पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
२८० . पद्मावत ।
दो० बिरह सो जार भस्मकै, चहै उड़ावा खेहं ।
आय सो धन पियमिलवे, करलेवे नई नेह ॥
पियबिन व्याकुल व्यापी नागाँ । बिरहा तपनश्याम भये कागा ॥
पवन पानि कहँ शीतल पीउ । जेहि देखे पलुहै तनजीउ ॥
कहँ सो बास मलयौगिरि नाहाँ । जेहि कल परत देत गलवाहा ॥
पद्मिनि ठगनी भइ कित साधा । जेहिते रतन परा पर हाथा ॥
होय बसंत आवहु पियकेसर । देखै फिर फूलै नागेसरं ॥
तुमबिन नाँह रहे हियँ तचा । अब नहिं बिरह गडुरपै बचा ॥
अब अँधियार परामंसि लागी । तुमबिन कौन बुझावै आगि ॥
दो० नयनश्रवणं रसरसनौ, सबै खीनं भये नाँहँ ।
कौन सो दिन जेहि भेंटके, आय करै सुखछाँह ॥
कुंभलनीरेँ राय देवपालू । राजा केर शत्रुँ हियेंशालू ॥
उनपै सुनी कि राजा बांधा । पाछल बैरसँवर छल सांधा ॥
शत्रु शालैँ तब न्योरे सोय । जो घर आव शत्रुँकी जोय ॥
दूती एक बृद्ध तेहि ठाँऊँ । ब्राह्मण जाति कुमोदन नाऊँ ॥
वह हँकौरं के बीरा दीन्हा । तोरे बल मैं बलजिव कीन्हा ॥
तुइँ कुमदनी कमल के नेरे । स्वर्ग जो चाँद बसै तोहि हेरे ॥
चितोर महँ जो पद्मिन रानी । करवलछल सो दै मुहिं आनी ॥
दो० रूप जगत मनमोहन, जेहि पद्मावत नाऊँ ।
कोटि द्रव्य तुहिं देहों, आन करेसि इकठाउँ ॥
कुमदिन कहा देखहों सोहों । मानुष कहा देवता मोहों ॥
. धूर १ रानी नागमती २-६ हरा होना ३ चन्दन ४ खाविन्द ५-७-१३
दिल ८ सियाही ६ कान १० ज़बान ११ कमज़ोर १२ नाममुल्क १४
दुश्मन १५-१८ दिल दुख देनेवाला १६ दुश्मन दुख देनेवालेने चाहा किं
जैसे बनपड़े १७ जगह १८ बुलाया २० आसमान २१ नज़र २२ ॥
पद्मावत। २८१
जस कामरू चमारिन लोना । कौनहिं छल पढ़त कै टोना ॥
विषहर नाचहिं पढ़तें मारी । औथर मूंदे घाल पेटारी ॥
बृक्षै चलैं पढ़तें के बोला । नदी उलटवहि परबत डोला ॥
पढ़त हरि पण्डित मतिघेरी । और को अन्धगूं ग औबहिरी ॥
पढ़त ऐसे देवतहिं लागा । मानुष का पढ़त सों भागा ॥
पढ़त कै हठ काढत पानी । कहां जाय पद्मावत रानी ॥
दो० दूती बहुत पैंचे कै बोली पढ़त बोल ।
जाकर सत सुमेरु है, लागे जगत न डोल ॥
दूती बहुत पकावन सांधी । मोतिन लड्डू खरोरा बांधी ॥
माठ पेराकें पेठे पापर । पहिर बूझ दूती के कापर ॥
लै पूरी भरडाल अनूती । चितौर चली पैंचैं कै दूती ॥
वृद्ध बैस जो बांधे पाऊं । कहां सो यौवन कित बोसाऊं ॥
तन बूढ़ा मन बूढ़ न होई । बल न रहा लालच जें होई ॥
कहां सो रूप जगंत सबरातौ । कहां सो गर्व हस्ति जसमाता ॥
कहां सो तीर्ष नयन तनठाढ़ा । सबै मार यौवन पुनि काढ़ा ॥
दो० मुहम्मद वृद्ध जो नइचलै, काह चलै भुंइ टोइ ।
यौवन रतन हेरान है, संकै धरती महँ होय ॥
आय कुमोदनि चितौर चढ़ी । जोहन मोहन पढ़त पढ़ी ॥
पूछ लीह रनवास बरोठा । पैठ पँवरै भीतर बहु कोठा ॥
जहँ पद्मावत शशि उजियारी । लै दूती पकेवान उतारी ॥
हाथ पसार धाय के भेंटी । चीन्ही नहिं राजा की बेटी ॥
सांप १ मन्त्र २-४ पेड़ ३ क़ौलमज़बूत ५-८ ईमान, ६ मोतीचूरके ल-
डुआ ७ खरीदार ६ दुनिया १० लाल ११ शहर १२ हाथी १३ कट ली १४
शायद १५ बहुत तरह के मन्त्र १६ दरवाज़ा १७ चांद १८ ॥
२८२ पद्मावत।
हौं ब्राह्मण जेहिकुमुदिनिनाऊँ। हम तुमउपँजी एकहि ठाँऊँ॥
नाऊँ पितौ कर दूवे वेनी। सोइ पुरोहित गन्धर्पसेनी॥
तुम वारी तब सिंहल दीपा। लीन्हेँ दूध पियायों सीपा॥
दो० ठाँउँ कीन्ह मैं दूसर, कम्भलनी रहि आय।
सुनितुमकहूँ चित्तौर महँ, कहूँ कि भेटों जाय॥
सुनि निरुचै नैहरकी गोई। गरे लाग पद्मावत रोई॥
नयनगगनँ रवि बिन अँधियारो। शशिसुखआंशु टूटजनु तारे॥
जग अँधियार गहनदिनपरा। कवलगशैशिनखतहितसमरा॥
माय बाप कित जन्मी वारी। ग्रीवं तोड़ कित जन्म नमारी॥
कित विवाह दुखदीन्ह दुहेलाँ। चितौर पंथ कन्त बंद मेला॥
अबयहिजियनचाहस लमरना। अठो पहार जन्म दुख भरना॥
निकसनजाय निलजयहजीउ। देखों मंदिर सून बँद पीउ॥
