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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६५
१५
मेलो ने मारगड़ो मेलीनी मावा ।
वाटे ने घाटे रोको साँवलिया हारे मारा पाल बडा सावा ।
रसिया जी सु सहोर करो छो, जीवन दो जावा ।
मीराँ बाई के शुभ गिरधर ना गुण, गुण तो गोविन्द नु गावा ॥४७१॥
१६
मने मेली ना जाशो भावा रे, आ व्रज मा केम वैसीए बोलारे, भेली ना जाशो।
जे जोइए ते तमणे आणी आपु बोला, मीठाई मेवा खावा रे ।
आ बीजाँ घणा घणा तमने बाना रे करती, नहि देऊँ तमने जावा रे ।
कब की ठारी अरज करूँ हूँ, ऐटली¹ अरज मोरी मानो ब्रज बाबा रे ।
जल जमनाँ रे जल भरवाँ गयाँ ताँ वहाला, सुन्दर गयाँ ता न्हावा रे ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण वहाला, शाम लिओ चित्र थे मनावा रे ।
॥४७२॥†
१७
जल भरवा के म जाऊँ, कानो मारी केडे² पड़्यो रे ।
साव सोनानु घाट घड़ुला वाला, उठानिए रतन जड़ाऊँ रे ।
मारग माँ वा'लो पानिला मागे, सहिय³ देखताँ⁴ केम⁵ पाऊँ रे ।
नाथ जी हमारा निरलज थई बैठा, वां'ला हुँ निरलज केम थाऊँ ।
बाईं मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण वा'ला, हरी चरणे ध्यान धराऊँ ।
॥४७३॥†
१८
काँनुडे कामण⁶ कीधा⁷, ओधव ने वा'ल, कानुड़े कॉमण कीधॉ ।
वृन्दावन माँ धेनु चरावे वा'लो, मोरलीए मनड़ा गोपी बिर्धा ।
जल जमनाँ भरवाँ ने गयाँ ताँ, ताँ पालव पकड़ी मन लीधॉ ।
१ इतना, २ पीछे, ३ सखियो के, ४ देखते हुये, ५ कैसे, ६ सम्मोहन,
जादू, ७ किया ।

२६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
राधा नो कथ^१ कामण^२ गारो।
मीराँबाई के प्रभु गिरिधर ना गुण वा'ला, भव सागर थी^३ हमने तारो।
॥४७४॥†
१९
प्रेम नी प्रेम नी प्रेम नी रे, मन लागी कटारी प्रेम नी रे।
जल जमुना माँ भरवा गयाताँ, इती गागर माथे इमे नीरे।
काँचे ते ताँत न हरि जी पे बाँधी, जेम खेचे तेम नी रे।
'मीराँ' के प्रभु गिरधर नागर, साँवली सुरत सुभ एक नी रे॥४७५॥†
श्री विष्णु कुमारी 'मजु' ने उपर्युक्त पद को मीराँ कृत मानने मे
सन्देह प्रकट किया है। परन्तु "मीराबाई की शब्दावली" वेलवेडियर
प्रेस, प्रयाग मे लिखित होने के कारण इसमे उल्लिखित है।
२०
जागो रे अलबेला कान्हा, मोटा मुकुट धारी र।
सहु दुनिया तो सुती जागी, प्रभु तुम्हारी निद्रा भारी रे।
गोकुल गामिनी गायो छूटी, वनज करे व्यापारी रे।
दातन करो तमे आद देवा, मुख धुओ मुरारी रे।
भात भात ना भोजन निपाया^५, भरी सुवरण थीली रे।
लवँग सुपारी न एलची, प्रभु पाननी बीडी वाली रे।
प्रीत करी बाओ पुरुषोत्तम, अवडावे^६ ब्रजनी नारी रे।
कस नीत मे वस काढी, मासी पूतना मारी रे।
पताले जाई काली नाग नाथ्यो, अँवली करी असारी रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, हुँ छे दासी तमारी रे ॥४७६॥
२१
ब्रजमा कथम र' वाशे, ओधवना वा' ला, ब्रजमा कयम रें' वाशे।
आठ दाहाड़ानी^७ अवध करीने गया छे वा'ला, खर मास थया छे^८ हरि ने।
१ पति, २ जादू करनेवाला, ३ से, ४ सब, ५ बनाया, ६ अच्छा लगे,
७ दिवस, ८ हो गये।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६७
वृन्दाबन नी कुज गली माँ वा'ला, बेठा छे मुख मोरली धटी ने ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण वा'ला, अमोरहया छे ऑसडा१ मरी ने ।
॥४७७॥†
२२
शामले मेल्याँ ते विसारी, ओधवने वा'ले शामले ते मेयाँ विसारी ।
प्रीत करीने पालव पकडो वा'ला, प्रेम नी कटारी मुने मारी ।
