नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( २०४ )
जीमूतकेतुः — (वामाक्षिरुस्पन्दनं सूचयन्)— जीमूतवाहन-
श्चिरयतीति पर्याकुलोऽस्मि हृदयेन ।—
स्फुरसि किमु दक्षिणेतर ! मुहुर्मुहुः सूचयन्ममानिष्टम् ।
हतचक्षुरपहतं ते स्फुरितं, मम पुत्रकः कुशली ॥ ४ ॥
(ऊर्ध्वमवलोक्य) अयमसौ त्रिभुवनैकचक्षुर्भगवान्
सहस्रदीधितिः स्फुटं जीमूतवाहनस्य श्रेयः करिष्यति ।
(अवलोक्य सविस्मयम्)—
आलोक्यमानमतिलोचनदुःखदायि,
रक्तच्छटा निजमरीचिरुचो¹ विमुञ्चत् ।
उत्पातवाततरलीकृततारकाभ-
मेतत्पुरः पतति किं सहसा नभस्तः ? ॥ ५ ॥
कथं चरणयोरेव पतितम् ? [सर्वे सविस्मयं निरूपयन्ति]
जीमूतकेतुः— अये ! कथं लग्नसरसमांसकेशचूडामणिः² !
कस्य पुनरयं स्यात् ?
श्लोकः नं०: ४, अन्वयः —
हतचक्षुः दक्षिणेतर ! मुहुः मुहुः मम अनिष्टं सूचयन् किमु
स्फुरसि ! ते स्फुरितम् अपहतम् ! मम पुत्रकः कुशली !!
श्लोक नं०: ५, अन्वयः —
आलोक्यमानम् अतिलोचनदुःखदायि, निजमरीचिरुचः रक्त-
च्छटाः विमुञ्चत् , उत्पातवाततरलीकृततारकाभम् एतत् नभस्तः
पुरः सहसा किं पतति ?
( २०५ )
जीमूतकेतु—(बाईं आंख का फड़कना सूचित करके) —जीमूतवाहन देर
कर रहा है, इस विचार से मैं मन में व्याकुल हो रहा हूँ।—
हे दुष्ट बाईं आंख ! बार बार मेरे अनिष्ट की सूचना देती हुई
तू क्यों फड़क रही है ? तेरा फड़कना दूर हो ! (और) मेरा
बच्चा सकुशल हो !!
(ऊपर देखकर) यही त्रिलोकी के नेत्रस्वरूप, सहस्र किरणों
वाले भगवान् सूर्य अवश्य ही जीमूतवाहन का कल्याण करेंगे ।
(देखकर, विस्मयपूर्वक)— देखने से आंखों को अति दुःख देने
वाला, अपनी किरणों की शोभा के समान खून की धाराएँ
टपकाता हुआ, उत्पातकारी वायु से हिलाए गए तारे की
कान्ति वाला यह आकाश से (हमारे) सामने एकाएक क्या
गिर रहा है ?
क्या, (मेरे) चरणों पर ही गिर पड़ा ? (सब हैरानी से देखते हैं)
जीमूतकेतु — अरे ! (यह तो) खून से गीले माँस तथा बालों से
लिपटा हुआ चूड़ामणि है । यह किस का हो सकता है ?
