मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
३८ मीराँ-बृहद-पद-संग्रह
काँढि कलेजा मै धरू रे, कौवा तू ले जाइ।
ज्या देसा म्हारो पिव बसै, (सजनी) वे देखे तू खाड।
म्हारो नातो नाव को रे, और न नातो कोड।
मीराँ व्याकुल विरहणी रे, पिया दरसण दीजो मोड।
११
तै दरद नहि जान्यू, सुनि रै वैद अनारी।
तू जा वैद घरि आपणै रे, तुझै खबर मोरी नाही।
मोरे दरद को तू मरम नहि जाणै, करक कलेजा रे माही।
'प्राण जाण का सोच नहि मोहि, नाथ दरस द्यौ आरी¹।
तुम दरसन बिन जिव यूँ तरसै, ज्यूँ जल बिन पनवारी।
कहा कहू कछु कहत न आवै, सुणिज्यो आप मुरारी।
मीराँ के प्रभु कबरे मिलोगे, जनम जनम की मै थारी ॥३९॥†
भाषा और भाव दोनो ही के आधार पर यह पद पद स० १० की
कुछ पक्तियो का गेय रूपान्तर ही सिद्ध होता है।
पद के इस रूप मे पूर्वापर सम्बन्ध का भी अभाव है। इससे
उपर्युक्त कथन का समर्थन ही होता है।
१२
रमैया बिन मोसूँ रह्योइ न जाय।
खान पान मोहि फीको सो लागै, नैणाँ रहै मुरझाइ।
बार बार मै अरज करत हूँ, रैण गई दिन जाइ।
मीराँ कहै प्रभु तुम मिलिया बिन, तरस तरस तन जाइ ॥४०॥
१ शीघ्र ।
वियोगाभिव्यक्ति ३९
१३
पिय बिन रह्योइ न जाइ।
तन मन मेरो पिया पर वॉहूँ, बार बार बलि जाइ।
निसदिन जोऊँ बाट पियाँ की, कबरे मिलोगे आइ।
मीराँ के प्रभु आस तुम्हारी, लीजो कठ लगाई। ॥४१॥
उपर्युक्त दोनो पदो की प्रथम पक्तियो का साम्य विचारणीय है।
१४
रे पपइया प्यारे कब को बैर चितार्यो१ ।
मै सूती छी अपने भवन मे, पिय पिय करत पुकार्यो।
दाध्या ऊपर लूण लगायो, हिवडो करवत सार्यो।
उठि बैठो बृच्छ की डाली, बोल बोल कठ सार्यो।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणॉ चित्त धार्यो ॥४२॥
१५
तुम देख्या बिन कल न पडत है, भली ए बुरी कोइं लाख कहो जी।
नेह को पेड़ो बोहोत करुण है, च्यारी कही दस और कहो जी।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, प्रीत करो तो बोल सहोजी।
॥४३॥†
पाठान्तर १,
कृष्ण मेरे नजर के आगे ठाढो रहो रे।
मै जो बुरी सान और भली है, भली की बुरी मेरे दिल रह्यो रे।
प्रीत को पेणूडो बहुत कठिन है, चार कही दस और कहो रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रीत करो तो मेरा बोल सहो रे।†
१ बदला लिया।
४० मीराँ-बृहद-पद-संग्रह
१६
म्हारो मनडो लाग्यो हरि सूं, मै आज करूँ अतर सूँ ।
माधोरी मूरति पलक न बिसरूँ, सो ले हिरदै धरूँ ।
आवन कह गये अजहूँ न अये, बिन दरसण मे तरसूँ ।
म्हाँरो जनम सुफल होय, जादिन हरि के चरण परसूँ ।
मीरा के प्रभु दरसण दीज्यो, तन मन अरपण करस्यूँ । ॥४४॥
१७
म्हाँरो मन मोह्यो छै जी स्याम सुजाण ।
माधुरी मूरत सूरत सुन्दरी जाणे कोटिक भान¹ ।
कसूॅमल पाग केसर्यो जामो, सोहै कुडल कान ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तुम बिन तलफत प्राण । ॥४५॥
१८
बाई, म्हाँरे रावल भेष ।
वे स्याम बहो जटाधारी, अब ही अजन रेख ।
स्वेत बरण रग के कथा पहर्या, भिक्षा मागा देस ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, करहूँ अलख अलेख ॥४६॥+
पाठान्तर १,
बाई, थाराँ नैन रावल भेख ।
बानी श्याम बोहो जटाधारी, अन्जन रेख ।
स्वेत अरुण कंथा बिराजत, माँगत देस ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, करत करत अलेख ।†
