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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

४६ २ अ० २ पा० १ खं० ।
(३) गो शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है, या वह क्या कारण है, जिससे
यह गो शब्द अपने पृथिवीरूप द्रव्य अर्थ पर रहता है ?
[ क ] यह दूर तक गई हुई है, “दूरं गता भवति” अर्थात् जहाँ
तक मनुष्य जाय, वहां सब जगह मिलती है, इसका अन्त
नहीं है । प्रयोजन यह है कि—‘ग्’ गमॢ गतौ (भ्वा०
प०) का होनेसे गमन अर्थको बोधन करता है, और
‘ओ’ (उ० प्र०) सम्बन्धको, क्योंकि-पृथिवीमें गमनका
सम्बन्ध है, इसीसे इन दोनों अक्षरोंका योगरूप ‘गो’
शब्द पृथिवी पर गया ।
[ ख ] जिससे कि-इस पर सब भूत ( प्राणी ) गमन करते हैं,
इसीसे यह ‘गो’ है, इस व्युत्पत्तिमें भी दूसरे प्रकारसे
गमनके सम्बन्धके कारण ही ‘गो’ शब्द पृथिवी द्रव्यमें
रहता है । “यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति” ।
(४) क्या ‘गो’ शब्द ‘गमॢ गतौ’ ( भ्वा० प० ) धातुसे अतिरिक्त
धातुसे भी बन सकता है ? हाँ, ‘गाङ् गतौ’ ( भ्वा० आ० )
धातुसे । इसमें भी ‘गम्’ के समान ‘ग्’ और गति अर्थ
दोनों हैं ।
(५) क्या ‘गो’ शब्द ‘गम्’ या ‘गा’ धातुसे ही बनता है, इसमें
किसी नामकरण प्रत्ययके योगकी आवश्यकता नहीं है ?
नहीं, है,-इसमें ‘ओ’कार नामकरण प्रत्यय है । “ओकारो
नामकरणः” ।
धातु केवल क्रियाहीको कहता है, किन्तु उसके सम्बन्धको
नहीं, इसीसे वह अकेला किसी द्रव्यका नाम नहीं बन सकता,
जैसे जो धातु खानेका नाम है, वह खानेवालेका नहीं हो सकता,
उसके बोधनके लिये भाषामें खानेके सामने ‘वाला’ शब्दके समान
किसी शब्दके योगकी अपेक्षा रहती है, ऐसे ही सम्बन्धके बोधक

हिन्दी निरुक्त । ४७
शब्दंशोंको कृत् प्रत्यय या नामकरण कहते हैं। इसी प्रकार धातुओं-
से नामकरणोंके योग होनेसे सब नाम बनते हैं। यही नामकरण
प्रत्ययोंकी नामकरणता है।
(६) क्या निघण्टुके अनुसार 'गो' शब्दका पृथिवी द्रव्य ही अर्थ है,
अन्य कोई नहीं ? नहीं, है, इन्हीं दोनों कारकोंमें तथा इन्हीं
दोनों धातुओंसे 'गो' यह पशुका नाम होता है। अर्थात्
यह भी स्वयम्, गमन करता है, तथा इसमें भी मनुष्य
दुग्धादिके लिये गमन करते हैं। “अथापि पशुनामेह भवति” ।
(७) क्या यह 'गो' शब्द जिस प्रकार सम्पूर्ण 'गो', पशुको बोधन
करता है, उसी प्रकार उसके किसी भाग विशेषको भी
बोधन करता है ? हाँ, कहीं, गोके दूधका नाम भी हो जाता
है। जैसे-'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' । [ ऋ० सं०-७,
१, ३, ४ ]
यह अनेक प्रकारसे शब्दकी वृत्तिका विषय इस लिये दिखाया
जाता है कि-क्यों नहीं शिष्य, इस प्रकारसे शब्दकी वृत्तियोंको
जान कर मन्त्रोंके अर्थोंका निर्वचन करेगा ।
“आधावता सुहस्त्यः शुक्राष्टभ्णीत मन्थिना ।
गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ॥” [ ऋ० सं०, ७, १, ३, ४ ]
अथास्य आङ्गिरस ऋषि, गायत्री छन्दः, ग्राव (पाषाण)
स्तुतिमें विनियोग ।
हे सुवर्णसे अलकृत हस्तवाले अध्वर्युओ ! दौड़ आओ, इन
शुक्रा मन्थी नामक ग्रहोको, समयके बीतनेसे पहिले ही, ग्रहण करो,
और गौओंसे निकले हुए दुग्धसे इस सोमको पकाओ, तथा एक
कर ठण्डा होने पर उससे होम करो।

