० भाट कहा धनगोरा, तुइँ महिरावण राउ।
आंत समेटकर बांधे, तूरी देत है पांउ ॥
कहेसिअंतँ अबमाभुइँ परना। अंतकोनित्तं खेहँ शिरभरना॥
कहिके गरज सिंह असधावा। सुरजा शार्दूल पहँ आवा ॥
सुरंजनै कीन्ह सांगपर घाऊ। परीखङ्गैं जनुपरा निहाऊँ ॥
वज्रकी सांग वज्र का डांड़ा। उठी आगतस बाजा खांड़ा ॥
जानहु वज्र वज्र सों बाजा। सबही कहापरी अबगाजौं ॥
दूसर खङ्गे कंधपर दीन्हीं। सुरजेंवह ओड़नै परलीन्हीं ॥
तीसर खङ्ग कूदपर लावा। कांधगरर्जें हंत घाव न आवा ॥
दो० तस मारा हतगोरें, उठी वज्रकी आग।
कोउ नेरे नहिं आवै, सिंहैं सेंदूरो लाग ॥
तस सुरजा कोपा वरबंडी। जान सेंदूर केर भुज दंडा ॥
कोप गरज मारेसि तब बाजा। जानहुपरी तुरतशिरगाजौं॥
टाटैरैं टूट टूट शिर तासू। सैं सुमेरुँ जनूटूट अकासू ॥
धमक उठा सब स्वर्गे पतारू। फिर गइ दीठें फिरा संसारू ॥
भा परलै अस सबही जाना। काढ़ा खङ्गैं स्वर्ग नयराना ॥

नाम सिपहसालार १ नामदेव २ नाम संजा ३ ज़बरदस्त ४-१६ घोड़ा
५ आख़िर ६ हमेशा ७ राख ८ शेरसुर्ख ९ नाम पहलवान १० तलवार ११-१४
निहाई १२ बिजुली १३-२० ढाल १५ उछलतलवार पर तलवार परी १६
शेर १७ शेरसुर्ख १८ खोपड़ी २१ पहाड़ २२ आसमान २३-२६ निगाह २४
तलवार २५ ॥

३०६ पद्मावत ।
तस मारेसि सैं घोड़े काटा । धर्ती फांट शेष फणनाथा ॥
अतिजो सिंहैं वरी है आई । शार्दूलै सो कौन बड़ाई ॥
दो० गोरापरा खेतमहँ, सुरै पहुँचावा पान ।
बादलै लैगा राजा, लै चितौर नियरान ॥
पद्मावत मन रही जो झूरी । सुनत सरोवरैं हियँ गा पूरी ॥
अद्र्रा महँ हुलासै जस होई । सुख सुहाग आदरसा सोई ॥
नयनजोकुमुदिनि लीन्हअँगूरू । उठाकमलअसउगवा सूरू ॥
पुरइन पूर सँवारी पाँती । औशिर आनधरा शिरछाता ॥
लाग्यो उदयहोय जस भोरा । रयनि १२ गईदिनकीन्हअजोरा १३ ॥
अस्ते अस्तकै पाई कलौ । आगोवली कटकै सब चला ॥
देख चांद अस पद्मिन रानी । सखीकुमोदैं सबैविकसानी ॥
दो० ग्रहन छूट दिनेरै कर, शशि २० सो भयो मिलाव ।
मंदिर सिंहासन साजा, बाजा नगर वधाव ॥
बिहँस चांद दय मांग सेंदूरू । आरत करन चली जहँसूरू ॥
औगोहनैं शशि नखत तराई । चित्तौरकी रानी जहँ ताई ॥
जनु बसन्तऋतु फली जो छूटी । की सावन महँ वीरबहूटी ॥
भा आनंद बाजा पँचतूरा । जगतरातैं है चला सेंदूरा ॥
अति मृदंग मन्दिर बहुवाजे । इन्द्रशब्दे सुन शब्दजोलाजे ॥
देखकन्त जस रवि २६ परकासाँ । पद्मावतमनकमल विकासाँ ॥
कमल पांव सूरजके परा । सूरज कमल आनि शिरधरा ॥
दो० सेंदुर फूल तँबोल सो, सखी सहेली साथ ।
शेर १ शेरखुर्ख २ देवता ३ नाम मंत्री ४ तालाव ५ छाती ६ नामनखत ७
खुशी ८ कोकावेली ६-१७ सूर्य १० तख्त ११ रात १२ रोशनी १३ रामराम
कर १४ कल १५ फ़ौज १६ खिलना १८-२८ सूर्य १६-२१-२६ चाँद २०-२३
साथ २२ लाल २४ आवाज़ २५ रोशनी २७ ॥