गोकुल थी मथुरामाँ गया छो वा'ला, कुब्जा से लागी छे ताली ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल बलिहारी ॥४७८॥†
२३
लालने लोचनीए दिल लीधाँरे, माडी मारा, लालने लोचनीए दिल लीधाँ रे ।
जत्र मणी वा'लो मुझ पर डारे वा'लो, वेला कबेलाजाँ कामण मने कीधाँ रे ।
जल जमना ना जल भरवाँ गयाँ ताँ वा'ला, घुंघटड़ा माँ घेरी लीधाँ रे ।
चुन चुन कलिया वाली सेज बनावुँ वाहला, भ्रमर पलग सुख लीधाँ रे ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल मे चित्त चोरी लीधाँ रे ।
॥४७९॥†
२४
लेशे रे महीडाँ केरा दान आ तो मोढुं, लेरो रे महीडा केराँ दाण ।
अमो अबला कइ सबल सुवालाँ वा'ला, आवड़ी शी खेचा ताण ।
नन्दना घरना गोवालियो रे, ओलख्या बिना रे अभ्रु माण ।
मधराते मथुराथी रे नांठो, ते तो अमणे न थी रे अजाण ।
वृन्दावन ने मारगे जाताँ, तुँ तो शेणे माँगे छे रे दाण ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल नु चित्तडा मे ध्यान ॥४८०॥†
२५
कोने२ कोने कहुँ दिलडानी बात, वारे वारे कोने कोने केहुँ ।
पॉडवनी प्रतिज्ञा पाली, द्रौपदी नी राखी लाज रे,
१ आशा, २ किसको ।

२७० मीरॉ-बृहद्-पद-संग्रह
३१
वृजमॉ नाव्या१ फरीने२ गोपीनो वांलो, व्रज माँ नाव्या फरीनो ।
गामने गोकुल यो मेली मथुरा पधारिया वांलो, जईवरिया कुब्जा कारीनो ।
सातरी दिवस हरि वादो करीने गयो छो, षटमास थमाछे हरी ने ।
सोलसे गोपी नो साथे रास रचे थे वांला, उमा मुख मुरली धरीने ।
बाई मीरॉ के प्रभु गिरधर ना गुन वाला, चरन कमल चित हरी ने ।
।।४८७।।†
३२
गगरिया बेडा ढलसे, उठानी मारी आप्णे, गागरिया बेडा ढलसे ।
साव सो नानी मारी, जड़ित्र उघानी वांला, सुने री तार मारो खड़से ।
कस तो दाय नो कुरु छे राज वांला, कस कहयू जू पडसे ।
जल रे जमुना ना वांला मोटो छे आरो रे, नित्य उठि नाहवॉ जाऊ परसे ।
बाई मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर वांला, गोपी नो स्वामी मुझने मलसे ।
।।४८८।।†
३३
वांला ना कान हेडा रे ओधव जी, एवा काल ना कठन हेडा रे ।
टीटू डीना इण्डा३ डगरिया मञ्जारी, ना राख्या दड्या रे ।
ग्रेह थी गजराज उगारियो, गोकुल मा चारी गइया रे ।
गोकुल सघन रेलतुँ राख्युँ, गोबरधन कर धरिया रे ।
मीरॉ गवे गिरधर ना गुन, मै तो तोरे लागूँ पड्या रे ।।४८९।।†
३४
उठानी मोरे आलो रे, गागरिया बेढा ढलसे ।
जल जमना भरूआ गयाँ ता, चीर खस्योने बेढु परसे ।
१ न + आव्या-नाव्या अर्थात् नही आये, २ लौटकर, ३ अण्डा ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७१
•
सास हठीली मारी ननद धुतारी, नाधड़े दीयरियो मूजने बढसे ।
मीराँ गावे प्रभु गिरधर ना गुन, चरण कमल चित हर से ॥४९०॥†
३५
ज्ञान कटारी मारी, अमने प्रेम कटारी मारी।
मारे आँगणे रे रामजी तपसीओ तापे रे,
काने कुडल जटाँधारी रे, राणाजी अमने।
मकनोसो¹ हाथी रामजी, लाल अबाडी² रे,
अँकुश दई दई हारी रे।
खारा समुद्र माँ अमृत नाँ बहे लियुँ रे,
ऐवी³ छे भक्ति हमारी रे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर,
चरण कमल बलिहारी रे ॥४९१॥†
३६
राखो रे श्याम हरि लज्जा मोरी, राखो श्याम हरि।
भीम ही बैठे, अर्जुन ही बैठे, तेणे⁴ मारी गरज ना खरी।
दुष्ट दुर्योधन चीरने खेचावे, सभा बीच खडी रे करी।
गरूड चढीने गोविन्द जी रे आव्या, चीरना तो वाण भरी।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरणे आवे तो उबरी ॥४९२॥†
३७
ओ आवे हरि हसता सजनी, ओ आवे हरि हसता।
मुझ अबला एकलडी जानी, पीताम्बर केड़े कसता।