- जो रस की धाराएँ बहा रही है जी उसकी किरणों के समान
लग रही हैं । - सरस=रस वाला; गीला; ताज़ा । (जिस के साथ ख़ून से युक्त
माँस लगा हुआ है)
( २०६ )
वृद्धा-(सविषादम्) महाराज ! पुत्तअस्स विअ मे एदं चूडारअणं।
महाराज ! पुत्रकस्येव मे एतच्चूडारत्नम् ।
मलयवती- अम्ब ! मा एवं भण ।
अम्ब ! मैवं भण ।
सुनन्दः- महाराज ! मैवमविज्ञाय विकलवीभूः । अत्र हि-
तार्क्ष्येण भक्ष्यमाणानां पन्नगानामनेककः ।
उल्कारूपाः पतन्त्येते शिरोमणय ईदृशाः ॥ ६ ॥
जीमूतकेतुः-देवि ! सोपपत्तिकमभिहितं सुनन्देन । कदाचि-
देवमपि स्यात् ।
वृद्धा-सुणंदअ ! जाव इमाए वेलाए ससुरसदणं जेव्व
सुनन्दक ! यावदनया वेलया श्वसुरसदनमे-
आअदो मे पुत्तओ भविस्सदि । ता गच्छ, जाणिअ
वागतो मे पुत्रको भविष्यति । तद्गच्छ , ज्ञात्वा
लहुं संपादेहि ।
लघु सम्पादय⁴ ।
सुनन्दः — यदाज्ञापयति देवी । [इति निष्क्रान्तः]
जीमूतकेतुः- देवि ! अपि नागचूडामणिः स्यात् ।
श्लोक नं०: ६, अन्वयः—
तार्क्ष्येण भक्ष्यमाणानां पन्नगानाम् एते ईदृशाः उल्कारूपाः शिरो-
मणयः अनेकशः पतन्ति ।
( २०७ )
वृद्धा - (दुःख पूर्वक) महाराज ! यह तो मानों मेरे बच्चे का ही
चूडामणि है।
मलयवती— माता जी ! ऐसा न कहो।
सुनन्द — महाराज ! इस प्रकार जाने बिना ही व्याकुल न हों। यहां
तो— गरुड के द्वारा खाए जाते हुए सांपों के यह ऐसे उल्कारूप
चूडामणि अनेकों ही गिरा करते हैं।
जीमूतकेतु — देवि ! सुनन्द ने युक्ति-युक्त बात कही है। शायद ऐसा
ही हो !
वृद्धा — हे सुनन्द ! कदाचित् मेरा पुत्र इस समय तक श्वशुरगृहमें
ही आ गया है ! अतः जाओ पता लगा कर शीघ्र सूचना दो।
सुनन्द — महारानी की जो आज्ञा। [प्रस्थान]
जीतमूतकेतु — देवि ! कदाचित् यह किसी सांप का ही चूडामणि हो ।
- भक्ष् + कर्मवाच्य + शानच् + पु० + षष्ठी, बहुवचन ।
- अनेकशः = अनेकों; अनेक बार; प्रायः ।
- सोपपत्तिकं = युक्ति के साथ ।
- सम्पादय = प्राप्त कर । (मेरे लिए) पता लगा । मुझे समाचार
ला दे । सूचना दे ।
( २०८ )
[ततः प्रविशति रक्तवस्त्रसंवीतः शङ्खचूडः]
शङ्खचूडः—(सास्रम्) कष्टं भोः कष्टम् ! कुपितोऽस्मि दैवेन ।
गोकर्णमर्णवतटे त्वरितं प्रणम्य
प्राप्तोऽस्मि तां खलु भुजङ्गवध्यभूमिम् ।
आदाय तं नखमुखक्षतवक्षसञ्च
विद्याधरं गगनमुत्पतितो गरुत्मान् ॥ ७ ॥
(रुदन्) हा महासत्त्व ! हा परम कारुणिक ! हा निष्कारणबान्धव !