४८ २ अ० २ पा० १ ख० ।
यहाँ पर जिस सोम-पाकका विधान मन्त्रसे ही प्रतीत होता
है, वह [सोम-पाक] साक्षात् गौओंसे शक्य नहीं, इस कारण गो
शब्दसे, गौके दुग्ध का ही ग्रहण है ऐसी, प्रतीति होती है।
१—उक्त मन्त्रमें “मत्सर” नाम सोमका है, क्योंकि-वह 'मन्द'
[मदि स्तुति मोद मद स्वप्न कान्ति गतिषु] धातु [भ्वा० आ०]
से बनता है। “मदन्ते तृप्यन्ति देवता अनेन इति मत्सरः” जिस-
से देवता तृप्त होते हैं, वह 'मत्सर' कहा जाता है।
२—'मत्सर' लोभका भी नाम है, क्योंकि, मनुष्यमें जब लोभ
आ घुसता है, तब वह धनको ही सब कुछ देखता हुआ, अन्य जगत्-
से विमुख होकर उन्मत्त हो जाता है।
पहिला 'मत्सर' शब्द, उदाहरणमें आनेसे 'उदाह्रण-प्रसक्त'
होकर व्याख्यामें आया, और दूसरा 'मत्सर' शब्द प्रथम 'मत्सर'
शब्दके समान होनेसे ही आया है, ऐसे शब्दको 'शब्द-सामान्य
प्रसङ्ग-प्रसक्त' कहते हैं।
“पयः”—[क-] पिबतेर्वा पानार्थस्य” 'पयस्' शब्द 'पा'
(भ्वा० प०) पाने, धातुसे बनता है, क्यों
कि-वह पान किया जाता है।
[ख-] “प्यायतेर्वा वृद्ध्यर्थस्य” अथवा वृद्ध अर्थ-
वाले 'प्याय्' [भ्वा० आ०] धातुसे बनता
है, क्योंकि, उससे प्राणी वृद्धिको प्राप्त होते हैं।
उक्त मन्त्रमें जो 'मत्सर' शब्द आया है, उसीका पर्याय पयस्
शब्द है, इससे, इसको व्याख्या की गई है। ऐसे शब्दको
पर्याय-प्रसक्त कहते हैं।
“क्षीर क्षरतेः” श्च्योतनार्थस्य । 'क्षीर' शब्द 'क्षर' (भ्वा०
आ०) धातुसे बनता है, 'क्षर' का क्षरण या झरना अर्थ होता है,
दुग्धको क्षीर इसीसे कहते हैं, कि—वह ऊधस् या ऊँढ़ीसे झरता है।

हिन्दी निरुक्त । ४६
(ख) अथवा 'क्षोर' शब्द भक्षण अर्थवाले 'घस' धातुसे
बनता है, वास्तवमें यह शब्द 'अद्' भक्षणे (अदा०
प०) धातुसे बनता है, 'घस' उसीका आदेशमात्र है।
कोई आचार्य कहते हैं कि-'घस' धातु स्वतन्त्र है, किन्तु
'अद्' धातुका आदेश नहीं है।
जब 'घस' धातुसे क्षीर शब्द बनाते हैं, तब उससे 'ईर' प्रत्यय
जोड़ते हैं, जैसे कि, 'वश-कान्तौ' (अदा० प०) धातुसे 'ईर' प्रत्यय
लग कर 'उशीर' शब्द बन जाता है। धातुके वकारको 'उ' सम्प्र-
सारण आदेश होता है। उशीर नाम खसका है, उसमें सुन्दर
गन्ध रहता है, इससे इस नामको 'वश-कान्तौ' धातुसे बनाना
उचित हुआ।
'गो' शब्द अधिषवण चर्मका वाचक भी होता है, जिस पर
कि-'सोमयाग' में सोमलता, का रस निकालनेके लिये अभिषव
संस्कार होता है।
तात्पर्य यह है कि-जिस प्रकार, यह गो शब्द सम्पूर्ण गोका
वाचक है, उसी प्रकार गोके एक भाग-(अंश) रूप चर्मका भी
वाचक है, इसीको 'कृत्स्नवत् अभिधायक' कहते हैं।
उदाहरण-“ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निस्वतेऽशुं
दुहन्तो अध्यासत गवि। तेभिर्दुग्धं
पपिवाञ् सोम्यं मध्विन्द्रो वर्द्धते प्रथते
वृषायते । [ऋ० सं०-८, ४, ३०, ४]
जगती छन्दः, अर्बुद नामका द्वेवेद्य ऋषि, ग्राव (पाषाण)
स्तुतिमें विनियोग।
ये सोमरसके भक्षण करनेवाले पाषाण जब अभिषव (कुट्टन)
कर्ममें प्रवृत्त होते हैं, उस समय इन्द्रके घोड़े यज्ञमें आगमनके

५० २ अ० २ पा० १ खं० ।
अर्थ इनके शब्दको सुन कर सोमको संस्कृत हुआ जान कर रथमें
जुड़नेकी इच्छा करते हुए स्वयम् ऋजीष या खूखसको भक्षण करने-
के लिये, और इन्द्रको सोमरस पिलानेको आप ही आप जूएमें
संयुक्त होनेके लिये अपनी गर्दनोंको झुकाते हैं, मानों सूचित करते
हैं, कि-‘हे इन्द्र ! यज्ञस्थानमें चल, सोम तय्यार है’ । उधर
ऋत्विज् लोग भी इन्द्रके आगमन-कालको जान कर शीघ्र शीघ्र गोके
अवयवभूत अधिषवण चर्मके ऊपर सोमरसको निचोड़ते हुए डटे
रहते हैं, मानों इस कर्मको करते हुए इसकी प्रतीक्षा ही कर रहे हैं,
कि—इतनेमें इन्द्र आकर उनके दुहे हुए मधुर सोमरसको पान कर
उससे तृप्त होता है। अनन्तर वीर्यसे बढ़ता है, पश्चात् शरीरसे
विस्तृत होता है, और फिर विस्तीर्ण हो कर अपने वीर्यसे मेघको
विदीर्ण करके वृष्टिको प्रवृत्त करता है ।
जिस सोमरसको पान करके इन्द्र देवता वर्षण आदि कर्मसे
सब जगत्को अनुगृहीत करता है, उस सोमरसकी लोढी शिलपट्टों-
से ही सिद्धि होतो है, इससे, इस सम्पूर्ण उपकारके मूल कारण
ये ही हुए, इस रीतिसे मन्त्रोक्त स्तुति ग्रावोंकी ही होतो है।
१
निगम प्रसक्तका निर्वचन ।
“अंशुः” शमष्टमात्रो भवति, 'अंशु' नाम सोमका है, तथा वह
सुख-वाचक 'शम्' अव्यय और 'अशू व्याप्तौ' धातु [ स्वा० आ० ]
से बनता है। इनसे यह अर्थ निकलता है कि-जैसे ही यजमान
सोमको सम्पादन करके उस पर अपनी व्याप्ति कर लेता है, वैसे
ही, वह, उसके लिये सुखरूप हो जाता है, अर्थात् सोमके
कर लेनेसे सुखी हो जाता है कि,–मैंने सोम याग कर लिया,
१ किसी शब्द पर दिये हुए निगम या मन्त्रमें व्याख्येय शब्दको
निगम-प्रसक्त कहते हैं ।

