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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पद्मावत । २८६

सुनि पद्मावत मंदिर बोलाई । पूछी कौन देश ते आई ॥
तरुणवैस$^{१}$ तोहि छाजन योगू । केहि कारण अस कीन्ह बियोगू$^{२}$ ॥
कहेसि बिरह दुख जान न कोई । बिरहिन जान बिरह जेहि होई ॥
कन्त हमार गयो परदेशा । तेहिकारण हम योगिन भेशा ॥
काकर जिय यौवन औ देहा । जो पिय गयो भयो सब खेहा$^{३}$ ॥
फार पटोरें$^{४}$ कीन्ह मन कन्थाँ$^{५}$ । जहाँ पिय मिलै लेहुँ सो पन्थाँ$^{६}$ ॥
फिरौं करौं चहुँ चक्र पुकारा । जटा परी को शीश$^{७}$ सँभारा ॥
दो० हिरदय$^{८}$ भीतर पिय बसै, मिलै न पूछै काहि ।
सून जगत सब लागै, वह बिन कछू न आहि ॥
श्रवण$^{९}$ छेद में मुद्रों मेला$^{१०}$ । शब्दे$^{११}$ सुनाउँ कहाँ पियगेलो$^{१२}$ ॥
तेहिवियोगैं सिंघी नितपूरी । बारबार किंगरी$^{१४}$ भइ झूरी ॥
को मोहिं ले पियकंठ$^{१५}$ लगावै । परस अधारी बात जनावै ॥
पांवरे$^{१७}$ टूट चलत गा छाला । मन न फेरै तन यौवनबाला ॥
गयौं प्रयाग मिला नहिं पीउ । करवंट लीन्ह दीन्ह बल जीव$^{१८}$ ॥
जाय बनारस जाखौं कयाँ । पारथ्यो पिण्ड नहायों गया ॥
जगन्नाथ चक्रहिं के आय । पुनि सो द्वारका जाय नहाय ॥
दो० जाय केदारा दागतन, तहँ न मिला तनआँकै$^{१९}$ ।
ढूँढ़ि अयोध्या आय फिर, स्वर्गद्वारी झांक ॥
गाउमुखै हरिद्वारै फिर कीन्हों । नगर कोटैं कित रसना दीन्हों ॥
ढूँढूँ बालें नाथ कर टीला । मथुरामथ्योनसोपिय मेला ॥
सूर्यकुण्डँ महँ जाख्यो देहा । बद्री$^{२२}$ मिला न जासों नेहा ॥


पाद-टिप्पणी:
१ नवजवान २ दुख २-१४ वास्ते ३ धूर ४ झारी ५ गुदड़ी ६ राह ७
शिर ८ दिल ६ कान १० चाली ११ आवाज़ १२ जाना १३ शेर १४ नाम
बाजा १५ गले १७ खड़ाऊँ १८ शिरकटाना १६ तप किया २० पता २१ नाम
तीर्थ २२ से २८ तक ॥