निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २८२ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
क्या ? संग्राम में शत्रु की ओर फेंकी हुई अथवा 'अभ्यक्ता'वह क्या ? नित्य-
काल ही शत्रुओं के प्रति गई हुई ।
“ अभ्यक्सा त इन्द्र ऋष्टिः ” अर्थात्-‘ इन्द्र ! ’
हे इन्द्र देव ! 'सा' वह 'ते' तेरी 'ऋष्टिः' ऋष्टि (शस्त्र विशेष)
'अभ्यक्' मेघके प्रति गई हुई होती है । यहां वृष्टि और ऋष्टि के
संबन्धसे ' अभ्यक् ' शब्द ' अभि ' ( अव्यय ) और गत्यर्थक
'अञ्चू' ( भ्वा० प० ) धातुसे है, यह उपपन्न होता है ।
‘ यादृश्मिन् ’ (६१) यह अनवगत 'यादृशे' (जिसमें) के अर्थ में है ।
“ यादृश्मिन् धायि तमपस्यया विदत् ” अर्थात्-
हे भगवन् ! अग्निदेव ! तेरे भक्तने ‘ यादृश्मिन् ’ जैसे काममें
मनको 'अधायि' धारण किया 'तम्' उसको 'अपस्यया' हविः
के दान और स्तुति आदिसे 'अविदत्'पाया । यहां 'यादृश्मिन्'
पदका शब्द की समानतासे 'यादृशे' परिवर्तन युक्त होता है ।
‘जारयायि’ (६२) यह अनवगत 'अजायि 'के अर्थ में है ।
“उस्रः पितेव जारयायि यज्ञैः ” अर्थात्-अग्नि
देव 'यज्ञैः' ( यज्ञेषु ) यज्ञों में विहरण किया जाता हुआ
'उस्रः-पिता-इव' गोओं के पति साण्ड ( सांड ) के समान
'जारयायि' ( अजायि) अनेकरूप होता है । अर्थात्-सांड जिस
प्रकार पुत्र पौत्र आदिकोंसे अनेक हो जाता है, उसी प्रकार
अग्नि देव भी बहुधा हो जाता है यहां 'जारयायि' पद का
'अजायि' अर्थ युक्त प्रतीत होता है ॥ ६ ( १५ ) ॥
( खं० ७ )
निघ०- अग्रिया ॥ ६३ ॥ चनः ॥६४॥
पन्नता ॥ ६५ ॥ शुरुधः ॥६६॥ अमिनः