सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

२६ २ अ० १ पा० ५ खं० ।
[खं० ५]
‘कक्ष्या’ रज्जुः, अश्वस्य । कक्षं सेवते । ‘कक्षः’
गाहतेः । ‘क्सः’ इति नामकरणः । ख्यातेर्वा
अनर्थकः अभ्यासः । किम्-अस्मिन्ख्यानम्-इति ।
कषतेर्वा । तत्सामान्यात्-मनुष्य कक्षः । बाहुमूल
सामान्याद्-अश्वस्य । राज्ञः पुरुषः राज पुरुषः ।
‘राज’ राजतेः । ‘पुरुषः’ पुरिषादः । पुरीशयः ।
पूरयते र्वा । पूरयति-अन्तः-इति अन्तर पुरुषम्-
अभिप्रेत्य । “यस्मात् परं ना पर मस्ति किञ्चिद्
यस्मान्नाणी यो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव
स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्।”
इत्यपि निगमो भवति ॥ ५ ॥
अनुवादः ।
‘कक्ष्याः’ नाम घोड़े की रस्सो (तंग) का है। [क्योंकि-वह]
कक्ष (बगल) को सेवन करती है। [‘कक्ष’ नाम और ‘य’
तद्धित प्रत्यय ।] [पदार्थ] ‘कक्ष’ शब्द विलोडनार्थ ‘गाहू’ (भ्वा०
आ०) धातुसे होता है। ‘क्स’ यह प्रत्यय है। अथवा ‘ख्या’
प्रकथने (अदा० प०) धातुसे। अभ्यास [दो बार उच्चारण]
अनर्थक है। [अथवा सार्थक है] क्या इसमें बताने योग्य है?
अथवा ‘कष’ (भ्वा० प०) धातुसे है। [क्योंकि-वह नित्य ही
खुजली पैदा करता।] अश्वके कक्षकी समानतासे मनुष्यका कक्ष
भी ‘कक्ष’ कहलाता है। घोड़े के भी बाहुके मूल स्थानको सादृश्यसे

हिन्दी निरुक्त । २७
कक्ष कहते हैं । [ समासका उदाहरण ] राज्ञका पुरुष राज-
पुरुष कहलाता है । [ पदार्थ ] ‘राजन्’ शब्द दीप्ति-अर्थ ‘राजृ’
(भ्वा० उ०) धातुसे है । ‘पुरुष’ नाम पुरिषादका है। [क्योंकि—]
वह पुर् नाम शरीर अथवा बुद्धिमें रहता है । [ अथवा ] पुरिशय
या शरीरमें सोनेवाला होनेसे पुरुष है । अथवा ‘पूरी’ आप्यायने
(चु० उ०) धातु से ‘पुरुष’ है। भीतरसे सब जगत्को व्यापन
करता है, इस प्रकार अन्तर-पुरुषके अभिप्रायसे । [निगम ] जिससे
पर अथवा पूर्व कुछ नहीं है, जिससे सूक्ष्म अथवा स्थूल या मोटा
कुछ नहीं है, वृक्षके समान निश्चल भावसे अकेला आकाशमें खड़ा
है, उससे यह सब जगत् पूर्ण या व्याप्त है ।” यह भी निगम है ॥५॥
व्याख्या--
२य, तद्धितका उदाहरण ।
( तद्धितार्थ निर्वचन )
“कक्ष्या” । ‘कक्ष्या’—यह तद्धित है । घोड़ेके चारजामेके
कसनेकी रस्सीको कक्ष्या कहते हैं । क्योंकि—वह कक्षको सेवन
करती है, या उससे संयुक्त होती है, अथवा उसमें रहती है।
पदार्थका निर्वचन ।
कक्षः—विलोड़नार्थक ‘गाह’ धातु (भ्वा० आ०) से ‘कक्ष’
शब्द बनता है। क्योंकि—कक्षों या बगलोंमें ही किसी दबाने
योग्य वस्तुको विलोडन करता या दबाता है। ‘गाह’ धातुसे
‘क्स’ प्रत्यय जुड़नेसे ‘कक्ष’ हो जाता है। और सब कुछ जो आ-
द्यन्त विपर्यय आदि होता है, वह जैसा दिखाया है, अथवा जैसा
सम्भव हो, जहां तहां कार्यस्थलमें यथासम्भव योजन कर
लेना चाहिये ।

३८ २ अ० १ पा० ५ खं० ।
अथवा 'ख्या' धातुका अनर्थक अभ्यास (दोहराये हुए धातुका
पहिला रूप ) ककार है । अर्थात् 'ख्य' का 'कख्य' होकर 'कक्ष'
हो गया ।
अथवा ककार सार्थक ही है, अनर्थक नहीं । कैसे ?
“किमस्मिन् ख्यातम्” इति कक्षः । अर्थात् क्या इसमें ख्यात
वा प्रसिद्ध करने योग्य कुछ नहीं। क्योंकि—देखनेमें नहीं आता,
या छिपाने योग्य है। इस अर्थके अनुसार 'किंख्या' शब्द होकर
‘कक्ष' शब्द हो जाता है। अथवा—‘कष,-विलेखने' (भ्वा० प०)
धातुसे ‘कक्ष' शब्द बनता है, क्योंकि—वह नित्य काल ही स्वेदशील
होनेसे खुजली पैदा करता रहता है, इसीसे उसे (बगलको)
नखोंसे नित्य खुजाते हैं, इस रीतिसे कषण-क्रियाके सम्बन्धसे
‘कक्ष' शब्द बन जाता है। उसके सादृश्यसे मनुष्यका कक्ष भी
कक्ष कहलाता है। अश्वका भी जो बाहुका मूल देश है, वह ‘कक्ष’
कहलाता है। और उसको सेवन करनेसे अश्वके तंगको 'कक्ष्या'
कहते हैं ।
अन्य टीकाकारोंका मत ।
“पूर्वं पूर्वमपरमपरं प्रविभज्य निर्ब्रूयात्”
( नि० अ० २, पा० १ ख ० ४ )
इस वाक्यकी पहिले व्याख्या की गई है, कि—“तद्धित व
समास युक्त पदोंमें पहिले तद्धित व समासके अर्थका निर्वचन
करना, और पदोंके अर्थका निर्वचन पीछे करना।” किन्तु कोई
टीकाकार इसकी व्याख्या दूसरे प्रकारसे करते हैं कि—“पहिले
जो पद हो, उसकी निरुक्ति पहले ही करना, तथा जो पद पीछे
आवै उसकी व्याख्या पीछे ही करना” अर्थात् इनके मतमें यह
बचन तद्धित और समासके लिये नहीं है, किन्तु पदोंके निर्वचन
मात्रकी व्यवस्था करता है, इस लिये तद्धित-समासमें निर्वचन

