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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ८ अ० २ पा० १ खं०
“आप्रीभिराप्रीणाति” इति च ब्राह्मणम् ।
तासाम्-‘इध्मः’ प्रथमागामी भवति ।
‘इध्मः’ समिन्धनात् ।
तस्य–एषा भवति॥१(४)॥
अर्थः-“अथातः” यहां से ‘आप्री’ देवताओं का अधि-
कार है- ‘इध्म’ (२) पद से ‘स्वाहाकृतयः’ (१३) पद तक
कुल बारह (१२) आप्री कहे जाते हैं ।
‘आप्री’ कैसे ? व्याप्ति अर्थ में ‘आप्’ (स्वा०उ०) धातु से
है । क्योंकि- वे लोक को व्यापन करते हैं । अथवा तर्पण या
तृप्ति अर्थ में ‘प्री’ (क्र्या०उ० धातु से है । क्योंकि- वे हवि-
ष्यों से या स्तुतियों से तृप्त किये जाते हैं ।
और “आप्रीभिः-आप्रीणाति” अर्थात्- ‘आप्री’
नाम वाली ऋचाओं से ( होता ऋत्विज् उन्हें ) आप्रीणन =
भले प्रकार तृप्त करता है । यह ब्राह्मण है ।
“तासाम्०” उन आप्री देवताओं में पहिले आने वाला
‘इध्म’ ( इन्धन देवता ) है ।
‘इध्म’ (इन्धन) क्यों ? समिन्धन से । क्योंकि-उस से
अग्नि समिन्धन किया जाता है-जलाया जाता है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥१(४)॥
व्याख्या ।
यहां अब देवताओं के नामों की व्याख्या चल रही है।
उनमें अग्नि (निघ० अ० ५ खं० १पद १) जातवेदाः (निघ०

हिन्दी निरुक्त ( १४३ ) द० अ० २ पा० १ खं०
अ० ५ ख० ? पद ०२) वैश्वानर (निघ० अ० ५ खं० १ पद ०३) द्रविणोदाः
(निघ० अ० ५ खं०२ पद० १) ये चार शब्द व्याख्यान किये
जाचुके हैं। दूसरे खण्ड के कुल १३ शब्दों में से 'इध्म' आदि
बारह (१२) शब्द अवशिष्ट हैं, इनका 'आप्री' नाम प्रसिद्ध
है, इसीसे आचार्य ने निघण्टु अ० ५ खण्ड २ में इध्म शब्द पर
ही "अथात आप्रियः" यह अधिकार की सूचना दी है,
ये बारह शब्द यहाँ निघण्टु ग्रन्थ में जिस क्रम से पढे हैं,
उसी क्रमसे ⁜प्रैष ग्रन्थ = मन्त्रभाग के स्थल विशेष में भी पढ़े
हुए हैं, अथवा वहाँ जिस क्रमसे ये शब्द पढ़े हैं, उसी क्रम से
वहां से इस समाम्नाय में उठा लिये हैं, इस कारण इनके
क्रम (सिलसिले) का प्रयोजन यहाँ वही है, जो वहाँ है,
किन्तु इन 'इध्म' आदि शब्दों के क्रम पूर्वक उठाए हुओं
का क्रम देखकर यह प्रश्न उठ आता है कि- क्या 'अग्नि'
आदि जो और २ शब्द इस काण्ड में पढे हुए हैं, उनका वह
क्रम निघण्टु में किसी प्रयोजन के साथ में होसकता है, या
उनकी गणना ही जैसे तैसे अपेक्षित है ?
यद्यपि 'इध्म' आदि आप्री देवताओं के नामों का

⁜ यह प्रैषाध्याय के नाम से ऋग्वेद मन्त्रसंहिताके
परिशिष्ट भाग के अन्त में एक प्रकरण ग्रन्थ है। उसमें १३
प्रयाजप्रैष ८ पाशुक प्रैष ११ अनुयाज प्रैष एक सूक्त वाक प्रैष
और ३६ सुत्या में सवनीय प्रैष हैं। इस प्रकार कुल
वहां पर ६९ प्रैष मन्त्र हैं। इसी का नाम प्रैषग्रन्थ या
प्रैषाध्याय है।