पचरगी पाघ केसरिया रे बाधा, फुलडा मेहेले तोरा।̂
१ मदमाता, २ हौदा, ३ ऐसी, ४ उनसे ।

३७२ मीरॉँ-वृहद्-पद-संग्रह
मारे ऑँगनए द्राख बिजॊरा, मेवले भराउँ तारा खोला१ ।
प्रीत करे ने तेनी पुठ न मेले, पासे थी से नथी खसता२ ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, हाँ रे वालो हृदय कमलमॉँ बसता ।
।।४९३।।†
३८
दव३ तो लागेल डुँगर४ मे, कहो ने ओधा जी हवे केम करी ओ ।
केम ते करी ओ, अमे केम करी ओ, दव तो लागेल डुगर मे ।
छालवा५ जइये तो वाहला हाली न शकीए, वेशी रहीए तो अमे
बली मरीए रे।
आरे वरतीए नथी ठेकाणँरू रे, वाहला हेरी परवरती नी पाँखे
अमे फरीए रे।
ससार सागर महाजण भरीओ वाहला हेरी, बॉँहेड़ी झालो नीकर
बूडी मरीए रे।
बाईँ मीराँ के प्रभु गिरधर नागर हेरी, गुरु जी तारे तो अमे
अमे तरीए रे। ।।४९४।।†
३९
जाण्यूँ जाण्यूँ हेत तमारू जदवारे लोल, हेतज होय तो हुई डामा बरताय जो,
अमे तमारी आँख डिये अलखामणा६ रे लोल, बालप होय तो नयणा
मॉँ कलकाय जो ।
पारिजातक नूँ फूल रे नारद लखियारे लोल;
जै सोप्यूँ राणी रुकमणी ने दरबार जो ।
राके पाखडकी मारे मदिर नव मोकली रे लोल;
कीधी मुज थीरा अदकेरी नार जो।
अचरत पाम्या ने आनन्द उतर्यो रे लोल,
जाओ जाओ जाओ नहि बोलूँ सुन्दर श्याम जो।
१ गोद, २ हटना, ३ अग्नि, ४ जगल, ५ दौडना, ६ परिचय।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७३
रुकमणी ने मदिर जैने रंगे रमोरे लोल,
हवे तमारे अमसाथे शुं काम जो।
अलगा रहो अलबेला मने अडशे नही रे लोल,
तम साथे न॑हि बोलूं नदकुमार जो।
भले ने पधारो मोनती तणे रे लोल,
आज पछी आवशोमा मारे द्वार जो।
नारदे कहचूं सतभामा साभलो रे लोल,
ऐ निर्लज ने नथीं तमारू काम जो।
काला ने वा'ला करतो ते आवशेरे लोल,
मोटा कुलनी मूक शोभा मान जो।
उतरचा आभरणारे सर्वे अग थकी रे लोल,
लो शामलिया तमारो शणगार जो।
मारा रे मैयरनी ओढूं आढणी रे लोल,
बीजूं आयो माने ती दरबार जो।
चरणा चीर उतारी चोली चूंदरी रे लोल,
उरथ की उतारचो नवसर हार जो।
काबी ने कडला रे भोटी दामणी रे लोल,
सर्व संभाली लेजो नन्दकुमार जो।
आगलथी नव जाण्यूँ मे तो रावडूं रे लोल,
घरथी न जाण्यूँ धूतारानो ढग जो।
वाला पणरी प्रीत अमारी पालटी रे लोल,
ए निर्लेंज ने शानो दीजे रग जो।
धीरज नी बातो धरथी जाणी नही रे लोल;
प्रीत करीने परवश कीधा प्राण जो।
कालजणा कोरी ने भीतर भेदिया रे लोल,
मीट उलियाँ मार्या मोहना वाण जी।
प्रीत करी पर हरऊँ नोतू पधारू रे लोल,
थोडा दिवस माँ शूं दीधा मने सुख जो।
१८

२७४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
स्वपनाना सुख डारे स्वपने पही गया रे लोल ;
देहड़ लीमां प्रगट्या दारुण दुख जो ।
पूरण पाप मल्यां रे ओ अबला तणां रे लोल ,
जेनो परण्यो पर घेर रमवा जाय जो ।
अवोलड़ा लीधा रे वाले वेहाथीरे लोल,
जे नारी नूं जोबन भोला खाय जो ।
पाणीडा पीनेरे घर शूं पूछिये रे लोल,
तेरीं पिता ओ शोध्या पूरण बैर जो ।
उद्देरी आपी रे ओना हात मारे लोल,
गल थूथ़ी मा घोल न पाया अरे जो ।
शोकडलीना वे मने बहु साभवरे लोल,
नयणथी छूटे छै जलनी धार जो ।
हैडू नव फोड्यू रे हजूए अमतणूं रे लोल,
उर ऊपर काई अहचा मेघ मलार जो ।
रावा ने मेण सूं बोलो मुख कीरे लोल,
कुलवन्ती तमे केम करो कल्यान्त जो ।
पटराणी तमथी बीजी घारी न थी रे लोल,
घणो वधारे घरे घरे विरोध जो ।
साँचू जो कहु तो तमे नव सांभलो रे लोल;
तोरा तमारू मन नव माने काम जो ।
मोहन जी कहेरे सती तमे साभलोरे लोल;
कहो तो मंगावू पारिजातक नू आड़ जो ।