हिन्दी निरुक्त । ३६
करनेवाले की इच्छा है, जिसे चाहे, पहिले निर्वचन करे, और जिसे
चाहे पीछे ; किन्तु भगवद्दुर्गाचार्य इसमें सहानुभूति नहीं करते,
उनके विचारमें पहिले व्याख्या ही ठीक है ।
समासका उदाहरण ।
“राज्ञःपुरुषो-’राजपुरुषः’ । ‘राजपुरुषः”-यह समस्त पद
है । 'राजका पुरुष' यह इसका अर्थ होता है। यहां ध्यानसे
देखो कि-इस वाक्यका पहिला भाग 'राजाका' यही बोला जाय
तो सभी कुछ उसका प्रतीत होता है, जबकि-इसके सामने पुरुष,
पद और कह दिया जाता है, तो अन्य सब पदार्थोंसे उसकी स्वता
या स्वाम्यता हटकर पुरुष पर ही आ जाती है, या पुरुष शब्द अप-
नेसे अन्य पदार्थोंको उसके स्वता या स्वाम्यतासे अलग करदेता है ।
इसी प्रकार जब उक्त वाक्यका दूसरा भाग 'पुरुष' यही बोला जाता
है, तो उसका सभी स्वामी प्रतीत है, जबकि-प्रथम भाग भी
उसके साथ जुड़ जाता है । तो राजाके अतिरिक्त सब स्वामी निवृत्त
होजाते हैं । अर्थात्-‘राजपुरुष’ ऐसा मिलाकर बोलनेसे राजा
अन्य स्वामियोंसे पुरुषको निवृत्त करके अपनेमें संयुक्त कर लेता हैं।
और पुरुष भी राजाको अन्य स्वकीय पदार्थोंसे निवृत्त कर अपनेमें
संयुक्त कर लेता है । इस प्रकार वे दोनों शब्द अपने अर्थोंको परस्पर
मिलाकर समस्त हो जाते है । इसीसे “राज पुरुषको ले आओ”
ऐसा कहने पर 'न राजाको ही लाते है' और न पुरुष मात्रको ही,
किन्तु राजस्वामिक (जिसका राजा स्वामी है) पुरुषको लाते हैं ।
प्रयोजन यह निकला कि, समासमें भिन्न ही शक्ति होती है, जिसका
अनुभव ख्याल करनेसे होता है । यह समासार्थ हुआ ।
यह प्रश्न हो कि-इस वाक्यमें 'राजस्वामिक' यह अर्थ कहांसे
लब्ध होता है, तो इसका उत्तर यह है कि-‘प्रधान और उपसर्जन
(गौण) पद दोनो मिलकर एक अर्थको कहते हैं ।

३० २ अ० १ पा० ५ खं० ।
पदके अर्थका निर्वचन ।
पूर्वोक्त नियमके अनुसार समासार्थका निर्वचन करके पदार्थका
निर्वचन करते हैं-“राजा” ‘राज़ृ’ दीप्तौ, ( भ्वा० उ० ) से ‘राजा
पद बनता है। क्योंकि-वह पांच लोकपालोंके शरीरसे दीप्तिमान्
होता है।
“पुरुषः” ‘पुरुष’ शब्द पुर् शब्द, जो शरीर या बुद्धिका नाम है,
सद् ( षदॢ ) विशरण गत्यवसादनेषु ( भ्वा० प० ) धातुसे बनता
है। क्योंकि-वह शरीर व बुद्धिमें विषयोंको उपलब्धि या अनुभ-
वके लिये रहता है। इससे ‘पुरिषाद’ होकर पुरुष शब्द बन गया ।
अथवा-उसी ‘पुर’ शब्दके साथमें ‘शीङ्, स्वप्ने’ ( अदा० आ० )
धातु मिलकर ‘पुरिशय’ शब्दसे ‘पुरुष’ शब्द बना। क्योंकि-वह
विशेषकर उन दोनोंमें शयन या स्थिति करता है।
अथवा-पूरयति ( पूरो आप्यायने ) ( चु० ) धातुसे ही ‘पुरुष’
शब्द बना। क्योंकि-इस पुरुषसे व्यापक होनेके कारण सब
जगत् पूर्ण है।
अथवा-‘पूरयति अन्तः’ जिससे कि-यह भीतर ही पूर्ण रहता
है, इस व्युत्पत्तिके सहारे अन्तर पुरुषके अभिप्रायसे उसी धातुसे
‘पुरुष’ शब्द बना। ( यह बात प्रासङ्गिक है । )
उक्त व्युत्पत्तिके प्रमाणमें निगम ।
“यस्मात् परं नापर मस्ति किञ्चिद्यस्मान्नाणीयो
न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि
तिष्ठत्येक स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ।
अर्थ-जिससे पर या अपर कुछ नहीं है, जिससे छोटा अथवा
बड़ा कुछ नहीं है। यह अभिप्राय है कि-सब वही है। प्रकाश-