क्रम वेदाध्ययन तथा कर्म में जैसा यथास्थित उपयुक्त होता
है वैसा इनका नहीं। क्योंकि-इनका पाठ या यजन इसी
क्रम से मन्त्रों में या कर्म में नहीं है (तथापि प्राकृतिक निय-
म के अनुसार उनके पाठ का क्रम प्रयोजन सहित है । जैसे
कि - सब संसार तीन भागों में बटा हुआ है - पृथिवी लोक
अन्तरिक्ष लोक और द्युलोक। देवता भी तीनों लोकों में रहते
हैं और उन सभी के नामों की व्याख्या भी कर्त्तव्य है ।
ऐसी अवस्था में हमारे निकट पहिले पृथिवी लोक के ही
देवता हैं और उन्हीं के नामों की व्याख्या हमें करनी चाहिए
जब हम ऊपर के लोकों में चलेगे, तो पृथिवी लोक से आगे
अन्तरिक्ष लोक आयेगा, इससे पृथिवी के देवताओं के नामों
की व्याख्या के पश्चात् अन्तरिक्ष के देवताओं के नामों की
ही व्याख्या प्राप्त होती है, और अन्तरिक्ष के ऊपर फिर
द्युलोक में जांयगे, इससे उनके अनन्तर द्युलोक के देवताओं के
नामों की व्याख्या प्राप्त होती है । यही देवता नामों के पाठ
का क्रम निघण्टु शास्त्र में रखागया है । पृथिवी का देवता
अग्नि, अन्तरिक्ष का वायु या इन्द्र और द्युलोक का सूर्य देवता
है। इस कारण पहिले अग्नि देवता के नामों का पाठ है,
और इसी प्रकार अग्नि के अनेक नामों में तथा अग्नि के
संबन्धी अन्य देवता आदि के नामों में जो पूर्वापरभाव है, वह
भी प्राकृतिक स्वभाव के अनुसार है, । ऐसे ही अन्तरिक्ष और
द्युलोक के देवताओं तथा उनके सम्बन्धी अन्य नामों की
भी व्यवस्था ध्यान में लाने योग्य है। इसी से आचार्य ने
स्थान २ में इस अभिप्राय की अपनी प्रतिज्ञा से सूचना भी
दी है। जैसे-

हिन्दी निरुक्त ( १४५ ) ८ अ० २ पा० १ खं०
“अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः”
(अ० ७ पा० ४ खं० १) अर्थात्- अग्नि पृथिवी स्थान का
देवता है, इससे हम उसकी व्याख्या पहिले करेंगे।
“तासामिध्मः प्रथमागामी भवति” [अ० ८ पा०२
खं०१] अर्थात् इनमें 'इध्म' स्वभाव से पहिले आनेवाला है।
“तेषामश्वःप्रथमागामी भवति” [अ०६पा०१खं०१]
अर्थात् उन में 'अश्व' स्वभाव से पहिले आने वाला है।
“तेषां रथः प्रथमागामी भवति” [अ० ६ पा० २
खं० १] अर्थात् उनमें 'रथ' स्वभाव से पहिले आने वाला है।
इत्यादि ।
पृथिवी स्थान के देवता- नामों के क्रम का विशेष रूप
से प्रयोजन इस प्रकार है कि- पार्थिव ज्योति = पृथिवी
लोक के तेज का संबन्ध जैसा 'अग्नि' शब्द के साथ अधिक
प्रसिद्ध है, वैसा 'जातवेदस्' शब्द के साथ नहीं, जैसा 'जात-
वेदस्' शब्द के साथ है, वैसा 'वैश्वानर' शब्द के साथ नहीं
जैसा 'वैश्वानर' शब्द के साथ है वैसा द्रविणोदस् के साथ
नहीं। इस प्रकार इन सब शब्दों के क्रम का कारण गुण के
न्यूनाधिक्य से या प्रसिद्धि के न्यूनाधिक्य से लेना चाहिये।
यद्यपि 'अग्नि' आदि शब्दों के समान 'इध्म' आदि
शब्द भी अग्नि के या पार्थिव ज्योति के नाम हैं इससे ये उन
के समान पूर्व स्थान के भागी होते हैं, तथापि 'अग्नि' आ-
दि शब्द प्रत्यक्ष अग्नि के नाम हैं, और इध्म = इन्धन = काष्ठ
आदि अप्रत्यक्ष अग्नि के नाम हैं। क्योंकि- काष्ठ को रगड़-
ने से उसमें अग्नि प्रत्यक्ष होता है, स्वतः नहीं। इससे

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ८ अ० २ पा० १ खं०
अग्नि आदि नामों की अपेक्षा इन 'इध्म' आदि नामों की
गौणता है ।
ऐसे ही 'इध्म' आदि परोक्ष अग्नि के ही नाम हैं और
'अश्व' आदि अग्नि के स्थान मात्र में रहने वाली वस्तुओं
के किन्तु किसी प्रकार की अग्नि के नहीं, इससे ये 'इध्म'
आदि की अपेक्षा भी गौण हैं, इस कारण उनके अनन्तर
पढे जाते हैं ।
इसी प्रकार 'अश्व' आदि प्राणी हैं, और 'अक्ष' (पासे)
आदि अप्राणी (जड) हैं, इस कारण अश्व आदि के पश्चात्
'अक्ष' आदि नामों की स्थापना ( संग्रह ) है। ऐसे ही सब
स्थानों में क्रम का प्रयोजन द्रष्टव्य है ।
शाकपूणि आचार्य ने स्वयम् निघण्टु शास्त्र के आरम्भ से
ही सब 'गौ' आदि शब्दों का प्रयोजन कहा है । जैसा कि-
वार्त्तिककार ने कहा है -
“क्रमप्रयोजनं नाम्नां शाकपूण्युपलक्षितम् ।
प्रकल्पयेदन्यदपि न प्रज्ञामवसादयेत् ॥”
नामों के क्रम का प्रयोजन शाकपूणि आचार्य ने दिखाया
है, उससे अन्य प्रयोजन की भी कल्पना करे किन्तु अपनी
बुद्धि को खिन्न न करे [ यदि वह ध्यान में न आवे ] ।
प्रयोजन यह है कि-व्युत्पत्तियों की कोई सीमा नही है,
जैसे २ न्यायसंगत अर्थ प्रतीत हो, वैसे २ ही व्युत्पत्ति करे,
किसी व्युत्पत्ति के ठहराने के लिये ही खिन्न न होना
चाहिए ।
( खं० २ )
(निरु०-) "समिद्धो अद्य मनुष्यो दुरोणे देवो

