निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ४१
ध्यायतेर्वा । 'क्षीरं' क्षरतेः, घसेर्वा । 'ई' कारो नाम-
करणः । 'उशीरम्'-इति यथा ।
“अंशुं दुहन्तो अध्यासते गवि” [ ऋ० सं०; ८,
४, ३०, ४] इति अधिषवण चर्मणः । 'अंशुः' शमष्ट-
मात्रो भवति । अननाय शं भवति,-इति वा । 'चर्म'
चरतेर्वा । उच्चृतं भवति-इति वा ।
अथापि-चर्म च श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः
सन्नद्धो असिवोल यस्व” [ ऋ० सं०; ४, ७, ३५, १ ]
इति-रथस्तुतौ ।
अथापि-स्नाव श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः
सन्नद्धा पतति प्रसूता”-इति-इषुस्तुतौ ।
ज्यापि 'गौः' उच्यते । गव्या चेत्, ताद्धितम् ।
अथ चेत्,-न गव्या, गमयति,-इषून् इति [यथा-] ॥१॥
अनुवाद ।
जिससे कि-सामान्य व्याख्या होचुकी इसीसे अब शब्दोंको
विशेष व्याख्याके लिये अनुक्रमण करेंगे । 'गो' यह पृथिवीका नाम
है, जिससे कि—दूर गई हुई है। और जिससे कि—इसमें प्राणी
गमन करते हैं। अथवा 'गाङ्' गतौ ( भ्वा० आ० ) धातुसे है।
'ओ' प्रत्यय होजाता है।
और-इसी धातु और व्युत्पत्तिसे यहाँ पशुका भी नाम होता है।
और-इस गो पशुमें पूरे अर्थके समान गौण-रूपसे प्रयोग होनेमें
[ मन्त्र ] निगम या ज्ञापक हैं। [ जैसे—]