दो० कुहुकजोरोवे शशिनखतँ, नयनहिंरौंतचकोर।
अबहूँ बोले तहँ कुहुक, चातृकँ कोकिल मोर॥
कुमुदिन कण्ठलाग सुठ रोई। पुनि लै रोग डारे मुख धोई॥
तुइँशशिरूपजगतउजियारी। मुखनझांपनिशिँ होयअँधियारी
सुनचकोर कोकिल दुखदुखी। घुँघची भई नयन करमुखी॥
केतो धाय मरै कोई बाटा। सोइपावै जो लिखा लिलाटाँ॥
जोविधि लिखाआन नहिंहोई। कित धावै कित रोवै कोई॥
कितको इच्छाँ कर औ पूजा। जो विधिलिखाहोयनहिं दूजा॥
पैदाहोना १ जगह २ बाप ३ पद्मावत का बाप ४ दूसरा खाविन्द ५
यक़ीन ६ गुइयां ७ आसमान ८ सूर्य ९ चांद १०-११-२३ गर्दन १२ भारी १३
राह १४ खाविन्द १५ क़ैद १६ चांद तथा पद्मावत १७ तथा सखी १८
लाल १९ पपीहा २० नामदूती २१ आफ़ताब २२ रात २४ माथा २५
ईश्वर २६ चाहना २७॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण देवनागरी पाठ पंक्तिबद्ध रूप में दिया गया है:
पद्मावत । २८३
जेते कुमुदिनि बयन करेई। तस पद्मावत उत्तर न देई॥
दो० सेंदुर चीर मैलतस, सूख रही तस भूल।
जेहि शृंगार पियतेंजिगया, जन्म न पहिरे फूल॥
तब पकवान उघारा दूती। पद्मावत नहिं छुई अछूती॥
मोहिं अपने पियकेर खँभारू। पान फूल कस होय अहारू॥
मोकहँ फूल भये जस कांटी। बांटि देहु जो चाहेसि बांटी॥
रतनछुवे जेहि हाथहिं सेती। औ न छुवों सो हाथ सकेती॥
दमक रङ्गभय हाथ मँजीठी। मुक्तौं लेउँ पै घुँघची दीठी॥
नयन करसुखी राती काया। मोती होहिं घुँघची जेहि छाया॥
असके ओछ नयन हत्यारे। देखतगा पिउ गँहे न पारे॥
दो० कातोर छुवों पकवान मैं, गुड़ कडुवा घिउ रूख।
जेहिमिलाहोतसवाद रस, लै पिय गयो सुभूख॥
कुमुदिन रही कमलके पासा। बैरी सूर्य चाँदकी आसा॥
वह कुँमलान रही भै चूरू। बिकसै रैनि वातहिंकरभोरू॥
कसतुइँौरिरिहेसि कुँभलानी। सूख बेल जस पाव न पानी॥
अबहीं कमल कली तुम बारी। कोमल बैस उठत पौनोंरी॥
बेनी तोर मैल शिर रूखी। सरवर मांह रहेसि कस सूखी॥
पान बेल विधि क्यौजंमाई। सींचत रही तोह पलहाँई॥
कर शृंगार मुख फूल तँबोला। बैठ सिंहासन झूल हिंडोला॥
दो० हार चीर नित पहिरो, शिरकी करो सँभार।
भोगआनदिनदशलिये, यौवन गये न बौरे॥
..नामछूती १-१०. वात २ जवाब ३ छोड़ना ४ दुख ५ लाख ६ मोती ७
लालवदन ८ पकड़ न सके ६ तथा राजा ११ सुरखई हुई १२ खिलना १३
रात १४ लड़की १५ मुलायसउमर १६ छाती उठती हुई १७ चोटी १८
तालाब १६ ईश्वर २० वदन २१ शरीर २२ वस्त्र २३॥
२८४ पद्मावत ।
बिहँसजोकुमुदिनियौवनकहा । कमल न बिकसा सम्पुटरहा ॥
ऐ कुमुदिनि यौवन तेहिमाहां । जोआछे पियंका सुखछाहां ॥
जाकर छत्र सो बाहेर छावा । सो उजार घर कौन बसावा ॥
अहा जो राजा रतन अँजूरोँ । केहकसिंहासनकेहक पटोरोँ ॥
को पलंग को पौढ़ै माँढ़े । सोवनहार परा बँद गाढ़े ॥
चहुँदिशि यह घर भा अँधियारा । सब शृंगारलै साथ सिधारा ॥
कार्यां बेल जान तब जामी । सींचनहार आव घरस्वामी ॥
दो० तौलहि रहों झुरानी, जौलहि आवसो कन्तँ ।
यही फूल यह सेंदुर, होय सो उठै वसन्त ॥
जन तुइँ बाँरिकरेसि असजीउ । जौलहि यौवन तौलहिपीउ ॥
पुरुषं संग आपन कहु केरा । एक कुहाय दुसर सों हेरोँ ॥
यौवन जल दिनदिनजसघटा । भँवर छिपान हंस परगटोँ ॥
शुभ्रै सरोवर जौलहि नीरों । बहु आदर पंखी बहु तीरों ॥
नीरेँ घटे पुनि पूछ न कोई । परसैँजोलीजहाथरहि सोई ॥
जबलगकालिंदेँ होय बिरौसी । पुनिसुरसरिहोयसमुद्रपरासी ॥
यौवन भँवर फूल तन तोरा । वर्ध पूँछ जस हाथ मरोरा ॥
दो० यौवनैं कृष्णतन करेंनेँ, मयाँ गोतनहिं साथ ।
छलकै जाय हिवानपैँ २४, धनुषैं छांड़इहाथ ॥
जो पिय रतनसेन मोर राजा । विनपिय यौवन कौनेकाजा ॥
जो नहिंजिव तो यौवन कहे । विन जिव यौवन काहसोअहे ॥
खिलना १ रोशनी २ कपड़ा ३ मोढ़ा ४ बदन ५ खाविन्द ६-७ लड़की=
जवानी ८ मर्द १० देखना ११ ज़ाहिर १२ भराहुआ तालाब १३ पानी १४-
१६ किनारा १५ मुख १७-१८ यमुना तथा जवानी १८ गंगा तथा
बुढ़ापा २० जवानी २१ नाम राजा दानी २२ मुहब्बत २३ तीर २४
कमान २५ ॥
