निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४८ ) ८ अ० २ पा० २ खं०
दृग्नि ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, और यास्क के मत में इस सूक्त ।
का ही अग्नि देवता है ।
हे वृष्म ! देव ! 'समिद्धः' भले प्रकार प्रज्वलित हुआ =
जलता हुआ 'अद्य' आज इस यजन के विशेष दिन में 'मनुषः'
( मनुष्यस्य मनुष्यस्य ) जन जन के 'दुरोणे' ( गृहे ) घर में
'देवः' दाता (त्वं) तू हे 'जातवेदः ' जातवेदस् = अग्नि के
आधार ! 'देवान्' देवताओं को 'यजसि' यजन करता है । हें
'मित्रमहः' मित्रों के महनीय ' = पूजनीय ! 'आ च वह'
( आह्वय च ) और तू देवताओं को बुला और बुलाकर यजन
कर । क्योंकि 'त्वम्' तू 'चिकित्वान्' ( चेतनावान् ) जानकर
'असि' है । 'दूत-' सब यजमानों का दूत है । 'कविः' (क्रान्त-
दर्शनः ) फैले हुए प्रकाश वाला या सुन्दर प्रकाश वाला है ।
'प्रचेता' (प्रवृद्धचेताः ) बड़े विज्ञान वाला है ।
व्याख्या
इस मन्त्र में कौन देवता है ?
"यज्जध्मः" कात्थक्य आचार्य मानते हैं कि-यहाँ यज्ञ
का 'इध्म' समिध् = काष्ठ देवता है ।
प्रश्न-इस मन्त्र में उसके देवता होने का कोई लिङ्ग या
सूचक नहीं है ?
उत्तर-यद्यपि नहीं है, तथापि यह ऋचा "समिद्भ्यः
प्रेष्या" इस श्रुति से समिधों के लिये प्रेष्य कही गई है,
और जो ऋचा जिस वस्तु के लिये प्रेष्य होती है, उसमें वही
वस्तु देवता होती है, उसी का यजन होता है । इस कारण
जिस समय समिध् इन्धन होकर अग्नि से ज्वलित हो जाती