आणी ने रोपाऊ तमारो ऑगणे रे लोल;
राणी रोषत जी ने मूको राड़ जो ।।४९५।।†

६. आत्म-समर्पण, ज्ञान-वैराग्य व उपसंहार

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७५
राधा वर्णन
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
मोहन जावो कठे¹ सावरियाँ मोहन जावो कठे।
तुम रहो न अठे² सावरियाँ मोहन जावो कठे।
गोकुल बसवो फीको लागे, मथुरा मे काई लडु बटे।
नित को आणो जाणो छोडि दे, नित के आये जाये से तेरा मान घटे।
राधा रुक्मण और सतभामा, कुब्जा ने कोई लीनी पटे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम सुमरॉ सूं सकट कटे ॥४९६॥†
पाठान्तर १,
जावो कठे रे रामा, रह्वो अठे सांवरियां।
नित काई जावो, नित कांई आवो, नित का जाया से मान घटे।
गोकुल बसवो फिकोई लागे, मथुरा मे काई लाडु बटे।
गोकुल मे काई धेनु चरावे, मथुरा मे काई राज लुटे।
राधाई रुक्मण और सतभामा, कुब्जा काई थारे संग पटे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम सुमरॉ सूं सकट कटे।
उपर्युक्त पदाभिव्यक्तियो मे पूर्वापर सबध का अभाव है।
'चन्द्रसखी' के नाम पर प्रचलित एक ऐसा निम्नाकित पद मिलता है
जिसका उपर्युक्त पदो से गहरा साम्य है।
कांई मिस आया छोजी राज अठे।
राय आगणिये ठाढा रहियो, आगे जावोला³ कठे।
राधा रुक्मण अर सतभामा, कुब्जा ने कांई लीनो पटे।
१ कहाँ, २ यहाँ, ३ जावेगे।

२७६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
हाथ को हीरो खोय दियो है, खोटी लाल सटे ।
चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, लीनी है सीस सटे ।
उपर्युक्त पदो के साम्य को देखते हुए चन्द्रसखी का ही यह पद कुछ
हेर फेर के साथ मीराँ के नाम पर भी चल पडा हो, ऐसा असम्भव
नही प्रतीत होता ।
२
आली ! म्हाने लागे वृन्दावन नीको ।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा, दरसण गोविन्द जी को ।
निरमल नीर बहुत जमुना मे भोजन दूध दही को ।
रतन सिघासन आप विराजै, मुगट धर्यो तुलसी को ।
कुजन कुजन फिरत राधिका, सबद सुनत मुरली को ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भजन बिना नर फीको ॥४९७॥
३
उधो ! म्हांने लागे वृन्दावन नीको रे ।
वृन्दावन मे धेनु बोहोत है, भोजन दूध दही को ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, सिर केसर को टीको ।
घर घर मे तुलसी को बिड़लौ, दरसण माधवजी को रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरी बिना सब फीको रे ॥४९८॥
उपर्युक्त दोनो पदो का गहरा साम्य विचारणीय है। बहुत
सम्भव है कि ये दो स्वतन्त्र पद न होकर एक ही पद के गेय रूपान्तर हो ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७७
मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद
१
आवत मोरी गलियन मे गिरधारी, मै तो छुप गई लाज की मारी।
कुसुमल पाग केसऱ्या जामा, ऊपर फूल हजारी।
मुकुट ऊपरै छत्र विराजे, कुडल की छवि न्यारी¹।
केसरी चीर दरियाई को लेगी, ऊपर अगिया भारी।
आवते देखे किसन मुरारी, छुप गई राधा प्यारी।
मोर मुकुट मनोहर सोहै, नथनी की छवि न्यारी।
गल मोतियन की माल विराजे, चरण कमल बलिहारी।
ऊभी² राधा प्यारी अरज करत है, सुर्ण जे किसन मुरारी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल पर बारी ॥४९९॥†
पद को तीन अंशो मे बाँटा जा सकता है। प्रथमांश "आवत
मोरी अगिया भारी" मे अपनी व्यक्तिगत भावो की
अभिव्यक्ति है। "आवते देखे ∙∙ ∙किसन मुरारी" लगभग प्रथम