पद्मावत। ३०७
धने पूजी पियपांय द्वय, पियपूजी धनमाथ ॥
पूजा कवन देउँ तुम राजा। सबैतुम्हार आवमोहिं लाजा ॥
तनमय यौवन आरति करेऊं । जीव काढ़ न्योछावर देऊं ॥
पन्थे पूरकर दृष्टि बिछाऊं। तुमपगे धरो शीशे मैं लाऊं ॥
राखतपांयपलकनहिं मारों। बरुनिहिं सौरजें चरणहिंझारों॥
हियँ सोमंदिर तुम्हरो नांहां। नयन पंथे आवहुतेहिमांहां ॥
बैठोपांटे छत्र नव फेरी। तुम्हरे गर्व गर्बी हों चेरी ॥
तुम जियमैंतन जो लहिमयों। कहै जो जीय करै सोकयों ॥
दो० जोसूरज शिर ऊपर, तबसो कमल शिरछात।
नाहित भरी सरोवरें, सूखी पुरइनपात ॥
परश पांय राजाके रानी। पुनआरत बादले कहँआनी ॥
पूजे बादलं के भुज दण्डों। तुरी केपांउ दाबकरे खण्डा ॥
यह गजगवने गर्व्व सो मोरा। तुम राखा बादले औगोरा ॥
सेंदुरतिलक जो अंकुश रहा। तुम राखा माथे तौ रहा ॥
कालश्यामें तुमजियपरखेला। तुमजियआनमँजूषों मेला ॥
राखाछात चमर औ दारा। राखा क्षुद्रघंटे झनकारा ॥
होय ध्वजा हनुमंत तुम पैठी। तब चितौर लै आये बैठी ॥
दो० पुनि गजमत्ते चढ़ावा, नेते बिछाई लाट।
बाजतगाजत राजा, आय बैठ सुख पाँटे ॥
तस राजें रानी कंठलाई। पिय मरजियानारि जनु पाई ॥
पद्मावत १ राह २-१० निगाह ३ पांव ४ शिर ५ पलक ६ घूर ७ दिल ८ खा-
विन्द ९ तख्त ११-२८ ग़रूर १२ मुहब्बत १३ बदन १४ तालाव १५ नाममंत्री
१६-२२ बाजू १७ घोड़ा १८ हाथ १६ हाथी की चाल २० ग़रूर २१ खाविन्द
२३ सन्दूक २४ नाम जेवर २५ हाथी २६ जे़रअन्दाज़ २७ गले लगाई २६ ॥

३०८ पद्मावत ।
संङ्गै राजा दुख उगसारों । जियत जीव नाकरों निरारों ॥
कठिनैबन्द तुर्कहिं लैगहा । जो सँवरों जिय पेट न रहा ॥
घनमँगढै ऊपर मुहिलेँ मेला । सांकर औअँधियार दुहेलाँ ॥
क्षणक्षणैं जीउसडार्सहिं आंका । औनित डोमलुछावाहिंवां का ॥
पीळे साप रहें चहुँ पासा । भोजन सोई रहे पर श्वासा ॥
पास न तहँवां दूसर कोई । नजनों पवन पानि कस होई ॥
दो० आस तुम्हारी मिलनकी, तब सो रहा जियपेट ।
नाहितहोत निराश जिय, कितजीवनकितभेंट ॥
तुम पिय आय परे अस बेरा । अबदुखसुनौं कमलधर्न केरा ॥
छोड़ गयो सरवेरं महँ मोहीं । सरवर सूख गयो बिनतोहीं ॥
केलिं जो करत हंस उड़गयऊ । भानुँ निपटसो वैरी भयऊ ॥
गइ तर्जे लहेरें पुरयन पाता । मुयों धूप शिर अहो न छाता ॥
भयो मीनें तन तड़पै लागा । विरह आय बैठो है कागा ॥
काग चोंचत सालैहिनौंहां । जस वँदतोर घालहियें माहां ॥
कहों काग अब तहँ लैजाही । जहँवां पिउदेखै मोहिं खाही ॥
दो० कागैं गृध्र नहिं ऐसो, गढ़ का मारे बहुमंद ।
यह पछतायें सठमरौं, गयों न पियसँगवंद ॥
खण्डचवालीसवां वृत्तांतदेवपाल ॥
तेहि ऊपर का कहों जो भारी । विषमै पहाड़ परादुखभारी ॥
दूती इक देवपाल पठाई । ब्राह्मण वेप छलें मोहिंआई ॥
अकेले में १ खोलना २ अलग ३ भारीकैद ४ पेचदार क़िला ५ बहुत ६
घड़ीघड़ी ७ शीशागर्म ८ पद्मावत ६ तालाब १० खुशी ११ सूर्य १२ छोड़ना
१३ मछली १४ सूराख १५ खाविन्द १६ छाती १७ कौवे और गृधका दखल
न था ऐसा क़िला रक्षाका था १८ टेढ़ा १६ ॥