१. भानु, सूर्य ।
वियोगाभिव्यक्ति ४१
पाठान्तर २,
बाई म्हारे नैन रावल भेष ।
बिना श्याम सखी मे जटाधारी, सेली अंजन रेख ।
सुवेद वरण अग कत्था राजै, भिक्षा मांगूं देश ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, करूंगी अलख अलेख ।†
उपर्युक्त तीनो ही पाठो से कोई भी अर्थ स्पष्ट नही होता ।
१९
डाल गयो रे गल मोहन फॉसी ।
ऊँची सी अटाली पर मेहुँडा बरसत,
बूँद लगी जसी तीर की गॉसी ।
अँबुवा की डाली पर कोयल बोलत,
म्हॉरो तो मरनो भयो थॉरी भयी हॉसी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर,
थे तो मेरा ठाकुर, मै तो थॉरी दासी ॥४७॥†
उपर्युक्त पद मे वसत और वर्षा का वर्णन एक ही साथ हुआ
ह, यह असगत प्रतीत होता है ।
पाठान्तर १,
डारि गयो मन मोहन फासी ।
ऑबा की डाली कोयल इक बोले ।
मेरो मरण अरु जग केरी हॉसी ।
बिरह की मारी मै बन बन डोलूँ ।
प्राण तजूं, करवत ल्यूँ कासी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर ।
तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी ।†
४२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
२०
ओलूंडी१ लगाय गयो है ब्रज को बासी, कब मिलि जासी हे।
चंपेली री डाल कोयलिया बोले, बोलत बचन उदासी हे।
गोकुल ढूँढ वृन्दावन ढूढ्यो, ढूँढी मथुरा कासी हे।
रैण दिवस मछली ज्यूँ तलफ, तलफ तलफ जिवडो जासी हे।
जो कोई प्रभु जी नै आण मिलावै, छूटत प्राण बचासी हे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि जी मिल्या दुख जासी हे।
।।४८।।
२१
ओलू थारी आवै ह्हो महाराज अविनासी।
हो म्हाने कब रे दरस दिखासी।
बिरह वियोगिन बन बन डोलूँ, करवत लूँगी कासी।
निसि दिन उभी पथ निहारु, कब मोहे धीर बधासी।
कृपा करो म्हारे भवन पधारो, नाही ये जिवडो जासी।
मे भेद अभागण काहे को सरजी, पिया मोसूँ रहत उदासी।
तुम हो हमारे अतरजामी मै (थारा) चरणा री दासी।
मीराँ तो कुछ जाणत नाही, पकडी टेक निभासी। ।।४९।।
इस पद की अंतिम पंक्ति सर्वथा नूतन शैली मे है,। पद की
भाषा राजस्थानी प्रधान है, अत सातवी पंक्ति मे प्रयुक्त 'तुम' और
'हमारे' शब्दो के स्थान पर 'थे' और 'म्हारा' होना ही उपयुक्त प्रतीत
होता है।
२२
परम सनेही राम की नित ओलू री आवै।
राम हमारे हम है राम के, हरि बिन कछु न सुहावै।
१. याद, स्मृति।
वियोगाभिव्यक्ति ४३
आवण कह गए अजहू न आए, जिवडो अति अकुलावै ।
तुम दरसण की आस रमैया, कब हरि दरस दिखावै ।
चरण कवल की लगन लगी, नित बिन दरसण दुख पावै ।
मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीज्यो, आनन्द वरणूं न जावै ।
॥५०॥
पद की चतुर्थ पंक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर प्राप्त है।
“तुम दरसण की आस रमैया, निसि दिन चितवत जावै ।”
२३
सावरिया, मोरे नैणा आगे रहिज्यो जी ।
म्हाने भूल मत जाज्यो जी, मोहन लगन लगी निभाज्यो जी ।
राणा जी भेज्यो विष रो प्यालो, सो अमृत कर पीज्यो जी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल बिछुड़न मत कीज्यो जी ।
॥५१॥ †
उपर्युक्त पद की प्रथम दो और अन्तिम दो पंक्तियो मे अर्थ समन्वय
नही होता। द्वितीय पंक्ति मे प्रयुक्त ‘पीज्यो’ शब्द के स्थान पर
‘दीज्यो’ शब्द ही अधिक अर्थमय सिद्ध होता है।
२४
सावरिया, म्हारी प्रीतडली निभाज्यो ।