पंक्ति की ही पुनरुक्ति है। परन्तु जहाँ प्रथम पंक्ति मे अपनी भावनाओ
का ही वर्णन हुआ है, वहाँ द्वितीयांश मे उन्ही भावों का राधा मे आरोप
किया गया है। तृतीयांश "ऊभी राधा पर बारी" का शेष पद
से समन्वय ही नही होता। ऐसे संगति-हीन पदों की प्रामाणिकता
विशेष संदिग्ध है।
२
थाने कुब्जा ही मनमानी, हम सो न बोलना हो राज।
हमरी कहा सुनी विष लागे, वाहा जाय प्रेम रस पागे।
उन संग हिलमिल रहना, हँसना बोलना हो राज।
हम सो कहे सिगार उतारो, दृग अंजन सब ही धोयँ डारो।
१ अपूर्व, २ खडी हुई।

२७८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
छापा तिलक सवारो, पहिरो चोलना हो राज।
जमना के तट धेनु चरावै, बेसी मे कछु अचरज गावै।
नई नई तान सुनावै, छाछ मछोलना जी राज।
म्हारी प्रीत तुम्ही सो लागी, कुल मरजाद सब ही हम त्यागे।
मीराँ के प्रभु गिरधारी, बन बन डोलना हो राज ॥५००॥†
इस पद को भी स्पष्ट ही दो भागो मे बाँटा जा सकता है। “थाने
कुब्जा हो ····चोलना हो राज।” प्रथमाशं है। बीच की दो पक्तियो
“जमुना के तट ····छाछ मछोलना जी राज” का पूर्वा श
से कोई सबन्ध नही प्रतीत होता। “छाछ मछोलना जी राज” जैसी
अभिव्यक्ति भी निरर्थक ही प्रतीत होती है। फिर पद की आठवी
पक्ति का सबन्ध पूर्वार्द्ध से ही जुडता है, जब कि अन्तिम पक्ति सम्पूर्ण
पद से भिन्न पड़ती है। अन्तिम पक्ति मे “मीराँ क प्रभु गिरधारी”
जैसा प्रयोग भी सर्वथा नूतन है।
पद की भाषा मे राजस्थानी और भोजपुरी का सम्मिश्रण हुआ है,
जिसका कारण एकमात्र गेय परम्परा ही हो सकती है।
पाठान्तर १,
थारे कुब्जा ही मनमानी, म्हाँसूँ अनबोलना हो राज।
हम से कहै सुहाग उतारो, दृग अंजन सब ही धो डारो।
माथे तिलक चढावो, पहरो चोलना हो राज।
हमरी कही बिषै सम लागै, घर घर जाय भवर रस पागै।
उन्ही के सग रहना, हँसना बोलना हो राज।
वृन्दावन मे धेनु चरावै, बसी मे कछु अचरज गावै।
बाकी तान सनावै, छतिया छोलना१ हो राज।
हमरी प्रीत तुम्ही सग लागे, लोक लाज सब कुल को त्यागी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर, बन बन डोलना हो राज।†
१ छीलना, जलाना।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७९
पाठान्तर २,
थाके दासी ही मनमानी, म्हाँसे अनबोलना हो राज।
हमकं कहै सिगार उतारो, दृग अजन सबही धो डारो।
माँथे तिलक लगावो, पहैरो चोलणा हो राज।
कुबज्या कंवर कंस की दासी, ज्यां देखवाँ मोये आवत हाँसी।
ज्यो पटराणी कीनी, हँस बोलणां म्हाराज।
कुबज्या के संग भोग बनायो, हमको लिख कर जोग पठायो।
मीराँ भई दिवानी, बन बन डोलणा हो राज।†
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
तेरो कान्ह कालो हो भाई, मेरी राधे गोरी हो।
ऐसी राधे रूप बनी, कंचन सी देह ठनी।
ऐसो कारो कान्ह पर, कोटि राधे वारी हो।
गोकुल उजार कीनो, मधुरा बसाय लीनी।
कुब्जा कूं राज दीनो, राधे को बिसारी हो।
बिनती सुनो ब्रजराज, लागूँगी तुम्हारे पाय।
मीराँ प्रभु सों कहीयो जाय, सेवक तुम्हारी हो ।।५०१।।†
इस पद मे भी भाव सामंजस्य नही है। "तेरो कान्ह ॰ ॰ ॰ ॰राधे
वारी हो" प्रथमांश मे स्पष्ट है कि कथनोपकथन दो व्यक्तियो के
बीच हो रहा है। “गोकुल उजार ॰ ॰ ॰ ॰बिसारी हो” वाला अंश
एक शिकायत के रूप मे ही आता है जिसका प्रथमाश से कोई सबन्ध
नही प्रतीत होता। छठी पंक्ति मे बिनती स्वय “ब्रजराय” को ही सुनायी
गयी है, जब कि अन्तिम पंक्ति से यही स्पष्ट होता है कि “ब्रजराय” तक
सदेशा पहुँचा देने की "बीनती" किसी अन्य से की जा रही है। एक
