मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
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राम मिलणरो घणो¹ उमावो,² नित उठ जोवूँ बाटडिया³ ।
दरस बिना मोहि कछु न सुहावै, जक न पडत है आखड़िया ।
तलफत तलफत बहु दिन बीता, पडी बिरह की पाशडिया⁴ ।
अब तो बेगि दया करि साहिब, मै तो तुम्हारी दासडिया ।
नैण दुखी दरसण कूँ तरसै, नाभि बैठे सासडिया ।
राति दिवस यह आरति मेरे, कब हरि राखै पासडिया ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, पूरौ मन की आसडिया । ।।७६।।
४९
बसीवारो आयो म्हारो देस, थांरी सावरी सूरत वाली बैस⁵ ।
आऊ आऊ कर गया सांवरा, कर गया कौल अनेक ।
गिणता गिणता घिस गई अगली, घिस गई अंगली की रेख ।
मै वैराग ण आदि की, थारे म्हारे कदकी⁶ सनेस⁷ ।
बिन पानी बिन उबहनो, हर गई धुर सपेद⁸ ।
जोगण होई मै वन वन हेरु, तेरा न पाया भेस ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, घूंघरवाला केस ।
मीराँ प्रभु गिरधर मिल गये, दूणा बढा सनेस । ।।७७।।†
उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से विरोधाभास ही लक्षित होता है।
प्रथम और अन्तिम-पंक्तियों से आराध्य की समीपता और शेष पदाभि-
व्यक्ति से विरह ही लक्षित होता है।
पद की चतुर्थ पंक्ति मे "वैराग ण . . . सनेस" सर्वथा विभिन्न
पडती है। प्रथम पंक्ति के उत्तरार्द्ध में अर्थ संगति का अभाव हे। पद
की चतुर्थ और छठी पंक्ति की अभिव्यक्ति नाथ पंथ से प्रभावित है।
नाथ पंथ और वैष्णव मत का प्रभाव एक साथ एक ही पद मे
विचारणीय है।
१ बहुत, २ उमग, ३ राह देखना, ४ फंदा, ५ वयस, ६ कब
की, ७ मित्रता, स्नेह, परिचय, ८ सफेद ।