निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ २ अ० १ पा० ४ खं० ।
'चक्रद्राति'-यह 'कद् द्राति' इस कर्त्तृवाच्य आख्यातका अन-
र्थक या अर्थशून्य अभ्यास है, [ अभ्यास नाम दोहराया हुआ शब्द
है । ] वह या निन्दितसे भी कुत्तेकी गति जिसमें है,-वह विश्व-कद्रु
है । [ उसको आकर्षण करने [ खेंचनेवाले ] को 'विश्व-कद्राकर्ष'
कहते हैं ] ।
[ व्याख्येय शब्द-] 'कल्याण वर्णरूप' । [ व्याख्या-] कल्याण-
वर्ण या शुभ रूप वालेके समान जिसका रूप हो ।। [ विग्रहके शब्द-
की व्याख्या-] 'कल्याण' नाम कमनीय या वाञ्छनीयका है। ['कमु'
कान्तौ, [ भ्वा०.आ० ] धातुसे बना है । ] 'वर्ण' शब्द 'वृञ्' वरणे
( स्वा० उ० ) धातुसे है । 'रूप' शब्द 'रुच' दीप्तौ, ( भ्वा० आ०)
धातुसे है। इस [ उक्त-] प्रकारसे तद्धित और समासोका निर्व-
चन करे, किन्तु एक या अखण्ड पदोंका निर्वचन न करे ।
[ अनधिकारी-] व्याकरणके न जाननेवालेके लिये [ यह निर्वचन न
सुनावे ] न अशिष्यके लिये और न, इसको न जाननेवालेके लिये ।
क्योंकि—अजान या मूढ़को विज्ञानमें सदा ही असूया या, अश्रद्धा
या निन्दा रहती है । [ अधिकारी-] किन्तु उसके लिये जो उप-
सन्न या शिष्य धर्मसे अपने पास आवे, सुनावे । अथवा समझनेमें
पूर्णरूपसे समर्थ हो । धारणावाली बुद्धिवालेको अथवा तपस्वीको-
[ सुनावे ।] ॥ ६ ॥
व्याख्या--
समासका द्वितीय उदाहरण ।
( समासार्थ )
विश्वकद्राकर्षः'' = विश्वकद्रूवाकर्षति'—इति विश्वकद्राकर्षः ।
विश्वकद्रूको खेंचनेवाला, 'विश्वकद्राकर्ष' कहलाता है ।