हिन्दी निरुक्त । ३१
स्वभाव अपने आत्मस्वरूपमें वृक्षके समान निष्क्रिय भावसे स्थित
है, उसी पुरुषसे यह सब स्थावर-जङ्गम जगत् व्याप्त है ॥ ५ ॥
(खं० ६)
विश्वकद्राकर्षः । 'वि' इति "चकद्र" इति
श्वगतौ भाष्यते । 'द्राति' इति गति कुत्सना ।
'कद्द्नाति' इति द्राति कुत्सना । 'चकद्द्वाति'—
'कद्राति' इतिततः—अनर्थकः—अभ्यासः । 'तत्-
अस्मिन् अस्ति'—इति विश्वकद्रः । कल्याणवर्ण-
रूपः । कल्याण वर्णस्य इव अस्य रूपम् । कल्याणं
कमनीयं भवति । 'वर्ण:'—वृणोतेः, 'रूप' रोचतेः।
एवं तद्धित समासान् निर्ब्रूयात् । न-वैयाकरणाय,
न अनुपसन्नाय, न अनिर्दंविदे वा । नित्यं हि अवि-
ज्जातुर्विज्जाने असूया । उपसन्नायतु निर्ब्रूयात् ।
योवा—अलं विज्जातुंस्यात् । मेधाविने, तप-
स्विने वा ॥ ६ ॥
अनुवाद ।
[ व्याख्येय शब्द-] 'विश्वकद्राकर्ष'। [ व्याख्या-] 'वि'-यह
[और-] चकद्र' यह शब्द श्वान या कुत्तेकी गति या चालमें बोला
जाता है। 'द्राति' या 'द्रा' ( अदा० प० ) धातुगतिकी निन्दा
[ का वाचक है ।] 'कद्-द्राति' या 'कुत्' अव्ययके साथमें 'द्रा'
[ अदा० प० ] धातु, 'द्रा' के अर्थकी निन्दा [ का वाच-] है।

३२ २ अ० १ पा० ४ खं० ।
'चक्रद्राति'-यह 'कद् द्राति' इस कर्त्तृवाच्य आख्यातका अन-
र्थक या अर्थशून्य अभ्यास है, [ अभ्यास नाम दोहराया हुआ शब्द
है । ] वह या निन्दितसे भी कुत्तेकी गति जिसमें है,-वह विश्व-कद्रु
है । [ उसको आकर्षण करने [ खेंचनेवाले ] को 'विश्व-कद्राकर्ष'
कहते हैं ] ।
[ व्याख्येय शब्द-] 'कल्याण वर्णरूप' । [ व्याख्या-] कल्याण-
वर्ण या शुभ रूप वालेके समान जिसका रूप हो ।। [ विग्रहके शब्द-
की व्याख्या-] 'कल्याण' नाम कमनीय या वाञ्छनीयका है। ['कमु'
कान्तौ, [ भ्वा०.आ० ] धातुसे बना है । ] 'वर्ण' शब्द 'वृञ्' वरणे
( स्वा० उ० ) धातुसे है । 'रूप' शब्द 'रुच' दीप्तौ, ( भ्वा० आ०)
धातुसे है। इस [ उक्त-] प्रकारसे तद्धित और समासोका निर्व-
चन करे, किन्तु एक या अखण्ड पदोंका निर्वचन न करे ।
[ अनधिकारी-] व्याकरणके न जाननेवालेके लिये [ यह निर्वचन न
सुनावे ] न अशिष्यके लिये और न, इसको न जाननेवालेके लिये ।
क्योंकि—अजान या मूढ़को विज्ञानमें सदा ही असूया या, अश्रद्धा
या निन्दा रहती है । [ अधिकारी-] किन्तु उसके लिये जो उप-
सन्न या शिष्य धर्मसे अपने पास आवे, सुनावे । अथवा समझनेमें
पूर्णरूपसे समर्थ हो । धारणावाली बुद्धिवालेको अथवा तपस्वीको-
[ सुनावे ।] ॥ ६ ॥
व्याख्या--
समासका द्वितीय उदाहरण ।
( समासार्थ )
विश्वकद्राकर्षः'' = विश्वकद्रूवाकर्षति'—इति विश्वकद्राकर्षः ।
विश्वकद्रूको खेंचनेवाला, 'विश्वकद्राकर्ष' कहलाता है ।

हिन्दी निरुक्त । ३३

( पदार्थ ) :

