पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पद्मावत। २६६
कोई माड़ें जाहिं धरि जूरी। कोई भात परोसहिं पूरी ॥
कोई लै लै आवहिं थारा। कोई परसहिं बावन परकारा ॥
पहिर जो चीरैं परोसहिं आवहिं। दूसरी और बरनै देखरावहिं ॥
वरण वरण पहिरहिं हर फेरा। आव झुंड जस अफसरै केरा ॥
दो० पुनि संधानै बहु आनी, परसहिं बूकाहिं बूक।
करै सँवार गुंसाई, जहां परी कछु चूक ॥
जानहु नखत करहिं सब सेवा। बिन शशि सूरहिं भावन जेवा ॥
बहु परकारै फिरहिं हर फेरें। हेरौं बहुत न पावा हेरें ॥
परी अमूझ सबै तरकारी। लोनी बिनु लोन सब खारी ॥
मण्डछूवहिं आवहिं गड़कांटी। जहां कमल तहँ हाथ न आँटी ॥
मन लाग्यो तेहि कमल की दंडी। भावै नहिं एको कनैहंडी ॥
सो जेवन नहिं जाकर भूखा। तेहि बिन लाग जानु सब रूखा ॥
अनभावत चाखी बैरागी। पञ्चामृत जानहु बिष लागा ॥
दो० बैठ सिंहासन गूँजै, सिंह चरै नहिं घास।
जबलग मिरगैन पावै, भोजन करै उपास ॥
पान लिये दासी चहुँ ओरा। अमृतैं दानी भरे कचूरौ ॥
पानी देहिं कपूरक बासा। सो नहिं पिये दरश कर प्यासा ॥
दरशन पान देयँ तौ जीऊँ। बिन रसना नयनहिं सो पीऊँ ॥
पपिहा बूँद सेवातिह अघा। कौन काज जो बरसै मघा ॥
पुनि लोटा कोंपरं लै आई। कै निराश अब हाथ धुवाई ॥
हाथ जो धोवैं विरहेंको रोरा। सँवरि सँवरि मन हाथ मरोरा ॥
रोटी १ कपड़ा २ रंग ३ परी ४ अचार ५ राजा ६ चांद ७ सूर्य्य ८
बहुत तरह ६ देखना १० तथा पद्मावंत ११ पहुँचना १२ तरकारी १३ बे
चाहना १४ शेर १५ हिरन १६ शरबत १७ कटोरा १८ जबान १६ सिल-
फ़ची आफ्ताया २० सताया २१ ॥
विधि¹मिलावजासोमनलाग। जोरहिं तोर प्रेम कर तागा ॥
दो० हाथ धोय जब बैठो, लीन्ह ऊब के श्वास ।
सँवरा सोई गुसांई, देय निराशहिं आस ॥
भइज्योनार फिरा खँडवॉनी । फिराअ्ररगजाँ कंकहि वानी ॥
नग अमोल सो थारहिं भरे । राजैं सेर्व आन के धरे ॥
बिन्ती कीन्ह घालगयैं पागा । येजगसूर सीवें गुहिलागा ॥
औगुन अश कांप यहिजीऊ । जहां भानु तहँ रहा न सीऊँ ॥
चारहुँ खण्ड भानु अस तपा।जेहिकी दृष्टि¹⁴ रैयनिमसि¹⁵ छिपा॥
औभानुँहिंअस निरमलैकला। दरश जो पावै सो निरमला ॥
कमल भानु देखै पै हँसा । औ भांतेहिं चाहै परकसा ॥
दो० रतैनैश्यामतहँरैंयनिमसिं¹⁷, येरवि²⁰ तिमिरं²¹ सँहार ।
कर सो दृष्टि²⁴ औ कृपा, दिवसैं देह उजियार ॥
सुनबिन्ती²⁶ बेहसाँसुलतानू । सहसैंहि किरणदिपै जसभानूँ ॥
ऐ राजा तुइँ सांच जुड़ावा । भइसो दृष्टिअवसीवैं जुड़ावा ॥
भानु की सेवा जो कर जीव । तेहिमसिकहां कहांतेहिसीवैं ॥
खाउ देश आपन कर सेवा । और देउँ मांडो तोहिं देवा ॥
लीकपषानैं पुरुषैं कर बोला । ध्रुवै सुमेरुँ ऊपर नांहिं डोला ॥
फेर बसावैं दीन्ह नग सूरू । लाभदेखायलीन्हचहिमूरू ॥
हँस हँस बोले टेके कांधा । प्रीतिभुलाय चहै छल बांधा ॥
दो० माया बोल बहुत कर, शाह पान हँस दीन्ह ।
ईश्वर १-२ नाउम्मेद ३ शरवंत ४ अतर ५ नज़र ६ अर्ज़ ७ गर्दन ८
सूर्य ९-११-१३-१७-२२-२६-३१ जाड़ा १०-१२-३०-३२ निगाह १४
रात १५-२० सियाही १६-२१ पाकसाफ़ १८ राजा १६ अंधियारा नाश-
कर२३ अच्छी नज़र २४ दिन २५ अर्ज़ २६ हँसा २७ हज़ार २८ पत्थर ३३
मर्द ३४ नाम नखत ३५ पहाड़ ३६ लालच ३७ जड़ ३८ ॥
पद्मावत । २७१
पहिले रतनैं हाथ कै, चहौं पदारथ लीन्ह ॥
माया मोह विबश भा राजा । शाह खेल शतरंज करसाजा ॥
राजाहै जबलग शिर घामू । हमतुमघड़िकै करहिंबिश्रामू ॥
दर्पन शाह भीतै तहँ लावा । देखों जोह झरोखें आवा ॥
खेलहिं दोऊ शाह औ राजा । शाहक रुख दर्पनरहि साजा ॥
प्रेमक लुब्ध पियादे पाउँ । चलै सौंहिं ताके कहँठाउँ ॥
घोड़ा दै फरजी बँद लावा । जेहिं मुहरा रुखचहै सोपावा ॥
राजा पील देइ शह मांगा । शहँ दै चाहि मैरथ स्वांगा ॥
दो० पीलहि पील देखावा, भयो दुहूँ चौदांत ।
राजा चहै बुर्द भा, शाह चहै शहमात ॥
सूरै देख वै तेरैं दासी । जहँ शशि तहां जाय परकौसी ॥