हिन्दी निरुक्त ( १४७ ) ८ अ० २ पा० २ खं०
देवान्यजसि जातवेदः । आ च वह मित्र मह-
श्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः॥” [ऋ०सं०
८,६८,१ ] ॥
“समिद्धो अद्य” मनुष्यस्य मनुष्यस्य गृहे “देवो
देवान्-यजसि जातवेदः, आ च वह मित्र मह-
श्चिकित्वान्”-चेतनावान् , “त्वं दूतः कविरसि
प्रचेताः”-प्रवृद्धचेताः ॥
यज्ञेध्मः-इति कात्थक्यः ।
अग्निः-इति शाकपूणिः ॥
‘तनूनपात्’ आज्यम्-इति कात्थक्यः ।
‘नपात्’ इति अनन्तरायाः प्रजाया नामधेयम् ।
निर्णततमा भवति । गौः अत्र ‘तनूः’ उच्यते ।
तता अस्यां भोगाः । तस्याः पयो जायते । पयसः
आज्यं जायते ।
अग्निः- इति शाकपूणिः ।
आपः अत्र ‘तन्वः’ उच्यन्ते । तता अन्तरिक्षे ।
ताभ्यः ओषधि-वनस्पतयो जायन्ते । ओषधि
वनस्पतिभ्यः एष जायते ॥
तस्य-एषा भवति ॥ २ (५) ॥
अर्थः-“समिद्धो अद्य” इस ऋचा का भार्गव जम-

हिन्दी निरुक्त ( १४८ ) ८ अ० २ पा० २ खं०
दृग्नि ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, और यास्क के मत में इस सूक्त ।
का ही अग्नि देवता है ।
हे वृष्म ! देव ! 'समिद्धः' भले प्रकार प्रज्वलित हुआ =
जलता हुआ 'अद्य' आज इस यजन के विशेष दिन में 'मनुषः'
( मनुष्यस्य मनुष्यस्य ) जन जन के 'दुरोणे' ( गृहे ) घर में
'देवः' दाता (त्वं) तू हे 'जातवेदः ' जातवेदस् = अग्नि के
आधार ! 'देवान्' देवताओं को 'यजसि' यजन करता है । हें
'मित्रमहः' मित्रों के महनीय ' = पूजनीय ! 'आ च वह'
( आह्वय च ) और तू देवताओं को बुला और बुलाकर यजन
कर । क्योंकि 'त्वम्' तू 'चिकित्वान्' ( चेतनावान् ) जानकर
'असि' है । 'दूत-' सब यजमानों का दूत है । 'कविः' (क्रान्त-
दर्शनः ) फैले हुए प्रकाश वाला या सुन्दर प्रकाश वाला है ।
'प्रचेता' (प्रवृद्धचेताः ) बड़े विज्ञान वाला है ।
व्याख्या
इस मन्त्र में कौन देवता है ?
"यज्जध्मः" कात्थक्य आचार्य मानते हैं कि-यहाँ यज्ञ
का 'इध्म' समिध् = काष्ठ देवता है ।
प्रश्न-इस मन्त्र में उसके देवता होने का कोई लिङ्ग या
सूचक नहीं है ?
उत्तर-यद्यपि नहीं है, तथापि यह ऋचा "समिद्भ्यः
प्रेष्या" इस श्रुति से समिधों के लिये प्रेष्य कही गई है,
और जो ऋचा जिस वस्तु के लिये प्रेष्य होती है, उसमें वही
वस्तु देवता होती है, उसी का यजन होता है । इस कारण
जिस समय समिध् इन्धन होकर अग्नि से ज्वलित हो जाती