विश्वकद्र = 'वि' और 'चकद्र' ये दोनों शब्द श्वानकी गति
(चाल) अर्थमें बोले जाते हैं । अर्थात्-जो मनुष्य कुत्तोंके साथ
चलता है, दोनों शब्द मिल कर उसको बोधन करते हैं। इन्हीं दोनों
शब्दोंके मेलसे 'विश्वकद्र' शब्द उत्पन्न होता है। भाष्यकार
'चकद्र' शब्दकी बनावटमें और भी महत्व बताते हैं कि—व्याकरणमें
'द्रा' (अदा० प०) धातुका कुत्सा (निन्दा) अर्थ है, और 'कत्'
जो 'कु' के स्थानमें आदेश होता है, उसका भी कुत्सित अर्थ है।
इन दोनोंके जोड़ देनेसे 'कद्रा' शब्द बन जाता है, जिसका 'निन्दित-
की निन्दा' अर्थ हो सकता है। ऐसी धातु कल्पित करके उसीके
पहिले अक्षर 'क' को 'च' से बदल कर, जिसे अभ्यास कहते हैं,
अनर्थक मान कर पढ़ते है, ऐसा करनेसे 'चकद्रा' धातु बन जाता
है। निन्दितको निन्दा यहाँ पर इस रीतिसे होती है,—कि,
कुत्तेके साथ जाना ही निन्दा है, फिर उसके साथ प्राणियोंकी
हिंसा भी करना यह दूसरी निन्दा हो जाती है। इस प्रकार
'खोटी गति और खोटीसे भी खोटी गति' ये दोनो जिसमें हों, वो
पुरुष 'विश्वकद्र' कहाता है, उसको किसी अपराधमें जो दूसरा
मनुष्य, आकर्षण करता है, उसे 'विश्वकद्राकर्ष' कहते हैं।
दूसरा प्रकार ।
कोई आचार्य कहते हैं कि—कुत्ता ही 'विश्वकद्र' है, क्योंकि—
स्वभावसे ही इसकी हिंसाशील होनेसे कुत्सित गति होती है, और
फिर उसके पैर भी विकल (बिगड़े हुए–टूटेके समान) होते हैं।
इससे उसकी कुत्सितसे भी कुत्सितता है, 'वि' शब्द दोनों अर्थोंके
मत्वर्थ को बतानेवाला है, जिसके योगसे प्रतीत होगा कि—ऐसी
गतियों वाला, इस रीतिसे कुत्तेका नाम 'विश्वकद्र' होता है, उसे
विश्वकद्राकर्ष है।

३४ २ अ० १ पा० ६ खं० ।
मेरी समझमें यदि 'वि, श्वन, कद्रा' ( धा०) इनको जोड़ कर
विश्वकद्रु शब्द बनाया जाय तो और भी अनुकूलता पडती है।
जैसे कि-"विशेषेण श्वभिः सह कद्राति ('कुत्सितां कुत्सित-
तराञ्च गतिं करोति' ) इति विश्वकद्रुः । अधिकतासे कुत्तोंके साथ
बुरी और बुरोसे भी बुरी गति करता है, वो 'विश्वकद्रु' होता है।
रूप-समास ।
( समासार्थ )
कल्याणवर्णरूपः—कल्याण वर्णके समान है रूप जिसका,
वो 'कल्याणवर्ण रूप' कहलाता है। कल्याणवर्ण नाम सुवर्णका
है। उसके समान जिसका रूप हो वह कल्याणवर्ण है, अग्नि या
और कोई ।
पदार्थ ।
"कल्याणम्" 'कमनीयम्' क्योंकि-वह सबको प्रार्थनीय होता
है, इससे वह कल्याण कहलाता है।
"वर्णः"-वर्ण नाम रूपका है, क्योंकि-वह अपने आश्रय या
आधारको आवरण कर लेता है।
"रूपम्" 'रूप' शब्द 'रुच-दीप्तौ' ( भ्वा० आ० ) धातुसे बनता
है, क्योंकि-वह प्रदीप्त होता है।
उपसंहार ।
इस प्रकारसे तद्धित और समासयुक्त पदोंका निर्वचन करना
चाहिये ।
चेतावनी ।
जो 'एकपद' शब्द हैं, उनका निर्वचन ऐसी अवस्थामें न करना
चाहिये कि-जब कोई द्रोहबुद्धिसे चाहे जहां पूछे, अर्थात् अपनी
बुद्धिकी प्रगाढ़ता या तीव्रता दिखानेके लिये अथवा किसी अन्य

हिन्दी निरुक्त । ३५
कारणसे स्वतन्त्रतापूर्वक निर्वचन न करे। क्योंकि-उन शब्दोंके
अर्थका निश्चय प्रकरणसे या उसके समीपस्थ पदोंके सहारेसे
होता है।
यदि प्रकरणको न समझ कर अन्यथा ही निर्वचन करेगा, तो
प्रत्यवाय या पापके सम्बन्धसे हानि होगी।
जैसे कि—“जहा” (४, १, १) यह ‘एकपद’ है, यदि प्रकरण
अथवा उपपदकी उपेक्षा करके इसकी व्याख्या की जाय, तो नहीं
जाना जाता—‘क्या यह ‘हन्’ धातुका है, या ‘ओहाक् त्यागे’
(जुहो० प०) का ।’
जबकि—प्रकरण और उपपदकी अपेक्षासे इसका निर्वचन करते
हैं, तो “मान एकस्मिन्” (ऋ० सं०-६, ३, ४८, ४) में “मावधीः”
यह पद है, उसीसे-“यह ‘हन्’ धातुका ही रूप है,” यह निश्चय
हो जाता है।
जिस पदके प्रकरण और समीपवर्ती पदका उज्ञान हो जाता
है, उसीका अर्थ करना समञ्जस या न्याययुक्त होता है, इस रीतिसे
जिन शब्दोंके संस्कारोंका पता नहीं है, ऐसे ‘एकपद’ शब्दोंका
निर्वचन प्रकरण अथवा उपपदकी सहायतासे किया जा सकता
है। इसीलिये ‘एकपद’ शब्दोंके निर्वचनका निषेध किया है।
समाम्नायके श्रवणका अधिकारी ।
निर्वचनका लक्षण कहा गया, किन्तु अब उस पुरुषका लक्षण
कहना चाहिये, जिसके लिये, ऐसे निर्वचनवाले समाम्नायका उप-
देश किया जावे। इस कारण अब उस श्रवणके अधिकारीका
लक्षण कहते हैं।
त्याज्य श्रोता ।
१—“नावैयाकरणाय”। जिसने व्याकरण-शास्त्र नहीं पढ़ा हो,
क्योंकि-वह लक्षणका जानकार न होनेसे व्युत्पत्तिपूर्वक