सुना जो हम देहली सुलतान् । देखों आज तपै जस भानू ॥
ऊंच छत्र ताकर जगमाहां । जग जोहांह सब वहकीछाहां ॥
बैठि सिंहासन गर्वहि गूंजा । एक छत्र चारहुँ खंड धूंजा ॥
निरखि न जायसौंहि वहपाहीं। सबैनवै कै दृष्टि तराहीं ॥
मन माथे वह रूप न दूजा । सबरूपवन्त करहिं वह पूजा ॥
हमअस कसा कसौटी आरसें । तुहूँ देख कस कंचनें पारस ॥
दो० वादशाह देहली कर, कित चितौर महँ आव ।
देख लेहु पद्मावत, जें न रहैं पछताव ॥
विकसै जो कुमुदै कह शशि ठाऊं। विकसा कमल सुनत रबि नाऊं
तथा राजा १ तथा पद्मावत २ एक घड़ी ३ आराम ४ दीवार ५ भरा-
हुआ ६ सामने ७-१८ जगह ८ शाह देके बाज़ी जीतना चाहा ६
मुक़ाबिल १० सूर्य ११-१५-२५ नखत १२ चांद तथा पद्मावत १३-२४ रो-
शनी १४ गरूर १६ देखना १७ निगाह १६ आईना २० सोना २१ खिलना २२
कोकाबेली २३ ॥
२७२ पद्मावत।
भइनिशि¹ शशिधौराहर² चढ़ी। सोरहकिरनजैसिविधि³ गढ़ी॥
बेहँस झरोखें आय सँरेखी। निरखै शाह दर्पनमहँ देखी॥
होतहि दरश परसँ भा लूना। धरती स्वर्ग भयो सब सूना॥
रुख मांगत रुखँ तासों भयो। भा शहमात खेल मिटगयो॥
राजा भेद न जानै झाँपी। भाबिएनारि पवनविनकाँपा॥
राघव कहा किलाग सपोंरी। लै पौढ़ावहिं सेज सँवारी॥
दो० रैनि बीतगइ भोरभा, उठा सूरे तब जाग।
जो देखै शँशि नाहीं, रही कराँ चितलाग॥
भोजन प्रेम सो जानिजोजेवां। सँवरहिंरुचिवासरस केवों॥
दरश देखायजायशँशि छिपी। उठा भानुँ जस योगी तपी॥
राघव चेत शाह पहँ गयो। सूर्य देख कमल विप भयो॥
छत्रपती मन कहां सो पहुँचा। छत्र तुम्हार जगत पर ऊँचा॥
पोटै तुम्हार देवतन पीठी। स्वँगपतालरयनिदिनदीठी²⁰॥
छोहते²¹ पलैं हहिं उघटे रूखा। कोहते²² महिसायँरसंबसूखा॥
सकलैं जगत तुम नावै माथा। सबकर जियन तुम्हारेहाथा॥
दो० दिनननयनलावहुतुम, रयनि भावनहिं जाग।
अबनिचिन्तअससोयं, कहँ विलम्ब असलाग॥
देख एक कौतुकँ हौं रहा। रहअन्तरपैटें पैनहिं अहा॥
सरवैरै एक देख मन सोई। रहापानि अब पानि न होई॥
स्वँग आय धरती महँ छावा। रहा धरति पै धरत न आवा॥
रात १-११ महल २ ईश्वर ३ होशियार ४ देखना ५ पारसपत्थर ६
मुँह ७ छिपा ८ नाम भाट ६ चुर्रीहवा १० सूर्य तथा बादशाह १२-१७
चांद तथा पद्मावत १३-१६ ध्यान १४ कमल १५ तख्त १८ आसमान १६-
२६ निगाह २० मेहरवानी २१ हराहोना २२ गुस्सा २३ तालाब २४-२८
सब २५ तमाशा २६ परदा २७॥
पद्मावत। २७३
तिन्हमहँपुनिइकमन्दिरऊँचा। करने१ अह्रापै करनहिंपहुँचा ॥
तेहि मण्डप मूरत मन देखी। बिनतनबिनजिवजायबिशेखी॥
पूरणचन्द्र२ होय जनु तपी। पारसरूप दरश दै छिपी ॥
अबजहँ चतुर्दशी जिव तहां। भान अमावस पावै कहां ॥
दो० विकसों कमलस्वर्ग निशिं, जनहुँलौंकगाबीज ।
यहू राहुभा मानहिं, राघव मनहिं पतीजै ॥
अति विचित्र देखों सो ठाढ़ी। चितकी चित्र लीन्ह जिव काढ़ी ॥
सिंहलङ्क कुम्भस्थल जोरू। आंकुश नाग महावत मोरू ॥
तेहि ऊपर भा कमल विकासू। फिर अलिलिन्हहुवै परसबासू ॥
दोहुँ खंजनै विच बैठो सुवा। दुइजका चन्द धनुष लै उवा ॥
मिर्ग१४ दिखाय गवन फिरगया। शँशिभा नाग सूर्य्य भा दिया ॥
सुठ ऊँचे देखत वह उचका । दृष्टि पहुँचकर पहुँच न सका ॥
पहुँची भयो दृष्टि गत भई। गहि२० नसका देखत वह गई ॥
दो० राघव हेरंत जो गयो, अच्छत हिये समाध ।
वैहँ तन राघव बाघभा, सके न कै अपराध ॥
राघव सुनत शीशें भुइँ धरा । युग युग राज भानेंकी किरा ॥
वही किरन वह रूप विशेखी। निश्चय तुम पद्मावत देखी ॥
केहरलङ्क कुम्भस्थल हिया। ग्रीवै मयूर अलंक रवि दिया ॥
कमल बदन श्रौ वाससमीं । खंजन नयन नासिका कीरू ॥
हाथ १ चौदहीं रातका चांद २-३ खिलना ४-११ आसमान ५ रात ६
सूर्य ७-२४-२६ सुरझाना ८ चीता की कमर ९-२५ हाथी १०-२६ मँवरा १२
फूल १३ ममोला १४-३१ हिरन १५ चांद १६ निगाह १७ हाथ १८ देखते
ही चाहा कि आप को पहुँचाऊँ १९ पकड़ना २० देखना २१ तदबीर काम
