नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
पृष्ठ 241, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 241
( २१७ )
का शङ्खचूड़ ने क्या ही अच्छा प्रत्युपकार किया है ? तो
क्या मैं अभी अपने आप को मार डालूँ ? अथवा, इन दोनों
को धैर्य बन्धाता हूँ । पिता जी, धीरज करो; माता जी, धीरज
करो । [दोनों होश में आते हैं]
वृद्धा - बेटी, उठ; रो मत । हम क्या जीमूतवाहन के बिना जी सकते
हैं ? अतः धीरज कर ।
मलयवती - (होश में आकर) आर्यपुत्र ! मैं आप को कहां ढूँढूँ ।
जीमूतकेतु - हाय पुत्र, गुरुजनों के चरणों की सेवा करने की विधि
जानने वाले ;-
मेरे पैरों पर चूडामणि गिराते हुए, परलोक गए हुए भी
तू ने विनय का क्रम (मार्ग) नहीं छोड़ा ।
(चूड़ामणि लेकर) हाय पुत्र ! क्या अब तुम्हारे दर्शन इतने ही
रह गए ? (हृदय पर रख कर) आह !-
- कटाक्ष अथवा उपालम्भ रूप में । उसके इतने बड़े उपकार के
बदले मैं ने इतना उपकार किया । - क्रम = मर्यादा ; मार्ग ; तरीका ।