३६ २ अ० १ पा० ६ खं० ।
निर्वचन करने पर भी न समझेगा तथा श्रमकी व्यर्थता होगी।
२—"नानुपसन्नाय"। "क्या ही इसने बड़ा अद्भुत काम किया
है, जोकि-इसने व्याकरण पढ़ लिया है"—ऐसे गौरवके साथ
उस वैयाकरणको भी यह शास्त्र न पढ़ाया जाय जो गुरुका अभक्त
हो। क्योंकि-धर्म सर्वथा ही अपरित्याज्य है, इससे वैयाक-
रणको भी, उसीको पढ़ाना जो सच्ची शिष्यवृत्ति रखता है।
३—(क) "अनिदंविदे" वैयाकरण भी कोई जड़ होता है, जिसको
समझाने पर भी नहीं समझ पड़ता। जिससे कि-इस
शास्त्रमें देवता आदि अनेक सूक्ष्म पदार्थ ज्ञातव्य हैं,
इसीलिये जो इस शास्त्रकी बातोंको विशेष रूपसे सम-
झनेमें असमर्थ हो, उसे वैयाकरण होने पर भी न बतावे।
(ख) जो आत्मवित् न हो, उसे भी न पढ़ावे। किन्तु आत्म-
वेत्ता या योगीको ही इस शास्त्रका उपदेश करे। क्यो-
कि—उस पुरुषके आत्मज्ञानसे सब पाप दूर होजाते
हैं, इसलिये वह थोड़े ही यत्नसे सूक्ष्म अर्थोंको जान-
नेमें समर्थ होता है।
(ग) अथवा—किसी शास्त्रके जाननेवालेसे 'इदं वित्' पदका
प्रयोजन है, जिसने पहिले कोई भी शास्त्र न पढ़ा हो,
उस अनिदंविद, मलिन या संस्कार-शून्यहृदयको यह
शास्त्र उपदेश नहीं करना चाहिये।
इसका कारण यह है कि—जिस पुरुषको किसी प्रकारका भी
विज्ञान नहीं होता, वह स्वयम् न समझता हुआ अपने दोषको
आचार्यमें ही लगाता है, कि—"आप ही गुरु नहीं समझता है, मुझे
क्या समझावेगा" इसलिये जिसने पहिले अन्य शास्त्र नहीं पढ़ लिया
हो, तथा किसी प्रकारका शास्त्रके जाननेके लिये मनमें जिसे खेद
न हो, उसे निरुक्त शास्त्र नहीं पढ़ाना।

हिन्दी निरुक्त । ३७
ग्राह्य अधिकारी ।
१-जो कोई भी पुरुष मेधावी हो, जिसे जन्मान्तरोंके अनुभवोंके
संस्कार हो, अथवा तपस्वी हो, ये चाहे व्याकरण न भी पढ़े
हों, किन्तु दोनोंको यह शास्त्र पढ़ाना चाहिये । क्योंकि-इन
दोनों प्रकारके पुरुषोंको कुछ असाध्य नहीं है। जैसे-पूर्वकालमें
तपके प्रभावसे ही स्वयम् ही ऋषियोको वेदार्थका प्रादुर्भाव होगया
था, इसो प्रकार मेधावी पुरुष भी स्वयम् उत्प्रेक्षा करनेमें समर्थ
हो सकता है, फिर उससे कहा जाय तो समझनेमें आश्चर्यही क्या है।
अथवा और कोई पुरुष दृढ़ग्राही वा स्थिरमति शास्त्रके अर्थको
समझनेमें समर्थ हो, ऐसे मनुष्यके लिये सर्वथा ही निर्वचन करे ।
किन्तु जो शरणागत न हो, उसके लिये कभी न उपदेश करे, चाहे वो
तपस्वी, मेधावी तथा दृढ़ग्राही क्यों न हो ? जैसा कि-कहा है।
“यश्चान्यायेन निब्रूयात् यश्चान्यायेन पृच्छति ।
तयोरन्यतरो मृत्युं विद्वेषं वाधिगच्छति ॥ ६॥”
अर्थः—जो अन्यायसे निर्वचन करे और जो अन्यायसे पूछे, उन
दोनोंमें जो दोषी हो वह, मृत्युको या विद्वेषको प्राप्त होता है।
( खं० ७ )
“विद्याह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय
मा शेवधिष्टेऽहमस्मि ।
असूयकायानुजवेऽयताय न मा
ब्रूया वीर्यवती तथास्याम् ॥
य आवृणोत्यवितथेन कर्णा व
दुःखं कुर्वन्नमृतं सम्प्रयच्छन् ।
तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै
न द्रुह्येत्कतमच्च नाह ॥

