नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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भी जीकर अपने आप को हंसी का पात्र नहीं बनाऊँगा। तो
इसो के पीछे जाने का यत्न करता हूँ ।
[ घूमते हुए, पृथ्वी पर आंखें गाड़ कर ] —
जो आरम्भ में अधिक खून के गिरने से मोटी है, फिर आगे कुछ
कुछ दूरी पर गिरी हुई मोटी मोटी बूंदों वाली है, पत्थरों पर
गिरने से टूटे हुए जिसके छोटे छोटे कण बिखरे पड़े हैं, भूमि
पर (गिरने से) जिस के ऊपर कीड़े व्याप्त हैं, धातुओं की चट्टानों
पर जो कठिनता से दिखाई दे रही है, घने वृक्षों पर जो
जमकर नीले रंग की हो गई है (ऐसी) इस रक्त धारा का
अनुसरण करता हुआ मैं गरुड़ को देखने की इच्छा वाला
जाता हूँ ।
वृद्धा — (घबराहट के साथ) महाराज ! यह शोकातुर सा रोता हुआ,
इधर ही शीघ्रता से आता हुआ मेरे हृदय को व्याकुल कर रहा
है। अतः पता लगाइए कि यह कौन है ?
जीमूतकेतु — जैसा रानी कहे।
शङ्खचूड़- (ज़ोर से रोता हुआ) हे त्रिलोकि के एकमात्र चूडामणि ! मैं
तुम्हें कहां देखूँ ? मैं लुट गया, अरे, ठगा गया ।
१. पृथ्वौ = मोटी । २. स्त्यान = घनीभूत, जमी हुई ।
३. शङ्खचूड़ जीमूतवाहन के बारे में कह रहा है । सुनने वाले सिर
का आभूषण ही समझते हैं ।