न आई शेरकी तरह गुस्सा किया २२ शिर २३ गर्दन २७ बाल २८
हवा ३० नाक तोता की ३२ ॥
२७४ पद्मावत ।
भौंहधनुषशशि दुइज ललाटू । सब शनिन ऊपर वह पाटू ॥
सोई मिरगं देखाय जो गयो । वेनी नाग दिया चितभयो ॥
दरपण महँ देखी परछाईं । सोमूरति भीतर जिव नाहीं ॥
दो० सबै श्रृंगार बनी धनि, अब सोलीमाँत कीज ।
अलकँजोलटकीअधरंपर, सोगहि केसरलीज ॥
खण्ड उन्तालीसवां क़ैद होना राजा
रतनसेन का ॥
मीते भा मांगा वेग बेवानू । चला सूरै सँवरा अस्थानू ॥
चलंत पंथै राखा जो पाऊं । कहांरहेथिरें चलत बैठाऊं ॥
पथिकै कहँ कहवां ससताई । पंथै चलै तब पंथ सेराई ॥
छल कीजे दल जहां न आंटों । लीजे फूल टारके कांटा ॥
बहुत मया सुन राजा फूला । चला साथ पहुँचावे भूला ॥
शाह हेत राजा सों बांधा । वात हिलाय लीन्ह गहि कांधा ॥
घिव मँधु सान दीन्ह रससोई । जो मुँह मीठ पेट विष होई ॥
दो० अमिय बचन औ माया, को न मुयो रस भीज ।
शत्रु मरै अमृत जो, तेहि विष काहे दीज ॥
चांद घरहि जो सूरज आवा । होयसो अलोपं अमावसपावा ॥
पूछहिंन खंतेँ मलीनसोमोती । सोरहकला न एकोज्योती ॥
चांद गहन आगाहिं जनावा । राज भूलगहिशाहचलावा ॥
पहिले पँवरै नांघ सो आई । ठाढ़े भये राज पहिराई ॥
चांद १ माथा २ तख्त ३ हिरन ४ चोटी ५ पद्मावत ६-२७ अक़िल ७
ज़ुल्फ़ ८ होंठ ६ पकड़ना १० दोस्त ११ सवारी १२ बादशाह १३ मकान १४
राह १५-१६ क़ायम १६ मुसाफ़िर १७-१८ पहुँचना २० पकड़ना २१ श-
हद २२ मीठीवात २३ दुश्मन २४ छिपजाना २५ तथा सखी २६ ख़बर २८
दरवाज़ा २६ ॥
पद्मावत । २७५
सौ तुषार तीस गज पावा । दुन्दुभिऔचौ घोड़ीदेवावा ॥
दूजे पँवर दिया असवारा । तीजे पँवर नग दीन्ह अपारा ॥
चौथे पँवरदै द्रव्य करोरी । पाँचयें दुइ हीरा की जोरी ॥
दो० छठयें पँवर माड़ो दियो, सतयें दीन्ह चँदेर ।
सात पँवर नांघत नृपति, लेगयों बांध गरेर ॥
यहिजग बहुत नदीजलजोड़ा। कौन पारभा कौन न बूड़ा ॥
कौन अन्धभा आग न देखा। कौन भयो डीठार सरेखां ॥
व्याध भई राजा कहँ माया। तजकैलास परी भुइँ पायाँ ॥
जेहिकारण गढ़कीन्ह अँगूठी। कित छोड़े जो आवै सूठी ॥
शत्रुहि कोउ पाव जो बांधे। छोड़ आपकहँ करै वियोंधे ॥
चारा मेल धरा जस माछू। जलसे विकसमरै जसकाँछू ॥
शत्रुहि नांग पेटारी मूँदा । बांधामिरगै पैगनहिं खूँदा ॥
दो० राजा धरा आनके, तन पहिरावा लोह ।
ऐसो लोह सोपहिरे, चेतैं श्यामकी ओह ॥
पांयन गाढ़ी बेड़ी परी। सांकर ग्रीवैं हाथ हथकड़ी ॥
औ घर बांध मँजूषा मेला। ऐसो शत्रु जनु होयदुहेलाँ ॥
सुनि चितौरमहँ पड़ा बखानौँ। देश देश चारहुँदिशजाना ॥
आजनरायण फिर जग बूँदौँ। आजसोसिंहँ मँजूषौ मूँदा ॥
आज खँसे रावण दशमाथा। आजकान्हेँ कालीफएनाथा॥
आजहिं प्राणकंस कर ढीला। आजमीनैं शंखासुरै लीला ॥
घोड़ा १ हाथी २ डंका ३ बग्धी ४ राजा ५ होशियार ६ जिसलिये ७
घेरना ८ दुश्मन ६-१२ दुख १० कछुवा ११ पैरबँधा हिरन नहीं भागता १३
ग़फ़लतका फल उठाये १४ गर्दन १५ पिंजरा १६-२१ दुखी १७ बयान १८
सख़्ती १६ शेर २० गिरना २२ श्रीकृष्णजी २३ मछली २४ नामदैत्य २५ ॥
२७६ पद्मावत ।
आज परे पाण्डवेँ बँद माहां। आज दुशासनँ उतरी वाहां॥
दो० आज धरा बलराजा, मेला बांध पतार।
आज सूरे दिनअथवा, भाचितौरअँधियार॥
देव सुलेमाँ के बँद परा। जहँलग देव सबहिंसतह्रा॥
शाहलीन्ह गहिकीन्ह पयानाँ। जोजहँशत्रुसोतहांबिलाना॥
खुरासानँ औ डरा हरेवै। कांपा बिदुर्र धरा यस देव॥
बंध उदयगिरि १० धौलौगिरी। कांपी सृष्टि दुहाई फिरी॥
उवा सूर भइ सामहि करा। पालाफूट पानि होय ढरा॥
डँडवी दांड दीन्ह जहँ ताई। आय दण्डवत कीन्ह सवाई॥
द्वंददांडे सब स्वर्गहि गई। भूमि जो डोली इस्स्थिर्र भई॥
दो० वादशाह देहली महँ, आय बैठ सुख पोंटँ।
जेहिंजेहिंशीशँउठावा, धरती धरी ललाटँ॥
हबँशी बन्दवान जिवबधौ। तेहि सौंपा राजा अगदहौँ॥
पीनि पवन कहँ आश करेई। सो जियवधिकैंसांसवहुदेई॥