पद्मावत । २८५
जो जिव तौ यहि यौवन भला । आपहि जैसा करै निरमलो ॥
कुलकरपुरुषै सिंहै जेहि केरा । तेहिथलें कैसिसियार बसेरा ॥
हियों फाड़ कूकुर तेहि केरा । सिंहै तजि सियार मुख हेरा ॥
यौवन नीर घटेका घटा । सतँके बेर न जाय हियेँ फटा ॥
सघनं मेघहै श्यामं बरीसहिं । यौवन नयेतरंवरे है दीसहिं ॥
दो० रावणपाप जो जिवधरा, दोउ जगत मुँहकार ।
राम शरण जो मन धरा, ताहि छलै को पार ॥
कित पावसि पुनि यौवनरातोँ । मैमँतेचढ़ा श्यामशिरछाता ॥
यौवन बिना वृद्धि हो नाउँ । बिन यौवन थाकै सब ठाउँ ॥
यौवन हेरत मिलै न हेरा । तेहिपुनि जाहिंकरहिंनहिंफेरा॥
अहहिजोकेशनरंगभवँरजोबसा।पुनिबकँहोहिजगतसबहँसा॥
सेंवर सेचन चेत कर सुवा । पुनि पछतास अंतहो भुवा ॥
रूप तोर जग ऊपर लोनों । यहि यौवनपाहुनजलसोना॥
भोग विलास केर यह बेरा । मानलेहु पुनिको केहिकेरा ॥
दो० उठत कोप जसतरवरैं, तसयौवन तोहिरातँ ।
तौलह रङ्ग लहो रच, पुनि सो पियरहो पात ॥
कुँमुदिनि बैनैं सुनतही जरी । पद्मिनि हियेँ आगजनुपरी ॥
रँग ताकर हौं जारों रचा । आपन तर्जै जो पराये लचा ॥
दूसर करै जाय दुइँ बाटा । राजा दुइ न होहिं इकपाटाँ ॥
जेहि जिय प्रेमप्रीतिदृढ़ होई । सुख सुहाग सों बैठौ सोई ॥
साफ़ १ खाविन्द ब्याहाहुवा २ शेर ३ जगह ४ छाती ५-६ देखना ६
पानी ७ ईमान ८ बादल १० खाविन्द ११ पेड़ १२-१६ लाल १३-२०
मस्त १४ मुक़ाम १५ सांप १६ बगुला १७ ख़ूबसूरत १८ नामदूती २१
बात २२ दिल २३ छोड़ना २४ दूसर राह तथा नरक २५ तख़्त २६
मज़बूत २७ ॥
२८६ पद्मावत ।
यौवन जाउ जाउ सो भँवरा । पियाकी प्रीति न जाय जो सँवरा ॥
यहिजग जो पियकरहिंनफेरा। वहजगमिलहिंजोदिनदिनमेरा ॥
यौवन मोर रतन जहँ पीउ । वलें सोपियपर यौवन जीव ॥
दो० भरथँरि विछोहैं पिंगला, आहकरत जिवदीन्ह ।
हों पापिन जो जियतहों, यही दोर्ष हम कीन्ह ॥
पद्मावत सो कौन रसोई । जहाँ प्रकारँ दूसर नहिं होई ॥
रस दूसर जेहि जीभहि बैठा । सो जानें रस खटा औ मीठा ॥
भँवर बास बहु फूलहिं लेई । फूल बास बहु भँवर न देई ॥
तुइँ रस पुरुष न दूसर पावा । तेहिजाना जेहिलीन्हपरावा॥
इक चुल्लू रसअर नहिं हियाँ । जौलहि नहिं फिर दूसर पिया॥
तोर यौवन जस समुद्र हिलोरा । देख देख जिय बूडै मोरा ॥
रंग और नहिं पाई वैसे । जन्में और तुइँ पावत कैसे ॥
दो० देखधनुष तोर नयना, मोहिलागा विष वान ।
विहँसै कमल जो मानै, सँवरै मिलाऊँ आन ॥
कुमुंदिनि तुइँ बैरिन नहिं धाई । मोहिं मसि बोलछलों वेसिआई ॥
निरमलै जगतनीरे करनामा । जो मसि परै होयसो श्यामाँ ॥
जहँवाँ धर्म पाप नहिं दीसा । कनकें सुहागमां भजससीसा ॥
जो मसि परै होय शशिकारी । सोहँसलाय देहेसिमोहिं गारी ॥
कापर महँ न छूट मसि अंकू । सोमसिलाय मोहिंदे सकलंकू ॥
श्याम भँवर मोर सूरूज करा । और जो भँवर श्याममसिभरा ॥
कमल भँवर रवि देखै आंखी । चन्दन पास न बैठै माखी ॥
·मुलाक़ात १ कुरबान २ नामराजा ३ जुदाई ४ नामरानी ५ पाप ६ दुइ-
तरह ७ मज़ा ८ मर्द ६ दिल १० तथा बुढ़ापा ११ हँसना १२ तथा दूसरा
खाविन्द १३ नामदूती १४ कारिख १५ दग़ा १६ पाकसाफ़ १७ पानी १८
सियाही १६ काला २० सोना २१ चांद २२ दाग़ २३ ऐब २४ सूर्य २५ ॥
। पद्मावत । २८७
दो० स्याम समुद्र मोर निरमले, रतनसेन जग सेने।
दूसर सरै जो कहावै, सो बिलाय जस फेन॥
पद्मिनिपुनिमसि बोल न बैनों। सों मसि देख दुहूँ तोर नयना॥
मसि श्रृंगार सब काजर बोला। मसक बुंद तिल सों हिंक पोलाँ॥
लोनाँ सोई जहां मसि रेखा। मसि पुतरिन तेहि से जग देखा॥
जो मसि घाल नयन दुहुँ लीन्हीं। सो मसि फेर जाय नहिं कीन्हीं॥
मसि मुद्रौ दुइ कुर्च उपराहीं। मसि भँवर जस कमल भंवाहीँ॥
मसि केशंहि मसि भौंह उरेहीं। मसि बिन दशन न शोभ न हिं देहीं॥
सो कस श्वेते जहाँ मसि नाहीं। सो कस पिंड़े न जहँ परछाहीं॥
दो० अस देवपाल राउ तस, छत्रधरा शिर फेर।
चितौर राज बिसरगा, गयो जो कुंभले नेर॥