हिन्दी निरुक्त । ५१
और जन्म लेनेका जो ऋण है, वह चुका दिया, मैं कृतकृत्य हो
गया,—इस प्रकार उसके मनका दुःख जो अपने ऊपर ऋणका
भार समझता है, दूर हो जाता है।
अथवा 'शम्' अव्यय और 'अन-प्राणने' [ अदा० प० ] धातु-
से अंशु शब्द बनता है। अर्थात्—सोम सब प्राणियोंके जीवनके
लिये सुखरूप होता है, क्योंकि, यज्ञसे वृष्टि होती है, उससे सब
प्राणी सुखसे जीवन करते हैं, इसीसे, इसका नाम 'अंशु' है।
“गो' शब्द अधिषवण = चर्मका भी वाचक है”—ऐसी पूर्वो-
क्त व्याख्यामें 'चर्म' शब्द भी एक ऐसा आगिरा जिसका निर्वचन
कर देना भाष्यकार आवश्यक समझते हैं। ऐसे शब्द व्याख्या-
प्रसक्त कहे जाते हैं।
[ क ] “चर्म—चरतेर्वा” 'चर्म' शब्द 'चर-गतिमक्षणयोः' [ भ्वा०
प० ] धातुसे बनता है। क्योंकि-वह सम्पूर्ण शरीर-
में चरितनाम गत या व्याप्त होता है, इसीसे.वह चर्म
कहलाता है ।
[ ख ]-'उच्च्त्तं भवति-इति वा” अथवा, वह, शरीरसे उघेड़ा
जाता है, इससे 'चर्म' कहलाता है । 'वृती-हिंसाग्रन्थ-
नयोः [ तु० प० ।] धातुसे बनता है। 'गो' शब्द चर्म
व श्लेष्माका भी वाचक होता है। जैसे कि—
^१'गोभिः सन्नद्धो असिवीलयस्व” । [ ऋ० सं०, ४, ७,३५, १ ]
यह रथस्तुति है। रथ चर्म से मढ़ा हुआ होता है, और उसके अरे,
१—वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत् सखा प्रतरणः सुवीरः ।
गोभिः सन्नद्धो असि वीलयस्वा स्थाताते जयतु जेत्वानि ॥ [ ऋ०
सं०-४, ७, ३५, १ । य० वा० स०-२६, ५२ । अथर्व स०-६, १२,
५, १ । ]

५२ ८ अ० २ पा० १ ख० ।
श्लेष्मा या चर्बी से चुपड़े हुए होते हैं। यहां चर्म तथा श्लेष्माके
अतिरिक्त अन्य किसी अर्थका संभव नहीं है। जैसे कि,—
२
“गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता” [ ऋ० सं०, ५, १, २१, १ ]
यह बाणकी स्तुति है।
'इषु' भी स्नाव (नाड़ी) से वेष्टित और श्लेष्मासे चुपड़ा
हुआ होता है।
'ज्या' को भी 'गो' शब्दसे बोलते हैं। यदि वह गोसे ही बनी
हुई हो तो वहां 'गो' शब्दको ताद्धित या गौण समझना। जो नाम
जिस वस्तुका होता है, वह नाम जब उस वस्तुके किसी अवयव
या उसके सम्बन्धी, किसी अन्य, वस्तुको कहे, तो उसे गौण
समझना उसीको ताद्धित कहते हैं। जो शब्द, जिस अर्थमें प्रसिद्ध
हो, उस अर्थमें उसकी मुख्यावृत्ति समझना, और उस शब्दको
वहां मुख्य या अभिधायक जानना। यदि शब्द उस मुख्य अर्थके
सम्बन्धसे ही, किसी अन्य अर्थमें चला जाय तो, वहां, उस शब्दको
गौण, और उसकी वृत्तिको गौणी समझना।
इसी रीतिसे गो, शब्द, गौ अर्थमें मुख्य है, और गोके चर्म,
स्नाव तथा श्लेष्मा आदि अर्थमें गौण है। ऐसे ही अन्यत्र अन्यत्र
भी ध्यान रखना चाहिये। यह शब्दका स्वभाव ही है, कि,—वह
जिस अर्थमें प्रसिद्ध होता है, अविकृत होकर भी उससे हट कर
उसके किसी भागमें चला जाता है। शब्दोंके व्याख्यानमे यह
बात प्रायः देखी जाती है, इससे ऐसे स्थलोंमें आश्चर्य नहीं मानना।
२—सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः सन्नद्धा पतति
प्रसूता । यत्रानरः संच विच द्रवन्ति तत्रास्मभ्यः मिषवः शर्म यंसन् ॥
[ ऋ० सं०-५, १, २१, १ । य० वा० सं०-२६, ४७ । ]