ऐसा ही पद चन्द्रसखी के नाम पर भी पाया जाता है -

२८० मीराँ-बृहद्-पद-सग्रह
‘“कैसे व्याहूँ राधे, कन्हैयो तेरो कारो भाई ।
घर घर री वो गऊ चरावै, ओढण कबल कारो ।
छीन झपट दही खात बिरज मे, चलैगो कैसे राधे को गुजारो ।
मेरी राधा अजब सुंदरी, तेरो कन्हैया कारो ।
कारो कारो मत करो, कान्हो है बिरज को उजियारो ।
नाग नाथ रेती पर डारयो, मारी फूँक कृष्ण भयो कारो ।
पीताम्बर की कछनी काछै, मोहन मुरली वारो ।
चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि, कान्ह त्रिलोकी सूं न्यारो ।’’
दोनो पदों मे भाव और भाषा साम्य के आधार पर यह कहा जा
सकता है कि चन्द्रसखी का ही पद मीराँ के नाम पर प्रचलित हो
गया है।
२
झूलत राधा सग गिरिधर ।
अबीर गुलाल उडावत, राधा भरि पिचकारी रग ।
लाल भईं वृन्दावन, जमुना केशर चूवत रग ।
नाचत ताल अधर सुर भरे, धिम धिम बाजे मृदग ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरन कमल कूँ रग ॥५०२॥†
प्रथम पक्ति मे राधा का कृष्ण के सग झूलने की और शेष पद मे
होली खेलने की ही अभिव्यक्ति है। पद की तीसरी पक्ति और अन्तिम
पक्ति का द्वितीयांश “चरन कमल कूँ रग” अर्थहीन प्रतीत होता है।
° पाठान्तर १,
झुलत राधा सग गिरिधर, झुलत राधा संग ।
अबील गुलाल की धुम मचाई, डारत पिचकारी रग ।
लाल भयो वृन्दावन जमना, केसर चुवत अनग ।
नाचत ताल अधारे सुर सुन्दरी, डारी डारी बाजे ताल मृदंग ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल कूं बहोत रंग ।

२८२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
४
कैसे आवों हो नन्दनलाल तेरी ब्रजनगरी, गोकुल नगरी।
इत मथुरा उत गोकुल नगरी, बीच बहे जमुना गहरी।
पाँव धर्यौँ मेरी पायल भीजै, कूदि परौ वहि जाओ सारी।
मै दधि बेचन जात वृन्दावन, मारग मे मोहन झगरी।
बरज यशोदा अपने लाल को, छीन लई मोरी नथली।
रहु रहु ग्वालिन झूठ न बोलो, कान अकेलो तुम सगरी।
मेरो कन्हैया पाँच बरस कौ, तुम ग्वालन अलमस्त भई।
जाय पुकारो हो कंस राजा से, न्याय नही तेरी गोकुल नगरी।
वृन्दाबन की कुज गलिन मे, बाँह पकर राधे झगरी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, साधु संग करि हम सुधरी ॥५०४॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर संबंध और संगति का अभाव है।
तृतीय पंक्ति “पाँव धर्यौँ”· · जाओं सारी” सर्वथा अर्थहीन है।
“झूठ न बोलो,” “तेरी,” “तुम” आदि शब्दो से पद की भाषा पर खड़ी
बोली का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है। “अलमस्त” शब्द का प्रयोग
उर्दू के प्रभाव को भी इंगित करता ह। इसी प्रकार का एक पद मीराँ
के नाम पर प्रचलित गुजराती पदों मे भी प्राप्त है।
५
हमरो प्रणाम बाँके बिहारी को।
मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे, कुडल अलकाकारी को।
अधर मधुर पर बसी बाजे, रीझ रीझावै राधा प्यारी को।
यह छवि देख मगन भई मीराँ, मोहन गिरिधारी को ॥५०५॥†
अन्तिम पंक्ति की शैली सर्वथा नूतन है।
६
झट द्यो मेरो चीर रे मोरारी रे, झट द्यो मेरो चीर।
मेरो चीर कदम चढ बैठो, मै जल बीच उघाडी।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८३
हाँरे वा'ला मै जलबीच उघाडी ।
उभी राधा अरज करत है, दो चीरदो ओ गिरधारी ।
प्रभु मैं तेरे पाय परूँगी ।
जो राधा तेरो चीर चहावत हो, जल से हो जा न्यारी ।
हाँ रे, वा'ला जल से हो जा न्यारी ।
जल से न्यारी कान्हा कबुए न होव्गी, तुम हो पुरुष हम नारी ।
लाज मोकूँ आवत भारी ।