सुन देवपाल जो कुंभल नेरी। पंकज नयन भौंह धने फेरी॥
शत्रु मोर पिय कर देवपालू। सो कित पूच सिंह सरै भालू॥
दुखन भरा तन जे तन केशा। तेहक संदेश सुनावसि बेश्या॥
सोन नदी अस मोर पिय गरवा। पाहन होय परै जो हरवाँ॥
जेहि ऊपर अस गरुवा पीउ। सो कस डोलाये डोलै जीउ॥
फेरत नयन चीर सो छूटी। भइ कूटन कुटनी तस कूटी॥
नाक कान काटी मैंसिलाई। मूड मूड़के गदहे चढ़ाई॥
दो० मुहमद गरू जो विधि लिखी, का कोई तेहि फूँक।
जेहिक भार जग थिर रहा, उड़ेन पवन के झूँक॥
पाकसाफ़ १ दुनिया का देखनेवाला २ बराबरी ३ बात ४ गाल ५
खूबसूरत ६ छाप ७ छाती ८ बाल ६ दांत १० सफ़ेद ११ वदन १२ नाम
मुल्क १३ कमल १४ पद्मावत १५ दुश्मन १६ शेरकी बराबरी १७ रीड़ १८
पत्थर १६ बहिजाना २० लहँगा २१ सियाही २२ ईश्वर २३ क़ायम २४॥
२८८ पद्मावत ।
रानी धर्म सारे पुनि साजा । बन्द मोष जेहिं पावहिं राजा ॥
जहँ तक परदेशी चलिआवा । अन्नदान औ पानि पियावा ॥
योगी यती आव जित कंथी । पूछी पियाजान कोउ पंथी ॥
दान जो देत बांह भइ ऊँची । जायशाहपहँ बात जो पहुँची ॥
पातुरिकहुतयोग सु आंगी । शाहैं उघारे हत वह मांगी ॥
योगिनवेष वियोगिन कीन्हीं । सुनके शब्द मोलततकीन्हीं ॥
पद्मिनिपहँ पठईकर योगिन । वेगँआनकरविरहवियोगिन ॥
दो० चित्र कला मन रोहन, परकाया परवेश ।
आयचढ़ी चितौरगढ़, होययोगिनकरभेष ॥
खण्ड चालीसवां वेश्यागमन ॥
मांगत राज वार चल आई । फेर चेरी यह बात जनाई ॥
योगिन एक वारे है कोई । मांगै जैसि वियोगिनि होई ॥
अवहीं नवयौवन तपलीन्हीं । फार पटोरीं कन्थौ कीन्हीं ॥
विरह विभूत जटा वैरागी । छाला कांध जांप कँठलागी ॥
मुद्रैं श्रवणैं नहीं थिरै जीउ । तन त्रिशूल आधारी पीउ ॥
छाता छाँह धूप जनु मरै । पांयन पँवरी सुभुल जरै ॥
भैंरी शब्द धँधारी करा । जरै सो ठाँउ जहाँ पैंग धरा ॥
दो० किंगरी गहे वियोग बजावे, वारहि वारै सुनाउ ।
नयनचक्रचहुँदिशि निरखि, धौंदरशनकबपाउ ॥
खैरातखाना १ बेषवाले २ मुसाफिर ३ मकार ४ शाह ने बुलाया ५
पद्मावत को ले. व इनाम पावेगी ६ जल्द ७ तजबीह ८ दरवाजा ९-११-२४
दासी १० दुखी १२ नवजवान १३ सारी १४ गुदड़ी १५ माला १६
बाला १७ कान १८ क़ायम १६ खड़ाऊँ २० शृंगी बजा की तरह आवाज
मस्ताना २१ जगह २२ पैर २३ तरफ २५ देखना २६ ॥
पद्मावत । २८६
सुनि पद्मावत मंदिर बोलाई । पूछी कौन देश ते आई ॥
तरुणवैस$^{१}$ तोहि छाजन योगू । केहि कारण अस कीन्ह बियोगू$^{२}$ ॥
कहेसि बिरह दुख जान न कोई । बिरहिन जान बिरह जेहि होई ॥
कन्त हमार गयो परदेशा । तेहिकारण हम योगिन भेशा ॥
काकर जिय यौवन औ देहा । जो पिय गयो भयो सब खेहा$^{३}$ ॥
फार पटोरें$^{४}$ कीन्ह मन कन्थाँ$^{५}$ । जहाँ पिय मिलै लेहुँ सो पन्थाँ$^{६}$ ॥
फिरौं करौं चहुँ चक्र पुकारा । जटा परी को शीश$^{७}$ सँभारा ॥
दो० हिरदय$^{८}$ भीतर पिय बसै, मिलै न पूछै काहि ।
सून जगत सब लागै, वह बिन कछू न आहि ॥
श्रवण$^{९}$ छेद में मुद्रों मेला$^{१०}$ । शब्दे$^{११}$ सुनाउँ कहाँ पियगेलो$^{१२}$ ॥
तेहिवियोगैं सिंघी नितपूरी । बारबार किंगरी$^{१४}$ भइ झूरी ॥
को मोहिं ले पियकंठ$^{१५}$ लगावै । परस अधारी बात जनावै ॥
पांवरे$^{१७}$ टूट चलत गा छाला । मन न फेरै तन यौवनबाला ॥
गयौं प्रयाग मिला नहिं पीउ । करवंट लीन्ह दीन्ह बल जीव$^{१८}$ ॥
जाय बनारस जाखौं कयाँ । पारथ्यो पिण्ड नहायों गया ॥
जगन्नाथ चक्रहिं के आय । पुनि सो द्वारका जाय नहाय ॥
दो० जाय केदारा दागतन, तहँ न मिला तनआँकै$^{१९}$ ।
ढूँढ़ि अयोध्या आय फिर, स्वर्गद्वारी झांक ॥
गाउमुखै हरिद्वारै फिर कीन्हों । नगर कोटैं कित रसना दीन्हों ॥
ढूँढूँ बालें नाथ कर टीला । मथुरामथ्योनसोपिय मेला ॥
सूर्यकुण्डँ महँ जाख्यो देहा । बद्री$^{२२}$ मिला न जासों नेहा ॥
पाद-टिप्पणी:
१ नवजवान २ दुख २-१४ वास्ते ३ धूर ४ झारी ५ गुदड़ी ६ राह ७
शिर ८ दिल ६ कान १० चाली ११ आवाज़ १२ जाना १३ शेर १४ नाम