हा परदुःखदुःखित ! क्व गतोऽसि ? प्रयच्छ मे प्रतिवचनम् ।
(आत्मानमुद्दिश्य) हा शङ्खचूडहतक ! किं कृतं त्वया ?—
नाहित्राणात्कीर्तिरेका मयाप्ता,
नापि श्लाघ्या स्वामिनोऽनुष्ठिताज्ञा ।
दत्वात्मानं रक्षितोऽन्येन शोच्यो,
हा धिक् ! कष्टं ! वञ्चितो वञ्चितोऽस्मि । ८॥
श्लोक नं०: ७, अन्वयः—
अर्णवतटे गोकर्णं प्रणम्य त्वरितं तां खलु भुजङ्गवध्यभूमिं
प्राप्तोऽस्मि । (परमस्मिन्नेवान्तरे) नखमुखक्षतवक्षसं च तं
विद्याधरम् आदाय गरुत्मान् गगनम् उत्पतितः ॥
श्लोक नं०: ८, अन्वयः—
न मया अहित्राणात् एका कीर्तिः आप्ता; नापि स्वामिनः श्लाघ्या
आज्ञा अनुष्ठिता ; अन्येन आत्मानं दत्वा रक्षितः ; (अतः)
शोच्यः ; हा धिक् ! कष्टम् ! वञ्चितो वञ्चितोऽस्मि ।
( २०६ )
[लाल वस्त्र पहने शङ्खचूड का प्रवेश]
शङ्खचूड— (आंसुओं के साथ)— आज, बड़े कष्ट की बात है ! भाग्य
द्वारा, ठगा गया हूँ।
समुद्र के किनारे (पर विराजमान) भगवान् गोकर्ण को प्रणाम
करके मैं शीघ्र ही उसी साँपों की वध्यभूमि पर पहुंच गया हूँ।
(परन्तु इसी बीच में) अपने नाखून तथा चोंच से विदीर्ण छाती
वाले उस विद्याधर को लेकर गरुड आकाश में उड़ गया है ।
(रोते हुए)— हा महात्मन् ! हा अत्यन्त दयालु ! हा बिना
कारण के बन्धु ! हा दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले ! तुम
कहां चले गए ! मुझे उत्तर दो । (अपने आप से) आह पापी
शङ्खचूड ! तू ने क्या किया ? —
न तो मैंने किसी सर्प को बचाकर कोई कीर्ति ही प्राप्त की,
और न ही अपने स्वामी की श्लाघा-योग्य आज्ञा का ही पालन
किया । (वरन्) किसी दूसरे ने अपने प्राण देकर मुझे बचाया;
(अतः) मैं शोचनीय हूँ । आह, धिक्कार है ! बड़े दुःख की
बात है कि मैं ठगा गया, ठगा ही गया, अतः ऐसा मैं एक क्षण
- नखमुख = नाखून का अग्रभाग । अथवा, नाखून और चोंच से
(विदीर्ण) । - एका = एक; थोड़ी भी; छुक भी ।
( २१० )
तन्नाहमेवंविधः क्षणमपि जीवन्नुपहास्यमात्मानं करोमि ।
यावदेतदनुगमनं प्रति यतिष्ये । [परिक्रामन्, भूमौ दत्तदृष्टिः]-
आदावुत्पीडपृथ्वीं प्रविरलपतितां स्थूलबिन्दुं ततोऽग्रे,
ग्रावस्वापातशीर्णप्रसृततनुकणां कीटकीर्णां स्थलीषु ।
दुर्लक्ष्यां धातुभित्तौ घनतरुशिखरे स्त्याननीलस्वरूपा-
मेनां तार्क्ष्यं दिदृक्षुर्निपुणमनुसरन् रक्तधारां व्रजामि ॥६॥
वृद्धा-(ससाध्वसम् ) - महाराअ ! एसो ससोओ विअ रुदि-
महाराज ! एष सशोक इव रुदि-
दवअणो इदो जेव्व तुरिदं आअच्छंतो हिअअं मे आ-
तवदन इत इव त्वरितमागच्छन् हृदयं मे आ-
कुलीकरेदि । ता जाणीअदु दाव को एसो त्ति ।
कुलीकरोति । तज्ज्ञायतां तावत्क एष इति ।
जीमूतकेतुः — यथाह देवी ।
शङ्खचूडः-(साक्रन्दम्)-हा त्रिभुवनैकचूडामणे ! क्व मया
द्रष्टव्योऽसि । मुषितोऽस्मि भो मुषितोऽस्मि ।
श्लोक नं०: ६, अन्वयः-
(या) आदौ उत्पीडपृथ्वीं, ततोऽग्रे प्रविरलपतितां स्थूलबिन्दुं,
ग्रावस्वापातशीर्णप्रसृततनुकणां, स्थलीषु कीटकीर्णां, धातुभित्तौ
दुर्लक्ष्यां, घनतरुशिखरे स्त्याननीलस्वरूपां एनां रक्तधारां
निपुणम् अनुसरन् (अहं) तार्क्ष्यं दिदृक्षुः व्रजामि ।
( २११ )
भी जीकर अपने आप को हंसी का पात्र नहीं बनाऊँगा। तो
इसो के पीछे जाने का यत्न करता हूँ ।
[ घूमते हुए, पृथ्वी पर आंखें गाड़ कर ] —
जो आरम्भ में अधिक खून के गिरने से मोटी है, फिर आगे कुछ
कुछ दूरी पर गिरी हुई मोटी मोटी बूंदों वाली है, पत्थरों पर
गिरने से टूटे हुए जिसके छोटे छोटे कण बिखरे पड़े हैं, भूमि
पर (गिरने से) जिस के ऊपर कीड़े व्याप्त हैं, धातुओं की चट्टानों
पर जो कठिनता से दिखाई दे रही है, घने वृक्षों पर जो
जमकर नीले रंग की हो गई है (ऐसी) इस रक्त धारा का
अनुसरण करता हुआ मैं गरुड़ को देखने की इच्छा वाला
जाता हूँ ।
वृद्धा — (घबराहट के साथ) महाराज ! यह शोकातुर सा रोता हुआ,
इधर ही शीघ्रता से आता हुआ मेरे हृदय को व्याकुल कर रहा
है। अतः पता लगाइए कि यह कौन है ?