मांगत पान आग लै धावा। मुँगरी एक आन शिरलाव॥
पानी पवन तुइँ पियासोपिया। अबको आन देय पनिया॥
तब चितौर जिय रहा न तोरे। वादशाह हैं शिर पर मोरे॥
जोहि हँकारेही२४ उठ चलना। सोकितकरोहय कैंरमलना॥
करै सो मीत गाढ़ बँद जहां। पान फूल पहुँचावै तहां॥
दो० जलँ अंजलमहँ सोवा, समुद्र न सँवराजाग।
राजा युधिष्ठिर १ नाम बहादुर २ सूर्य ३ नामबादशाह ४ कूच ५
दुश्मन ६ नाममुल्क ७ से ११ तक। दुनिया १२ आवाज़मुनादी १३ आस-
मान १४ ज़मीन १५ क़ायम १६ तख़्त १७ शिर १८ माथा १९ हबशी
दरोगा क़ैदखाना २० जल्लाद २१ जलाहुवा २२ जानमारनेवाले २३ बो-
लाना २४ हाथ २५ पानीमहँ पियासा २६ ॥
पद्मावत । २७७
अबधरकाढ़ामच्छज्यों, पानी मांगत आग॥
पुनिचल दुइजने पूछन धाये। वै शठ दग्धै आय देखराये॥
तुइँ मेरिपुरी न कबहुं देखी। हाड़ जो बिथरे देखन लेखी॥
जानी नहिं कि होब अस मुहूँ। खोजे खोज न पावब कहूं॥
अब हम उतरें देहुरे देवा। कौने गर्व न मानी सेवा॥
तुइँ अस बहुत गाड़खन मूंदी। बहुर न निकसबारेहोयखूंदी॥
जो जस हँसै सो तैसे रोवा। खेलै हँसै अभी भुइँ सोवा॥
जस अपने मुहँ काढ़ धुवां। चाहेसि परा नरक के कुवां॥
दो० जरेसि मरेसि अब बांधा, तैसो लाग तोहिदोष।
अबहुं मांग पद्मिनी, जो चाहेसिभा मोर्ष॥
पूँछहिं बहुत न बोला राजा। लीन्हेसि जियेमीर्च मनसाजा॥
खनं गड़वा चरनहिं लै राखा। नितउठ दग्धैं होयनौलाखा॥
ठाँवै सो सांकर औ अँधियारा। दूसर करवट लेइ न पारा॥
पीछे सांप आय तहँ मेली। बांका आन छुवावहिं हेली॥
धरहिं सँदौसी छूटै नारी। रात दिवसै दुखपहुँचै भारी॥
जो दुखकठिन न सहै पहारू। सोअँगवाँ मानुषशिरभारू॥
जो शिर परै आय सो सहै। कछु न बिसाय काहसों कहै॥
दो० दुख जारै दुख भूजै, दुख खोवै सब लाज।
काजैहि चाह अधिकदुख, दुखीजानजेहिबाज॥
पद्मावत बिन कंत दुहेली। बिनजलकमलसूखजसंबेली॥
गाढ़ी प्रीति सो मोसों लाई। देहिलीजायनिचितहोयछाई॥
आदमी १ आग २ यमपुरी ३ जंघाच ४ गहूर ५ फेर ६ पाप ७ छूटना
क़ैदसे ८ मौत ६ तंगपिंजरा में क़ैद किया १० जलाना ११ जगह १२
डांग १३ संसी १४ दिन १५ भारी १६ उठाना १७ दुखकों चह जाने जिस
पर पड़े १८ दुखी १६॥
२७८ पद्मावत ।
कोउ न बहुरा पुनि हर देशू । केहि पूछहुँ को कहै सँदेशू ॥
जो कोइ जाय तहां कर होई । जो आवे कुछ जान न सोई ॥
अगम पंथे पिय तहां सिधावा । जोरे गयो सो बहुर न आवां ॥
कुवांदार जल जैसो बिलोवा । डोल भरा नयनहिं वन रोवा ॥
लेजुरि भई नांहिं बिन तोहीं । कुवां परीधर काढेसिमोही ॥
दो० नयन डोल भर ढारै, हिये न आग बुझाय ।
घड़ी घड़ी जियावै, घड़ी घड़ी जिव जाय ॥
नीर गँभीरं कहां हो पिया । तुम बिन फाटै सरवर हियाँ ॥
गयो हेराय बिरह के हाथा । चलत सरोवर लीन्हेन साथा ॥
चरत जो पंखे केलि कर नीरा । नोर कठिन कोउ आवन तीरा ॥
कमल सूख पखुरी बेहिरानी । गलगल कै मिल लौर हेरानी ॥
बिरह रेत कंचन तन लावा । चून चून कै खेह मिलावा ॥
कनकैकै जो कनकनै है बेहिरोई । पिय पै छार समेटो आई ॥
बिरह पवन यहि छार शरीरू । छारहि आन मिलावहु नीरू ॥
दो० अबहुँ जियाविहु के मया, बिथुरी छार समेट ।
नइकायौ अवतरै नव, दर्श तुम्हारे भेट ॥
नयन सीप मोती तस आशू । तंतैं ततपरहिं करत न नाशू ॥
पदक पदारथ पद्मिन नारी । पिय बिन भइ कौड़ी बेरेबारी ॥
सँग ले गयो रतन सब ज्योती । कंचन क्या कांच भइ पोती ॥
बूड़त हों दुख दग्धे गँभीरी । तुम बिन कंत लाव को तीरी ॥
मुश्किल राह १ लौट २ पद्मावत ३ रस्सी ४ खाविन्द ५ छाती ६-६
पानी गहिरा ७ तालाब ८-१० जानवर परिन्द ११ अलग १२-१६ धूर १३-
१६-२० मिलना १४-१५ सोना १७-२७ रेज़ारेज़ा १८ पानी २१ बदन २२
पैदा होना २३ गर्म २४ लाल जवाहर २५ मोल २६ आगमारी २८
किनारा २६ ॥
हिये³ विरह होय चढ़ापहारू। जल यौवन सहसकैन भारू॥
जलमहँ आगिनसोजानि विछूता। पांहन जरहिं होहिं सब चूना ॥