बाजा १५ गले १७ खड़ाऊँ १८ शिरकटाना १६ तप किया २० पता २१ नाम
तीर्थ २२ से २८ तक ॥
.२६० पद्मावत ।
रामकुण्डे गोमंति गुरुद्वारू । दाहिनवर्त कीन्ह कै भारू ॥
सेतुबंध कैलासै सुमेरू । गयौंअलखपुर जहां गँभीरू ॥
ब्रह्मवर्त ब्रह्मावर्त परसी । बेनी संगमे सीसों करसीं ॥
नीलकंठे मिश्रिर्षे कुरुजेटों । गोरखनाथे अस्थाने समेटा ॥
दो० पटना पूर्व सो घर घर, हाड़ फिर्यो संसार ।
हेरंत कहूँ न पियमिला, नाकोइमिलवनहार॥
वन बन सब हेर्यो नवखण्डा । जलजलनदी अठारहगण्डा ॥
चौसठ तीर्थ कीन्ह सब ठाऊँ । लेत फिर्यो वह पियकरनाऊँ ॥
देहली सब देख्यों तुरकानू । औसुलतान केर बँदेवानू ॥
रतनसेन देख्यों बँद माहां । जरै धूप खनें पावन छाहां ॥
सब राजा बांधे औ दागी । योगिनजान राजपंगलागी ॥
कासोंभोगैं जहँअन्त न गयऊ । यहदुखलैसोगयोसुकंदयऊ ॥
देहलीनाउँ न जानों ढीली । सठबँदै गाढ़निकसनहिंगेली ॥
दो० देख दगधै दुखताकर, अझो क्यों नहिं जीउ ।
सो धनै कैसेंवहजिये, जाकर अस बँदपीउ ॥
पद्मावत जो सुना बँद पीउ । पराअगिनिमहँ जानहुघीउ ॥
दौरे पांय योगिन के परी । उठी आग योगिनपुनिजरी ॥
पांय देहु दुइ नयन न लाऊं । लैचल तहां कन्तजेहिठाऊं ॥
जेहि नयनन तुइँ देखा पीउ । मोहिं देखाय देव बल जीउ ॥
सत औ धर्म देउँ सब तोहीं । पियकी बात कहै जो मोहीं ॥
तुइँ मोर गुरु तोर हौं चेली । भूली फिरत पन्थे जे मेली ॥
नामतीर्थ १ से १४ तक । नामयोगी १५ मकान १६ ढूँढ़ना १७ क़ैद-
ख़ाना १८ कभूं छाया नहीं पाता १९ पालागन राजाने किया २० लेकिन
क्या अस्तियार जहां दखल गैरका न हो २१ भारी क़ैदखाना जहां से नि-
कलना मुश्किल है २२ जलना २३ बदन २४ औरत तथा पद्मावत २५ राह २६॥
पद्मावत। २६१
दण्डकै माया कर मोरे। योगिनहोउँ चलों सँग तोरे॥
दो० सखिन कहापद्मावतहि, प्रगटै करोना भेश।
योगी जुगवे गुसै मन, लै गुरुकर उपदेश॥
भीख लेहु योगिन फिर मांगू। कन्त न पाई कीन्हें सुवांगू॥
यह बड़योग वियोग जो सहा। जैसे पिय राखै तुम रहा॥
घरही महँ रहु भई उदासा। अंचलखप्पर श्रृंगी श्वासा॥
रहै प्रेम मन उरझा लटा। विरह ढँढार परहिं शिरजटा॥
नयन चक्र लावै लै पन्था। कायौं कापर सोई कन्थौ॥
छालाभूमि१२ गगनैशिरछाता। रंगरकै रहि हिरदै१५ राता॥
मनमाला पहिरे तंत ओहीं। पाँचौ१७ भूत भस्म तन होहीं॥
दो० श्रवणँकुँडलमुनिपियवचनै, पाँवरैं पांयपरेह।
दण्डकै गोरा बादलहि, जाय अधौरी लेह॥
सखिन बुझाई दग्धै अपारा। गइ गोरा बादलें केवाराँ॥
चरण कमल भुइँजन्मन धरी। जात तहां लग छाला परी॥
निकस आय सुन क्षत्री दोऊ। तस काँपै जस काँप न कोऊ॥
केश छोर चरणन रज झारी। कहां पाँउ पद्मावत धारी॥
राखा आन पाँटै सुन वानी। विरह वियोगन बैठी रानी॥
चँवर ढार द्वै चँवर डुलावहिं। माथे छत रजायसु पावहिं॥
उलट वहा गंगाकर पानी। सेवक बारि न आवहिं रानी॥
दो० का असकट कीन्ह जिय, जो तुमकरतन छाज।
१ एकघड़ी १-२१ मेहरबानी २ ज़ाहिर ३ भेद ४ छिपा ५ ओछों के फ़रेब
से ६ नामराजा ७ भारी ८ राह ६ बदन १० गुदड़ी ११ ज़मीन १२ आस-
मान १३ खून १४ दिल १५ लाल १६ आंख कान नाक ज़बान छूना १७
कान १८ बात १६ खड़ाऊं २० नाममंत्री २२-३५ सहारा २३ आँग २४
दरवाज़ा २६-२६ सोने का तख़्त २७ हुक्म २८॥
२६२ पद्मावत।
आज्ञा होय बेगैं सो, जीव तुम्हारे काज ॥
खण्डइकतालीसवां पद्मावत वा गोराबाद्दल
संवाद ॥
कही रोय पद्मावत बाता । नयनहिं रक्त देख जगराताँ ॥
उलट समुद्रस माणिकैं भरे । रोवसि रुधिरैं आंसुतस ढरे ॥
रतनके रंग नयन पै वारौं । रती रती के लोहू ढारौं ॥
कमलहिं ऊपर भँवर उड़ाऊं । लैचलि तहां सूर्य्यजहँ पाऊं ॥
हियँ कर हरद बदन कै लोहू । जियबलदेउँसौंवर बिछोहूँ ॥
परहिं आंसुजस सावन नीरू । हरियरि भूमि कुसुंभी चीरू ॥
चढ़ी भुवंगिन लट लटकेशा । भइ रोवत योगिन के भेशा ॥
दो० बीरबहूटी भै चलैं, तोहू रहहिं न आंस ।
नयनहिं पंथै न सूझै, लाग्यो भादों मास ॥
