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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 705

हिन्दी निरुक्त ( २६२ ) ६ अ० ४ पा० १ खं०
अविरोध से 'रंसु' का 'रमणीयेषु' (रमणीयोंमें) अर्थ होता है।
'द्विबर्हाः' (७४) अनवगत 'द्विपरिवृढः' (द्वयोःस्थान-
योः परिवृढः) (दो स्थानों में अर्थात् मध्यम स्थान में विद्युत्
(बिजली) के रूपसे और उत्तम (द्यु) लोकमें सूर्य के रूपसे
बढ़ाहुआ) के अर्थ में है।
"उत द्विबर्हाः अमिनः सहोभिः" अर्थात्-'उत'
और इन्द्रदेव 'द्विबर्हाः' दोनों लोकों में बढ़ा हुआ और
'सहोभिः' बलों से 'अमिनः' (अमितमात्रः) बिना परि-
माण (अथाह) है। यह भी निगम है॥
'अक्रः' (७५) यह अनवगत 'आक्रमणः' (कोट) के
अर्थ में है। क्यों ? वह शत्रुके आक्रमण (चढ़ाई) से बचाता
है। [ अथवा अक्रमण से यह 'अक्र' है। क्योंकि वह दुर्गम होने
से क्रमण (लांघा) नहीं जाता।]
"अक्रो न बभ्रिः समिथे महीनाम्" अर्थात्-सो
अग्निदेव 'समिथे' (संग्रामे) संग्राम में 'महीनाम्' शत्रु-सेनाओं
का 'अक्रो-न' दुर्ग के कोट के समान 'बभ्रिः' धारण करने वाला
है। यह भी निगम है। यहां शब्द की समानता और अर्थ के
अविरोधसे 'अक्र' नाम कोट का होता है ॥
'उराणः' (७६) अनवगत 'उरु-कुर्वाणः' (बहुत करते
हुए) के अर्थ में है।
"दूत ईयसे प्रदिव उराणः" अर्थात्- हे अग्नि
देव ! तू 'उराणः' थोड़े दिए हुए हविः को भी देवताओं की
तृप्ति में समर्थ बहुत करता हुआ 'प्रदिवः' सब यजमानों का
पुराना 'दूतः दूत 'ईयसे' (याच्यसे) याचना किया जाता है