प्रीत करो तो स्वामी ऐसी कीज्यो, अधविच मत छिटकाज्यो१ ।
तुम तो स्वामी गुणरा सागर, म्हारा ओगुण चित मति लाज्यो ।
काया गढ घेरा ज्यो पड़ या छै, ऊपर आपर खाज्यो ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चित्त चरणा रखाज्यो । ॥५२।
पद की तीसरी पंक्ति सर्वथा अर्थहीन प्रतीत होती है।
१. दूर हटा देना।
४४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
२५
घडी एक नही आवडे¹ तुम दरसण बिन मोय।
तुम ही मेरे प्राण जो, कासू जीवण होय।
धान² न भावै, नीद न आवै, बिरह सतावै मोय।
घायळ सी घूमत फिरु रे, मेरो दरद न जाणै कोय।
दिवस तो खाय गमायो रे, रैण गमाई सोय।
प्राण गमायो झूरता³ रे, नैण गमाया रोय।
जो मै ऐसा जाणती, प्रीत किए दुख होय।
नगर ढिढोरा पीटती रे, प्रीत न कीज्यो कोय।
पथ निहारु, डगर⁴ बुहारु⁵, ऊभी मारग जोई।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम मिलिया सुख होई। ॥५३॥
पद की भाषा प्रधानत राजस्थानी है सिर्फ कुछ सर्वनाम खडी
बोली के हैं। जैसे 'तुम' अत इनका भी राजस्थानी के अनुकूल 'थे'
हो जाना ही अधिक युक्तियुक्त होगा।
२६
को विरहणि को दुख जाणै हो।
जा घट विरहा सोई लख⁶ है, कै कोई हरिजन मानै⁷ हो।
रोगी आतर⁸ वेद बसत है, वैद ही ओखद जाणै हो।
विरह करद९ उरि अतरि माही, हरि बिनि सुख काने¹⁰ हो।
दुग्धा आरत फिरै दुखारी, सुरत बसी सुत मानै हो।
छात्रग स्वाति बूँद मन माही, पिव पिव उकलाणै¹¹ हो।
सब जग कूड़ो कंटक दुनिया दरध¹² न कोई पिछाणै हो।
मीराँ के पति आप रमइया, दूजो नही कोई छाणै हो। ॥५४॥
१ चैन पडे, २ अन्न, ३ याद करते हुए, ४ रास्ता, ५ झाड दूं, साफ
करदूँ, ६ अंदाज लगा लेना, ७ विश्वास कर ले, ८ अतर, ९ करक,
१० काम है, छोटा है। ११ व्याकुल होना, १२ दर्द,
वियोगाभिव्यक्ति' ४५
२७
रमैया बिन नीद न आवै ।
नीद न आवै बिरह सतावै, प्रेम की आँच दुलावै ।
बिन पिया जोत मदिर अधियारो, दीपक दाय१ न आवै ।
पिया बिन मेरी सेज अलूणी, जागत रैण बिहावै ।
पिया कब रे घर आवै ।
दादुर मोर पपीहरा बोले, कोसल सबद सुणावै ।
घुमट घटा ऊलर होई आई, दामिन दमक डरावै ।
नैना झर लावै ।
कहा करु कित जाऊ मोरी सजनी, वेदण कूण बुतावै२ ।
बिरह नागण मोरी काया डसी है, लहर लहर जिव जावै ।
जडी घस लावै ।
को है सखी सहेली सजनी, पिय कूँ आण मिलावै ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे मन मोहन मोहि भावै ।
कबै हस कर बतलावै३ । ॥५५॥
२८
साजन, म्हारी सेजडली कद आवै हो ।
हसि हसि बात करु हिडदा की, जब जिवड़ो जक४ पावै हो ।
पाचू इन्द्री बस नही मोरी, घन ज्यूँ धीर धरावै हो ।
कठिन विरह की पीड गुँसाई, मिलि करि तपत बुझावै हो ।
या अरदास५ सुणो हरि मोरी, विरहणी पल्लो बिछावै६ हो ।
॥५६॥
१ पसन्द, २ बन्द कर देना, मिटा देना, ३ बात करे। ४ चैन,
५ अर्ज, प्रार्थना, ६ "पल्लो बिछावै"-दैन्य स्वीकार करना ।
४६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
२९
म्हारे घर आवो जी, राम रसिया, थारी सावरी सूरत मन बसिया।
घुडला जीव पूरबो मोहन, बखतर खासा कसिया ।
चुन चुन कलिया सेज बिछाई; ऊपरि राखिया तकिया ।
सिरे- गाय की पूँछ मगायो, चावल गेया पसिया ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल मन बसिया ।।५७।।†
पदाभिव्यक्ति अर्थ हीन है।
?
