पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ पद्मावत ।
संङ्गै राजा दुख उगसारों । जियत जीव नाकरों निरारों ॥
कठिनैबन्द तुर्कहिं लैगहा । जो सँवरों जिय पेट न रहा ॥
घनमँगढै ऊपर मुहिलेँ मेला । सांकर औअँधियार दुहेलाँ ॥
क्षणक्षणैं जीउसडार्सहिं आंका । औनित डोमलुछावाहिंवां का ॥
पीळे साप रहें चहुँ पासा । भोजन सोई रहे पर श्वासा ॥
पास न तहँवां दूसर कोई । नजनों पवन पानि कस होई ॥
दो० आस तुम्हारी मिलनकी, तब सो रहा जियपेट ।
नाहितहोत निराश जिय, कितजीवनकितभेंट ॥
तुम पिय आय परे अस बेरा । अबदुखसुनौं कमलधर्न केरा ॥
छोड़ गयो सरवेरं महँ मोहीं । सरवर सूख गयो बिनतोहीं ॥
केलिं जो करत हंस उड़गयऊ । भानुँ निपटसो वैरी भयऊ ॥
गइ तर्जे लहेरें पुरयन पाता । मुयों धूप शिर अहो न छाता ॥
भयो मीनें तन तड़पै लागा । विरह आय बैठो है कागा ॥
काग चोंचत सालैहिनौंहां । जस वँदतोर घालहियें माहां ॥
कहों काग अब तहँ लैजाही । जहँवां पिउदेखै मोहिं खाही ॥
दो० कागैं गृध्र नहिं ऐसो, गढ़ का मारे बहुमंद ।
यह पछतायें सठमरौं, गयों न पियसँगवंद ॥
खण्डचवालीसवां वृत्तांतदेवपाल ॥
तेहि ऊपर का कहों जो भारी । विषमै पहाड़ परादुखभारी ॥
दूती इक देवपाल पठाई । ब्राह्मण वेप छलें मोहिंआई ॥
अकेले में १ खोलना २ अलग ३ भारीकैद ४ पेचदार क़िला ५ बहुत ६
घड़ीघड़ी ७ शीशागर्म ८ पद्मावत ६ तालाब १० खुशी ११ सूर्य १२ छोड़ना
१३ मछली १४ सूराख १५ खाविन्द १६ छाती १७ कौवे और गृधका दखल
न था ऐसा क़िला रक्षाका था १८ टेढ़ा १६ ॥