हिन्दी निरुक्त (१४६) ८ अ० २ पा० २ खं०
हैं, उनके समूह को ध्यान करके यह वचन है। यह व्यवहित
अभिधान कहलाता है- साक्षात् = असली नाम न होकर
परदे से नाम लिया हुआ होता है। जैसे हिन्दू स्त्रियें अपने
पति का साक्षात् नाम न लेकर उस के नाम को किसी उपाय
के द्वारा बताती हैं, वैसे ही ऋचाओं में कहीं २ देवताओं के
लिये भी परदे से कहा जाता है। “परोक्षप्रिया इव हि
देवाः” देवता परोक्षता से-परदे से कही हुई स्तुति से प्यार
करने वाले होते हैं। ऐसा ही यह श्रुति भी कहती है। इसी
न्याय के अनुसार यहां “समिद्धो अद्य” इस ऋचा में
'इध्म' यह आप्रीगत गुप्त नाम है। यह बात दर्श पूर्णमास
के होता के कर्म में प्रसिद्ध है-“समिधो यज” 'समिधों
का यजन कर' इस मन्त्र से अध्वर्यु के द्वारा प्रेषित = प्रेरित
हुआ होता “ये३यजामहे समिधः समिधो अग्नआ-
ज्यस्य व्यन्तु३वौ३षट्” इस मन्त्र से “वषट्” करता
है, उस “वषट्”कार के साथ या अनन्तर ही अध्वर्यु आज्य
का होम करता है। इस कारण यहां 'इध्म' देवता है, यह
कात्थक्य आचार्य का मानना ठीक है।
“अग्निः-इति शाकपूणिः” शाकपूणि आचार्य मानते
हैं कि-इस मन्त्र में अग्नि देवता है ॥
व्याख्या ।
शाकपूणि आचार्य यहां किस युक्ति से अग्नि देवता को
मानते हैं ?
(क) इध्म की अपेक्षा अग्नि होम कर्म में समीप होकर

हिन्दी निरुक्त ( १५० ) ८ अ० २ पा० २ खं
उपकार करता है- पहिले इन्धन रखाजाता है, फिर अग्नि
जलता है, फिर उसमें होम होता है, जो देवताओं का यजन या
पूजा है, उसमें अग्नि निकट और इध्म दूसरा होता है ।
(ख) इध्म प्रैष कर्म में मिलकर उपकार करता है किन्तु
स्वतन्त्रता से नहीं पहिले होता प्रैषमन्त्र “समिधःस-
मिधो०” इत्यादि पढता है, फिर अध्वर्यु आज्य का होम
करता है, अतः उसका क्रिया से स्वतन्त्र सम्बन्ध नहीं होता
अर्थात्- जिस देवता के यजन का प्रैष होता है उसी का फिर
यजन होता है । और यहां कात्थक्य के मत में प्रैष इध्म(समि
ध् ) के यजन का हुआ, और यजन या होम अग्निमें । इसी
से इध्मका क्रिया से साक्षात् सम्बन्ध न होकर अग्नि के द्वारा
सम्बन्ध होता है, स्वतन्त्रता से नहीं । तथा स्वतन्त्रता के
बिना उसकी ज्ञापकता ग्राह्य नहीं । अतः इध्म नाम अग्नि
का ही होता है ।
(ग) यजति या इष्टि = दर्श पूर्णमास आदि में आप्री
ऋचाओं का जो आप्री रूप है-- वे ऋचाएं जिस रूप में
स्थित है- अपने स्वभाव से जिस प्रकार अर्थ को प्रकाश कर
रही हैं- उनपर ध्यान देनेसे जो बुद्धि पर आपसे आप ज्ञान
फैलता है, वह उनका रूप बलवत् है और वह अग्नि पक्ष को
ही पुष्ट करता है, उसका उल्लङ्घन करके दूसरा अर्थ किया
नहीं जासकता ।
आप्री का क्या रूप है ! और कैसे वह अग्नि के अर्थ हो
जाती है- उसका देवता इध्म न होकर अग्नि कैसे
होजाता है ?
सुनो--

हिन्दी निरुक्त ( १५१ ) ८ अ० २ पा० २ खं०
“समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि
जातवेदः । आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः
कविरसि प्रचेताः॥”
यह आप्री का रूप है। इसमें समिद्ध प्रज्वलित होना
देवताओं का यजन करना द्योतन (प्रकाश करना) जातवेदस्
नाम, देवताओं का आवाहन, और दूतता, ये सब अभिधान
= शब्द अग्नि पक्षमें मुख्य रहते हैं, और इध्म पक्षमें गौण
होजाते हैं । जैसे- सिंह के लिये सिंह, शब्द मुख्य रहता
है, और पुरुष के लिये कहा गया गौण होता है।
“गौणमुख्ययोश्च मुख्ये कार्यसंप्रत्ययः” 'जहां
गौण और मुख्य दोनों उपस्थित हों वहां मुख्य में कार्य होता
है यह न्याय है। इससे अपने रूप में स्थित रहती हुई आप्री
का यज्ञ में बहुत उपकार होता है, इससे और सब प्रयाज
अग्नि देवता के ही होते हैं, इस कारण से इस आप्री ऋचा
के द्वारा अग्नि का ही यजन है, यह शाकपूणि आचार्य
मानते हैं ॥
'तनूनपात्' (२) आज्य (घी) का नाम है, यह कात्थक्य
(कत्थक के पुत्र) आचार्य मानते हैं ।
'नपात्' यह अननन्तरा = दूसरी प्रजा = सन्तान का
नाम है. पहिली सन्तान का नाम पुत्र और उसके पुत्र का
नाम नपात् = नाती (पोता) है ।
यहां 'तनू' नाम 'गो' (गाय) का कहा जाता है । क्यों ?
इसमें भोग तत = विस्तृत हैं । उस (गो) से दूध उपजता है
दूधऔर घ से आज्य (घृत) होता है । इस प्रकार कात्थक्य आ-

