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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 912, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 912

क्रम वेदाध्ययन तथा कर्म में जैसा यथास्थित उपयुक्त होता
है वैसा इनका नहीं। क्योंकि-इनका पाठ या यजन इसी
क्रम से मन्त्रों में या कर्म में नहीं है (तथापि प्राकृतिक निय-
म के अनुसार उनके पाठ का क्रम प्रयोजन सहित है । जैसे
कि - सब संसार तीन भागों में बटा हुआ है - पृथिवी लोक
अन्तरिक्ष लोक और द्युलोक। देवता भी तीनों लोकों में रहते
हैं और उन सभी के नामों की व्याख्या भी कर्त्तव्य है ।
ऐसी अवस्था में हमारे निकट पहिले पृथिवी लोक के ही
देवता हैं और उन्हीं के नामों की व्याख्या हमें करनी चाहिए
जब हम ऊपर के लोकों में चलेगे, तो पृथिवी लोक से आगे
अन्तरिक्ष लोक आयेगा, इससे पृथिवी के देवताओं के नामों
की व्याख्या के पश्चात् अन्तरिक्ष के देवताओं के नामों की
ही व्याख्या प्राप्त होती है, और अन्तरिक्ष के ऊपर फिर
द्युलोक में जांयगे, इससे उनके अनन्तर द्युलोक के देवताओं के
नामों की व्याख्या प्राप्त होती है । यही देवता नामों के पाठ
का क्रम निघण्टु शास्त्र में रखागया है । पृथिवी का देवता
अग्नि, अन्तरिक्ष का वायु या इन्द्र और द्युलोक का सूर्य देवता
है। इस कारण पहिले अग्नि देवता के नामों का पाठ है,
और इसी प्रकार अग्नि के अनेक नामों में तथा अग्नि के
संबन्धी अन्य देवता आदि के नामों में जो पूर्वापरभाव है, वह
भी प्राकृतिक स्वभाव के अनुसार है, । ऐसे ही अन्तरिक्ष और
द्युलोक के देवताओं तथा उनके सम्बन्धी अन्य नामों की
भी व्यवस्था ध्यान में लाने योग्य है। इसी से आचार्य ने
स्थान २ में इस अभिप्राय की अपनी प्रतिज्ञा से सूचना भी
दी है। जैसे-