३०
भवन पति, तुम घरि आज्यो हो।
बिदा तागी तन माहिने (म्हारी) तपत बुझाज्यो हो।
रोवत रोवत डोलॉत, सब रैण बिहावै हो।
भूख गई, निदरा गई, पापी जीव न जावै हो।
दुखिया को सुखिया करो, मोहि दरसण दीजै हो।
मीराँ व्याकुल विरहणी, अब बिलम न कीजै हो। ।।५८।।
पद की भाषा मुख्यत. राजस्थानी है, अत भाषा के दृष्टि कोण से
'डोलॉत' प्रयोग के बदले 'डोलता' प्रयोग ही विशेष शुद्ध है। 'डोलता'
का अर्थ है घूमते हुए ।
३१
बेग पधारो सावरा कठिन बनी है, आप बिना म्हारो कूण धनी है।
दुखिया कूँ देख देर मत कीज्यो, देर की बिरिया और घणि है।
दिन नही चेत, रैन नही निद्रा, दुसमन के हिये हरस घणि है।
जमडा की फौजा प्रभु आन पड़ी है, बेग हटावो मोटा आप धनीहै।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल बिच आन खडी है।
।।५९।।†
पद मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है।
वियोगाभिव्यक्ति ' ४७
३२
म्हारे घर होता जाज्यो राज ।
अब के जिन¹ टाला दे जावो, सिर पर राखूँ विराज ।
पावणडा² म्हाके भले ही पधारो, सब ही सुधारण काज ।
म्हे तो जनम जनम की दासी, थे म्हारा सिरताज ।
म्हे तो बुरी छा,थाके भली छै घणेरी,तुम हो एक रसराज ।
थाने हम सब दिन की चिंता,तुम सब के हो गरीब निवाज ।
सब के मुगुट सिरोमनि, सिर पर मानूँ पुण्य की लाज ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बाह गहे की लाज ॥६०। '†
पाठान्तर १,
होता जाज्यो राज, महलाँ म्हारे होता जाज्यो राज ।
मे अगुणी मेरा साहब सुगुणा, सत सवारे काज ।
मीराँ के प्रभु मन्दिर पधारो, कर केसरिया साज ।†
इस द्वितीय पाठान्तर की भाषा अधिक शुद्ध है । प्रथम पाठ
की अभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबंध का अभाव है।
३३
साजन, बेगा³ घर आज्यो जी ।
आदि अतर रा यार हमारा, हम को सुख लाज्यो जी ।
निसि दिन चित चरणा धरू, हो मनडा ते न बिसरू ।
नजरि परै तुजि ऊपरि, धन जोवन वारू ।
हो मे पतिवरता रावरी, काहू तन काजै जी ।
अपनी वोरि निहारि के, प्रीति निभाज्यो जी ।
हरि बिन सुरति कहा धरू, नित मारग जोऊ जी ।
१ नही, २ अतिथि, ३ शीघ्र ।
४८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
सांईं तेरे कारणे, भरि नीद न सोऊ हो।
बिछरिया दिन बहु भया, बेगा दरस दिखाय्जो जी।
प्रीति पुराणी जाणि कै, वाही कृपा रखाय्जो जी।
मेरे अवगुण देखि कै, तुम नाहि तुलाज्यो जी।
मेरे कारण रावरो, मति बिडद लाज्यो जी।
वा बिरिया कब होसी, कोई कहै सदेशा हो।
मीराँ के उणवात रो, मति परो अनेसा हो। ॥६१॥†
पदाभिव्यक्ति मे असंगति और पुनरुक्ति है।
३४
आवो मनमोहना जी जोऊ थारी बाट।
खान पान मोहि नेक न भावै, नैण न लागे कपाट।
तुम आया बिन सुख नाहि मेरे, दिल मे बहोत उचाट।
मीराँ कहे मै भई रावरी, छाडो नही निराट¹। ॥६२॥
३५
आवो मनमोहना जी मीठा थारां बोल।
बालपना की प्रीत रमइया जी, कदे² नहि आयी थारो तोल।
दरसण बिना मोहि जक³ न पड़त है, चित्त मेरो डावाडोल।
मीराँ कहै मै भई रावरी, कहो तो बजाऊ ढोल। ॥६३॥
पद की द्वितीय पंक्ति से व्यक्त होती भावना विशेष विचार-
णीय है।
३६
कोई कहियो रे विनती जाइकै, म्हारा प्राण पिया नाथ ने।