तुम गोराबाद्दल खंभ दोऊ । जस रणभारत और न कोऊ ॥
दुखबर्षा अब रही न शाखा । मूलैं पतार स्वर्गे भइ शाखा ॥
ब्यायरही सकलैं महि पूरी । बिरह बेल भइ बाढ़ खजूरी ॥
तेहिं दुख लेत बृक्ष बन बाढ़ी । शीश उघारे रोवहिं ठाढ़ी ॥
भूमि पूर सायरैं दुख पाटा । कौड़ी भई फेर हियैं फाटा ॥
बेहरि हिये खजूरकर बिया। बेहरिनाहिं मोर पाहनैं हिया ॥
पियजेहिं बँद योगिन है धाऊं । हौं बंधूलों पियमकरौंऊँ ॥
दो० सूर्य्य ग्रहण गरासा, कमल न बैठी पाट ।
हुक्म १ जल्द २ लाल ३ जबाहिर ४ खून ५ छाती ६-२१ जुदाई ७
पानी ८ ज़मीन ६-१६-१६ नागिन १० राह ११ नाममंत्री १२ जड़ १३
आसमान १४ सब १५ पेड़ १७ शिर १८ तालाब २० फटना २२ दिल २३
पत्थर २४ छोड़ना २५ तख़्त २६ ॥
... मुहुँ पंथ तहँ गवनब, कंत गये जेहि बाट ॥
गोरा बादल दोऊ पसीजे। रोवत रुधिरं शीशँ लहिभीजे ॥
हम राजा सों यही कुहाँने। तुमनहिं मिलो धरै तुरकाने ॥
जो मति सुन हम आय कुहाये। सो नियार्न हम माथे आये ॥
जबलगि जिये न भाँगहिं दोऊ। स्वामिन जिय कित योगिन होऊ॥
उये अगस्त्य हँस्ति अवगाजा। नीर घटे घर आवै राजा ॥
वर्षा गयो अगस्त्य की दीठी। परै पलाने न तुरंगनँ पीठौ ॥
वेधों राहु छुडाऊँ सूरै। रहै न दुखकर मूलँ अंगूरू॥
दो० वह सूरज तुम शशिवदन, आन मिलाऊँ सोय ।
तस दुख महँ सुख उपजै, रैनि मांझ दिन होय ॥
लीन्ह पान बादल औ गोरा। गहि लैदेउँ उपम तुम जोरा ॥
तुम सावन्तरैन सरवरं कोऊ। तुम हनुमंतै अंगद सम दोऊ ॥
तुम अर्जुन औ भीमें भुवारा। तुम बलवीर सो मन्दन हारा ॥
तुम तारन भारन जग जानी। तुम सों पुरुष औ कर्ण बखानी ॥
तुम अस मोरे बादल गोरा। काकर मुख हेरौं २६ बँदछोरा ॥
जस हनुमंत राघव वँद छोरी। तस तुम छोर मिलावहु जोरी ॥
दो० जैसे जरत लक्ष घर, साहँस कीन्हा भीउँ ।
जरत खम्भ तस काढ़ो, कै पुरषारथ जीउ ॥
रामलपण सम दैत्य संहारा। तुमहीं घर बलभद्रं भुवारा ॥
तुम द्रोनों औ पितागे गेऊँ। तुम लेखो ईश्वर सहदेऊँ ॥
नाममंत्री १ खून २ शिर ३ खफ़ा होना ४ सलाह ५ आखिर ६ नाम
नक्षत्र ७-८ पानी ९ निगाह १० चारजामा ११ घोड़ा १२ सूर्य्य १३ जड़ १४
चांद १५ पैदा १६ रात १७ जोड़ी मिलादौ १८ बहादुर १६ चराचर २०-२५
नाम शूरवीर २१-२२-२३-२४-२५-२८-३१-३२-३३ देखना २६ बहादुरी २७
बलभद्रका घर खराब किया ३० ॥
२६४ पद्मावत ।
तुमहु युधिष्ठिर औ१ दुर्योधन२ । तुमहुभोज३नल४दोउसम्बोधन ॥
तुमराघव५परशुरामैंऔ योधा६। तुमपरतज्ञाँ औ हत बोधा ॥
तुमहु शत्रुहनें भरत कुमारा । तुम कंसहिं चाणूरें सँहारोँ ॥
तुमप्रद्युम्न औ अनिरुद्ध दोऊ । तुमअभिमन्यु बोलसबकोऊ ॥
तुम सैरैं पूजननविक्रम१५ शाके । तुमहरिचन्दै हमीरैं सतं माके ॥
दो० जस अतिसङ्कट पांडवनं, भयोभीमँ बँदछोर ।
तस परबँश पर काहहु, राखलेहु ब्रह्ममोर ॥
गोराँ बादल बीरा लीन्हा । जसहनुमत अंगदबलकीन्हा ॥
साज सिंहासन ताना छातू । तुम माथे युग युग अहिवातू ॥
कमलचरण भुइँधर दुखपावहु । चढ़ सिंहासनमंदिरसिधावहु ॥
सुनसूरजकमलाहिजियजागा । केसेरें वरन पवन हियलागा ॥
जनुनिशि २४ मुँह अबदीनन्हेदेखाई । भाउदोत मसि गईबिलाई ॥
चढ़ी सिंहासन झमकतचली । जानहुँ चाँद दुइज निरमँली ॥
औ सँग सखी कुँमोद तराँई । ढारत चँवर मंदिर लै आई ॥
दो० देख दुइज सिंहासन, शंकर धरा ललाटँ ।
कमल चरण पद्मावत, लै बैठारी पाटँ ॥
खण्ड बयालीसवां गोरा बादल गवन ॥
बादल केर जसोदी माया । आय गही बादल के पाया ॥
बादल राय मोर तुइ बारा । काजानेसिकसहोयजुझाराँ ॥
नामशूरवीर १-२-३ श्रीरामचन्द्रजी ४ नाम महाशूरबीर ५-६-१०-२१
कौल ६ भाईश्रीरामचन्द्र ७-८ मारना ११ बेटा श्रीकृष्ण १२ पोता श्री-
कृष्ण १३ बेटा अर्जुन १४ बराबरी १५ विक्रमादित्य १६ नामराजा १७-१८
सचबोलनेवाले १६ राजा युधिष्ठिर २० उसीतरह इस वक़्तमें मददकरो २२
नाममन्त्री २३ रंग २४ रात २५ रौशन २६ सियाही २७ साफ़ २८ कोका-
बेली २६ नखत ३० माथा ३१ तख़्त ३२ लड़ाई ३३ ॥