जीमूतकेतु — जैसा रानी कहे।
शङ्खचूड़- (ज़ोर से रोता हुआ) हे त्रिलोकि के एकमात्र चूडामणि ! मैं
तुम्हें कहां देखूँ ? मैं लुट गया, अरे, ठगा गया ।
१. पृथ्वौ = मोटी । २. स्त्यान = घनीभूत, जमी हुई ।
३. शङ्खचूड़ जीमूतवाहन के बारे में कह रहा है । सुनने वाले सिर
का आभूषण ही समझते हैं ।
( २१२ )
जीमूतकेतुः - (आकर्ण्य, सहर्षम् विहस्य) देवि ! मुञ्च
शोकम् । अस्यायं चूडामणिर्नूनं मांसलोभात् केनापि
पक्षिणा मस्ताकदुत्खायानीयमानोऽस्यां भूमौ पपात ।
वृद्धा-(सपरितोषं मलयवतीं समालिङ्ग्य)-अविधवे ! धीरा
अविधवे ! धीरा
होहि । ण क्खु ईरिसी आकिदी वेहव्वदुक्खं अणुहोदि ।
भव । न खल्वीदृशी आकृतिर्वैधव्यदुःखमनुभवति ।
मलयवती-(सहर्षम्) अम्ब ! तुम्हाणं आसिसां पभाएण ।
अम्ब ! युष्माकमाशिषां प्रभावेण ।
[पादयोः पतति]
जीमूतकेतुः--(शङ्खचूडमुपसृत्य) वत्स ! किं तव चूडा-
मणिरपहृतः ?
शङ्खचूडः- आर्य ! न ममैकस्य, त्रिभुवनस्यापि ।
जीमूतकेतुः - कथमिव ?
शङ्खचूडः- दुःखातिभाराद्वाष्पोपरुध्यमानकण्ठो न शक्नोमि
कथयितुम् ।
जीमूतकेतुः-आवेदय ममात्मीयं पुत्र ! दुःखं सुदुःसहम् ।
मयि सङ्क्रान्तमेतत्ते येन सह्यम् भविष्यति ॥१०॥
श्लोक नं० : १०, अन्वयः-
पुत्र ! आत्मीयं सुदुःसहं दुःखं मम आवेदय, येन मयि
सङ्क्रान्तम् एतत् सह्यं भविष्यति ।
( २.२ )
जीमूतकेतु- (सुनकर, हर्षपूर्वक हंस कर) देवी ! शोक को छोड़ दो।
निश्चय ही यह चूडामणि इसी का है, (जो) मांस के लोभ से
किसी पक्षी के द्वारा मस्तक से उखाड़ कर लाया जाता हुआ इस
भूमि पर गिर पड़ा है।
वृद्धा - (सन्तोष के साथ, मलयवती को गले लगाकर) सौभाग्यवती,
धीरज धर। ऐसी (सुन्दर) आकृति वैधव्य दुःख का अनुभव
नहीं कर सकती।
मलयवती - माता जी ! आपके ही आशीर्वादों के प्रभाव से।
[पैरों पर गिरती है]
जीमूतकेतु - (शङ्खचूड के पास जाकर) वत्स, क्या तुम्हारा चूडामणि
चुरा लिया गया है ?
शङ्खचूड- आर्य ! केवल मेरा ही नहीं, त्रिलोकि का ही।
जीमूतकेतु - कैसे ?