३८ २ अ० १ पा० ७ खं० ।
अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्ते
विप्रा वाचा मनसा कर्मणाऽवा ।
यथैव ते न गुरोर्भोजनीया-
स्तथैव तान्न भुनक्ति श्रुतं तत् ॥
यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं
ब्रह्मचर्योपपन्नम् ।
यस्ते न द्रुह्येत्कतमच्च नाह तस्मै
माब्रूया निधिपाय ब्रह्मन् ॥”
इति-। निधिः शेवधिः,-इति ॥ ७ ॥
विद्याकी अधिदेवता इच्छित रूप धारण कर किसी वेद-वेदाङ्गों-
के जाननेवाले जितेन्द्रिय ब्राह्मणके पास आई, और उसके पास
जा कर नम्र हो कर बोली—
विद्या—हे ब्रह्मन् ! तू मेरी रक्षा कर । फिर रक्षित होकर मैं तेरे
सुखका निधान या कोश बनूंगी ।
ब्राह्मण—मैं किससे तेरी रक्षा करू ?
विद्या—जो मनुष्य दूसरेमें दोषारोप किया करते हैं, जिसकी
वृत्तियां मन, वाणी, और देहमें समानतासे नहीं रहतीं,
तथा जिसकी इन्द्रियां चञ्चल हों, या जिसके किसी न
किसी अङ्गमें अपवित्रता बनी रहती हो, ऐसे मनुष्यके लिये
मुझे मत दे ।
ब्राह्मण—ऐसा करनेसे क्या होगा ?
विद्या—ऐसा करनेसे तुम्हारी मैं वीर्यवती हो जाऊंगी, किञ्च जो
ब्राह्मण शिष्यके खुले हुए कानोंको सत्य-ब्रह्म (वेद) से
भर देता है, जिसके भरनेसे उसे सुख हो जाता है, जो
ब्राह्मण मोक्षके देनेवाले ज्ञानको देता हुआ उसके कानोंको
भरता है, उसीको माता तथा पिता मानें, किन्तु दूसरे
जन्मदाताओको नहीं, कहा भी है—

हिन्दी निरुक्त । ३६
“उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता ।
“ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥
[ म० सं०-२, १४६ ]
अर्थः—जन्म देनेवाले और ब्रह्म ( वेद ) के देनेवाले दोनों पिताओंमें
ब्रह्म देनेवाला ही पिता श्रेष्ठ होता है, क्योंकि-ब्रह्मजन्म ही
ब्राह्मणका इस लोक और परलोकमें स्थायी रहनेवाला है।
उस गुरुके लिये जो अकेला ही माता-पिता दोनोंकी मूर्त्ति है,
कभी द्रोह न करे, चाहे घोर आपत्ति पड़े ॥
दुष्ट शिष्योंके लिये—
जो ब्राह्मण मेधावी, गुरुसे विद्या पढ़ कर फिर उसका मन
वाणी तथा कर्मसे आदर नहीं करते, वे जिस प्रकार गुरुके भोजन
योग्य नहीं होते ( उनके यहां गुरु भोजन नहीं करते ) उसी प्रकार
पढ़ा हुआ शास्त्र भी उनको रक्षा नहीं करता, अर्थात् शास्त्रके फलसे
उन्हें संयुक्त नहीं करता ।
विद्या देने योग्य शिष्य ।
हे ब्रह्मन् ! जिसको तू जाने कि- “यह शुचि है, यम-नियमोंमें
अप्रमत्त है, मेधावी है, ब्रह्मचर्यसे युक्त है, और जो तेरे लिये किसी
आपत्तिकी अवस्थामें भी द्रोह न करे, उसो तेरे विद्या-रूप कोशकी
रक्षा करनेवालेको तू मुझे दे ॥”
“निधिः” । ‘निधि’ शब्दका अर्थ ‘शेवधि’ है, ‘शेव’ नाम
सुखका और उसके निधान या आश्रयको ‘शेवधि’ कहते हैं ॥ ७ ॥
इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः
समाप्तः ।

२ अ० २ पा० १ खं०।
द्वितीय पादः ।
अथ निघण्टु प्रथमाध्यायः ॥ १ ॥
[निघ०-] गौः (१) । ग्मा (२) । ज्मा (३) । क्ष्मा
(४) । क्षा (५) । क्षमा (६) । क्षोणिः (७) ।
क्षितिः (८) । अवनिः (६) । उर्वी (१०) ।
पृथ्वी (११) । मही (१२) । रिपः (१३) ।
अदितिः (१४) । इला (१५) । निर्ऋतिः
(१६) । भूः (१७) । भूमिः (१८) । पूषा
(१६) । गातुः (२०) । गोत्रा (२१) । इति-
एकविंशतिः पृथिवीनामधेयानि ॥ १ ॥
( खं० १ )
अथ-अतः-अनुक्रमिष्यामः । ‘गौः’-इति पृथिव्या
नामधेयम् । यद् दूरं गता भवति । यत् च अस्यां
भूतानि गच्छन्ति । गतेर्वा ‘औ’कारो नामकरणः ।
अथापि-पशुनाम इह भवति-एतस्मात्-एव ।
अथापि-अस्यां ताद्धितेन कृत्स्नवत्-निगमा भ-
वन्ति । [ यथा-] “गोभिः श्रीणीत मत्सरम्” [ऋ०
सं०; ७, १, ३, ४ ] इति पयसः । ‘मत्सरः’ सोमः,
मन्दतेः-तृप्तिकर्म्मणः । ‘मत्सरः’-इति लोभनाम ।
अभिमत्तः एनेन धनं भवति । ‘पयः’ पिबतेर्वा;

