निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १५६ ) ८ अ० ३ पा० ६ खं०
ब्राह्मण श्रुति (विधिवाक्य) है। इसी विधि का अनुवाद इस
मन्त्र वाक्य में किया गया है।
ऐसे ही वेदी में कुशा बिछाई जाती है, उस पर सब
हविः रखेजाते हैं, इस लिये जब वहां कुशा बिछाये तो कुशा-
ग्रों के अग्र को पूर्व की ओर रखे और वेदी के पश्चिम भाग
से बिछाना आरम्भ करके उसे पूर्व के भाग में पूराकरे । यह
अर्थ भी "प्राचीनं बर्हिः वृज्यते" इस वाक्य से ही आता
है। इसका दूसरा मूल वाक्य "प्राचीनं बर्हिः स्तृणाति"
यह ब्राह्मण श्रुति (विधिवाक्य) है। प्रस्तरण यो फैलाने का
मन्त्र "देवस्यत्वा" इत्यादि है।
कुशा क्यों फैलाई जाती हैं, इसका उत्तर भी अंशमात्र
इस मन्त्र में ही "पृथिव्या वस्तोरस्याः" "पृथिवी के
ढांपने के अर्थ' इस वाक्य से मिलजाता है। क्यों कि- देवता
पृथिवी पर खड़े नहीं होते और न पृथिवी पर धरे हुए हवि
ओं को वे ग्रहणकरते हैं, इसलिये वेदी पर कुशा बिछाई जाती
हैं, और उन पर हविः रखे जाते हैं ॥ अथवा कुशाग्रों के
फैलाने से पृथवी की नग्नता निवृत्त होजाती है। क्यों कि-
पृथवी की नग्नता की अवस्था में देवता यज्ञ में न आवेंगे
अतः पृथिवी की नग्नता की निवृत्ति के लिये कुशा बिछाना बहुत
आवश्यक है।
'द्वारः' (७) यह देवता का नाम वेग अर्थ में 'जु' (भ्वा०
प०) धातु से है। अथवा गति अर्थ में 'द्रु' (भ्वा० प०) धातु
से है। अथवा 'वारयति' (वृञ् धा० णिच्०प्र०) वारण अर्थ
में णिजन्त धातु से है। क्यों कि- द्वारों (दरवाजों) से ही