हिन्दी निरुक्त ( १५२ ) ८ अ० २ पा० ३खं०
चार्य 'तनूनपात् नाम घृत का बताते हैं। क्योंकि वह गौ का
पोता (नाती) है।
'तनूनपात्' (३) अग्नि है, यह शाकपूणि आचार्य कहते
हैं। उनका अभिप्राय यह है-
यहां 'तनू' जल कहे जाते हैं। क्यों कि - वे अन्तरिक्ष में
तत = फैले हुए होते हैं। उनसे ओषधि, वनस्पतियां होती
हैं, ओषधि वनस्पतियों से यह (अग्नि) उत्पन्न होता है। इस
प्रकार शाकपूणि के मत में 'तनूनपात्' अग्नि है। क्योंकि-
वह जल का पोता है।
उस 'तनूनपात्' = आज्य अथवा अग्नि की यह ऋचा
है ॥२(५) ॥
(खं०३)
(निरु०) “तनूनपातपथ ऋतस्य यानान्मध्वासम-
ञ्जन्स्वदया सुजिह्व । मन्मानिधीभिरुत यज्ञ-
मृन्धन्देवत्राच कृणुह्यध्वरं नः ॥” [८, ६, ८, २]॥
तनूनपात, 'पथः ऋतस्य' यानान् यज्ञस्य यानान्
मधुना समञ्जन् स्वदय कल्याणजिह्वः। मननानि
च नो धीभिर्यज्ञंत्र समर्द्धय, देवान् नो यज्ञं
गमय ॥
'नराशंसः' यज्ञः' इति कात्थक्यः नराः अस्मिन्
आसीनाः शंसन्ति ॥
अग्नि'-इति शाकपूणिः । नरैः प्रशस्यो भवति।
तस्य एषा भवति—॥३(६)॥

हिन्दी निरुक्त ( १५३ ) ८ अ० २ पा० ४ खं०
अर्थः- “तनूनपात्पथ” हे 'तनूनपात्' आज्य (त्वम्)
तू 'ऋतस्य' (यज्ञस्य) यज्ञ के 'पथः'(मार्गान्) मार्गों को और
'यानान्' (हवींषि) हविओं को 'मध्वा' (मधुना) मधुर स्वाद से
'समञ्जन्' सींचता हुआ 'स्वदय' स्वादु कर दे। और हे सुजि-
ह्वः' सुन्दर जीभ वाले! [अपनी जीभ से ऐसा करता हुआ-]
'मन्मानि' (मननानि च) हमारी मानी हुई या मांगी हुई
वस्तुओं को 'कृणुहि' कर । 'धीभिः' (कर्मभिः) कर्मों से 'यज्ञम्'
यज्ञ को 'ऋन्धन्' (संसाधयन्) सम्पादन करता हुआ =
साधता हुआ (समर्धय) बढा । 'नः' हमारे 'अध्वरम्' (यज्ञम्)
यज्ञ के प्रति देवत्रा (देवान्) देवताओं को (गमय) चला या
ला।(यह हम तुझ से चाहते हैं।) ॥
शाकपूणि के मत में- हे भगवन् ! अग्ने ! तनूनपात् !
जल के पोते ! तू यज्ञ के मार्गों को हवियों को पाक के किये
हुए मीठे रस से संयुक्त करता हुआ स्वादु बना । हे सुजिह्व !
अच्छी ज्वालाओं वाले ! ऐसा करता हुआ हमारी वाञ्छित
वस्तुओं को सिद्ध करता हुआ यज्ञ को बढा और हमारे
यज्ञ के प्रति देवताओं को ला ॥
'नराशंस' (४) यज्ञ है, यह कात्थक्य मानते हैं। क्योंकि-
इस में नर (मनुष्य) आसीन (बैठे हुए) शंसन करते हैं-
देवताओं की स्तुति करते हैं ।
अग्नि 'नराशंस' है,-यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं।
क्योंकि-नरों से (मनुष्यों से) प्रशंसो किया जाता है ।
“तस्य०” उस 'नराशंस' की यह ऋचा है ॥३(६)॥
(खं० ४)
(निरु०) “नराशंसस्य महिमानमेषामुपस्तोषाम