पद्मावत। ३६५
बादशाह भूमीपति राजा। सन्मुख है न हमीरहिंलाजा॥
बत्तीसलाखतुंरी जेहिसाजहिं। बीससहसहस्तीदल गाजहिं॥
जबहीं आय चढ़े दल ठाटा। देखत जैस गगन घनघटा ॥
चमकहिं खड्ग जोबीजैंसमाना। डमरहिंगलगजहेंहिंनिशाना॥
वरसहिं सेलें बानैं घनघोरा। धीरज धीर न बांधे तोरा ॥
दो० जहां दलपती दलमलहिं, तहां तोरका काज।
आज गवन तोर आवै, बैठमान सुखराज ॥
मातन जानेसि बालकेँआदी। हौं बादला सिंहे रन बादी ॥
सुनगजजूहें अधिकजिउतपा। सिंहे जातकहुँरैनाहिं खिपा ॥
तवलग गाजनैं गाज सँडेला। साँहैं शाहसों जुरों अकेला ॥
को मोहिं साँह होय मै मन्ता। फारौं सूँड़ उखारों दन्ता ॥
जरों स्वामैं संकरे जस तारा। ओ बर्ले जस दुर्योधन मारा ॥
अङ्गदकोप पांव जस राखा। टेकों कटकेँ छतीसो लाखा ॥
हनुमत सरस जङ्घपर जोरों। दहौं समुद्र स्वामें बँद छोरों ॥
दो० जो तुम मात जसोदी, मोहिं न जानो बार।
जहँ राजा बलबांधा, छोरों पैठ पतार ॥
बादल गवन जूझकहँ साजा। तैसेहिंगवन आय घरबाजाँ ॥
लिये साथ गवने कर चारू। चन्द्रवदन रचकीन्हशिंगारू ॥
मांग-मोति भर सेंदुर पूरा। बैठ मयूरे बाँक तस जूरा ॥
भौंहैं धनुर्पे टकोर परीखी। काजर नयन मारशरतीखी ॥
घोड़ा १ हाथी २ आसमान ३ तलवार ४ बिजुली ५ परहरा ६-१४
गोला ७ तीर ८ बड़े राजा ६ छोटा लड़का १० शेर ११-१३ हाथियों का
हलक़ा १२ सामने १५ मस्त १६ मालिक का काम करों १७ नाम महाशूर-
वीर १८-१६ फ़ौज २० राजा २१ पहुँचा २२ मोर २३ कमान २४ तीर २५
कटीली २६ ॥
२६६ पद्मावत।
घाल कचवेची टीका सजा। तिलकजोदेखठाउँ जिउतजा॥
मणिकुण्डलडोलैदुइश्रवनाँ।शीशँधुनहिसुनिसुनिपियगवनाँ॥
नागिनअलकैँ झलकउरेहारू। भयो श्रृंगार कंत बिन भारू ॥
दो० गवन जो आयो पॅवरँ महँ, पिय गवने परदेश ।
सखीबुझावहिंकिमैअनंल, हुसैसेोकेहिउपदेश॥
मान गवन जस घूँघट काढ़ी। बिनवै आय वारेँ भइ ठाढ़ी ॥
तीपी हेरे' चीर गँहि ओढ़ा। कंतनहेरे' कीन्ह जियपोढ़ा ॥
तबधनेँ कीन्ह बेहँसे चंपै दीठी। बादलैंतवहिँ दीन्ह फिरपीठी ॥
मुख फिराय मन अपने रीसा । चलतनतिरियाकरमुखदीसाँ ॥
भामिने भेष नारिकेँ लेखे। कसपिउ पीठ दीन्ह मुँहदेखे ॥
मँकु पिय दृष्टि समानो चालू। हुलैसे पीठ गढ़ाऊँ सालू ॥
कुचें ताँबी अब पीठ गड़ोऊँ। गहेसि जोहूककाढ़रिसधोऊँ॥
दो० रँहुलजाय तोपिय चलै, कहौंतो कहिमुहिँ दीठँ।
ठाढ़ तेवानी काकरों, भारी दोउबसीठँ ॥
लाजकियेजो पियनहिंपाऊं। तजों लाज करें जोर मनाऊं ॥
कर हठ कंत जाय जेहिलाजा। घूँघट लाज आवकेहिकाजा ॥
तब धन बेहँसे कहा गहिफेटा। नारिजो बिनवै कंत न मेटा ॥
आज गवन हूँ आई नाँहां। तुम न कंते गवनो रनमाहां॥
गवनआवधनमिलनकिताई। कौन गवन जो बिछुड़े सांईं॥
नाम नखत १ फान २ शिर ३ बाल ४ छाती ५-२३ दरवाज़ा ६ जाना
सिधारना ७ किसतरह ८ आग ६ ड्योढ़ी १० कटीली निगाहसे देखा ११
खींचना १२ देखना १३-१८ औरत बादल की १४ हँसना १५ आँख १६
नाममंत्री १७ औरतका शकुन बदसमागया १६ शायद २० निगाह २१
पीठ देख तसकीनकी २२ खींचाकि दिलका दुख निकल जावे २४ शोख २५
दोनों छाती २६ हाथ २७ हँसना २८ अर्ज़ २६ खाविन्द ३०-३१
पद्मावत । २६७
धन न नयन भर देखा पीऊ । पिया न मिलंधनसोभरजीऊ ॥
तेहिसव आस भरा है केवों । भँवरन तेजै वास रस लेवा ॥
दो० पावनधरा ललाटै धन, विनय सुनहु हो राय ।
अलकें परा फँदवार है, कैसेहिं तजै न पाय ॥
बांड़ फेटैं धन बादल कहा । पुरुषगवन धन फेट न गहों ॥
जो तुइँगवन आयगजगामी । गवन मोर जहँवाॅमोरस्वामी ॥
जब लग राजा लूट न आवा । भावै वीर शृंगार न भावा ॥
तिरिया भूमि खड्ग की चेरी । जीत जो खड्ग होय तेहिकेरी ॥
जेहिं घर खड्ग मूठ तहँ गाढ़ी । तहां न अंडन मूछ न दाढ़ी ॥
तब मुँह मूछ जीव पर खेलौं । स्वामिकाज इन्द्रासन पेलौं ॥
पुरुप कें २ बोल टरै नहिं पाछू । दर्शनै गयन्द ग्रीवै नहिंकाछू ॥
दो० तुइँ अवलों धन कुबुधैँ बुध, जानैकहाजुभाँरें ।
जेहि पुरुर्षहि हियें १७ बीररस, भावैतेहिन शृँगार ॥