हिन्दी निरुक्त । ४१
ध्यायतेर्वा । 'क्षीरं' क्षरतेः, घसेर्वा । 'ई' कारो नाम-
करणः । 'उशीरम्'-इति यथा ।
“अंशुं दुहन्तो अध्यासते गवि” [ ऋ० सं०; ८,
४, ३०, ४] इति अधिषवण चर्मणः । 'अंशुः' शमष्ट-
मात्रो भवति । अननाय शं भवति,-इति वा । 'चर्म'
चरतेर्वा । उच्चृतं भवति-इति वा ।
अथापि-चर्म च श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः
सन्नद्धो असिवोल यस्व” [ ऋ० सं०; ४, ७, ३५, १ ]
इति-रथस्तुतौ ।
अथापि-स्नाव श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः
सन्नद्धा पतति प्रसूता”-इति-इषुस्तुतौ ।
ज्यापि 'गौः' उच्यते । गव्या चेत्, ताद्धितम् ।
अथ चेत्,-न गव्या, गमयति,-इषून् इति [यथा-] ॥१॥
अनुवाद ।
जिससे कि-सामान्य व्याख्या होचुकी इसीसे अब शब्दोंको
विशेष व्याख्याके लिये अनुक्रमण करेंगे । 'गो' यह पृथिवीका नाम
है, जिससे कि—दूर गई हुई है। और जिससे कि—इसमें प्राणी
गमन करते हैं। अथवा 'गाङ्' गतौ ( भ्वा० आ० ) धातुसे है।
'ओ' प्रत्यय होजाता है।
और-इसी धातु और व्युत्पत्तिसे यहाँ पशुका भी नाम होता है।
और-इस गो पशुमें पूरे अर्थके समान गौण-रूपसे प्रयोग होनेमें
[ मन्त्र ] निगम या ज्ञापक हैं। [ जैसे—]

४२ २ अ० २ पा० १ खं० ।
“गोभिः श्रोणीत मत्सरम्”-[ अर्थ-] दूधसे सोमको पकाओ ।
इस ऋचामें 'गो' नाम दूधका है। 'मत्सर' नाम सोमका है। तृप्ति
अर्थमें 'मदि' [ भ्वा० आ० ] धातुसे है। 'मत्सर' यह लोभका
नाम भी है। क्योंकि-लोभसे धन, और उससे मनुष्य उन्मत्त
होता है। 'पयस्' शब्द 'पा' पाने (भ्वा० प०) धातुसे होता है।
अथवा 'ओप्यायी' वृद्धौ (भ्वा० आ०) धातुसे । 'क्षीर' शब्द 'क्षर'-
श्च्योतने (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा 'घस्लृ' अदने (भ्वा०
प०) धातुसे । 'ईर' प्रत्यय होता है। जैसे-'उशीर' शब्दमें ।
'अंशुं दुहन्तो अध्यासत गवि” इस ऋचामें 'गो' नाम अधि-
षवण चर्मका है। 'अंशु' नाम यजमानको सम्बन्ध मात्रसे ही
सुखका देनेवाला । अथवा सब प्राणियोंके जीवनके लिये सुखरूप
होनेवाला। 'चर्म' शब्द 'चर' गतौ (भ्वा० प०) धातुसे है।
अथवा शरीरसे उखाड़ा जाता है, इसीसे वह चर्म है। ['वृती'
हिंसायाम् (तु० प०) धातुसे है।]
और-'गो' नाम चर्म और श्लेष्माका भी है। जैसे-
“गोभिः सन्नद्धो असिवौल यख”
अर्थः-'हे रथ तू 'गो' नाम चर्मसे मढ़ा हुआ, अथवा चर्बीसे चुपड़ा
हुआ है, तू चल' इस रथकी स्तुतिमें ।
स्नाव (नाड़ी) और श्लेष्मा (चर्बी) का भी वाचक है। [जैसे-]
“गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता”
[अर्थः-] जो बाण गो या सूक्ष्म आँतोंके सूतोंसे बंधी हुई, और
धनुष्मान्से प्रेरित हुई चलती है।
ज्या-नाम धनुष्की तांत भी 'गो' कहलाती है। यदि वह
गोके द्रव्यसे बनी हो, तो वहाँ 'गो' शब्द गौण है। और यदि
गौकी नहीं है, तो 'बाणोंको चलाती है', इस व्याख्यासे मुख्य है ॥१॥

हिन्दी निरुक्त । ४३
व्याख्या ।
यास्क मुनिने जैसी प्रतिज्ञा की थी, कि-'मैं समाम्नायकी
व्याख्या करूंगा।' उसके अनुसार आप सम्पूर्ण समाम्नायकी
सामान्य व्याख्याको पूरी कर चुके हैं,-जैसे कि, 'यह सब नामोंका
सामान्य लक्षण है'-'यह आख्यातोंका'-'यह उपसर्गोंका' और
'निपातोंका' एवम्, उसीके प्रसङ्गमें शास्त्रके आरम्भके प्रयोजन कहे,
१ आगमका परिशोधन किया, वेद और वेदाङ्गोंका विस्तार प्रयोजन
सहित कहा, निघण्टु समाम्नायको तीन प्रकरणोंके विभागोंसे
विरचनाका उपदेश किया, तथा अनेक विस्तारोंके सहित निर्वचन-
का लक्षण कहा ।
अब विशेष व्याख्यासे समाम्नायकी प्रतिपद व्याख्या करना है,
उसीके लिये विशेष प्रतिज्ञा करते हैं—“अथातोऽनुक्रमिष्यामः”
विशेष व्याख्याका परिचय ।
विशेष व्याख्यासे प्रयोजन एक एक शब्दकी व्याख्यासे है,
सामान्य व्याख्यामें शब्दोंके बड़े बड़े समूहोंके साथ परिचय दिये
जाते हैं, जैसे—आख्यात और नाम आदि । किन्तु यहाँ निघण्टुमें
जो ‘गौः’ ‘ग्मा’ ‘ज्मा’ आदि “देवपत्नी” पर्य्यन्त शब्द परिगणन
किये हैं, उनमेंसे एक एक शब्दकी पृथक् पृथक् व्याख्या होगी ।
जिस प्रकार सामान्य व्याख्यामें आपने अनेक प्रसङ्गोंकी आप-
त्तियोंके साथ अनेक उत्तम विषयोंका प्रदर्शन कराया है, उसी प्रकार
आपकी विशेष व्याख्या भी बहुत चमत्कारोंको अङ्कमें लिये हुए
है । निरुक्त-शास्त्रको आद्यन्त देखनेसे प्रतीत होता है कि—इस
शास्त्रके द्वारा वेदके जिस विभागकी पूरी व्युत्पत्ति होती है, वह
१—मन्त्रोंके आनर्थक्यका आक्षेप और उसका समाधान ।