पद्मावत । ३०६
कहै तोर हौं आहि सहेली । चल लैजाउँ भँवर जहँबेली ॥
तब मैं जाने कीन्ह सतबांधा । वहकर बोल लागि विषसांधा ॥
कहूँ कमल नहिं करत अहेराँ । जोहै भँवर करे सें फेरा ॥
पांचभूतै आत्मा नेवास्यों । बारैहि बार फिरत मनमाख्यों ॥
रोय बुझायों आपन हियराँ । कंत न दूर अहै सुठ नियरा ॥
दो० फूल वास घिव खीरै ज्यों, नीरै मिलाय मिठाइ ।
तस नुक्ताँ घट जेवरी, हिय दुख नाहिं कहाइ ॥
सुनि देवपाल राय करवाळू । राजा कठिन परा हियशालू ॥
दादुरै पुनि सो कमलकर भेखा । गीदरमुख न शूरकर देखा ॥
अपने रंग कस नाचि मयूरूँ । तेहि सेर साधककै रेतमें चूरू ॥
जबलागिआय तुरुकै गढ़बाजा । तबलगि धरिआनौ तौ राजा ॥
नींद न लीन्ह रैयनि सबजागा । होतबिहान आय गढ़लागा ॥
कम्मर्ले नेरअग्गर्म गढ़बांका । विषमँ पंथचढ़जाय न झांका ॥
राजा तहाँ गयो लै कालू । होय सामहिँ रोपौँ देवपालू ॥
दो० दोउ लड़े होय सम्मुख, लोहे भयो असूझ ।
शत्रु जूझे तब न्योरे, एक दोउ महँ जूझ ॥
खण्ड पैंतालीसवां देवपाल लड़ाई ॥
जो देवपालैँ राउ रण गाजा । मोहिँतुहिँ जूझ एकाकीँ राजा ॥
मेलेसि आय सांग विष भरी । मेट न जाय कालकी धरी ॥
विचारा १ शिकार २ देखता ३ देखना-सुनना-बोलना-सूंघना-छूना
४-रोकना ५ दरवाज़ा ६ दिलकी आग ७ दूध ८ पानी ६ तुझा-यह कि बदन
ने खाया और दिल दुखी परन्तु ज़ाहिर न किया १० सूराख ११ मेंढक १२
मोर १३ नाज़ १४ चिरौटा १५ बादशाह पहुँचे १६ रात १७ नाममुहंक १८
जहांजाना मुशकिल है १६ टेढ़ीराह २० आया २१ दुश्मन २२ लड़ाई २३
आखिर २४ नाम राजा २५ अकेले-२६ ॥

३१० पद्मावत ।
आय नाभि पर सांग जो बैठी । नाभवेध निकसी नृपं पीठी ॥
चला मारि तब राजा मारा । टूट कंध धड़ भयो निरारां ॥
शीशँ काटिकेँ पैरीँ बाँधा । पावा दाउँ वैर जसै साँधा ॥
जियत फिरा आयो बल भरा । माँझवाट होय लोहेँ धरा ॥
कारी घाउ जाय नहिं डोला । रही जीभ यमँ गहेको बोला ॥
दो० सुधिबुधि तो सब बिसरी, बारपरी मँझू पाट ।
हस्तिँ घोर को काकर, घर आनी गइ खाट ॥
खण्ड बियालीसवाँ वैकुण्ठवासी राजा ॥
तौलहि श्वास पेट महँ अही । जौलहि दशा जीउकी रही ॥
काल आय देखलाई साँटी । उठ जियचला छांड़के माटी ॥
काकर लोग कुटुंब घर बारू । काकर अर्थ द्रव्यँ संसारू ॥
वही घड़ी सब भयो परावा । आपन सोइ जो परसा खावा ॥
रहि जे हितू साथके नेगी । सबैलानि काढन तेहिबेगी ॥
हाथझार जस चलै जुवारी । तजौं राज द्वै चला भिखारी ॥
जबलग जीउ रतन सब कहा । भा बिनजीव न कौड़ी लहा ॥
दो० गढ़सौंपा तेहि बादलँ, गये टेकँतँ वसुदेव ।
छोड़ी राम अयोध्या, जो भावै सो लेव ॥
पद्मावत पुनि पहिर पटोरोँ । चलीसाथ पियके द्वै जोरा ॥
सूरज छिपा रयँनि द्वै गई । पूनोशशि सो अमावस भई ॥
छोरे केशँ मोतिलर छूटी । जानो रयनि नखत सब टूटी ॥
राजा १ अलग २ शिर ३ शिकारबन्द ४ जैसा वैर किया ५ राह में ६
हथियारबन्द ७ मौतने पकड़ी ८ सुरदा की तरह तख्तपर ६ हाथी १० जुड़ी
११ दौलत १२ दोस्त १३ जल्द निकाला १४ छोड़ना १५ नाम मन्त्री १६ वैकुंठ
गये १७ सारीरेशमी १८ रात १६ पूरनमासी का चांद २० बाल २१ ॥

