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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

५६ मीरों-वृहद्-पद-संग्रह
तुम पतिबरता नारी बिना प्रभु, काहो सो न पतीज्यो जी ।
साचो प्रेम प्रीत मो नातो, ताही सो तुम रीझ्यो जी ।
राति दिवस ओहि ध्यान तिहारो, आपही दरसन दीज्यौ जी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिलि बिछुरन मत कीज्यौ जी ।
इस पाठ की भाषा पर ब्रज भाषा का प्रभाव अति स्पष्ट है ।
प्रथम दो और अन्तिम पक्तियो के सिवा शेष पद अन्य पाठो से सर्वथा
भिन्न पडता है । बीच की चार पक्तियो मे अर्थ और पूर्वापर सबध
का अभाव है । इस पाठ विशेष से मिलता जुलता एक और निम्नाकित
पाठ भी प्राप्त है।
पाठान्तर ३,
ज्यूँ जाणो ज्यूँ लीज्यो सजन, सुध ज्यूँ जाणे ज्यूँ लीज्यो ।
हूँ तो दासी जनम जनम की, कृपा रावरी कीज्यो ।
उठत बैठत जागत सोवत, कबहुँक याद करीज्यो ।
आवत जावत जीमत सोवत, सुपणे दरस मोये दीज्यो ।
में पतिबरता नारी प्रभु जी, काँहूँ ते न पतीजौ ।
साँचो प्रेम प्रीत को नातो, ताही ते तुम हरि रीझौ ।
रात दिवस मोहि ध्यान तिहारो, आय दरस मोये दीज्यौ ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चित चरणाँ मे लीज्यो ।†
पाठान्तर ४,
थे म्हारी सुध ज्यूँ जाणूँ ज्यूँ लीज्यौ ।
आप बिना मोहे कछु न सुहावै, बेगो ही दरसण दीज्यो ।
मै मद भागण करम अभागण, ओगण चित म़त दीज्यौ ।
विरह लगी पल छिन न लगत है, तो तन यूँही छीज्यौ ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, देख्याँ प्राणपती ज्यौ ।
इस पाठ की अन्तिम पक्ति भी सर्वथा भिन्न पड़ती है ।
प्रथम पाठ से संतमत का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है, परन्तु अन्य
पाठो से विरह वेदना ही विशेष तौर से लक्षित होती है ।