निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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करनेवाले की इच्छा है, जिसे चाहे, पहिले निर्वचन करे, और जिसे
चाहे पीछे ; किन्तु भगवद्दुर्गाचार्य इसमें सहानुभूति नहीं करते,
उनके विचारमें पहिले व्याख्या ही ठीक है ।
समासका उदाहरण ।
“राज्ञःपुरुषो-’राजपुरुषः’ । ‘राजपुरुषः”-यह समस्त पद
है । 'राजका पुरुष' यह इसका अर्थ होता है। यहां ध्यानसे
देखो कि-इस वाक्यका पहिला भाग 'राजाका' यही बोला जाय
तो सभी कुछ उसका प्रतीत होता है, जबकि-इसके सामने पुरुष,
पद और कह दिया जाता है, तो अन्य सब पदार्थोंसे उसकी स्वता
या स्वाम्यता हटकर पुरुष पर ही आ जाती है, या पुरुष शब्द अप-
नेसे अन्य पदार्थोंको उसके स्वता या स्वाम्यतासे अलग करदेता है ।
इसी प्रकार जब उक्त वाक्यका दूसरा भाग 'पुरुष' यही बोला जाता
है, तो उसका सभी स्वामी प्रतीत है, जबकि-प्रथम भाग भी
उसके साथ जुड़ जाता है । तो राजाके अतिरिक्त सब स्वामी निवृत्त
होजाते हैं । अर्थात्-‘राजपुरुष’ ऐसा मिलाकर बोलनेसे राजा
अन्य स्वामियोंसे पुरुषको निवृत्त करके अपनेमें संयुक्त कर लेता हैं।
और पुरुष भी राजाको अन्य स्वकीय पदार्थोंसे निवृत्त कर अपनेमें
संयुक्त कर लेता है । इस प्रकार वे दोनों शब्द अपने अर्थोंको परस्पर
मिलाकर समस्त हो जाते है । इसीसे “राज पुरुषको ले आओ”
ऐसा कहने पर 'न राजाको ही लाते है' और न पुरुष मात्रको ही,
किन्तु राजस्वामिक (जिसका राजा स्वामी है) पुरुषको लाते हैं ।
प्रयोजन यह निकला कि, समासमें भिन्न ही शक्ति होती है, जिसका
अनुभव ख्याल करनेसे होता है । यह समासार्थ हुआ ।
यह प्रश्न हो कि-इस वाक्यमें 'राजस्वामिक' यह अर्थ कहांसे
लब्ध होता है, तो इसका उत्तर यह है कि-‘प्रधान और उपसर्जन
(गौण) पद दोनो मिलकर एक अर्थको कहते हैं ।