जा दिन के बिछुरे मन मोहनं, कल न परे दिन रात नै।
१ निरावलम्ब २ कभी, ३ चैन ।
वियोगाभिव्यक्ति. ४९
देस विदेस सदेश न पूगे१, बिरहिन तलफे साथ नै ।
प्यारा महरम दिल की जाणै, और न जाणै कोई बात नै ।
मीराँ दरसण कारण झूरै, ज्यूँ बालक झूरै मात नै । ॥६४॥
पद की चतुर्थ पंक्ति मे प्रयुक्त 'महरम' शब्द की अर्थ संगति नही
बैठती। इस शब्द के बदले 'म्हारा' कर देने से अर्थ स्पष्ट हो जाता
है। भाषा के दृष्टिकोण से भी यह गलत नही हो सकेगा क्योकि पद की
भाषा राजस्थानी ही है।
३७
पतिया ने कूण पतीजै,२ आणि खबरि हरि लीजै।
झूठी पतिया लिख लिख भेजे, क्या लीजै क्या दीजै।
ऐसा है कोइ बाच३ सुणावै, मै बाचू तो भीजै।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चरण कमल चित दीजै। ॥६५॥
प्रथम और तृतीय पंक्ति का निम्नांकित पाठान्तर भी प्राप्त है।
प्रथम पंक्ति "पतिया ने कूण पतीजै, म्हारो असुँवा सो अचल भीजै।"
तृतीय पंक्ति "ऐसा है कोई बाच सुणावै, मैं बांचू तन छीजै।"
३८
थे छो म्हारा गुण रा सागर, औगुण (म्हारा) मत जाज्यो जी।
लोक न धीजै (म्हारो) मन न पतीजै, मुखडारो सबद सुणाज्यो जी।
मै तो दासी जनम जनम की, म्हारे आगण रमता आज्यो जी।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेड़ो पार लगाज्यो जी। ॥६६॥†
उपर्युक्त पद किसी अन्य पद का अंश मात्र प्रतीत होता है।
१ पहुचे, २ विश्वास करे ३ पढ़ कर।
४
५० मीरों-बृहद्-पद-संग्रह
३९
मदरो १ सो बोल मोरा, मोरा स्याम बिन जिव दोरा।
दादुर मोर पपइया बोले, कोयल कर रही शोरा।
झरमुर झरमर मेहा बरसे, गाजत हे घन घोरा।
मीराँ के प्रभु राधा बोले, स्याम मिल्या जिव सोरा २ ॥६७॥
४०
ऊधो, भली निभाई रं, त्यागे गोपी गोकुल म्हाने क्यूँ तरसाहि रे।
चन्दन घिस लाई, वा से प्रीत लगाई, वा नै लाज न आई।
खो देस्यो जी, उधो जी, आखिर चेरी की जाई रे।
बोहोत दिन बीत्या, म्हारी सुध न लई, नैणा से नीद गई।
चांदणी सी रात, म्हारे बैरण भई रे।
रास तो कियो म्हासे, प्रीतडली जोडी अब तुम काहे कूँ तोड़ी।
तीख ३ की मारी, म्हासै हुई छै नेडी ४ रे।
मीराँ जी तो बिना कल ना पडै, पल बिन नाही सरै।
छतियाँ तप़ै नैणा नीर झरै रे। ॥६८॥†
पद की पाचवी और सातवी पंक्तियो का शेष पद से पूर्वापर संबंध
नही बैठता। पद की आठवी पंक्ति निरर्थक है।
४१
अहो कांई जाणे गुवालियो, बेदरदी पीर तो पराई।
थे जनमत ही कुल त्यागन कीनों, बन बन धेनु चराई।
चोर चोर दधि माखन खायो, अबला नार त ताई।
१ मधुर, २ आराम युक्त, ३ इर्षा, ४ निकट,
५२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ज्या श्री चरणा सो म्हारो दुख जासी, चरणखोल१ जल पायजोजी।
दरद दिवानी मीराँ वैद सांवलियो, सूती ने आण जगायजोजी।
मीराँ तो दासी थारी जनम की, चरण कमल चित लायजोजी। ॥७१॥
४४
थारें रग रीझी रसिक गोपाल।
निस वासर मै रटूँ निरतर, दरसण द्यो नन्दलाल।
सो पतिव्रत टरै र्जिन टारो, मति बिसरो नन्दलाल।
कोऊ कहै नन्दो कोऊ कहै बन्दौ, चला भावती चाल।
सो पथ भलि केरो जिन साधो, म्हांरो मणि उरमाल।
प्रेम भरी मीराँ जिन गरबै, हरि है गिरधर लाल। ॥७२॥+