हिन्दी निरुक्त । ५३
[ ख ] यदि वह ज्या गोसे बनी हुई न हो तो, वहां 'गो' शब्दकी
“गमयति इषून्—इति गौः” 'बाणोंको फेंकनेवाली'— ऐसी
व्युत्पत्ति करके अन्य द्रव्य ही लेना। इस व्युत्पत्तिमें
'गो' शब्द स्वतन्त्रतासे ज्या अर्थमें आता है, किन्तु किसो
अन्य अर्थके द्वारा नहीं, इससे मुख्य है, गौण नहीं। जैसे,
कि पूर्व, अर्थमें था ॥ १ ॥
[ खं० २ ]
*
“वृक्षे वृक्षे नियतामोमयीत् स्ततो वयः
प्रपतान् पूरुषादः ।” [ ऋ० सं०-७, ७, १६, २, ]
[ भाष्यम् ] वृक्षे वृक्षे धनुषि धनुषि । 'वृक्षः'
व्रश्चनात् । नियताऽमोमयीद् गौः। शब्दं
करोति । मीमयतिः शब्दकर्मा ।
ततो वयः प्रपतन्ति, पुरुषानदनाय ।
'विः' इति शकुनिनाम । वेतेर्गति-
कर्मणः । अथापि-इषु नाम-इह भवति
एतस्माद्-एव ।
आदित्योऽपि 'गौः' उच्यते । [ यथा ]
“उतादः परुषे गवि” [ ऋ० सं०-४, ८, २२, ३ ]
[ भाष्यम् ] पर्ववति भास्वति,-इति औपमन्यवः ।

  • “अमीमयद् गौः” यहां वेद भगवान्ने एक उत्तम साहित्य
    भी दिखाया है, वह यह कि—धनुषकी ताँतको गो बनाया, वह
    उधर उसके शब्दको मिमाना कहा है।

५४ २ अ० २ पा० २ खं० ।
अथापि ऽअस्य एको रश्मिः चन्द्रमसं प्रति
दीप्यते, तद्-एतेन उपेक्षितव्यम्, आदित्यतः-अस्य
दीप्तिर्भवति,—इति ।
“सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः [ य० वा० सं०
१८, ४० ]
इत्यपि निगमो भवति । [ प्रयोजनम् ]
सोऽपि गौः उच्यते । [ यथा ]
“अन्वाह गोरमन्वत”
इति तद् उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः ।
सर्वेऽपि रश्मयः गावः उच्यन्ते ॥ २ ॥ [ यथा ]
अनुवाद ।
[ मन्त्रार्थ ] 'प्रत्येक धनुषमें बँधी हुई गो, या ताँत मिमाती, है,
फिर पुरुषोंको भक्षण करनेके लिये पक्षी या बाण गिरते हैं'
[ भाष्य- ] वृक्ष वृक्ष, = धनुष धनुषमें । 'वृक्ष' व्रश्चन या काटने-
से है । बधी हुई गो, या तांत शब्द करती है । मोमयति धातु शब्दा-
र्थक है । फिर 'वि' पुरुषोंके खानेके लिये गिरते है । 'वि' यह पक्षी-
का नाम है । 'वि' शब्द गत्यर्थक 'वी' [ अदा० प० ] धातुसे बनता
है । और यहांपर इषु या वाण का नाम भी होता है । इसी
धातु से ।
आदित्य भी 'गो' कहलाता है । [ जैसे- ]
“उतादः परुषे गवि” [ ऋ० स०, —४, ८, २२, ३. ]
[ मन्त्रार्थ-] 'धार' या प्रकाश वाले, गमन शील [मण्डल] मे' ।

हिन्दी निरुक्त । ५५
[ निरुक्तार्थ ] 'पर्ववाले [ या ] प्रकाश वालेमें'-यह उपमन्यु के
पुत्र मानते हैं ।
और भी-इस [ सूर्य ] का किरण चन्द्रमा में प्रकाशित होता है,
इसके साथ यह भी जानना चाहिये, कि-इस [ चन्द्रमा-] की
दीप्ति या ज्योति आदित्य से होती है। [ प्रमाण- ]
“सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः ।” [ य०
वा० सं०-१८, ४०]
[ मन्त्रार्थ-] सुषुम्ण-नामक सूर्यका किरण [ ही ] चन्द्रमा गन्धर्व
है। यह निगम या जानने वाला भी है। [ प्रयोजन-]
वह भी 'गो' कहा जाता है। [ जैसे-] "अत्राह गोर-
मन्वत" । इसका व्याख्यान आगे करेंगे ।
सब रश्मि या किरणें भी 'गो' कहे जाते हैं ॥२॥ [ जैसे-]
व्याख्या ।
उदाहरण-“वृक्षे॑ वृक्षे॒ निय॑ता मीमयद्गौ स्ततो॑
वयः॒ प्रप॑तान् पूरु॒षादः॑ । ऋ॒थे॒दं विश्वं॒
भुव॑नं भया॒त इन्द्रा॑य सुन्वद्दृष॒ये च॑ शिक्षत् ।
[ ऋ० सं०,—७, ७, १६ २ ]
वसुक इन्द्रका पुत्र ऋषि। त्रिष्टुप्छन्दः। इन्द्र देवता। मरुत्व-
तीय महाव्रत में, शस्त्र ।
भगवान् इन्द्र संग्रामोंमें अनेकबाहु होकर अनेक धनुष धारण
करते हैं। उनको देखकर ऋषि इस प्रकार कहता है—'इन्द्र ने जितने
धनुष धारण किये हैं, उनमें प्रत्येकमें नियत या बँधी हुई 'गौः'
अर्थात् प्रत्यञ्चा [ तांत ] जो गो-से बनी है, अथवा बाणोंको चलाने
वाली है, इन्द्रके भुजसे खिची हुई होकर शब्द करती है। “ततः”