शङ्खचूड - दुःख के अत्यन्त भार के कारण आँसुओं से रुँधे हुए गले
वाला मैं कह नहीं सकता।
जीमूतकेतु - हे पुत्र, अपना कठिनता से सहन किए जाने वाला (भी)
दुःख मुझे सुनाओ, जिससे मुझे दे देने से यह सहने योग्य
(हल्का) हो जाएगा।
( २१४ )
शङ्खचूडः—श्रूयताम्। शङ्खचूडो नाम नागः खल्वहम्। आहारार्थं
वासुकिना वैनतेयाय प्रेषितः। किं बहुना विस्तरेण !
कदाचिदियं रुधिरधारापद्धतिः पांसुभिरवकीर्यमाणा
दुर्लभ्यतामुपयाति। तत्संक्षेपतः कथयामि—
विद्याधरेण केनापि करुणाविष्टचेतसा।
मम संरक्षिताः प्राणा दत्त्वात्मानं गरुत्मते ॥११॥
जीमूतकेतुः— कोऽन्य एवं परहितव्यसनी ? वत्स ! ननु
स्पष्टमेवोच्यतां जीमूतवाहनेनेति। हा हतोऽस्मि
मन्दभाग्यः।
वृद्धा- हा पुत्तअ ! कहं तुए एदं किदं ?
हा पुत्रक ! कथं त्वयैतत्कृतम् ?
मलयवती— (सास्रम्) कहं सच्चीभूदं जेव्व दुच्चिंतिदं ?
कथं सत्यीभूतमेव दुश्चिन्तितम् ?.
[सर्वे मोहं गच्छन्ति]
शङ्खचूडः— (सास्रम्) नूनमेतौ पितरौ तस्य महासत्त्वस्य।
कथमप्रियवादिना मया इमामवस्थां नीतौ। अथवा
(विषादृते विषधरस्य मुखात् किमन्यन्निःसरति ? अहो
श्लोक नं०: ११, अन्वयः—
करुणाविष्टचेतसा केनापि विद्याधरेण गरुत्मते आत्मानं दत्त्वा मम
प्राणाः संरक्षिताः।
( २१५ )
शङ्खचूड— सुनिए— मैं शङ्खचूड नामक नाग हूँ। मुझे वासुकि ने गरुड़
के पास खाने के लिए भेजा था। अधिक विस्तार से क्या
लाभ ? कहीं यह खून की धारा का मार्ग धूलि से ढक जाने से
कठिनता से दिखाई पड़ने लगे । अतः संक्षेप से कहता हूँ।—
करुणापूर्ण चित्त वाले किसी विद्याधर ने गरुड़ को अपना शरीर
देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है।
जीमूतकेतु—कौन दूसरा इस प्रकार परोपकार में लगन रखता है ? पुत्र,
साफ़ साफ़ कहो कि जीमूतवाहन ने (तुम्हारे प्राण बचाए हैं) ।
आह, मैं अभागा मारा गया !
वृद्धा— हाय बच्चे, तू ने ऐसा क्यों किया ?
मलयवती— (आँसुओं के साथ) क्या जिस अमङ्गल की मुझे शङ्का थी
वह सच ही हो गया। [सब मूर्छित हो जाते हैं]
शङ्खचूड़—(आंसुओं के साथ) अवश्य ही ये ही (दोनों) उस महात्मा के
माता पिता हैं। अप्रिय वचन बोल कर मैं ने इन्हें इस दशा को
क्यों पहुँचाया है ? अथवा, साँप के मुख से विष के विना और
क्या निकल सकता है ? आह, प्राण दान करने वाले जीमूतवाहन
- करुणा ने जिस के मन पर काबू पा लिया है; अथवा, करुणा से
भरे मन वाला। - जिस को परोपकार करने की लत है।
( २१६ )
प्राणप्रदस्य सुसदृशं १ प्रत्युपकृतं जीमूतवाहनस्य शङ्ख-
चूडेन। तत् किमधुनैवात्मानं व्यापाययामि ? अथवा
समाश्वासयामि तावदेतौ। तात ! समाश्वसिहि ! अम्ब
सामाश्वसिहि। [उभौ समाश्वसितः]
वृद्धा- वच्छे ! उट्ठेहि, मा रोअ। अम्हे किं जीमूदवाहणेण
वत्से ! उत्तिष्ठ, मा रुदिहि ! वयं किं जीमूतवाहनेन
विणा जीवम्ह ? ता समस्सस दाव।
विना जीवामः ? तत्समाश्वसिहि तावत्।
मलयवती- (समाश्वस्य) अज्जउत्त ! कहिं मए तुमं पेक्खिदव्वो ?