हिन्दी निरुक्त ( १४४ ) = अ० २ पा० ४ खं०
यजतस्य यज्ञैः । ये सुक्रतवः शुचयोधियंधाः
स्वदन्ति देवा उभयानि हव्या ॥” [ऋ०सं० ५,२,
१, २] ॥
नराशंसस्य महिमानम्-एषाम् उपस्तुमः, यज्जि-
षस्य यज्ञै ये सुकर्माणः शुचयोधियंधारयितारः
स्वदयन्तु देवाः-उभयानि हवींषि सोमं च इतरा-
णि च इतिवा । तान्त्राणि च आवापिकानि च
इति वा ॥
‘ईलः’ ईट्टेः स्तुतिकर्मणः । इन्धतेर्वा ॥
तस्य एषा भवति–॥४(७)॥
‘एषाम्’ इन मनुष्यों के ‘नराशंसस्य’ वाञ्छित फल के
देने वाले यज्ञ की ‘महिमानम्’ महिमा को ‘उपस्तुमः’ स्तुति
करते हैं । ‘यजतस्य’ (यज्जिषस्य) यज्ञ करने वाले के ‘यज्ञैः’
(कर्मभिः) कर्मों से ‘ये’ जो ‘सुक्रतवः’ (सुकर्माणः) सुन्दर
कर्म वाले ‘शुचयः’ बिलकुल पाप रहित ‘धियंधाः’ (धियंधार-
यितारः) बुद्धि के धारण करने वाले ‘देवाः’ देवता हैं, वे
‘उभयानि’ दोनों प्रकार के ‘हव्या’ (हवींषि) हविष्यों को
‘स्वदन्ति’ (स्वदयन्तु) चाखें । दोनों प्रकार के हवि-सौमिक
पशु में-एक सोम और दूसरे पशु पुरोडाश धाना आदि हैं ।
और सोम से अन्यत्र तान्त्र (प्रयाज आज्यभाग स्विष्टकृत्
आदि) और आवापिक (प्रधान हविष् ) ये दो प्रकार के
हवि हैं ।
शाकपूणि के मत में-हम नरों के इच्छित उपकारों के

हिन्दी निरुक्त ( १५५ ) ८ अ० २ पा० ५ खं०
करने वाले नराशंस अग्नि देव की महिमा को स्तुति करते
हैं। उस नराशंस अग्नि को स्तुत होजाने पर यज्ञ के करने
वाले के गुणों से युक्त जो सुन्दर कर्मों वाले पवित्र बुद्धि के
धारण करने वाले देवता हैं, वे दोनों प्रकार के हविष्योँ को
चाखें ॥
'ईल' ५) (अग्नि) स्तुति अर्थ में 'ईड्' (अदा०आ०)
धातु का है। अथवा दीप्ति अर्थ में 'इन्ध' (रु० आ०) धातु
का है।
“तस्य०” उस 'ईल' की यह ऋचा है ॥४(७)॥
( खं० ५ )
(निरु०-) आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्चायाह्यग्ने
वसुभिः सजोषाः । त्वं देवानामसि यह्व होता स
एनान्यक्षीषितो यजीयान् ॥” (ऋ०सं०८,६,८,३)
आहूयमानः ईलितव्यो वन्दितव्यश्च आयाहि
अग्ने वसुभिः सह जोषणः त्वं देवानाम् असि
यह्व होता ।
'यह्व' इति महतो नामधेयम् । यातश्च हूतश्च
भवति ।
“स एनान् यक्षीषितो यजीयान्” । 'इषितः'
प्रेषितः इति वा । अधीष्टः इति वा ।
'यजीयान्' यष्टृतरः ॥
'बर्हिः' परिवर्हणात् ।

हिन्दी निरुक्त ( १५७ ) ८ अ० २ पा० ६ खं०
वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम् ॥” (ऋ० सं०
८, ६, ८, ४)॥
प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वसनाय अस्याः
प्रवृज्यते, अग्रे अन्हो बर्हिः, पूर्वार्द्धे तद् विप्रथते
'वितरं',-विकीर्णतरम्-इति वा, विस्तीर्णतरम्-
इति वा ।
'वरीयः' वरतरम् । उरुतरं वा ।
देवेभ्यश्च अदितये च स्योनम् ।
'स्योनम्'- इति सुखनाम । स्यतेः । अवस्यन्ति-
एतत् । सेवितव्यम्भवति-इति वा ।
'द्वारः' जवतेर्वा । द्रवतेर्वा । वारयतेर्वा ॥
तासाम्-एषा भवति- ॥६(९)॥
अर्थ :- “प्राचीनं०” [ यज्ञ में कुशों का उपयोग- ]
‘अस्याः पृथिव्याः वस्तोः (वसनाय) प्रदिशा (विधिना)
(मन्त्रेण वा) अन्हाम् अग्रे (पूर्वाह्ने) प्राचीनं बर्हिः वृ-
ज्यते' इस पृथिवी के ढांपने के लिये पूर्वाह्नकाल में = दिन
के पहिले पहर में प्राचीन = पूर्व दिशा में गया हुआ अथवा
पूर्वाग्र कुश (डाभ) विधिवाक्य के अनुसार काटा जाता है
अथवा प्रस्तरण मन्त्र से बिछाया जाता है। ‘वरीयः' और २
यज्ञ के अङ्गों से बहुत श्रेष्ठ है । 'वितरं (विकीर्णतरं वा
विस्तीर्णतरं वा) काटा हुआ अथवा बिछाया हुआ 'व्युप्र-
थते' (तद् विप्रथते) वह कुश फैल जाता है। और 'देवेभ्यः'

