निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ २ अ० १ पा० ६ खं० ।
मेरी समझमें यदि 'वि, श्वन, कद्रा' ( धा०) इनको जोड़ कर
विश्वकद्रु शब्द बनाया जाय तो और भी अनुकूलता पडती है।
जैसे कि-"विशेषेण श्वभिः सह कद्राति ('कुत्सितां कुत्सित-
तराञ्च गतिं करोति' ) इति विश्वकद्रुः । अधिकतासे कुत्तोंके साथ
बुरी और बुरोसे भी बुरी गति करता है, वो 'विश्वकद्रु' होता है।
रूप-समास ।
( समासार्थ )
कल्याणवर्णरूपः—कल्याण वर्णके समान है रूप जिसका,
वो 'कल्याणवर्ण रूप' कहलाता है। कल्याणवर्ण नाम सुवर्णका
है। उसके समान जिसका रूप हो वह कल्याणवर्ण है, अग्नि या
और कोई ।
पदार्थ ।
"कल्याणम्" 'कमनीयम्' क्योंकि-वह सबको प्रार्थनीय होता
है, इससे वह कल्याण कहलाता है।
"वर्णः"-वर्ण नाम रूपका है, क्योंकि-वह अपने आश्रय या
आधारको आवरण कर लेता है।
"रूपम्" 'रूप' शब्द 'रुच-दीप्तौ' ( भ्वा० आ० ) धातुसे बनता
है, क्योंकि-वह प्रदीप्त होता है।
उपसंहार ।
इस प्रकारसे तद्धित और समासयुक्त पदोंका निर्वचन करना
चाहिये ।
चेतावनी ।
जो 'एकपद' शब्द हैं, उनका निर्वचन ऐसी अवस्थामें न करना
चाहिये कि-जब कोई द्रोहबुद्धिसे चाहे जहां पूछे, अर्थात् अपनी
बुद्धिकी प्रगाढ़ता या तीव्रता दिखानेके लिये अथवा किसी अन्य