पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ पद्मावत।
आज्ञा होय बेगैं सो, जीव तुम्हारे काज ॥
खण्डइकतालीसवां पद्मावत वा गोराबाद्दल
संवाद ॥
कही रोय पद्मावत बाता । नयनहिं रक्त देख जगराताँ ॥
उलट समुद्रस माणिकैं भरे । रोवसि रुधिरैं आंसुतस ढरे ॥
रतनके रंग नयन पै वारौं । रती रती के लोहू ढारौं ॥
कमलहिं ऊपर भँवर उड़ाऊं । लैचलि तहां सूर्य्यजहँ पाऊं ॥
हियँ कर हरद बदन कै लोहू । जियबलदेउँसौंवर बिछोहूँ ॥
परहिं आंसुजस सावन नीरू । हरियरि भूमि कुसुंभी चीरू ॥
चढ़ी भुवंगिन लट लटकेशा । भइ रोवत योगिन के भेशा ॥
दो० बीरबहूटी भै चलैं, तोहू रहहिं न आंस ।
नयनहिं पंथै न सूझै, लाग्यो भादों मास ॥
तुम गोराबाद्दल खंभ दोऊ । जस रणभारत और न कोऊ ॥
दुखबर्षा अब रही न शाखा । मूलैं पतार स्वर्गे भइ शाखा ॥
ब्यायरही सकलैं महि पूरी । बिरह बेल भइ बाढ़ खजूरी ॥
तेहिं दुख लेत बृक्ष बन बाढ़ी । शीश उघारे रोवहिं ठाढ़ी ॥
भूमि पूर सायरैं दुख पाटा । कौड़ी भई फेर हियैं फाटा ॥
बेहरि हिये खजूरकर बिया। बेहरिनाहिं मोर पाहनैं हिया ॥
पियजेहिं बँद योगिन है धाऊं । हौं बंधूलों पियमकरौंऊँ ॥
दो० सूर्य्य ग्रहण गरासा, कमल न बैठी पाट ।
हुक्म १ जल्द २ लाल ३ जबाहिर ४ खून ५ छाती ६-२१ जुदाई ७
पानी ८ ज़मीन ६-१६-१६ नागिन १० राह ११ नाममंत्री १२ जड़ १३
आसमान १४ सब १५ पेड़ १७ शिर १८ तालाब २० फटना २२ दिल २३
पत्थर २४ छोड़ना २५ तख़्त २६ ॥