पदाभिव्यक्ति असंगत है। प्रथम पक्ति मे 'रग' के बदले 'गुण'
और अन्तिम पक्ति मे 'गरबै' के बदले 'गरजै' का प्रयोग भी मिलता है।
अन्तिम भक्ति पद की प्रामाणिकता का विरोध इगित करती है।
४५
गिरधर रूसणूँ जी कोन गुनाह।
कछु इक औगुण काढो म्हा मै, म्हैं भी कानां सुणा।
मै दासी थारी जनम जनम की, थे साहिब सुगणा२।
काँई बात सूँ करवौ रूसणूँ, क्यो दुःख पावो छो मना।
किरपा करि मोहि दरसण दीज्यो, बीते दिवस घणा३।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, थारो ही नांव गणा४ ॥७३॥+
पद के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही
हुआ है।
१ चरण धोकर, २ गुणयुक्त, ३० बहुत, ४ गिनना, निरन्तर जपना।
वियोगाभिव्यक्ति ५३
४६
सहेल्या उद्दौ जी आया है।
आया पठाया स्याम का, मेरे मन नहीं भाया है।
एक निमिष के कारणै, षटमास लगाया है।
पहली प्रीत करी हमसूँ, पीछे पछताया है।
जमुना जल मे नहावता, सभी चीर चुराया है।
कुबज्या दासी कस की, जिन स्याम चुराया है।
मुरली तो मोहन लई, जिणि स्याम रिझाया है।
देखो सखी सहलियो, नैणां कंर ल्याया है।
सुष दुष अपने करम का, गोविन्द वर पाया है।
दोस कुणी को दीजिये, मीराँ गुण गाया है। ॥७४॥†
उपर्युक्त पद की क्रियाये सभी आधुनिक हिन्दी मे है। अत
पद का प्रक्षिप्त होना ही युक्ति सगत है।
४७
निजर भर न्हालो नाथ जी, हू तो थारे चरणा री दासी।
मै अबला तुम सबला स्वामी, नही मिलणा कौ टालो रें।
फूँक फूँक पग धरू धरणी पर, मति लगाज्यौ कोई कालौ रे।
आप तो जाइ द्वारिका छाये, हम सूं दे गया टालौ रे।
बालपने को बालसनेही, प्रीति बचन प्रतिपालौ रे।
च्यारि महिना आयो सियालो१, च्यारि महिना उन्हियालो२ रे।
कृपा करि मोहि दरसण दीज्यौ, अब ऋतु आयो बरसालौ रे।
सब जग म्हारी निन्दा करत है, कीन्ही मूढो३ कालौ रे।
सरण तुम्हारी लई सावरा, तुम भी दियो छै म्हासूं टालौ रे।
म्हारो घर मे भयो अधेरो, आण करो उजियालौ रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, विरह अगनि मत जालौ रे। ॥७५॥†
पदाभिव्यक्ति मे अर्थ संगति और पूर्वापर संबंध का सर्वथा
अभाव है।
१ जाडे की ऋतु, २ गर्मी की ऋतु, ३ मुख।
५४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
४८
राम मिलणरो घणो¹ उमावो,² नित उठ जोवूँ बाटडिया³ ।
दरस बिना मोहि कछु न सुहावै, जक न पडत है आखड़िया ।
तलफत तलफत बहु दिन बीता, पडी बिरह की पाशडिया⁴ ।
अब तो बेगि दया करि साहिब, मै तो तुम्हारी दासडिया ।
नैण दुखी दरसण कूँ तरसै, नाभि बैठे सासडिया ।
राति दिवस यह आरति मेरे, कब हरि राखै पासडिया ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, पूरौ मन की आसडिया । ।।७६।।
४९
बसीवारो आयो म्हारो देस, थांरी सावरी सूरत वाली बैस⁵ ।
आऊ आऊ कर गया सांवरा, कर गया कौल अनेक ।
गिणता गिणता घिस गई अगली, घिस गई अंगली की रेख ।
मै वैराग ण आदि की, थारे म्हारे कदकी⁶ सनेस⁷ ।
बिन पानी बिन उबहनो, हर गई धुर सपेद⁸ ।
जोगण होई मै वन वन हेरु, तेरा न पाया भेस ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, घूंघरवाला केस ।
मीराँ प्रभु गिरधर मिल गये, दूणा बढा सनेस । ।।७७।।†
उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से विरोधाभास ही लक्षित होता है।
प्रथम और अन्तिम-पंक्तियों से आराध्य की समीपता और शेष पदाभि-
व्यक्ति से विरह ही लक्षित होता है।
पद की चतुर्थ पंक्ति मे "वैराग ण . . . सनेस" सर्वथा विभिन्न
पडती है। प्रथम पंक्ति के उत्तरार्द्ध में अर्थ संगति का अभाव हे। पद
की चतुर्थ और छठी पंक्ति की अभिव्यक्ति नाथ पंथ से प्रभावित है।
नाथ पंथ और वैष्णव मत का प्रभाव एक साथ एक ही पद मे
विचारणीय है।
१ बहुत, २ उमग, ३ राह देखना, ४ फंदा, ५ वयस, ६ कब
की, ७ मित्रता, स्नेह, परिचय, ८ सफेद ।
वियोगाभिव्यक्ति ५५
५०
म्हारी सुध ज्यो जाणो ज्यो लीजो जी।
पल पल भीतर पंथ निहारूं, दरसण म्हाने दीजो जी।
मै तो हू बहु औगण हारी, औगण१ चित मत दीजो जी।
मै तो दासी थारे चरण कवल की, मिल बिछुरन मत कीजो जी।
मीराँ तो सतगुरु जी सरणे, हरि चरणा चित दीजो जी। ॥७८॥ †
तृतीय पक्ति का निम्नांकित पाठान्तर भी मिलता है।
“मै तो दासी थारे चरणा जना की, मिल बिछुरन मत कीज्यो जी।”
इस पद के विभिन्न बोलियो से प्रभावित कई पाठ मिलते है।
उपर्युक्त पाठ की भाषा राजस्थानी है।
पाठान्तर १,
सजन, सुध ज्यूँ जानै त्यूँ लीजै हो।
तुम बिन मोरे और न कोई, किरपा रावरी कीजै हो।
दिन नही भूख रैण नही निद्रा, यूँ तन पल पल छीजै हो।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल बिछुडन मत कीजै हो। †
'हो' और 'रावरी' जैसे शब्दो के प्रयोग से इस पाठ पर अवधी
का प्रभाव प्रतीत होता है। प्रथम पक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर भी
मिलता है।
“ज्यों जानो त्यो लिये सजन, सुधि ज्यों जानो त्यो लीजै।”
पाठान्तर २,
साजन सुधि ज्यो जाणो, त्यो लीज्यौ जी।
म्हे तो दासी जनम जनम की, किरपा रावरी कीज्यौ जी।
उठत बैठत जागत सोवत कबहुक, याद करीज्यौ जी।
१ अवगुण।
५६ मीरों-वृहद्-पद-संग्रह
तुम पतिबरता नारी बिना प्रभु, काहो सो न पतीज्यो जी ।
साचो प्रेम प्रीत मो नातो, ताही सो तुम रीझ्यो जी ।
राति दिवस ओहि ध्यान तिहारो, आपही दरसन दीज्यौ जी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिलि बिछुरन मत कीज्यौ जी ।
इस पाठ की भाषा पर ब्रज भाषा का प्रभाव अति स्पष्ट है ।
प्रथम दो और अन्तिम पक्तियो के सिवा शेष पद अन्य पाठो से सर्वथा
भिन्न पडता है । बीच की चार पक्तियो मे अर्थ और पूर्वापर सबध
का अभाव है । इस पाठ विशेष से मिलता जुलता एक और निम्नाकित
पाठ भी प्राप्त है।
पाठान्तर ३,
ज्यूँ जाणो ज्यूँ लीज्यो सजन, सुध ज्यूँ जाणे ज्यूँ लीज्यो ।
हूँ तो दासी जनम जनम की, कृपा रावरी कीज्यो ।
उठत बैठत जागत सोवत, कबहुँक याद करीज्यो ।
आवत जावत जीमत सोवत, सुपणे दरस मोये दीज्यो ।
में पतिबरता नारी प्रभु जी, काँहूँ ते न पतीजौ ।
साँचो प्रेम प्रीत को नातो, ताही ते तुम हरि रीझौ ।
रात दिवस मोहि ध्यान तिहारो, आय दरस मोये दीज्यौ ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चित चरणाँ मे लीज्यो ।†
पाठान्तर ४,
थे म्हारी सुध ज्यूँ जाणूँ ज्यूँ लीज्यौ ।
आप बिना मोहे कछु न सुहावै, बेगो ही दरसण दीज्यो ।