५६ २ अ० २ पा० २ ख० ।
[ क- ] शब्द होनेके अनन्तर ही, 'वयः" [ क-] पक्षी संग्राम भूमि-
में इन्द्रके बाणोंसे तत्काल ही गिरे हुए शत्रुओके मृत शरीरोंको
भक्षण करनेके लिये गिरते हैं । "ततः" [ ख- ] अथवा उसी धनुष-
से पक्षियोंके पत्र या पांख के लगे रहनेसे इषु [ बाण ] भी "वयः"
पक्षी हैं, वे शत्रुओंके प्राण-भक्षण करनेके लिये गिरते हैं, अथवा
"वयः" [ ग ] वी-गतौ ( अदा० प० ) धातुसे 'वि' शब्द बनता है,
गति क्रियाके योगसे बाण भी 'वि' शब्दके वाच्य हैं, पहिले व्या-
ख्यानमें बाण अर्थमें 'वि' शब्द गौण है, और दूसरेमे मुख्य है।
'ऐसा अति प्रभाववाला इन्द्र है'-यह जान कर सम्पूर्ण विश्व
या प्राणि-मात्र यत्-किञ्चित् त्रुटिके लिये भी अपने अपने कर्ममें डरता
है, तथा डर कर इन्द्रके लिये सोमका सवनरूप सस्कार करता हुआ
ऋत्विज्को दक्षिणा देता है । भाव यह है कि-सब जगत् इन्द्रकी
ओर मुख उठाये हुए और सब कार्यको छोड़ कर आदर सहित
स्थित है, जो इन्द्र ऐसे प्रभाववाला है. उसको हम अपने वाञ्छित-
की सिद्धिके लिये स्तुति करते हैं ।
१
निगम-प्रसक्त "वृक्ष" शब्दको व्याख्या करते हैं—"वृक्षो व्रश्च-
नात्" इसी लिये वृक्षोंको वृक्ष कहते हैं, कि,-वह इन्धनके लिये
काटा जाता है ।
और शब्द मन्त्रके व्याख्यानमें ही आ चुके हैं, इससे उनका
निर्वचन नहीं किया जाता । इन पूर्वोक्त उदाहरणोंसे यह दिखाया
गया कि, 'अवयवमें अवयवीके समान शब्दका प्रयोग होता है।
इसके अनन्तर यह दिखाते हैं कि—'अन्य बहुतसे अर्थान्तरोंमें भी
१—जो मन्त्र किसो शब्दके अर्थके साक्ष्यमें दिया जाता है, वह
'निगम' कहाता है, और उसमें आये हुए अन्य व्याख्येय
शब्दको 'निगम-प्रसक्त' कहते हैं।

हिन्दी निरुक्त । ५७

'गो' शब्द आता है, जिनमें गोका सम्बंध बिलकुल ही नहीं है।
यह विषय ऐकपदिक या नैगम काण्डमें कहने योग्य है, किन्तु यहाँ
'गो' शब्दके प्रसङ्गसे कहा जाता है,—
[१] “आदित्योऽपि गौरुच्यते” आदित्यका नाम भी 'गो'
है। जैसे—
“उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम् । न्यैर-
यद्रथी तमः ॥ [ऋ० सं०, ४, ८, २२, ३]
भारद्वाज ऋषि । गायत्री छन्दः । पूषा देवता । नैरुक्तोंके
मतमें पूषा नाम आदित्यका है, और अन्य मतमें भूमिकी ।
धारा विशेष या, प्रकाश अथवा अहोरात्रादि रूप पर्ववाले तथा
निरन्तर गमन करनेवाले उस आदित्य-मण्डलमें स्थित होकर,
रथीतम [जिसका रथ मुहूर्त्तमात्र भी विश्राम नहीं करता] सूर्यदेव
तेजोमय मण्डलको, उदय, अस्तमय तथा मध्यान्हकालके विभाग
करनेके लिये नियत मार्गसे नित्य ही घुमाता है।
अथवा उस मण्डलमें अवस्थित जो आदित्यान्तरवर्ती सूर्य-
भगवान्, वह—लव, क्षण, निमेष, त्रुटि, मुहूर्त्त, अहोरात्र, पक्ष,
मास, ऋतु, अयन तथा संवत्सर रूप कालचक्रको प्रेरित करता है।
वह ऐसे गुणोंवाला है, इससे हम उसकी अपने वाञ्छित अर्थकी
सिद्धिके लिये स्तुति करते हैं।
[२] सूर्य भगवान्‌का 'सुषुम्ण' नामक एक रश्मि या किरण
होता है, वहो चन्द्रमण्डलमें जाकर लगता है, उसोसे
चन्द्रमा दीप्तिमान् होता है, और अपनी ज्योत्स्नासे
सब दिशाओंको प्रकाशित करता है। इससे यह बात
समझने योग्य है कि—“आदित्य देवसे ही चन्द्रमामें
प्रकाश आता है।” इस अर्थको निगम भी प्रमाणित
करता है।