हिन्दी निरुक्त ( १५८ ) ८ अ० २ पा० ६ खं०
देवताओं के लिये तथा 'अदितये' पृथिवी के लिये सुखरूप
होता है ।
'वितर' क्या ? विशीर्णतर = बहुत काट डाला हुआ ।
अथवा विस्तीर्णतर = बहुत फैलाया हुआ या बिछाया हुआ ।
'वरीयः' क्या ? वरतर = बहुत श्रेष्ठ । अथवा उरुतर =
बहुत घना ।
'स्योन' यह सुख का नाम है । कैसे ? स्यतेः । 'अव'
(उप०) और 'सो' (दि०प०, धातु से है । क्योंकि- 'एतद्
अवस्यन्ति' सब प्राणी इसी पर निर्भर करते हैं—इसी को
निश्चय करते हैं—कैसे मिले ? कैसे हो ? अथवा सेवन करने
योग्य होता है इससे यह 'स्योन' है ।
व्याख्या ।
“प्राचीनं बर्हिः” मन्त्र में कुशा या डाभ के सम्बन्ध में
बहुतसी विधियों का अक्षरार्थ से स्पष्टीकरण होता है । यज्ञ
में इसका बहुत उपयोग होता है। कर्मकेआरम्भ से पहिलेइसे वन
में से काट कर लाना पड़ता है अतः उसके काटने या बिछाने
का समय “अग्रेअन्हाम्” यह वाक्य पूर्वाह्न (दिनका पहि
ला प्रहर) बताता है, और वहां कैसे काटे इसके लिये
प्राचीनं बर्हिः वृज्यते” वाक्य बताता है कि- पूर्व की
ओर मुख करके काटने वालो उसे पूर्व की ओर ही ऐसे २
काटता हुआ बढे जैसे २ वह पूर्वाग्र कट २ कर गिरै या उसे
काट २ कर वैसे ही डाले जैसे पूर्वाग्र गिरे । जहां तक संभव
हो उस कर्म में सब प्रकारपूर्व दिशाको उपयोग करें ।
इसका दूसरा मूल “प्रागुदग्ग्रा बर्हि च्छिनात्ति”

हिन्दी निरुक्त ( १५६ ) ८ अ० ३ पा० ६ खं०
ब्राह्मण श्रुति (विधिवाक्य) है। इसी विधि का अनुवाद इस
मन्त्र वाक्य में किया गया है।
ऐसे ही वेदी में कुशा बिछाई जाती है, उस पर सब
हविः रखेजाते हैं, इस लिये जब वहां कुशा बिछाये तो कुशा-
ग्रों के अग्र को पूर्व की ओर रखे और वेदी के पश्चिम भाग
से बिछाना आरम्भ करके उसे पूर्व के भाग में पूराकरे । यह
अर्थ भी "प्राचीनं बर्हिः वृज्यते" इस वाक्य से ही आता
है। इसका दूसरा मूल वाक्य "प्राचीनं बर्हिः स्तृणाति"
यह ब्राह्मण श्रुति (विधिवाक्य) है। प्रस्तरण यो फैलाने का
मन्त्र "देवस्यत्वा" इत्यादि है।
कुशा क्यों फैलाई जाती हैं, इसका उत्तर भी अंशमात्र
इस मन्त्र में ही "पृथिव्या वस्तोरस्याः" "पृथिवी के
ढांपने के अर्थ' इस वाक्य से मिलजाता है। क्यों कि- देवता
पृथिवी पर खड़े नहीं होते और न पृथिवी पर धरे हुए हवि
ओं को वे ग्रहणकरते हैं, इसलिये वेदी पर कुशा बिछाई जाती
हैं, और उन पर हविः रखे जाते हैं ॥ अथवा कुशाग्रों के
फैलाने से पृथवी की नग्नता निवृत्त होजाती है। क्यों कि-
पृथवी की नग्नता की अवस्था में देवता यज्ञ में न आवेंगे
अतः पृथिवी की नग्नता की निवृत्ति के लिये कुशा बिछाना बहुत
आवश्यक है।
'द्वारः' (७) यह देवता का नाम वेग अर्थ में 'जु' (भ्वा०
प०) धातु से है। अथवा गति अर्थ में 'द्रु' (भ्वा० प०) धातु
से है। अथवा 'वारयति' (वृञ् धा० णिच्०प्र०) वारण अर्थ
में णिजन्त धातु से है। क्यों कि- द्वारों (दरवाजों) से ही