कौने यतन कंत तुम पाऊँ। आज आगहौं जरत बुझाऊँ॥
दो० कौन खण्ड हौं हेरों³, कहां वन्धु हौं नांहिं।
हेरे कतहूँ न पाऊँ, बसै तु हिरदय मांह ॥
नागमती पियपिय रत लागी। निशिदिन तपै मच्छ ज्यों आगी
भँवर भुजंग कहां हो पिया। हम ठेगाँ तुम कानन किया॥
भूल न जाहि कमल के पाहां। बांधत बिलंब न लागैनौहां ॥
कहां सो सूर पास हौं जाऊँ। वींधा भँवर छोर के लाऊँ ॥
कहां जाऊँ को कहै संदेशा। जाऊँ सो तहँ योगिन के भेशा॥
फार पटोरे सो पहिरौं कंथों। जो मोहिं कोउ देखावै पंथों॥
वह पंथे पलकन जाऊँ बुहारी। शीश चरण के चलौं सिधारी ॥
दो० को गुरु अगवा होय सखि, मोहि लावै पंथ मांह ।
तन मन धन बल बल करों, जो रे मिलावै नांहैं॥
कै कै कारण रोवै बाला। जनु टूटहिं मोतिन के माला ॥
रोवत भई न श्वास सँभारा। नयन चुवहिं जनु उरती धारा ॥
जाकर रतन परे पर हाथा। सो अनाथ किमि जीवै नाथा॥
पांचौं रतन वह रतनहि लागी। बेगैं आव पिय रतन सभागी ॥
रही न ज्योति नयन भये खीनी। श्रवण न सुनैं बैनैं तुम लीनी॥
रसनौं रस नहिं एको भावा। नासिकैं और वास नहिं आवा॥
तचत चतुम बिन अंगैं मोहि लागी। पांचौं²⁴ दग्धै विरह अब जागी॥
छाती १ पत्थर २ देखना ३ कैद ४ खाविन्द ५-८-१५ रात ६
दुश्मनी ७ सूर्य ६ सारी १० गुदड़ी ११ राह १२-१३ शिर १४ ताक़त
देखने, सुनने, सूंघने, बोलने, छूने की १६-२४ जल्द १७ रोशनी कम १८
कान १६ आवाज़ २० ज़बान २१ नाक २२ वदन २३ आग २५ ॥
२८० . पद्मावत ।
दो० बिरह सो जार भस्मकै, चहै उड़ावा खेहं ।
आय सो धन पियमिलवे, करलेवे नई नेह ॥
पियबिन व्याकुल व्यापी नागाँ । बिरहा तपनश्याम भये कागा ॥
पवन पानि कहँ शीतल पीउ । जेहि देखे पलुहै तनजीउ ॥
कहँ सो बास मलयौगिरि नाहाँ । जेहि कल परत देत गलवाहा ॥
पद्मिनि ठगनी भइ कित साधा । जेहिते रतन परा पर हाथा ॥
होय बसंत आवहु पियकेसर । देखै फिर फूलै नागेसरं ॥
तुमबिन नाँह रहे हियँ तचा । अब नहिं बिरह गडुरपै बचा ॥
अब अँधियार परामंसि लागी । तुमबिन कौन बुझावै आगि ॥
दो० नयनश्रवणं रसरसनौ, सबै खीनं भये नाँहँ ।
कौन सो दिन जेहि भेंटके, आय करै सुखछाँह ॥
कुंभलनीरेँ राय देवपालू । राजा केर शत्रुँ हियेंशालू ॥
उनपै सुनी कि राजा बांधा । पाछल बैरसँवर छल सांधा ॥
शत्रु शालैँ तब न्योरे सोय । जो घर आव शत्रुँकी जोय ॥
दूती एक बृद्ध तेहि ठाँऊँ । ब्राह्मण जाति कुमोदन नाऊँ ॥
वह हँकौरं के बीरा दीन्हा । तोरे बल मैं बलजिव कीन्हा ॥
तुइँ कुमदनी कमल के नेरे । स्वर्ग जो चाँद बसै तोहि हेरे ॥
चितोर महँ जो पद्मिन रानी । करवलछल सो दै मुहिं आनी ॥
दो० रूप जगत मनमोहन, जेहि पद्मावत नाऊँ ।
कोटि द्रव्य तुहिं देहों, आन करेसि इकठाउँ ॥
कुमदिन कहा देखहों सोहों । मानुष कहा देवता मोहों ॥
. धूर १ रानी नागमती २-६ हरा होना ३ चन्दन ४ खाविन्द ५-७-१३
दिल ८ सियाही ६ कान १० ज़बान ११ कमज़ोर १२ नाममुल्क १४
दुश्मन १५-१८ दिल दुख देनेवाला १६ दुश्मन दुख देनेवालेने चाहा किं
जैसे बनपड़े १७ जगह १८ बुलाया २० आसमान २१ नज़र २२ ॥
पद्मावत। २८१
जस कामरू चमारिन लोना । कौनहिं छल पढ़त कै टोना ॥
विषहर नाचहिं पढ़तें मारी । औथर मूंदे घाल पेटारी ॥
बृक्षै चलैं पढ़तें के बोला । नदी उलटवहि परबत डोला ॥
पढ़त हरि पण्डित मतिघेरी । और को अन्धगूं ग औबहिरी ॥
पढ़त ऐसे देवतहिं लागा । मानुष का पढ़त सों भागा ॥
पढ़त कै हठ काढत पानी । कहां जाय पद्मावत रानी ॥
दो० दूती बहुत पैंचे कै बोली पढ़त बोल ।
जाकर सत सुमेरु है, लागे जगत न डोल ॥
दूती बहुत पकावन सांधी । मोतिन लड्डू खरोरा बांधी ॥
माठ पेराकें पेठे पापर । पहिर बूझ दूती के कापर ॥
लै पूरी भरडाल अनूती । चितौर चली पैंचैं कै दूती ॥
वृद्ध बैस जो बांधे पाऊं । कहां सो यौवन कित बोसाऊं ॥
तन बूढ़ा मन बूढ़ न होई । बल न रहा लालच जें होई ॥