तुम तो कुँवर नन्दलाल कहावो, मैं बृषभानु दुलारी ।
हाँ रे, वा'ला मे वृषभानु दुलारी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, तुम जीते हम हारी ।
चरण जाऊँ बलिहारी ॥ ५०६ ॥†
उपर्युक्त पद की भाषा पर खडी बोली का और शैली पर
गुजराती भाषा मे प्राप्त पदों की शैली का प्रभाव सुस्पष्ट है ।
गुजराती में प्राप्त पद
१
वारो यशोदा तारा दानी ने, आली गारा आल करे छे ।
लाडकवायो बाई लामज तमने, ते थी घनो राधा राणी ने ।
जल यमुना जतॉ मारगे पालव, ग्रहियो मारो तानी न ।
एक बार साख्युं बीजी बार साख्युं शरम तमारी घनी आनी ने ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित मानी ने ॥५०७॥†
२
बोले झीणा मोर, राधे तारा डुँगरिया पर बोलेझीणा मोर ।
ए मौर ही बोले ब पैया ही बोले, कोयल करे घन शोर ।
······भली बीजली चमके, बादल हुआ घन घोर ।
झरमर झरमर मेहुलो बरसे, भीजे मारा सालुडानी कोर ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण,प्रभुजी म्हाँरा चितडानो चोर॥५०८॥†

२८४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
३
काहानो माग्यो दे,धुतारो माग्यो दे,वर तो राधानो,मने कहानो माग्यो दे।
वृन्दारे वनमाँ जेदी रास रम्याँ, ता सोल से गोपी माँ घेलो कहान।
हाथी ने घोडा बाई माल खजाँना, हैया केरो हार ले मान।
तल भर जव भर वछो नव कीधो, जवे तोली ने पाछो ले।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल मे चित दे ॥५०९॥†
बाँसुरी वर्णन
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
कान्हा रसिया वृन्दाबन बासी।
जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे,मुरली बजावे मृदुलासी।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, श्रवण कुडल फलासी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बिना मोल की दासी ॥५१०॥
पाठान्तर १,
म्हारी बालपना की परीति थे निभाज्यो रैना।
जमुना के नीराँ तीराँ धेनु चरावै, कुडल झलकत काना।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हर नौ माह रो धाना।
यह पद उपर्युक्त पद का गेय रुपान्तर मात्र प्रतीत होता है, क्योकि
प्रथम पंक्ति के सिवा सम्पूर्ण पद की भाव और भाषा भी लगभग
एक ही है। विभिन्न स्थानो पर प्रचलित होने के कारण स्थानीय
बोलियो का प्रभाव पदो से स्पष्ट होता है।
पद की भाषा पर राजस्थानी प्रभाव स्पष्ट है। इस रूपान्तर की
अभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। इसी पद से साम्य रखता
एक और भी निम्नांकित पद प्राप्त है --
या मोहँन के मै रूप लुभानी।
सुन्दर वदन कमल दल लोचन, बाँकी चितवन मद मुसकानी।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८५
जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावै, बसी मे गावै मीटी बानी ।
तन मन धन गिरिधर पर बारूँ, चरण कवल माही लपटानी ।
२
आजु मै देख्यो गिरधारी ।
सुन्दर बदन मदन की शोभा, चितवन अनियारी ।
बजावत वशी कुज मे ।
गावत ताल तरग रंग ध्वनि, नाञ्चत ग्वाल गन मे ।
माधुरी मूरति वह प्यारी ।
बसि रहै निस दिन हिरदै बिच, टरै नही टारी ।
वाही पर तन मन हो वारी ।
वह मूरति मोहनि निहारत, लोक लाज डारी ।
तुलसी बन कुंजन सचारी ।
गिरिधर नवल नटनागर मीराँ बलिहारी ॥ ५११ ॥
३
प्यारी मै ऐसे देखे श्याम ।
बाँसुरी बजावत गावत कल्याण ।
कब की ठाढी भैयाँ, सुध बुध भूल गैयाँ ।
छौने जैसे जादू डारा, भूले मोसे काम ।
जब धुन कान पैयाँ, देह की ना सुध सैयाँ ।