५८ २ अ० २ पा० ३ खं० ।
“सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः” [ य०
वा० सं०-१८, ४० ]
‘सुषुम्ण’ नामक सूर्यका रश्मि चन्द्रमामें जाकर स्वयम् चन्द्रमा
हो जाता है, तथा वही गन्धर्व होता है।
जिस सुषुम्ण नामक सूर्यकी रश्मिका ऊपर परिचय दिया गया
है, वही एक रश्मि ‘गो’ शब्दका वाच्य होता है। जिस प्रकार
यह ‘रश्मि’ ‘गो’ नामसे बोला जाता है, वैसा ही यह उदाहरण है,—
“अत्राह गो रमन्वत” उस आदित्यमण्डलमें ‘गो’ नाम सुषुम्ण
नामक एक सूर्य रश्मिके अवस्थानको अन्य सूर्यके रश्मियोंने स्वीकार
किया है। इस मन्त्रकी विशेष व्याख्या नैगम काण्ड [ ४, ४, ४ ]
में होगी ।
[ ३ ] सब रश्मि भी ‘गो’ कहलाते हैं। इसके अनुसार
यह ऋचा उदाहरण है ॥ २ ॥
[ खं० ३ ]
“ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरि
शृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरु गायस्य वृष्णः परमं पद
मवभाति भूरि ॥” [ ऋ० सं०-२, २, २४, ६ ]
[ भा० ] तानिवां वास्तूनि कामयामहे, गमनाय, यत्र
गावो बहु शृङ्गाः । ‘भूरि,-इति बहुनो नाम
धेयम्, प्रभवति,-इतिसतः । ‘शृङ्ग’ श्रयते
र्वा । शृणाते र्वा । शम्नाते र्वा । शरणाय
उद्गतम्, इति वा । शिरसो निर्गतम्,-इति
वा ‘अयासः’-अयनाः । तत्र तद्उरुगायस्य

हिन्दी निरुक्त । ५६'
विष्णोः महागतः परमं पदं परार्ध्यस्थम्-
अव भाति भूरि ॥
पादः पद्यतेः, तन्निधानात् पदम् । पशु पाद
प्रकृतिः प्रभाग पादः । प्रभाग पाद-सामान्याद्-
इतराणि पदानि ।
एवमन्येषामपि सत्वानां सन्देहा विद्यन्ते,
तानि चेत् समान कर्माणि, समान निर्वचनानि,
नाना कर्माणि चेत् नाना निर्वचनानि । यथार्थं
निर्वक्तव्यानि, इति ।
इमानि एक विंशतिः पृथिवीनाम धेयानि अनु-
क्रान्तानि, तत्र-‘निर्ऋतिः निरमणात् । ऋच्छतेः
कृच्छ्रापत्तिः-इतरा । सापृथिव्या सन्दिह्यते । तयो-
र्विभागः । तस्याएषा भवति ॥ ३ ॥—
मन्त्रान्वयार्थः-हे दम्पति ! 'ता' तानि 'वास्तू-
नि' गृहाणि 'वां' युवाभ्यां गमध्यै गमनाय वयम्
'उश्मसि' कामयामहे । किम्भूतानि । 'यत्र' येषु
'भूरिशृङ्गाः' बहुदीप्तयः 'अयासः' गमनशीलाः 'गावः'
किरणाः सन्तीति शेषः । पुनः किम्भूतानि 'अत्राह'
यत्र ( तत्र ) 'उरुगायस्य' महागतेः 'वृष्णः' विष्णोः

६० २ अ० २ पा० ३ खं० ।
'तत्' प्रसिद्धं 'परमम्' उत्कृष्टं 'पदम्' स्थानम् 'भूरि'
बहु 'अवभाति' सर्वम् अधः कृत्वा दीप्यते इत्यर्थः ।
अनुवादः ।
मन्त्रार्थ-हे दम्पती ! उन स्थानोंको तुम दोनोंके जानेके
लिये हम चाहते हैं। जहां बहु प्रकाश गमनशील किरणें हैं । और
जहां बड़ी गतिवाले विष्णुदेवका उत्तमोत्तम स्थान सब संसारको
नीचे करता हुआ प्रकाश कर रहा है ।
[भा० र्थ०-] तुम दोनोंके लिये उन स्थानोंको चाहते हैं,
गमनके अर्थ। जहां गो या किरणें बहु शृङ्गवालीं। [एक पद
निरुक्त] 'भूरि यह बहुतका' नाम है। 'प्रभवति' समर्थ होता है,
इस कर्तृवाच्य 'प्र' उपसर्ग 'भू' । [भ्वा० प० ] धातुसे । 'शृङ्ग'
श्रिश्रू सेवायाम् (भ्वा० उ० ) धातुसे, अथवा 'शल' हिंसायाम्
[क्या० प०] धातुसे । अथवा 'शम्' उपशमे .(क्या० प०) धातुसे
अथवा शरण या हिंसाके लिये उठा है,-इससे या शिरसे निकला
हुआ है, इससे[ शृङ्ग] है। 'अयासः' गमन करने वाले वहां वह 'उरु-
गाय' या महागति 'वृषन्' या विष्णुका 'परम' या सबसे ऊंचा
'पद' स्थान सबको नीचा करता हुआ बहुत प्रकाश करता है ।
'पाद' शब्द 'पद'गतौ ( दिवा० आ०) धातुसे है । उसके
रख देनेसे पद होजाता है। पशुके पादके सादृश्यसे रुपये या मुहर
आदि द्रव्य का पाद होता है। उसके पादके सादृश्यसे और क्षेत्र
आदिके पद होते हैं ।
इसी प्रकार और द्रव्योंके भी सन्देह हैं। जो वे समान क्रिया
वाले हों, तो उनके एकसे निर्वचन करना, यदि भिन्न भिन्न कर्म या
क्रिया वाले होंतो,भिन्न भिन्न निर्वचन करना। प्रयोजन के अनुसार
निर्वचन करना चाहिये।