कहां सो रूप जगंत सबरातौ । कहां सो गर्व हस्ति जसमाता ॥
कहां सो तीर्ष नयन तनठाढ़ा । सबै मार यौवन पुनि काढ़ा ॥
दो० मुहम्मद वृद्ध जो नइचलै, काह चलै भुंइ टोइ ।
यौवन रतन हेरान है, संकै धरती महँ होय ॥
आय कुमोदनि चितौर चढ़ी । जोहन मोहन पढ़त पढ़ी ॥
पूछ लीह रनवास बरोठा । पैठ पँवरै भीतर बहु कोठा ॥
जहँ पद्मावत शशि उजियारी । लै दूती पकेवान उतारी ॥
हाथ पसार धाय के भेंटी । चीन्ही नहिं राजा की बेटी ॥
सांप १ मन्त्र २-४ पेड़ ३ क़ौलमज़बूत ५-८ ईमान, ६ मोतीचूरके ल-
डुआ ७ खरीदार ६ दुनिया १० लाल ११ शहर १२ हाथी १३ कट ली १४
शायद १५ बहुत तरह के मन्त्र १६ दरवाज़ा १७ चांद १८ ॥
२८२ पद्मावत।
हौं ब्राह्मण जेहिकुमुदिनिनाऊँ। हम तुमउपँजी एकहि ठाँऊँ॥
नाऊँ पितौ कर दूवे वेनी। सोइ पुरोहित गन्धर्पसेनी॥
तुम वारी तब सिंहल दीपा। लीन्हेँ दूध पियायों सीपा॥
दो० ठाँउँ कीन्ह मैं दूसर, कम्भलनी रहि आय।
सुनितुमकहूँ चित्तौर महँ, कहूँ कि भेटों जाय॥
सुनि निरुचै नैहरकी गोई। गरे लाग पद्मावत रोई॥
नयनगगनँ रवि बिन अँधियारो। शशिसुखआंशु टूटजनु तारे॥
जग अँधियार गहनदिनपरा। कवलगशैशिनखतहितसमरा॥
माय बाप कित जन्मी वारी। ग्रीवं तोड़ कित जन्म नमारी॥
कित विवाह दुखदीन्ह दुहेलाँ। चितौर पंथ कन्त बंद मेला॥
अबयहिजियनचाहस लमरना। अठो पहार जन्म दुख भरना॥
निकसनजाय निलजयहजीउ। देखों मंदिर सून बँद पीउ॥
दो० कुहुकजोरोवे शशिनखतँ, नयनहिंरौंतचकोर।
अबहूँ बोले तहँ कुहुक, चातृकँ कोकिल मोर॥
कुमुदिन कण्ठलाग सुठ रोई। पुनि लै रोग डारे मुख धोई॥
तुइँशशिरूपजगतउजियारी। मुखनझांपनिशिँ होयअँधियारी
सुनचकोर कोकिल दुखदुखी। घुँघची भई नयन करमुखी॥
केतो धाय मरै कोई बाटा। सोइपावै जो लिखा लिलाटाँ॥
जोविधि लिखाआन नहिंहोई। कित धावै कित रोवै कोई॥
कितको इच्छाँ कर औ पूजा। जो विधिलिखाहोयनहिं दूजा॥
पैदाहोना १ जगह २ बाप ३ पद्मावत का बाप ४ दूसरा खाविन्द ५
यक़ीन ६ गुइयां ७ आसमान ८ सूर्य ९ चांद १०-११-२३ गर्दन १२ भारी १३
राह १४ खाविन्द १५ क़ैद १६ चांद तथा पद्मावत १७ तथा सखी १८
लाल १९ पपीहा २० नामदूती २१ आफ़ताब २२ रात २४ माथा २५
ईश्वर २६ चाहना २७॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण देवनागरी पाठ पंक्तिबद्ध रूप में दिया गया है:
पद्मावत । २८३
जेते कुमुदिनि बयन करेई। तस पद्मावत उत्तर न देई॥
दो० सेंदुर चीर मैलतस, सूख रही तस भूल।
जेहि शृंगार पियतेंजिगया, जन्म न पहिरे फूल॥
तब पकवान उघारा दूती। पद्मावत नहिं छुई अछूती॥
मोहिं अपने पियकेर खँभारू। पान फूल कस होय अहारू॥
मोकहँ फूल भये जस कांटी। बांटि देहु जो चाहेसि बांटी॥
रतनछुवे जेहि हाथहिं सेती। औ न छुवों सो हाथ सकेती॥
दमक रङ्गभय हाथ मँजीठी। मुक्तौं लेउँ पै घुँघची दीठी॥
नयन करसुखी राती काया। मोती होहिं घुँघची जेहि छाया॥
असके ओछ नयन हत्यारे। देखतगा पिउ गँहे न पारे॥
दो० कातोर छुवों पकवान मैं, गुड़ कडुवा घिउ रूख।
जेहिमिलाहोतसवाद रस, लै पिय गयो सुभूख॥
कुमुदिन रही कमलके पासा। बैरी सूर्य चाँदकी आसा॥
वह कुँमलान रही भै चूरू। बिकसै रैनि वातहिंकरभोरू॥
कसतुइँौरिरिहेसि कुँभलानी। सूख बेल जस पाव न पानी॥
अबहीं कमल कली तुम बारी। कोमल बैस उठत पौनोंरी॥
बेनी तोर मैल शिर रूखी। सरवर मांह रहेसि कस सूखी॥
पान बेल विधि क्यौजंमाई। सींचत रही तोह पलहाँई॥
कर शृंगार मुख फूल तँबोला। बैठ सिंहासन झूल हिंडोला॥
दो० हार चीर नित पहिरो, शिरकी करो सँभार।
भोगआनदिनदशलिये, यौवन गये न बौरे॥
..नामछूती १-१०. वात २ जवाब ३ छोड़ना ४ दुख ५ लाख ६ मोती ७
लालवदन ८ पकड़ न सके ६ तथा राजा ११ सुरखई हुई १२ खिलना १३
रात १४ लड़की १५ मुलायसउमर १६ छाती उठती हुई १७ चोटी १८
तालाब १६ ईश्वर २० वदन २१ शरीर २२ वस्त्र २३॥
२८४ पद्मावत ।