तन मन हर लीन्हो, विरहो वाले कान्ह ।
मीराँ बहि प्रेम पाया, गिरिधर लाल ध्याया ।
देह सो विदेह भैयाँ, लागो पग ध्यान ॥५१२॥†
उपर्युक्त पद मे तीन विभिन्न बोलियो का सम्मिश्रण विचारणीय
है । पद की भाषा प्रमुखत ब्रज है तथापि क्रियापदो पर पजाबी प्रभाव
स्पष्ट है । “मै ऐसे देखे श्याम”, “पाया” आदि प्रयोगो से आधुनिक
प्रभाव भी स्पष्ट हो उठता है । निम्नाकित एक और पद ऐसा मिलता
है जिसकी प्रथम पक्ति उपर्युक्त पद की प्रथम पक्ति का पाठान्तर
प्रतीत होती है, परन्तु शेष पद सर्वथा विभिन्न पडता है ।

२८६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
४
कही ऐसे देखे री घनश्याम ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल झलकन काना ।
साँवरी सूरत पर तिलक बिराजे, तिस मे लगे रहे मेरे प्राना ।
बरसाने सो चली गुजरिया, नन्दग्राम को जाना ।
आगे केशव धेनु चरावे, लगे प्रेम के बाना ।
सागर सूखि कमल मुरझाना, हंसा किया पयाना ।
भौरे रह गये प्रीति के धोखे, फेर मिलन को जाना ॥५१३॥†
इस पद मे कही से भी यह स्पष्ट नही होता कि यह पद किस के
द्वारा बनाया गया है, तथापि तथाकथित मीराँ क पदसंग्रहो मे प्राप्त
हैं। पदाभिव्यक्ति स्पष्ट ही अर्थहीन है।
५
बाँके साँवरियाँ ने घेरि मोहि आन के।
जो गई जमुना जल भरन, मारग रोक्यो मेरो आन के ।
वृन्दाबन की कुज गलिन मे मुरली बजावे, आन तान के ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रीत पुरातन जान के ॥५१४॥†
६
भई हो बावरी सुन के बाँसुरी ।
श्रवण सुनत गोरी सुध बुध बिसरी, लगी रहत तामे मनकी बाँसुरी ।
नेम धरम कोन कीनी मुरलिया, कौन तिहारे पासुरी ।
मीराँ के प्रभु वश कर लीन्हे, सप्त ताननि की फाँसुरी॥५१५॥†
पद की तृतीय पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही होता ।
७
मुरलिया बाजे जमुना तीर ।
मुरलि सुनत मेरो मन हरि लीन्हों, चीत धरत नही धीर ।
कारो कन्हैया, कारी कामरिया, कारो जमुना को नीर ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल पै सीर ॥५१६॥†

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८७
८
मोरे अगना मे मुरली बजाय गयो रे ।
छोटे छोटे चरण, बडे बडे नयना,
वृन्दाबन की कुज गलिन मे, मारि गयो सयना '
मेरी आली, मेरी आली कहो कित जाऊँ,
मुरली मे गावै लै लै मेरो नाम ।
ऊँची नीची घाटी, मोसे चढऊँ न जाय,
मुरली की धुनि सुनि, मोसे रहऊँ न जाय ।
कित गई गैया, कित गए ग्वाल, कित गये बसी बजावन हारा ।
घर आई गैया, घर आये ग्वाल, अजहूँ न आये मेरे मदन गोपाल ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल, पाये.है दर्शन भई निहाल ।
॥५१७॥†
उपर्युक्त पद मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। पद
स० ३ और उपर्युक्त दोनो पदो मे 'मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर' न
होकर "मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल" का ही प्रयोग हुआ है, जो
विचारणीय है ।
९
कवन गुमान भरी बसी, तू कवन गुमान भरी ।
अपने तन पै छेद परेचे, बाला तूं बिछरी ।
जाँत पाँत सब तेरो मै जाणूँ, तू बन की लकरी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राधा से क्यूँ झगरी ॥५१८॥†
पद की दूसरी पक्ति का द्वितीयाश “बाला तू बिछरी” अर्थहीन
प्रतीत होता है। ऐसा ही एक पद सूरदास का भी प्राप्त है .-
बाँसुरी तू कवन गुमान भरी ।
सोने की नाही, रूपे की नाही, नाही रतन जरी ।
जात सिफत तेरी सब कोई जानै, मधुवन की लकरी ।