आर्यपुत्र ! क्व मया त्वं प्रेक्षितव्यः ?
जीमूतकेतुः - हा वत्स ! गुरुचरणशुश्रूषाविधिज्ञ !
चूडामणिं चरणयोर्मम पातयता त्वया।
लोकान्तरगतेनापि नोज्झितो २ विनयक्रमः ॥ १२ ॥
(चूडामणिं गृहीत्वा) हा वत्स ! कथमेतावन्मात्रदर्शनः संवृत्तोऽसि ?
(हृदये दत्त्वा) अहह ! —
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
श्लोक नं०: १२, अन्वयः—
मम चरणयोः चूडामणिं पातयता, लोकान्तरगतेनापि त्वया
विनयक्रमः न उज्झितः।
( २१७ )
का शङ्खचूड़ ने क्या ही अच्छा प्रत्युपकार किया है ? तो
क्या मैं अभी अपने आप को मार डालूँ ? अथवा, इन दोनों
को धैर्य बन्धाता हूँ । पिता जी, धीरज करो; माता जी, धीरज
करो । [दोनों होश में आते हैं]
वृद्धा - बेटी, उठ; रो मत । हम क्या जीमूतवाहन के बिना जी सकते
हैं ? अतः धीरज कर ।
मलयवती - (होश में आकर) आर्यपुत्र ! मैं आप को कहां ढूँढूँ ।
जीमूतकेतु - हाय पुत्र, गुरुजनों के चरणों की सेवा करने की विधि
जानने वाले ;-
मेरे पैरों पर चूडामणि गिराते हुए, परलोक गए हुए भी
तू ने विनय का क्रम (मार्ग) नहीं छोड़ा ।
(चूड़ामणि लेकर) हाय पुत्र ! क्या अब तुम्हारे दर्शन इतने ही
रह गए ? (हृदय पर रख कर) आह !-
- कटाक्ष अथवा उपालम्भ रूप में । उसके इतने बड़े उपकार के
बदले मैं ने इतना उपकार किया । - क्रम = मर्यादा ; मार्ग ; तरीका ।
यहाँ पृष्ठ पर अंकित पाठ का देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
( २१८ )
भक्त्या विदूरविनताननमग्रमौलेः
शश्वत्तव प्रणमतश्चरणौ मदीयौ ।
चूडामणिर्निकषणैर्मसृणोऽप्ययं हि$^1$
गाढं विदारयति मे हृदयं कथं नु ॥ १३
वृद्धा—हा पुत्त जीमूदवाहण ! जस्स दे गुरुअणसुस्स
हा पुत्र जीमूतवाहन ! यस्य ते गुरुजनशुश्रूषां
विजिअ अण्णं सुहं ण रोअदि, सो कहिं दाणिं पि
वर्जयित्वान्यत्सुखं न रोचते , स कुत्रेदानों पित
उज्झिअ सग्गसुहमणुहोदुं गदोसि ?
उज्झित्वा स्वर्गसुखमनुभवितुं गतोऽसि ?
जीमूतकेतुः—(सास्रम्) देवि ! किं जीमूतवाहनेन वि
जीवामो वयं येनैवं प्रलपसि ?