हिन्दी निरुक्त। ६१
ये इक्कीस (२१) पृथ्वोके नाम गिने गये हैं;। उनमें निर्ऋ-
ति' शब्द निरमणं या सुख पहुंचानेसे-[ पृथिव्याः नाम ]
[ 'रमु' 'क्रीड़ायाम्' ( भ्वा० आ० ) धातुसे ] दूसरी निऋति कष्ट-
की आपत्ति है, जो 'ऋच्छ' इन्द्रिय प्रलये (तु० प० ) धातुसे है।
वह पृथिवीके साथ सन्दिग्ध होती है । उन दोनों का भेद है।
उसकी [ कृच्छ्रापत्ति और पृथिवीकी भी ] यह निर्वचन करने वाली
ऋचा है ॥ ३ ॥—
व्याख्या—
“तांवां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्रगावो भूरि
शृङ्गा अयासः॥ अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं
पद मवभाति भूरि ॥” [ ऋ० सं०-२, २, २४, ६ ]
दीर्घतमस् ऋषि । विष्णु देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । रथके अव-
धानमें तथा सोमातिरेक शस्त्रमें विनियोग ।
इस मन्त्रमें यजमान और यजमान-पत्नी दोनोंके लिये आशीर्वाद
है। ऋत्विज् कहते हैं कि—'हम तुम दोनोंके जानेके लिये उन
निवास स्थानोंकी कामना करते हैं, जिनमें बहुत दीप्तिवाले
निरन्तर फिरनेवाले तथा महागति (तीब्र निरन्तर एवम् बहुत दूर
तक चलने वाले ) रश्मियें या किरणें हैं, भगवान् विष्णुका परम
पद या आदित्य-मंडल रूप स्थान, सम्पूर्ण जगत्‌को अपनेसे नीचे
करके अत्यन्त प्रकाशित होता है।
अथ एक-निरुक्तम् ।
(१) “भूरि” यह बहुतका नाम है। क्योंकि-देनेसे वह बहुत
होता है । (२ “शृङ्ग” 'श्रिञ्सेवायां' धातुसे बनता है । क्योंकि
वह शिरमें आश्रित होता है । अथवा 'शृहंसायाम्' धातुसे

६२ ३ अ० २ पा० ३ खं० ।
'शृङ्ग' शब्द बनता है, क्योंकि-सींग वाला पशु उसीसे मारता है ।
अथवा शिरसे निकलता है, इससे वह शृङ्ग है । अथवा परमपूज-
नीय स्थानमें स्थित होता है, इससे वह 'शृङ्ग' है । ( ३ ) 'पद'
'पद' गतौ' धातुसे 'पाद' शब्द [ जो पैरका नाम है ] बनता है,
क्योंकि, उससे ही, शरीर धारी चलते हैं, और पादके धूलिया कीच
आदिमें धरनेसे जो वैसीही आकृति उत्पन्नहो जाती है, वह पद
कहाता है । चाहे वह पशुकाहो या मनुष्यका । पद शब्द पन्द
शब्दसे बनता है, और वह खोज का नाम है ।
प्रसक्तानु-प्रसक्त ।
पाद नाम किसी भी वस्तुके चतुर्थांशका है, उसीके सादृश्यसे
पशुके पैर को पशु-पाद कहते हैं, क्योंकि,-वहभी पशुका चौथा
भाग जैसा प्रतीत होता है । एवम् उसीके सादृश्यसे दीनार
(अशरफी) आदि मुद्राओंके चतुर्थांशको भी 'दीनार पाद'
आदि नामसे बोलते हैं, ये प्रभाग पाद कहाते हैं । इन प्रभाग पादों-
की समानतासेही और और वस्तुभी पाद कहाते है, जैसे ग्रन्थ पद,
क्षेत्रपद, आदि । क्योंकि उनमेंभी उसी प्रकारसे विभाग है ।
सुतराम्, 'पद' शब्दका मूल 'पाद' शब्द है ।
उपसंहार ।
इसी प्रकार और और शब्दोंमेभी सन्देह होते हैं, केवल गो
शब्दका पद शब्दमें ही नहीं । उन सभी स्थानोमें निर्वचनका स्वा-
भाविक लक्षण यह है कि "वे यदि समान क्रियावाले हों"तो उनका
समानही निर्वचन करना चाहिये, और यदि भिन्न भिन्न क्रिया,युक्तहों
तो भिन्न भिन्न प्रकारसे निर्वचन करना, इसी रीतिसे निर्वचन
होता है।"

हिन्दी। निरुक्त । ६३
उदाहरण ।
ये 'गौः' आदि २१ पृथिवीके नाम गिनाये हैं, इनमें एक 'निऋ-
ति' शब्द है । वह पृथिवी और दुःख देवताका नाम है । उन
दोनोंका कर्मसे यह भेद है कि उनमें एक पृथिवी अपने में आये
हुए प्राणियोंको सुख देनेवाली है, और दूसरी पाप-देवता, दुःख देने-
वाली । इससे उस एकही 'निऋति' शब्दका निर्वचन अर्थके उद्दे-
श्यानुसार दो प्रकारसे होता है। अर्थात्-पृथिवीके लिये 'नि' उप-
सर्ग और 'रमु, क्रीडायाम्' (भ्वा० आ०) धातुसे और दुःख देवताके
उद्देश्यसे दुःखार्थक 'ऋच्छ' [तु० प०] धातुसे निर्वचन होता है ।
देखो ! आगेजो ऋचा दिखाई जाती है, उसमें निऋति शब्दके
आधार पर पृथिवी और दुःख देवताके अभिप्रायसे दो व्याख्यान
होते हैं, जिनमें प्रत्येक व्याख्यान 'निऋति' की भिन्न भिन्न व्याख्या
करनेमें साक्ष्य देता है ॥ ३ ॥
[ ख० ४ ]
"यईं चकार न सो अस्यवेद यईं ददर्श हि
रुगिन्नु तस्मात् । समातु र्यो ना परिवीतो अन्तर्बहु
प्रजा निऋति माविवेश ॥”
(भा०) 'बहु प्रजाः कृच्छ्रम्-आपद्यते' - इति परिव्रा-
जिकाः । 'वर्षकर्म' इति नैरुक्ताः । "यईं
चकार" इति करोति-किरती सन्दिग्धौ वर्ष
कर्मणा । "नसो अस्यवेद" मध्यमः । सएव
अस्यवेद-मध्यमः,-यो ददर्श आदित्यो पहि-
तम् । समातुर्यो नौ । माता अन्तरिक्षम् !