मै मद भागण करम अभागण, ओगण चित म़त दीज्यौ ।
विरह लगी पल छिन न लगत है, तो तन यूँही छीज्यौ ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, देख्याँ प्राणपती ज्यौ ।
इस पाठ की अन्तिम पक्ति भी सर्वथा भिन्न पड़ती है ।
प्रथम पाठ से संतमत का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है, परन्तु अन्य
पाठो से विरह वेदना ही विशेष तौर से लक्षित होती है ।
वियोगाभिव्यक्ति ५७
५१
पिया जी म्हारे नैणा आगे रहज्यो जी।
नैणा आगे रहज्यो जी, म्हाने भूल मत जाज्यो जी।
भौ सागर मे बही जात हूँ; बेग म्हांरी सुध लीज्यो जी।
राणो जी भेज्या विष का प्याला, सो इमरित कर दीज्यो जी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल बिछुडन मत कीज्यो जी।
॥७९॥†
उपर्युक्त दोनो पदो मे प्राप्त साम्य के आधार पर यह पद भी ⁓
पद स० ५० का ही गेय रुपान्तर प्रतीत होता है। अन्तिम पंक्ति तो हूबहू
वही है। अन्य पंक्तिया भी विभिन्न पदों मे मिल जा सकती है। गेय
परम्परा से प्राप्त पदो मे ऐसे सम्मिश्रण का होना असम्भव नही।¹
५२
कहो ने जोशी² प्यारा, राम मिलण कद होसी।
जो जोशी मोहे प्रभु मिले, तो हीरा जडावूँ थारी पोथी।
जो जोशी मोहे प्रभु ना मिले, तो झूठी पडे तेरी पोथीं।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राम मिले सुख होसी। ॥८०॥
⁓ ५३
इतनूँ काई छै मिजाज म्हारे मदिर आवता।
थाने इतनूँ काई छै मिजाज।
तन मन धन सब अरपण कीनूँ, छाडी छै कुल की लाज।
दो कुल त्याग भई वैराग ण, आप मिलन की लाग।
मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, कुबज्या आई काई या है। ॥८१॥†
अन्तिम पंक्ति का उत्तरार्द्ध अर्थ हीन है। प्रथम दो पंक्तियो की
अभिव्यक्ति मे समर्पण की वह गहराई नही, जो मीराँ के पदो की
विशेषता है।
१ देखे 'मीराँ, एक अध्ययन,' २ कुल पुरोहित।
५८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
थे तो पलक उघाडो दीनानाथ, मे हाजिर नाजिर कद की खटी।
सोजनियाँ दुसमण होय बैठ्या, सब ने लगूँ कड़ी।
तुम बिन साजन कोई नही है, डिगी नाव मेरी सपद अडी।
वाण विरह का लाग्या हिये मे, भूलूँ न एक घडी।
पत्थर की तो अहल्या तारी, बन के बीच पडी।
कहा बोझ मीराँ के कहिए, सौ पर एक घडी। ॥८२॥
कही कही इसी पद के साथ निम्नांकित दो पंक्तियाँ और भी पायी
जाती हे।
'गुरु रैदास मिले मोहिं पूरे, धुर से कलम भिडी।
सतगुरु सैन दई जब आकें, जोत से जोत रली।
पदाभिव्यक्ति स्पष्ट नही है। पूर्वापर सबध और अर्थ संगति
का भी अभाव है। साथ ही प्रथम पंक्ति और शेष पद की अभिव्यक्तियो
मे गहरा विरोध भी है। सतमत का प्रभाव विशेष रूपेण लक्षित हो
उठता है।
२
राम मिलण के काज सखी, मेरे आरति उर मे जागी री।
तलफत तलफत कल न परत है, बिरह आणि उर लागी री।
निस दिन पथ निहारूँ पीव को, पलक न पल भरी लागी री।
पिव पिव मे रटूँ रातदिन, दूजी सुध बुध भागी री।
बिरह भवग¹ मेरो उस्यो है कलेजो, लहरि हलाहल जागी री।
मेरी आरति मेटि गुँसाई, आई मिलौँ मोहि सागी² री।
मीराँ व्याकुल उकलाणी³, पिया की उमंग अति लागी री।
॥८३॥
१ भुवग-साँप, २ स्वयम्, ३ व्याकुल।