पद्मावत । ३११
सेंदुरपरा जो शीशे उघारी । आग लाग चहि जगै अँधियारी ॥
यहादिवसै हौं चाहत नाहीं । चलो साथ पियदै गलबाहं ॥
सारसपंख नहिं जिये निरोरे । हौं तुम बिन का जियों पियारे ॥
न्योछावर कै तन छहाराँऊँ । छारँ होऊँ सँग बहुरें न आऊँ ॥
दो० दीपक प्रीति पतंगज्यों, जन्मनिबाह करेउँ ।
न्योछावर चहुँपास है, कण्ठलाग जियदेउँ ॥
खण्ड सैंतालीसवां सतीहोना
पद्मावत और नागमतीका ॥
नागमती पद्मावत रानी । दोउ महासत सती बखानी ॥
दोउं सौत चढ़ खाट जो बैठी । औ शिवलोक परातहँदीठी ॥
बैठो कोइ राज औ पाटों । अन्तै सबै बैठे पुनि खाटा ॥
चन्दन अगर काढ़सरै साजा । औ गँतें देय चले लैराजा ॥
वाजन बाजहिं होय अगोतौं । दोउ कन्तलै चाहे सोता ॥
एक जो बाजा भयो विवाहू । अब दुसरे है और निबाहू ॥
जियतजलैं जो कन्तै कीआंसा । मुये रहस बैठे इकपासा ॥
दो० आज सूरै दिन अथयो, आजरैनि शशि बूड ।
आजनाच जियदीजिये, आज आगिन हमजूड़ ॥
सैं रच दान पुण्यबहु कीन्हा । सातबार फिरसांवर लीन्हा ॥
एक जो भांवर भयो बियाही । अब दूसर है गोहनैं जाही ॥
जियत कन्तै तुम हमगललाई । मुये कण्ठ नहिं छांडुहुसाई ॥
१ शिर २ दुनियां ३ दिन ३ खाविन्द ४ अलग ५ बिथराना ६ राख ७ लौट
८ पद्मावत-नागमती ९ नज़र १० तख़्त ११ आख़िर १२ चिता १३ दाह १४
लड़का १५ ख़ाविन्द १६ सूर्य १७ रात १८ चांद १६ चिता २० साथ २१
खाविन्द २२ ॥

