नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
पृष्ठ 211, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 211नायक—शङ्खचूड़ ! तो जाओ, इन कोमल बातों से क्या लाभ ?
नायक—शङ्खचूड़ ! तो जाओ, इन कोमल बातों से क्या लाभ ?
शङ्खचूड़—गरुड़ के आने का समय समीप ही है। (माता के आगे
घुटने टेक कर) माता जी ! आप भी अब लौट जाइए।
हे माता ! जिस जिस योनि में हम उत्पन्न हों, उस उस
(योनि) में हे पुत्रवत्सले ! तू ही हमारी माता हो।
वृद्धा—(आंसुओं के साथ) क्या यह इस का अन्तिम वचन है ? हे पुत्र,
तुम्हें छोड़ कर मेरे पैर कहीं और नहीं चलते। यहीं तेरे साथ
ही ठहरूँगी।
शङ्खचूड़—(उठकर) मैं भी तब तक समीप ही भगवान् दक्षिण गोकर्ण
की प्रदक्षिणा कर के स्वामी की आज्ञा का पालन करता हूँ।
[दोनों का प्रस्थान]
नायक—आह ! मेरी इच्छा पूर्ण नहीं हुई। (अब) यहां कौनसा उपाय
है ?
कञ्चुकी—(वेग के साथ प्रवेश करके) यह (लाल) वस्त्रों का जोड़ा।
नायक—(देख कर, हर्षपूर्वक, मन ही मन) भाग्यवश अचानक लाए
गए इन दोनों लाल वस्त्रों से मेरा मनोरथ सिद्ध हो गया !
- दशा, हालत, योनि। 2. पताकास्थानम्।
- जिस के बारे में सोचा नहीं था, सहसा, अचानक।