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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 910, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 910

हिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ८ अ० २ पा० १ खं०
“आप्रीभिराप्रीणाति” इति च ब्राह्मणम् ।
तासाम्-‘इध्मः’ प्रथमागामी भवति ।
‘इध्मः’ समिन्धनात् ।
तस्य–एषा भवति॥१(४)॥
अर्थः-“अथातः” यहां से ‘आप्री’ देवताओं का अधि-
कार है- ‘इध्म’ (२) पद से ‘स्वाहाकृतयः’ (१३) पद तक
कुल बारह (१२) आप्री कहे जाते हैं ।
‘आप्री’ कैसे ? व्याप्ति अर्थ में ‘आप्’ (स्वा०उ०) धातु से
है । क्योंकि- वे लोक को व्यापन करते हैं । अथवा तर्पण या
तृप्ति अर्थ में ‘प्री’ (क्र्या०उ० धातु से है । क्योंकि- वे हवि-
ष्यों से या स्तुतियों से तृप्त किये जाते हैं ।
और “आप्रीभिः-आप्रीणाति” अर्थात्- ‘आप्री’
नाम वाली ऋचाओं से ( होता ऋत्विज् उन्हें ) आप्रीणन =
भले प्रकार तृप्त करता है । यह ब्राह्मण है ।
“तासाम्०” उन आप्री देवताओं में पहिले आने वाला
‘इध्म’ ( इन्धन देवता ) है ।
‘इध्म’ (इन्धन) क्यों ? समिन्धन से । क्योंकि-उस से
अग्नि समिन्धन किया जाता है-जलाया जाता है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥१(४)॥
व्याख्या ।
यहां अब देवताओं के नामों की व्याख्या चल रही है।
उनमें अग्नि (निघ० अ० ५ खं० १पद १) जातवेदाः (निघ०