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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 923, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 923

हिन्दी निरुक्त ( १५५ ) ८ अ० २ पा० ५ खं०
करने वाले नराशंस अग्नि देव की महिमा को स्तुति करते
हैं। उस नराशंस अग्नि को स्तुत होजाने पर यज्ञ के करने
वाले के गुणों से युक्त जो सुन्दर कर्मों वाले पवित्र बुद्धि के
धारण करने वाले देवता हैं, वे दोनों प्रकार के हविष्योँ को
चाखें ॥
'ईल' ५) (अग्नि) स्तुति अर्थ में 'ईड्' (अदा०आ०)
धातु का है। अथवा दीप्ति अर्थ में 'इन्ध' (रु० आ०) धातु
का है।
“तस्य०” उस 'ईल' की यह ऋचा है ॥४(७)॥
( खं० ५ )
(निरु०-) आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्चायाह्यग्ने
वसुभिः सजोषाः । त्वं देवानामसि यह्व होता स
एनान्यक्षीषितो यजीयान् ॥” (ऋ०सं०८,६,८,३)
आहूयमानः ईलितव्यो वन्दितव्यश्च आयाहि
अग्ने वसुभिः सह जोषणः त्वं देवानाम् असि
यह्व होता ।
'यह्व' इति महतो नामधेयम् । यातश्च हूतश्च
भवति ।
“स एनान् यक्षीषितो यजीयान्” । 'इषितः'
प्रेषितः इति वा । अधीष्टः इति वा ।
'यजीयान्' यष्टृतरः ॥
'बर्हिः' परिवर्हणात् ।