जो तुमचहो जूझ पिय वाजा । कीन्ह शृंगार जूझ मैं साजा ॥
यौवन आय सौंहें है रोपा । पिघला विरहकामदल कोपा ॥
भयो वीररस सेंदुर मांगा । रातो रुधिर खड्गजस नांगा ॥
भौंहैं धनुप नयन शरैं सांधे । बरनैं बीज काजर बिषबांधे ॥
दय कटाक्ष २३ सों सान सँवारी । औ मुखसेलभाल अनयौरी ॥
अलकें फासग्रिवैं मेलअस्रूझा । अधरैं अधरसों चाहहिंजूझा ॥
कुंभस्थलें कुचैं दोउ मैमन्ता । पेलों सौंहें सँभारहु कन्ता ॥
कमल १ छोड़ना २ माथा ३ बाल ४ कंमर ५ औरत ६ पकड़ना ७
हाथीकी चाल ८ लड़ना ६ ज़मीन १० तलवार ११ मर्द १२-१८ दांतहाथी
के १३ गरदन कछुवाकी १४ नादान १५ कमअक़्ल १६ लड़ाई १७ दिल १८
सामने २० लालखून २१ तीर २२ पलक बिजुली की तरह २३ तिरछी नि-
गाह २४ नोकीले २५ बाल २६ गर्दन २७ होंठ २८ हाथी मस्त २६ छाती ३०
मुक़ाबिल ३१ ॥
२६८ पद्मावत ।
दो० कोप श्रृंगार विरह दल, टूटहोय दुइ आध ।
पहिले मोहिं संग्रामकै, करहुजूझकी साधै॥
कैसहूँ कंत फिरै ना फेरी । आग परी चितौर धन केरी ॥
उठी सो घूमें नयन गरवानी । लागे परे आंशु भंहरानी ॥
भीजेहार चीरें हियें चोली । रही अलूत कंत नहिं खोली॥
भीजेलाग चुवें कर्टमुण्डन । भीजै भँवरकमलशिरफुन्दन ॥
चुइ चुइ काजर अँचरा भीजा । तवहूँ न पियके रोवैं पसीजा॥
छांड़चला हिरदयँ दयदाहूँ । निठुरनाहँ आपननहिंकाहू ॥
सबै श्रृंगार भीज सुँई बुवा । छोरंमिलायकन्ते नहिं छुवा ॥
दो० रोये कन्त न बहुरे, तेहि रोये का कांज ।
कन्तधरामनजूझरन, धने साजीसबसाज ॥
खण्ड तैंतालीसवां गोरावादलवर्णन ॥
मँते बैठ बादल औ गोरा । सोमत कीजे परनहिं भोरों ॥
पुरुष न करै नारिमत कांची । जसनौशावाँ कीन्ह न बांची॥
चढ़ा हाथ इसकन्देर वैरी । सकतें छांड़ के भई बँदेरी ॥
सजंगं जोनाहँमारवल कांधा । बुधै कहिये हँस्ती काबांधा ॥
देवतनचलें आय अस आंटी । सुरजनै कञ्चनै दुर्जनै माटी॥
कञ्चन जुरै भये दश खांड़ा । फूटन मिलै और कर भांड़ा॥
जस तुरकहिं राजा छलसाजा । तस हमसाज छुड़ावहिंराजा ॥
दो० पुरुष तहांही छल करै, जहँवल कैसोन आंटँ ।
लड़ाई १ इरादा २ धुवां ३ सारी ४ छाती ५-७ कुरती ६ जलन ८ ता-
विन्द ९-११ धूर १० औरत १२ सलाह १३ नाममंत्री १४ हँसी १५ मर्द १६
नामशाहज़ादी १७ नाम बादशाह १८ उसको छोड़ दिया १६ होशियार २०
अक़लमन्द २१ हाथी २२ दोस्त २३ सोना २४ दुश्मन २५ माटी २६
पहुँचना २७ ॥
पद्मावत । २६६
जहां फूल तहँ फूल है, जहां कांटे तहँ कांटे ॥
सोरह सै चयडोल सवारी । कुँवर सजायेले तहँ बैठारी ॥
पद्मावत कर साज बेवानू । बैठ लुहार न जानै आनू ॥
रच बेवान सौ साज सँवारा । चहुँदिशिँ चमरकरहिंसबदाराँ ॥
साज सबै चयडोल चलाई । सुरँग उहार मोति बहु लाई ॥
भय सँग गोरो बादल बली । कहत चले पद्मावत चली ॥
हीरा रतन पदार्थ झूलहिं । देख बिमानँ देवता भूलहिं ॥
सोरह सै सँग चलीं सहेली । कमल न रहा और को बेली ॥
दो० राज छुड़ावन रानिचलि, आपहोय तहँ ओल ।
तीससहर्स तुरि खींचसँग, सोरहसै चयडोल ॥
राजा बँद जेहिके सौंपना । गागोराँ तापहँ अगमनाँ ॥
टका लाख दशदीन्ह अकोरों । बिनती कीन्हपांयगहिगोराँ ॥
बिनवौं बादशाह सो जाई । अब रानी पद्मावत आई ॥
बिनँती करै आयहूँ देहिली । चित्तौरकी मोसों है कीली ॥
बिनँती करै जहां है पूँजी । सब भँडारूँ की मोसों कूँजी ॥
एक घड़ी जो अज्ञा पाऊँ । राजा सौंप मंदिर महँ आऊँ ॥
तब रखवारँ गये सुलतानी । देख अकोरेँ भये जसपानी ॥
दो० लीन्ह अँकोर हाथ जो, जीउ दीन्ह तेहि हाथ ।
जो वह कहै करैसो, कहीं छांड़ नहिं माथ ॥
लोभ पाप की नदी अकोराँ । संतै न रहै हाथ जो बोरा ॥
जहँ अकोर तहँ नेकैं न राजू । ठाकुरकेर बिनाशहिं काजू ॥
बहादुर १ सूर्य २ चारोंतरफ ३ औरत ४ राजमंत्री ५-१० जवाहिरोत ६
चयडोल ७ तीसहज़ार ८ घोड़ा ६ पहिले ११ रिशवंत-नज़राना १२-२१-
२२-२३ अर्ज़ १३-१४-१५-१७ कुंजी १६ खज़ाना १८ हुक्म १६ दारोगा २०
ईमान २४ राजअच्छा नहीं २५ ख़राब २६ ॥