हिन्दी निरुक्त ( १६० ) ८ अ० २ पा० ७ खं०
दौड़ना, गमने, तथा धारण करने योग्यों का धारण किया
जातो है ।
“तासामेषा०” उन द्वारों की यह ऋचा है-॥६(६)॥
(खं०७)
(निरु०) व्यचस्वतीरुर्विया विश्रयन्तां पतिभ्यो
न जनयः शुम्भमानाः । देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्व-
मिन्वादेवेभ्यो भवतसुप्रायणाः॥» [ऋ० सं० ८, ६, ८, ५]
व्यञ्जनवत्यः उरुत्वेन विश्रयन्तापतिभ्यो इव जा-
याः ऊरू मैथुनधर्मे शुशोभिषमाणाः वरतमम्-
अङ्गम् · ऊरू, देव्यो द्वारो बृहत्यो महत्यो 'विश्व-
मिन्वाः' विश्वम् आभिः एति यज्जे ।
गृहद्वारः- इति कात्थक्यः ।
अग्निः- इति शाकपूणिः ।
'उषासानक्ता' उषाश्च नक्ता च ।
'उषा' व्याख्याता ।
'नक्ता' इति रात्रिनाम। अनक्ति भूतानि। अपि
वा अव्यक्तवर्णा ।
तयोः एषा भवति-॥७(१०) ॥
अर्थ:- “व्यचस्वतीः०” (याः) जो ये 'व्यचस्वती' (व्यञ्जनव-
त्यः) अनेक प्रकार आने जाने से युक्त हैं, वे (द्वारः) द्वार (दर-
वाजे) 'उर्विया' (महत्त्वेन) विस्तार से 'विश्रयन्ताम्' खुलजावें ।

हिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ८ अ० २ पा० ७ खं
‘जनयः-न’ (जायाः-इव) जैसे स्त्रिएं ‘पतिभ्यः’ पत्तियों के
लिये शुम्भमानाः’ (शुशोभिषमाणाः) अपनी शोभा बढाने की
इच्छा करती हुईं (मैथुनधर्मे) मैथुन कर्म में (ऊरू। जांघों को
फैला देती हैं । ‘द्वारः!’ ‘देवीः!’ (देव्य) हे द्वार देविओ? (यूयम्)
तुम ‘देवेभ्यः’ देवताओं के लिये ‘बृहतीः’ (बृहत्यः) बड़ी बड़ी
‘विश्वमिन्वाः’ सब संसार के आने जाने योग्य ‘सुप्रायणाः’
(सुप्रगमना) भले प्रकार आने जाने योग्य ‘भवत’ होजाओ ।
‘ऊरू’ क्या ? ‘वरतरम् अङ्गम्’ बहुत उत्तम अङ्ग ।
‘विश्वमिन्वा’ क्या ! ‘विश्वम् आभिः एति यञ्जे’ यज्ञ
में इनके द्वारा सब संसार आता है ॥
व्याख्या ।
इस मन्त्र के द्वारा यजमान अपने यज्ञ के द्वारों को ऐसे
खुले हुए चाहता है, जिनके द्वारा संसार के सब याचक आ
कर उससे अपनी सब प्रार्थनाओं को पूरी करें । यज्ञ के
अधिकारी की उदारता का स्वरूप इस मन्त्र से भले प्रकार जाना
जासकता है ।
यहां ‘द्वार’ क्या देवता है !
यह द्वार (घरके दरवाजे) हैं- यह कात्थक्य आचार्य
मानते हैं ।
अग्नि है- यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं ।
‘उषासानक्ता’ क्या ! उषा (प्रभात काल) और नक्ता
[रात्रि] ।
‘नक्ता’ यहरात्रि का नाम है। क्योंकि-अवश्याय (ओस)
से सब पदार्थों को ‘अनक्ति’ गीले कर देती है । अथवा वह
अव्यक्तवर्णा होने से ‘नक्ता’ है अर्थात् अंधेरे के कारण उस में

हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ८ अ० २ पा० ८ खं
कोई वर्ण (रंग) प्रतीत नही होता । 'अव्यक्तवर्णा' शब्द से
'अ' के बदले में 'न' और 'क्त' ये दो अक्षर लेकर 'नक्ता' शब्द
बना है। यहां ऐसे ही संक्षेप होते है ।
उन दोनों की यह ऋचा है—॥ ७(१०)॥
(सं० ८)
(निरु०) "आसुष्वयन्ती यजते उपाके उषासा-
नक्ता सदतां नियौनौ । दिव्ये योषणे बृहती सु-
रुक्मे अधिश्रियं शुक्रपिशं दधाने ॥" [ ऋ० सं०
८, ६, ९, १ ]
सेष्मीयमाणे इति वा । सुष्वपन्त्यौ इति वा ।
सीदताम्-इति वा । न्यासीदताम् इति वा ।
यज्जिये उपक्रान्ते, दिव्ये योषणे बृहत्यौ महत्यौ
सुरुक्मे सुरोचने । अधिद्धाने शुक्रपेशासं श्रियम् ।
'शुक्रम्' शोचतेर्ज्वलतिकर्मणः ।
'पिश' इति रूपनाम । पिंशतेः । विपिशितं
भवति ।
'दैव्या होतारा' देव्यौ होतारौ। अयंच अग्निः,
असौ च मध्यमः ।
तयोः- एषा भवति ॥ ८ (११) ॥
अर्थ :- "आसुष्वयन्ती" 'सुष्वयन्ती' (सेष्मीयमाणे
इति वा, सुष्वपन्त्यौ इति वा) आपस में दोनों मुसकिराती