बिहँसजोकुमुदिनियौवनकहा । कमल न बिकसा सम्पुटरहा ॥
ऐ कुमुदिनि यौवन तेहिमाहां । जोआछे पियंका सुखछाहां ॥
जाकर छत्र सो बाहेर छावा । सो उजार घर कौन बसावा ॥
अहा जो राजा रतन अँजूरोँ । केहकसिंहासनकेहक पटोरोँ ॥
को पलंग को पौढ़ै माँढ़े । सोवनहार परा बँद गाढ़े ॥
चहुँदिशि यह घर भा अँधियारा । सब शृंगारलै साथ सिधारा ॥
कार्यां बेल जान तब जामी । सींचनहार आव घरस्वामी ॥
दो० तौलहि रहों झुरानी, जौलहि आवसो कन्तँ ।
यही फूल यह सेंदुर, होय सो उठै वसन्त ॥
जन तुइँ बाँरिकरेसि असजीउ । जौलहि यौवन तौलहिपीउ ॥
पुरुषं संग आपन कहु केरा । एक कुहाय दुसर सों हेरोँ ॥
यौवन जल दिनदिनजसघटा । भँवर छिपान हंस परगटोँ ॥
शुभ्रै सरोवर जौलहि नीरों । बहु आदर पंखी बहु तीरों ॥
नीरेँ घटे पुनि पूछ न कोई । परसैँजोलीजहाथरहि सोई ॥
जबलगकालिंदेँ होय बिरौसी । पुनिसुरसरिहोयसमुद्रपरासी ॥
यौवन भँवर फूल तन तोरा । वर्ध पूँछ जस हाथ मरोरा ॥
दो० यौवनैं कृष्णतन करेंनेँ, मयाँ गोतनहिं साथ ।
छलकै जाय हिवानपैँ २४, धनुषैं छांड़इहाथ ॥
जो पिय रतनसेन मोर राजा । विनपिय यौवन कौनेकाजा ॥
जो नहिंजिव तो यौवन कहे । विन जिव यौवन काहसोअहे ॥
खिलना १ रोशनी २ कपड़ा ३ मोढ़ा ४ बदन ५ खाविन्द ६-७ लड़की=
जवानी ८ मर्द १० देखना ११ ज़ाहिर १२ भराहुआ तालाब १३ पानी १४-
१६ किनारा १५ मुख १७-१८ यमुना तथा जवानी १८ गंगा तथा
बुढ़ापा २० जवानी २१ नाम राजा दानी २२ मुहब्बत २३ तीर २४
कमान २५ ॥
पद्मावत । २८५
जो जिव तौ यहि यौवन भला । आपहि जैसा करै निरमलो ॥
कुलकरपुरुषै सिंहै जेहि केरा । तेहिथलें कैसिसियार बसेरा ॥
हियों फाड़ कूकुर तेहि केरा । सिंहै तजि सियार मुख हेरा ॥
यौवन नीर घटेका घटा । सतँके बेर न जाय हियेँ फटा ॥
सघनं मेघहै श्यामं बरीसहिं । यौवन नयेतरंवरे है दीसहिं ॥
दो० रावणपाप जो जिवधरा, दोउ जगत मुँहकार ।
राम शरण जो मन धरा, ताहि छलै को पार ॥
कित पावसि पुनि यौवनरातोँ । मैमँतेचढ़ा श्यामशिरछाता ॥
यौवन बिना वृद्धि हो नाउँ । बिन यौवन थाकै सब ठाउँ ॥
यौवन हेरत मिलै न हेरा । तेहिपुनि जाहिंकरहिंनहिंफेरा॥
अहहिजोकेशनरंगभवँरजोबसा।पुनिबकँहोहिजगतसबहँसा॥
सेंवर सेचन चेत कर सुवा । पुनि पछतास अंतहो भुवा ॥
रूप तोर जग ऊपर लोनों । यहि यौवनपाहुनजलसोना॥
भोग विलास केर यह बेरा । मानलेहु पुनिको केहिकेरा ॥
दो० उठत कोप जसतरवरैं, तसयौवन तोहिरातँ ।
तौलह रङ्ग लहो रच, पुनि सो पियरहो पात ॥
कुँमुदिनि बैनैं सुनतही जरी । पद्मिनि हियेँ आगजनुपरी ॥
रँग ताकर हौं जारों रचा । आपन तर्जै जो पराये लचा ॥
दूसर करै जाय दुइँ बाटा । राजा दुइ न होहिं इकपाटाँ ॥
जेहि जिय प्रेमप्रीतिदृढ़ होई । सुख सुहाग सों बैठौ सोई ॥
साफ़ १ खाविन्द ब्याहाहुवा २ शेर ३ जगह ४ छाती ५-६ देखना ६
पानी ७ ईमान ८ बादल १० खाविन्द ११ पेड़ १२-१६ लाल १३-२०
मस्त १४ मुक़ाम १५ सांप १६ बगुला १७ ख़ूबसूरत १८ नामदूती २१
बात २२ दिल २३ छोड़ना २४ दूसर राह तथा नरक २५ तख़्त २६
मज़बूत २७ ॥
२८६ पद्मावत ।
यौवन जाउ जाउ सो भँवरा । पियाकी प्रीति न जाय जो सँवरा ॥
यहिजग जो पियकरहिंनफेरा। वहजगमिलहिंजोदिनदिनमेरा ॥
यौवन मोर रतन जहँ पीउ । वलें सोपियपर यौवन जीव ॥
दो० भरथँरि विछोहैं पिंगला, आहकरत जिवदीन्ह ।
हों पापिन जो जियतहों, यही दोर्ष हम कीन्ह ॥
पद्मावत सो कौन रसोई । जहाँ प्रकारँ दूसर नहिं होई ॥
रस दूसर जेहि जीभहि बैठा । सो जानें रस खटा औ मीठा ॥
भँवर बास बहु फूलहिं लेई । फूल बास बहु भँवर न देई ॥
तुइँ रस पुरुष न दूसर पावा । तेहिजाना जेहिलीन्हपरावा॥
इक चुल्लू रसअर नहिं हियाँ । जौलहि नहिं फिर दूसर पिया॥
तोर यौवन जस समुद्र हिलोरा । देख देख जिय बूडै मोरा ॥
रंग और नहिं पाई वैसे । जन्में और तुइँ पावत कैसे ॥