३१२ पद्मावत।
लै सरै ऊपर खाट बिछाई। पौढ़ी दोउ कन्त गल लाई ॥
और जो गांठ कन्त तुम जोरी। आदि अन्त लहि जायन छोरी ॥
यह जग काह जो अर्थहि नयाथी। हमतुम नाहिं दोहूजग साथी॥
लागी कठ आग दै होरी। छार भई जरि अंग न मोरी ॥
दो० राँती पियके नेहकी, स्वर्ग भयो रतनार ।
जोरेउ वासो अथवा, रहा न कोइ संसार ॥
वै सहगवनैं भई जिय आई। बादशाह गढ़ छेंका आई ॥
तबलग सो औसर है बीता। भये अलोप राम औ सीता ॥
आय शाह जो सुना अखारों। है गइसत दिवसै उजियारा ॥
छोर उठाय लीन्ह इक मूठी। दीन्ह उड़ाय पिरेथैवी झूठी ॥
सगरे कटकै उठाई माटी। पुल बांधा जहँ जहँ गढ़घाटी ॥
जौलहि ऊपर छोर नहिं परै। तौलहि यह तृष्णा नहिं मरै ॥
भा दूर्हवाँ भा जूझ असूझा। बादलैं आय पँवरे पर जूझा ॥
दो० जूनहरे भईं सब स्त्री, पुरुष भये संग्राम।
बादशाह गढ़ चूरौं, चितौर भा इसलाम ॥
मैं यह अर्थ पण्डितन बूझा। कहा कि हम कुछ और न सूझा ॥
चौदह भुवनैं जो छत उपराहीं। सो सब मानुष के घट माहीं ॥
तन चितौर मन राजा कीन्हा। हियँ सिंहल बुधि पद्मिनि चीन्हा ॥
गुरु सुवा जेहि पन्थ देखावा। बिन गुरु जगत सोनिरगुण पावा॥
. चिता १ अव्वल से आखिर तक २ आया था ३ खाविन्द ४ राख ५ बदन
६ लाल ७-६ आसमान ८ जब खाविन्द के साथ जल गई १० गायब ११ हाल
१२ दिन १३ ख़ाक १४ दुनियां १५ फ़ौज १६ माटी १७ हवस १८ कोई बाकी
न रहा उस भारी लड़ाई में १६ नाम मंत्री २० दरवाज़ा २१ मरना २२ तथा
राजा २३ तोड़ा २४ सात परदा आसमान, सात परदा ज़मीन २५ भीतर २६
छाती २७ राह २८ दुनियां २६ ॥

˙पद्मावत˙ 14653 ३१३
नागमती यह दुनियां धन्धा । बांचा सोई न यह चित बन्धा ॥
राघव दूत सोई शैतानू । माया अलाउदीं सुलतानू ॥
प्रेम कंथा यह भांति विचारू । बूझलेहु जो बूझेंहि पारू ॥
दो० तुरकी अरबी हिन्दवी, भाषाँ जेती आहि ।
जामें मारग प्रेमका, सबै सराहें ताहि ॥
मुहम्मद कवि यह जोर सुनावा । सुना सो प्रेम पीर का पावा ॥
जोरे लायै रक्त लेगये । प्रेमप्रीति नयनहिं जल भये ॥
औ मैं जान गीत अस कीन्हा । कीय हरीति जगत मँह चीन्हा ॥
कहां सो रतनसेन अब राजा । कहां सुवा अस बुधै उपराजा ॥
कहां अलाउदीन सुलतानू । कहँ राघव जेहि कीन्ह बखानू ॥
कहँ स्वरूप पद्मावत रानी । कुछ न रही जग रही कहानी ॥
धनसोई यशँ कीरति तासू । फूल मरै पै मरै न बासू ॥
दो० कैन जगत यशँ बेचा, कैन लीन यशँ मोल ।
जो यह पढ़ै कहानी, हम सँवरै दोइ बोलें ॥
मुहम्मद वृद्धैं बैश जो भई । यौवनैं हत सो अवस्थौ गई ॥
बल जो गयो कैक्षीऐं शरीरू । दृष्टि १६ गई नयनहिं दै नीरू ॥
दर्शनै गये कै बचा कपोलौँ । बैनैं गये अनरुच दैबोला ॥
बुधि २१ जोगई दै हियैँ बौराई । गर्व २२ गयो तरिहत शिरनाई ॥
श्रवणैं गये ऊँच जो सुना । स्याही गये शीशँ भा धुना ॥
भँवर गये केशँहि दे भुवा । यौवनैं गयो जीत लै जुवा ॥
बूझसको १ बोली २ खून जिगर पीकर ३ दुनियां में निशानी ४ अक्ल
बताई ५ तारीफ ६ नेकनामी ७-६-१० करनी ८ दुआयखैर ११ बूढ़ी उमर १२
जवानी १३-२७ उमर १४ दुबला बदन १५ निगाह १६ पानी १७ दांत १८ गाल
१६ आवाज़ २० अक्ल २१ दिल २२ ग़रूर २३ कान २४ शिर २५ बाल २६ ॥

३१४ पद्मावत ।
जोलहि जीवन यौवन साथा । पुनि सो मीचें पराये हाथा ॥
दो० वृद्धि२ जो शीशँ डुलावै, शीशधुनहि तेहि रीसैं ।
बूढ़ी आयू होहु तुम; कै यह दीन अशीस ॥
मौत १ बूढ़ा २ शिर ३ गुस्सा ४ उमर ५ ॥
इति श्रीपद्मावतभाषा मलिकमुहम्मदजायसीकृत समाप्त ॥

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