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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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२८० मीराँ-बृहद्-पद-सग्रह
‘“कैसे व्याहूँ राधे, कन्हैयो तेरो कारो भाई ।
घर घर री वो गऊ चरावै, ओढण कबल कारो ।
छीन झपट दही खात बिरज मे, चलैगो कैसे राधे को गुजारो ।
मेरी राधा अजब सुंदरी, तेरो कन्हैया कारो ।
कारो कारो मत करो, कान्हो है बिरज को उजियारो ।
नाग नाथ रेती पर डारयो, मारी फूँक कृष्ण भयो कारो ।
पीताम्बर की कछनी काछै, मोहन मुरली वारो ।
चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि, कान्ह त्रिलोकी सूं न्यारो ।’’
दोनो पदों मे भाव और भाषा साम्य के आधार पर यह कहा जा
सकता है कि चन्द्रसखी का ही पद मीराँ के नाम पर प्रचलित हो
गया है।
२
झूलत राधा सग गिरिधर ।
अबीर गुलाल उडावत, राधा भरि पिचकारी रग ।
लाल भईं वृन्दावन, जमुना केशर चूवत रग ।
नाचत ताल अधर सुर भरे, धिम धिम बाजे मृदग ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरन कमल कूँ रग ॥५०२॥†
प्रथम पक्ति मे राधा का कृष्ण के सग झूलने की और शेष पद मे
होली खेलने की ही अभिव्यक्ति है। पद की तीसरी पक्ति और अन्तिम
पक्ति का द्वितीयांश “चरन कमल कूँ रग” अर्थहीन प्रतीत होता है।
° पाठान्तर १,
झुलत राधा सग गिरिधर, झुलत राधा संग ।
अबील गुलाल की धुम मचाई, डारत पिचकारी रग ।
लाल भयो वृन्दावन जमना, केसर चुवत अनग ।
नाचत ताल अधारे सुर सुन्दरी, डारी डारी बाजे ताल मृदंग ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल कूं बहोत रंग ।