मलयवती—(पादयोर्निपत्य कृताञ्जलिः)— ता देहि मे अ[त्त]
तद्देहि मे आ
उत्तचिण्हं चूडामणिं, जेण एदं हिअए क[डु]
पुत्रचिह्नं चूडामणिं , येनैनं हृदये कृत
जलणपवेसेण अवणेमि हिअअस्स संदावदुःखम् ।
ज्वलन प्रवेशेनापनयामि हृदयस्य सन्तापदुःखम् ।
श्लोक नं०: १३, अन्वयः—
भक्त्या विदूरविनताननमग्रमौलेः मदीयौ चरणौ शश्वत् प्रण[मतः]
तव अयं हि चूडामणिः निकषणैः मसृणोऽपि कथं नु मे [हृदयं]
गाढं विदारयति ।
( २१६ )
भक्ति के साथ दूर तक अपने मुख तथा सिर को झुकाने वाले,
सदा मेरे पैरों पर प्रणाम करने वाले तेरा यह चूडामणि, रगड़
से चिकना हुआ भी क्यों मेरे हृदय को इतने ज़ोर से काट रहा
है।
द्धा - हा पुत्र जीमूतवाहन, तुम्हें तो गुरुजनों की सेवा को छोड़ दूसरा
कोई सुख अच्छा ही नहीं लगता था, फिर तुम अब माता
पिता को छोड़ कर स्वर्ग का सुख अनुभव करने कैसे चले
गए हो ?
जीमूतकेतु — (आंसुओं के साथ) देवी ! क्या हम जीमूतवाहन के बिना
जीएँगे जो तुम इस प्रकार विलाप कर रही हो ?
मलयवती — (चरणों पर गिर कर, हाथ जोड़ कर) — आर्य्यपुत्र की
निशानी यह चूडामणि मुझे दे दीजिए, ताकि इसे छाती से
लगाकर अग्नि में प्रवेश कर के अपने हृदय की जलन तथा
दुःख दूर करूँ ।
१. विरोधाभास ।
(२२०)
जीमूतकेतुः— पतिव्रते ! किमेवमाकुलयसि ? ननु सर्वेषामे-
वास्माकमयं निश्चयः ।
वृद्धा- महाराअ ! ता किं अम्हेहिं पडिवालीअदि ?
महाराज ! तत्किमस्माभिः प्रतिपाल्यते ?
जीमूतकेतुः— न खलु देवि ! किञ्चित् । किन्त्वाहिताग्नेर्ना-^1
न्येनाग्निसंस्कारो विहितः^2 । अतोऽग्निहोत्रशरणाद्-
ग्नीनादायात्मानमुद्दीपयामः^3 ।
शङ्खचूडः— (आत्मगतम्)— कष्टं ! ममैकस्य कृते सकल-
मेवेदं विद्याधरकुलमुच्छिन्नम्। तदेवं तावत्। (प्रकाशम्)
तात ! न खल्वनिश्चित्यैव युक्तमिदमीदृशं साहसमनु-
ष्ठातुम् । विचित्राणि हि दैवविलसितानि । कदाचिन्नायं
नाग इति ज्ञात्वा परित्यजेन्नागशत्रुः । तदनयैव दिशा
वैनतेयमनुसरामस्तावत् ।
वृद्धा— सव्वहा देवदाणं पसादेण जीवतस्स पुत्तअस्स मुहं
सर्वथा देवतानां प्रसादेन जीवतः पुत्रस्य मुखं
दंसेम ।
पश्यामः ।
मलयवती-(आत्मगतम्) दुल्हहं क्खु एदं मम मंदभग्गाए ।
दुर्लभं खल्वेतन्मम मन्दभाग्यायाः
( २२१ )
जीमूतकेतु—हे पतिव्रते ! इस प्रकार क्यों व्याकुल हो रही हो ? हम
सब का यही निश्चय है।
वृद्धा—महाराज ! तो हम किस की प्रतीक्षा कर रहे हैं ?