४४ २ अ० २ पा० १ ख० ।

दूसरे किसी वेदाङ्ग या शास्त्रसे नहीं हो सकती, सर्वथा यह अङ्ग
अपने प्रयोजनके लिये स्वतन्त्र और महत्व-पूर्ण है । शब्दोंके अर्थके
स्थिर करने तथा उनके ऐतिहासिक तत्वकी शिक्षा देनेमें अन्य,
शास्त्रोंसे इसका प्रथम आसन है, इसमें कोई आपत्ति नहीं उठा
सकता ।
जिस प्रकार इस समाम्नायमें 'नैघण्टुक' 'नैगम' और 'दैवत'
यह तीन काण्ड अलग अलग स्थित हैं, उसी प्रकार इनकी विशेष
व्याख्यायें भी पृथक् पृथक् प्रकारकी हैं। ऐसा होना भी चाहिये
था, क्योंकि—जब उनमे पृथक् पृथक् जातिके शब्द हैं, तो उनकी
व्याख्याके उपाय या साधन भी पृथक् पृथक् होगे । इस स्वाभाविक
नियमके अनुसार प्रथम क्रमागत नैघण्टुक काण्डमें प्रत्येक शब्दकी
व्याख्यामें आवश्यकतानुसार प्रायः सात बातें दिखाई जावेंगी।
जैसे—तत्व या व्याख्येय शब्दका वाच्य-अर्थ (१) पर्याय शब्द जो
उसका समानार्थक, और उसी अर्थमें प्रसिद्ध हो (२) भेद या
व्याख्येय शब्दकी व्युत्पत्ति (३) संख्या या निघण्टुमें व्याख्येय
शब्दके समान अर्थमें दिखाये हुए शब्दोंकी गणना (४) संदिग्ध,
व्याख्येय शब्दका वह अर्थ जो दिखाये हुए अर्थसे भिन्न हो (५)
सन्दिग्धोदाहरण, अर्थात्-वह उदाहरण, जिसमें उन दोनों अर्थोंका
सम्भव हो (६) और उसका निर्वचन, अर्थात् जो मन्त्र या निगम
उदाहृत किया है, उसकी व्याख्या (७) ।
वास्तवमें व्याख्या उसीको कहते हैं, कि-जिस वस्तुकी व्याख्या
करना हो, उस वस्तुके सम्बन्धको लेकर जितने प्रश्न उठ
सकें, उनमें प्रत्येकका उत्तर दिया जाय । परन्तु मैं जहां तक
समझता हूं, संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसके सम्बन्धको
लेकर उठनेवाले प्रश्नोंका अन्त हो, सुतराम्, संसारकी प्रत्येक
वस्तुके सकल प्रश्नोके अन्त पर अपने प्रश्नोंके अन्तको निर्भर करती

हिन्दी निरुक्त । ४५
है। इस रीतिसे जो पुरुष किसी एक वस्तुकी व्याख्या करने
बैठता है, मानो वह सकल संसारकी ही व्याख्या करेगा, किन्तु
ऐसा करना सर्वथा असाध्य है, यदि साध्य होता तो अबतक कोई
महापुरुष वैसा कर ही डालता, या, यो समझिये कि-संसारमें
जितने पुस्तक हैं, वे सब उसी महाव्याख्याके भाग मात्र है। इस
लिये मानना होगा कि-जिस वस्तुको व्याख्यामें वक्ताकी इच्छा-
नुसार जितने प्रश्न आवश्यक या उपयुक्त हों, उनके उद्धारका ही
नाम व्याख्या है।
इसी प्रयोजनसे हमारे यास्क मुनि भी प्रत्येक व्याख्येय शब्दों-
मे आवश्यक प्रश्नोंको दिखाते हैं, जिनके द्वारा अध्येता पुरुष शब्दोंके
अर्थनिर्णयमें पूर्ण योग्यता प्राप्त कर लेता है। ऐसे व्याख्याके
समझानेके लिये कोई कल्पित उदाहरण न रख कर यास्क मुनिके
प्रथम व्याख्येय गो शब्द (गौः) तथा उसकी व्याख्याको ही हम लेते
हैं, उसीके अनुसार सकल निघण्टुक शब्दोंमें कल्पना करना होगी।
“गौः”
व्याकरणके समान इस शास्त्रका भी प्राधान्यसे शब्दतत्व ही
सामान्य व विशेष रूपसे व्याख्येय होता है, इस लिये यहाँ 'गौः'
आदिके कहनेसे उसके अर्थकी व्याख्याका लक्ष्य न समझ कर शब्द-
के स्वरूप पर ही ध्यान रखना होगा।
यहाँ “गौः” या 'गो' शब्द, जिसका शरीर 'ग्-ओ'-इन दो
अक्षरोंसे बना हुआ है, व्याख्येय है।
(१) गो शब्दका तत्व क्या है, जिसका यह अभिधान करता है ?
पृथिवीरूप द्रव्य।
(२) गो शब्दका पर्याय क्या है, जो इसके अभिधेय अर्थको अभि-
धान करता है ? 'पृथ्वी' शब्द।