६४ २ अ० २ पा० ४ खं० ।
निर्मोयन्ते अस्मिन् भूतानि । योनिः-अन्त
रिक्षम् महानवयवः । “परिवोतः” वायुना ।
अयमपि इतरो योनिः,-एतस्माद्-एव ।
परिवृतो भवति । “बहु प्रजाः” भूमिम्-
आपद्यते वर्ष कर्मणा ।
शाकपूणिः संकल्पयां चक्रे-'सर्वा देवता जाना-
मि'-इति । तस्मै देवता उभयलिङ्गा प्रादुबर्भूव । तां
न जज्ञे । तां प्रपच्छ 'विविद् घाणित्वा'-इति । सा
अस्मै —'एतात् ऋचम् आदि देश एषा मद्दैवता'—
इति ॥ ४ ॥ “यईं चकार”-इति । दीर्घतमसः
आर्षम् । त्रिष्टुप् । महाव्रते वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।”
अनुवाद ।
मन्त्रार्थ-‘निऋॄंति’ शब्दकी दुःख वाचकताके पक्षमें-जो मनुष्य
गर्भको करने वाला है, वह इसके तत्त्वको नहीं जानता, बल्कि-वह
जो इस गर्भ या जन्तुको पेटके या शरीरके भीतर अध्यात्म-बुद्धिके
द्वारा देखता है, यथार्थ रूपसे जानता है। वह गर्भका उत्पन्न
करने वाला पुरुष माताको योनि या गर्भ स्थानमें माताके खाये,
पीये, चक्खे और चबाये हुए अन्नादिके परिणामसे पुष्ट होता है,
तथा समय पर जरायु (जेर) से लिपटा हुआ जन्मता है । अनन्तर,
इसी प्रकार, अनेक बार जन्म लेता हुआ, दुःखको प्राप्त होता है ।
अर्थात् यह गर्भतत्त्वके न जानने वालोंकी गति है । इस व्याख्यामें
गर्भ कर्त्ताके लिये ‘निऋॄंति’ को प्राप्तिही फल दिखाया है, और वह
दुःखही होसकता है, इस रीतिसे यह व्याख्यान ‘निऋॄंति’ शब्दके

हिन्दी निरुक्त । ३९
दुःखार्थक 'ऋच्छ' धातुसे निर्वचन करनेमें नियम या सहायक
होता है ।
और—'निऋ'ति' शब्दको भूमि वाचकता पक्षमें-जो पुरुष इस
वृष्टिका करनेवाला या फेंकने वाला मेघ है'-जानता है; वह इसके
तत्वको नहीं जानता । बल्कि-वह, जो आदित्यकी रश्मियोंके भी-
तर छिपी हुई वृष्टिको देखता है, जानता है । वह मेघ, माता या
अन्तरिक्षके योनि = एक देशमें वायुसे घिरा हुआ, वर्षा कालमें
बहुरूपसे उत्पन्न होता हुआ भूमिमें आता है। इस व्याख्यामें
मेघ 'निऋ'ति' को आता है, और वह भूमिही, होसकती है, इस
लिये उसीके अनुसार 'निऋ'ति' शब्दका निर्वचनभी 'निरमण'
क्रियासेही होना उचित है । यही "यथार्थं निर्वक्तव्यानि"
[ नि०-अ० २, पा० २, खं० ३ ] इस वचनका तात्पर्य है।
[भाष्यार्थ-] [प्रथम अर्थके पक्षपाती-] 'बहुत सन्तानोंका
उत्पन्न करने वाला' दुःखको प्राप्त होता है, ऐसा सन्यासी मानते
हैं। [प्रयोजन-उन्हींकी दृष्टिसे इस मन्त्रमें ऐसा अर्थ दिखाई
देता है ] [ दूसरा पक्ष-] 'इस मन्त्रमें वर्ष कर्म या वृष्टिका वर्णन
है' यह निरुक्त शास्त्रके पण्डित मानते हैं । [इनके मतमे'] 'बई'
चकार" यहां वर्ष कर्मके साथ 'चकार' पदमें 'डुकृञ्' करणे
( तना० उ० ) धातु और 'कृ' विक्षेपे ( तु० प० ) धातुका सन्देह
है। [क्योंकि, यह रूप दोनोंसे समानही बनता है, और दोनोंके
अर्थ भी संगत होजाते हैं । जैसेकि, वर्षाको करता है, या,
फेंकता है । ] वह इसको नहीं जानता, जो देखता है,-'मध्यम
या मेघ है'। जो देखता है-'आदित्यमें छिपे हुएको, [वह जानता
है। "मातुर्योनौ"-माताकी योनिमें । 'मातः' नाम अन्तरिक्ष ।
[क्योंकि-] इसमें भूत ( प्राणी ) निर्माण किये जाते हैं। 'योनि'
नाम अन्तरिक्ष या उसके छोटे भागका है । वह बड़ा और अनव-