जीमूतकेतु—देवी ! किसी की नहीं। परन्तु अग्निहोत्री का दाह संस्कार
किसी दूसरी अग्नि से नहीं हो सकता। अतः अग्निहोत्र शाला
से अग्नियां लाकर अपने आप को जलाते हैं।
शङ्खचूड़—(मन ही मन) बड़े कष्ट की बात है। मुझ अकेले के लिए यह
विद्याधर कुल सारा ही नष्ट हो रहा है। तो ऐसा (करता हूँ)।
(प्रकट) हे तात ! बिना निश्चय किए ही ऐसा साहस करना
उचित नहीं। भाग्य के खेल विचित्र हैं। कदाचित् 'यह नाग
नहीं है' ऐसा जान कर गरुड़ उसे छोड़ (ही) दे। अतः इसी
मार्ग से गरुड़ का पीछा करते हैं।
वृद्धा—सब प्रकार से देवताओं की कृपा से हम जीते हुए पुत्र का मुख
देखेंगे।
मलयवती—(मन ही मन) मुझ अभागिन के लिए यह दुर्लभ है।
१. आहिताग्नि = अग्निहोत्री। जो घर में यज्ञ की अग्नि सदा जलाए
रखते हैं; बुझने नहीं देते।
२. न विहितः = विधान नहीं किया गया। शास्त्रकारों ने अनुमति
नहीं दी।
३. अग्नीन् = तीन प्रकार की अग्नियां बताई हैं — दक्षिण,
गार्हपत्य तथा आहवनीय।
( १२२ )
-वत्सः ! अवितथैषा तव भारती भवतु । तथापि
साग्नीनामेवास्माकं युक्तमनुसर्तुम् । तदनुसरतु भवान् ।
वयमप्यग्निशरणादग्निमादाय त्वरितमेवानुगच्छामः ।
[पत्नीवधूसमेतो निष्क्रान्तः ।]
शङ्खचूडः - तद्यावद् गरुडमनुसरामि । (परिक्रम्य अग्रतो निर्वर्ण्य) -
^1कुर्वाणो रुधिराद्र्रचञ्चुकषणैर्दोखीरिवाद्रेस्तटीः,
प्लुष्टोपान्तवनान्तरः स्वनयनज्योतिःशिकासञ्चयैः ।
मज्जद्वङ्ककठोरघोरनखरप्रान्तावगाढावनिः
शृङ्गाग्रे मलयस्य पन्नगपुरिर्दूरादसौ दृश्यते ॥१४॥
[ततः प्रविशति आसनस्थः पुरःपतितनायको गरुडः]
गरुडः - (आत्मगतम्) जन्मन. प्रभृति भुजङ्गपतीनश्नन्।
नेदमाश्चर्यं मया दृष्टपूर्वं यदयं महासत्वो न केवलं न
व्यथते प्रत्युत प्रहृष्ट इव किमपि दृश्यते । तथाहि-
श्लोक नं०: १४, अन्वयः- रुधिराद्र्रचञ्चुकषणैः अद्रेः तटीः दोधीः इव
कुर्वाणः, स्वनयनज्योतिःशिखासञ्चयैः प्लुष्टोपान्तवनान्तरः,
मज्जद्वङ्ककठोरघोरनखरप्रान्तावगाढावनिः, असौ पन्नगरिपुः
शृङ्गाग्रे दूरात् दृश्यते ॥
( २२१ )
जीमूतकेतु—वत्स, तुम्हारी यह वाणी सत्य हो ! फिर भी अग्नि के
साथ ही हमारा अनुसरण करना उचित होगा। अतः आप
(उसका) अनुसरण करें। हम भी अग्निशाला से अग्नि लेकर
शीघ्र ही पीछे पीछे आते हैं।
[पत्नी तथा बहू के साथ प्रस्थान]
शङ्खचूड़— तब मैं गरुड़ का अनुसरण करता हूँ। (घूमकर, आगे देख
कर)— रक्त से गीली अपनी चोंच के रगड़ने से पर्वत की
तलहटियों को नावों की तरह (बीच में से गहरी) करता हुआ
अपनी आँखों की ज्योति की ज्वालाओं से समीप के वन के
मध्यभाग को जलाता हुआ, (मलयभूमि में) घुसने वाले वज्र के
समान कठोर भीषण नखों की नोकों से भूमि को खोदता हुआ,
यह साँपों का शत्रु (गरुड़) मलयपर्वत की चोटी पर (बैठा हुआ)
दूर से (ही) दिखाई दे रहा है।
[सामने पड़े हुए नायक के साथ आसन जमाए गरुड़ का प्रवेश]
गरुड़ – (मन ही मन) जन्म से नागराजों को खाते हुए मैंने कभी
पहिले ऐसा आश्चर्य नहीं देखा। क्योंकि यह महासत्त्व (महात्मा)
केवल व्यथा रहित ही नहीं, अपितु कुछ कुछ प्रसन्न सा दिखाई
देता है— । क्योंकि:—
- कृ + शानच् + प्रथमा एक वचन।