दो० देखधनुष तोर नयना, मोहिलागा विष वान ।
विहँसै कमल जो मानै, सँवरै मिलाऊँ आन ॥
कुमुंदिनि तुइँ बैरिन नहिं धाई । मोहिं मसि बोलछलों वेसिआई ॥
निरमलै जगतनीरे करनामा । जो मसि परै होयसो श्यामाँ ॥
जहँवाँ धर्म पाप नहिं दीसा । कनकें सुहागमां भजससीसा ॥
जो मसि परै होय शशिकारी । सोहँसलाय देहेसिमोहिं गारी ॥
कापर महँ न छूट मसि अंकू । सोमसिलाय मोहिंदे सकलंकू ॥
श्याम भँवर मोर सूरूज करा । और जो भँवर श्याममसिभरा ॥
कमल भँवर रवि देखै आंखी । चन्दन पास न बैठै माखी ॥
·मुलाक़ात १ कुरबान २ नामराजा ३ जुदाई ४ नामरानी ५ पाप ६ दुइ-
तरह ७ मज़ा ८ मर्द ६ दिल १० तथा बुढ़ापा ११ हँसना १२ तथा दूसरा
खाविन्द १३ नामदूती १४ कारिख १५ दग़ा १६ पाकसाफ़ १७ पानी १८
सियाही १६ काला २० सोना २१ चांद २२ दाग़ २३ ऐब २४ सूर्य २५ ॥
। पद्मावत । २८७
दो० स्याम समुद्र मोर निरमले, रतनसेन जग सेने।
दूसर सरै जो कहावै, सो बिलाय जस फेन॥
पद्मिनिपुनिमसि बोल न बैनों। सों मसि देख दुहूँ तोर नयना॥
मसि श्रृंगार सब काजर बोला। मसक बुंद तिल सों हिंक पोलाँ॥
लोनाँ सोई जहां मसि रेखा। मसि पुतरिन तेहि से जग देखा॥
जो मसि घाल नयन दुहुँ लीन्हीं। सो मसि फेर जाय नहिं कीन्हीं॥
मसि मुद्रौ दुइ कुर्च उपराहीं। मसि भँवर जस कमल भंवाहीँ॥
मसि केशंहि मसि भौंह उरेहीं। मसि बिन दशन न शोभ न हिं देहीं॥
सो कस श्वेते जहाँ मसि नाहीं। सो कस पिंड़े न जहँ परछाहीं॥
दो० अस देवपाल राउ तस, छत्रधरा शिर फेर।
चितौर राज बिसरगा, गयो जो कुंभले नेर॥
सुन देवपाल जो कुंभल नेरी। पंकज नयन भौंह धने फेरी॥
शत्रु मोर पिय कर देवपालू। सो कित पूच सिंह सरै भालू॥
दुखन भरा तन जे तन केशा। तेहक संदेश सुनावसि बेश्या॥
सोन नदी अस मोर पिय गरवा। पाहन होय परै जो हरवाँ॥
जेहि ऊपर अस गरुवा पीउ। सो कस डोलाये डोलै जीउ॥
फेरत नयन चीर सो छूटी। भइ कूटन कुटनी तस कूटी॥
नाक कान काटी मैंसिलाई। मूड मूड़के गदहे चढ़ाई॥
दो० मुहमद गरू जो विधि लिखी, का कोई तेहि फूँक।
जेहिक भार जग थिर रहा, उड़ेन पवन के झूँक॥
पाकसाफ़ १ दुनिया का देखनेवाला २ बराबरी ३ बात ४ गाल ५
खूबसूरत ६ छाप ७ छाती ८ बाल ६ दांत १० सफ़ेद ११ वदन १२ नाम
मुल्क १३ कमल १४ पद्मावत १५ दुश्मन १६ शेरकी बराबरी १७ रीड़ १८
पत्थर १६ बहिजाना २० लहँगा २१ सियाही २२ ईश्वर २३ क़ायम २४॥
२८८ पद्मावत ।
रानी धर्म सारे पुनि साजा । बन्द मोष जेहिं पावहिं राजा ॥
जहँ तक परदेशी चलिआवा । अन्नदान औ पानि पियावा ॥
योगी यती आव जित कंथी । पूछी पियाजान कोउ पंथी ॥
दान जो देत बांह भइ ऊँची । जायशाहपहँ बात जो पहुँची ॥
पातुरिकहुतयोग सु आंगी । शाहैं उघारे हत वह मांगी ॥
योगिनवेष वियोगिन कीन्हीं । सुनके शब्द मोलततकीन्हीं ॥
पद्मिनिपहँ पठईकर योगिन । वेगँआनकरविरहवियोगिन ॥
दो० चित्र कला मन रोहन, परकाया परवेश ।
आयचढ़ी चितौरगढ़, होययोगिनकरभेष ॥
खण्ड चालीसवां वेश्यागमन ॥
मांगत राज वार चल आई । फेर चेरी यह बात जनाई ॥
योगिन एक वारे है कोई । मांगै जैसि वियोगिनि होई ॥
अवहीं नवयौवन तपलीन्हीं । फार पटोरीं कन्थौ कीन्हीं ॥
विरह विभूत जटा वैरागी । छाला कांध जांप कँठलागी ॥
मुद्रैं श्रवणैं नहीं थिरै जीउ । तन त्रिशूल आधारी पीउ ॥
छाता छाँह धूप जनु मरै । पांयन पँवरी सुभुल जरै ॥
भैंरी शब्द धँधारी करा । जरै सो ठाँउ जहाँ पैंग धरा ॥
दो० किंगरी गहे वियोग बजावे, वारहि वारै सुनाउ ।
नयनचक्रचहुँदिशि निरखि, धौंदरशनकबपाउ ॥
खैरातखाना १ बेषवाले २ मुसाफिर ३ मकार ४ शाह ने बुलाया ५
पद्मावत को ले. व इनाम पावेगी ६ जल्द ७ तजबीह ८ दरवाजा ९-११-२४
दासी १० दुखी १२ नवजवान १३ सारी १४ गुदड़ी १५ माला १६
बाला १७ कान १८ क़ायम १६ खड़ाऊँ २० शृंगी बजा की तरह आवाज
मस्ताना २१ जगह २२ पैर २३ तरफ २५ देखना २६ ॥