निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १५२ ) ८ अ० २ पा० ३खं०
चार्य 'तनूनपात् नाम घृत का बताते हैं। क्योंकि वह गौ का
पोता (नाती) है।
'तनूनपात्' (३) अग्नि है, यह शाकपूणि आचार्य कहते
हैं। उनका अभिप्राय यह है-
यहां 'तनू' जल कहे जाते हैं। क्यों कि - वे अन्तरिक्ष में
तत = फैले हुए होते हैं। उनसे ओषधि, वनस्पतियां होती
हैं, ओषधि वनस्पतियों से यह (अग्नि) उत्पन्न होता है। इस
प्रकार शाकपूणि के मत में 'तनूनपात्' अग्नि है। क्योंकि-
वह जल का पोता है।
उस 'तनूनपात्' = आज्य अथवा अग्नि की यह ऋचा
है ॥२(५) ॥
(खं०३)
(निरु०) “तनूनपातपथ ऋतस्य यानान्मध्वासम-
ञ्जन्स्वदया सुजिह्व । मन्मानिधीभिरुत यज्ञ-
मृन्धन्देवत्राच कृणुह्यध्वरं नः ॥” [८, ६, ८, २]॥
तनूनपात, 'पथः ऋतस्य' यानान् यज्ञस्य यानान्
मधुना समञ्जन् स्वदय कल्याणजिह्वः। मननानि
च नो धीभिर्यज्ञंत्र समर्द्धय, देवान् नो यज्ञं
गमय ॥
'नराशंसः' यज्ञः' इति कात्थक्यः नराः अस्मिन्
आसीनाः शंसन्ति ॥
अग्नि'-इति शाकपूणिः । नरैः प्रशस्यो भवति।
तस्य एषा भवति—॥३(६)॥